भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 648

श्लोक १४]

  • साधक-संजीवनी *

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परिशिष्ट भाव —पूर्वश्लोकमें पतनकी तरफ जानेवाले संसारी मनुष्योंका वर्णन करके अब उनसे विलक्षण भगवान्की तरफ जानेवाले मनुष्यों-(भक्तों-)-का वर्णन करते हैं। 'दैवी प्रकृति' का अर्थ है—भगवान्का स्वभाव। आसुरी प्रकृतिके आश्रित मनुष्य न तो भगवान्को मानते हैं और न उनकी आज्ञाको ही मानते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका बत्तीसवाँ श्लोक)। परन्तु दैवी प्रकृतिके आश्रित मनुष्य भगवान्को भी मानते हैं और उनकी आज्ञाको भी मानते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

‘ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्’ —अनन्त ब्रह्माण्डोंके अविनाशी बीज भगवान् ही हैं (गीता—सातवें अध्यायका दसवाँ और नवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)—इस प्रकार दृढ़तापूर्वक मानना ही भगवान्को आदि और अविनाशी जानना है। दृढ़ मान्यता भी जाननेके समान होती है। भगवान् सबके आदि और अविनाशी हैं—इसका वर्णन इसी अध्यायके चौथे श्लोकसे ग्यारहवें श्लोकतक हुआ है।

सम्बन्ध—पीछेके श्लोकमें भजन करनेवालोंका वर्णन करके अब भगवान् आगेके श्लोकमें उनके भजनका प्रकार बताते हैं।

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥

नित्ययुक्ताः | = नित्य-निरन्तर (मुझमें) लगे हुए मनुष्य | | = साधनमें लगे हुए = और भक्त्या = प्रेमपूर्वक | माम् | = मुझे | नमस्यन्तः | = नमस्कार करते हुए ---|---|---|---|---|---|---|--- दृढव्रताः | = दृढव्रती होकर | कीर्तयन्तः | = कीर्तन करते हुए | सततम् | = निरन्तर | माम् | = मेरी यतन्तः | = लगनपूर्वक | | = तथा | उपासते | = उपासना करते हैं। | |

व्याख्या —‘नित्ययुक्ताः ’—‘मात्र मनुष्य भगवान्में ही नित्ययुक्त रह सकते हैं, हरदम लगे रह सकते हैं, सांसारिक भोगों और संग्रहमें नहीं। कारण कि समय-समयपर भोगोंसे भी ग्लानि होती है और संग्रहसे भी उपरति होती है। परन्तु भगवान्की प्राप्तिका, भगवान्की तरफ चलनेका जो एक उद्देश्य बनता है, एक दृढ़ विचार होता है, उसमें कभी भी फरक नहीं पड़ता।

भगवान्का अंश होनेसे जीवका भगवान्के साथ अखण्ड सम्बन्ध है। मनुष्य जबतक उस सम्बन्धको नहीं पहचानता, तभीतक वह भगवान्से विमुख रहता है, अपनेको भगवान्से अलग मानता है। परन्तु जब वह भगवान्के साथ अपने नित्य-सम्बन्धको पहचान लेता है, तो फिर वह भगवान्के सम्मुख हो जाता है, भगवान्से अलग नहीं रह सकता और उसको भगवान्के सम्बन्धकी विस्मृति भी नहीं होती—यही उसका ‘नित्ययुक्त’ रहना है।

मनुष्यका भगवान्के साथ ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हूँ’—ऐसा जो स्वयंका सम्बन्ध है, वह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन अवस्थाओंमें, एकात्ममें भजन-ध्यान करते हुए अथवा सेवारूपसे संसारके सब काम करते हुए भी कभी खण्डित नहीं होता, अटलरूपसे सदा ही बना रहता

है। जैसे मनुष्य अपनेको जिस माँ-बापका मान लेता है, सब काम करते हुए भी उसका ‘मैं अमुकका लड़का हूँ’ यह भाव सदा बना रहता है। उसको याद रहे चाहे न रहे, वह याद करे चाहे न करे, पर यह भाव हरदम रहता है; क्योंकि ‘मैं अमुकका लड़का हूँ’—यह भाव उसके ‘मैं’-पनमें बैठ गया है ऐसे ही जो ‘अनादि, अविनाशी, सर्वोपरि भगवान् ही मेरे हैं और मैं उनका ही हूँ’—इस वास्तविकताको जान लेता है, मान लेता है, तो यह भाव हरदम बना रहता है। इस प्रकार भगवान्के साथ अपना वास्तविक सम्बन्ध मान लेना ही ‘नित्ययुक्त’ होना है।

‘दृढव्रताः’ —जो सांसारिक भोग और संग्रहमें लगे हुए हैं, वे जो पारमार्थिक निश्चय करते हैं, वह निश्चय दृढ़ नहीं होता (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। परन्तु जिन्होंने भीतरसे ही अपने मैं-पनको बदल दिया है कि ‘हम भगवान्के हैं और भगवान् हमारे हैं’, उनका यह दृढ़ निश्चय हो जाता है कि ‘हम संसारके नहीं हैं और संसार हमारा नहीं है’; अतः हमें सांसारिक भोग और संग्रहकी तरफ कभी जाना ही नहीं है, प्रत्युत भगवान्के नाते केवल सेवा कर देनी है। इस प्रकार उनका निश्चय बहुत दृढ़ होता है। अपने निश्चयसे वे कभी विचलित नहीं

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