श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 620, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २७-२८ ]
- साधक-संजीवनी *
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नैते सूती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन ! | योगी | = योगी | सर्वेषु | = सब |
|---|---|---|---|---|---|
| एते | = इन दोनों | न, मुह्यति | = मोहित नहीं होता। | कालेषु | = समयमें |
| सूती | = मार्गीको | तस्मात् | = अतः | योगयुक्तः | = योगयुक्त (समतामें स्थित) |
| जानन् | = जाननेवाला | अर्जुन | = हे अर्जुन ! (तू) | भव | = हो जा। |
| कश्चन | = कोई भी |
व्याख्या—‘नैते सूती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन’— शुक्लमार्ग प्रकाशमय है और कृष्णमार्ग अन्धकारमय है। जिनके अन्तःकरणमें उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व नहीं है और जिनके उद्देश्य, ध्येयमें प्रकाशस्वरूप (ज्ञानस्वरूप) परमात्मा ही हैं, ऐसे वे परमात्माको तरफ चलनेवाले साधक शुक्लमार्गी हैं अर्थात् उनका मार्ग प्रकाशमय है। परन्तु जो संसारमें रचे-पचे हैं और जिनका सांसारिक पदार्थोंका संग्रह करना और उनसे सुख भोगना ही ध्येय होता है, ऐसे मनुष्य तो घोर अन्धकारमें हैं ही, पर जो भोग भोगनेके उद्देश्यसे यहाँके भोगोंसे संयम करके यज्ञ, तप, दान आदि शास्त्रविहित शुभ कर्म करते हैं और मरनेके बाद स्वर्गादि ऊँची भोग-भूमियोंमें जाते हैं, वे यद्यपि यहाँके भोगोंमें आसक्त मनुष्योंसे ऊँचे उठे हुए हैं, तो भी आने-जानेवाले (जन्म-मरणके) मार्गमें होनेसे वे भी अन्धकारमें ही हैं। तात्पर्य है कि कृष्णमार्गवाले ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी जन्म-मरणके चक्करमें पड़े रहते हैं। कहीं जन्म गये तो मरना बाकी रहता है और मर गये तो जन्मना बाकी रहता है—ऐसे जन्म-मरणके चक्करमें पड़े हुए वे कोल्हूके बैलकी तरह अनन्तकालतक घूमते ही रहते हैं।
—इस तरह शुक्ल और कृष्ण दोनों मार्गोंके परिणामको जानेवाला मनुष्य योगी अर्थात् निष्काम हो जाता है, भोगी
परिशिष्ट भाव— कामनावाला मनुष्य ही मोहित होता है अर्थात् जन्म-मरणमें जाता है। शुक्ल और कृष्णमार्गको जानेवाला मनुष्य निष्काम हो जाता है, इसलिये वह जन्म-मरणमें नहीं जाता अर्थात् कृष्णमार्गको प्राप्त नहीं होता। इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्सर युध्य च’ और यहाँ कहते हैं—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।’ तात्पर्य है कि भगवत्स्मरण करना अर्थात् भगवान्में लगना भी ‘योग’ है और समतामें स्थित होना अर्थात् संसारसे हटना भी ‘योग’ है। दोनोंका परिणाम एक ही है।
सम्बन्ध—अब भगवान् इस अध्यायमें वर्णित विषयको जाननेकी महिमा बताते हैं।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥