भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

होते। कारण कि उनका उद्देश्य भगवान्का है और वे स्वयं भी भगवान्के अंश हैं। उनके निश्चयमें अदृढ़ता आनेका प्रश्न ही नहीं है। अदृढ़ता तो सांसारिक निश्चयमें आती है, जो कि टिकनेवाला नहीं है।

‘यतन्तश्च’ —जैसे सांसारिक मनुष्य कुटुम्बका पालन करते हैं तो ममतापूर्वक करते हैं, रुपये कमाते हैं तो लोभपूर्वक कमाते हैं, ऐसे ही भगवान्के भक्त भगवत्प्राप्तिके लिये यत्न (साधन) करते हैं तो लगनपूर्वक ही करते हैं। उनके प्रयत्न सांसारिक दीखते हुए भी वास्तवमें सांसारिक नहीं होते; क्योंकि उनके प्रयत्नमात्रका उद्देश्य भगवान् ही होते हैं।

‘भक्त्या कीर्तयन्तो माम्’ —वे भक्त प्रेमपूर्वक कभी भगवान्के नामका कीर्तन करते हैं, कभी नाम-जप करते हैं, कभी पाठ करते हैं, कभी नित्यकर्म करते हैं, कभी भगवत्-सम्बन्धी बातें सुनाते हैं; आदि-आदि। वे जो कुछ वाणी-सम्बन्धी क्रियाएँ करते हैं, वह सब भगवान्का स्तोत्र

परिशिष्ट भाव —भक्त जो कुछ कहता है, वह सब भगवान्का ही कीर्तन है। वह जो कुछ क्रिया करता है, वह सब भगवान्की ही सेवा है* (गीता—नवें अध्यायका सताईसवाँ श्लोक)।

अनित्य संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके कारण भक्त नित्ययुक्त होते हैं।

सम्बन्ध —अनित्य संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके नित्य-तत्त्वकी तरफ चलनेवाले साधक कई प्रकारके होते हैं। उनमेंसे भक्तिके साधकोंका वर्णन पीछेके दो श्लोकोंमें कर दिया, अब दूसरे साधकोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते।

एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥

अन्ये= दूसरे साधककरते हैंविराटरूपकी
ज्ञानयज्ञेन= ज्ञानयज्ञके द्वारा= और
एकत्वेन= एकीभावसे
(अभेदभावसे)अपि= दूसरे भी कई साधक
माम्= मेरापृथक्त्वेन= (अपनेको) पृथक्
मानकर
यजन्तः= पूजन करते हुएविश्वतोमुखम्= चारों तरफ
मुखवाले मेरे
उपासते= मेरी उपासनाबहुधा= (मेरी) अनेक प्रकारसे
(उपासना करते हैं)।
  • कायेन वाचा मनसिन्द्रियैर्वा बुद्ध्याऽऽत्मना वानुसूतस्वभावात्।

करोति यद् यत् सकलं परमं नारायणायति समर्पयेत्तत् ॥ (श्रीमद्भा० ११।१।३६)

‘शरीरसे, वाणीसे, मनसे, इन्द्रियोंसे, बुद्धिसे, अहंकारसे अथवा अनुगत स्वभावसे मनुष्य जो-जो करे, वह सब परमपुरुष भगवान् नारायणके लिये ही है, इस भावसे उन्हें समर्पित कर दे।’

संचारः पदयोः प्रदक्षिणाविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो।

यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ (शिवमानसपूजा)

‘हे शम्भो! मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं। मैं जो-जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है।’

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