भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक १६-१८ ]

  • साधक-संजीवनी *

६४९

व्याख्या —[जैसे, भूखे आदमियोंकी भूख एक होती है और भोजन करनेपर सबकी तृप्ति भी एक होती है; परन्तु उनकी भोजनके पदार्थमें रुचि भिन्न-भिन्न होती है। ऐसे ही परिवर्तनशील अनित्य संसारकी तरफ लगे हुए लोग कुछ भी करते हैं, पर उनकी तृप्ति नहीं होती, वे अभावग्रस्त ही रहते हैं। जब वे संसारसे विमुख होकर केवल परमात्माकी तरफ ही चलते हैं, तब परमात्माकी प्राप्ति होनेपर उन सबकी तृप्ति हो जाती है अर्थात् वे कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाते हैं। परन्तु उनकी रुचि, योग्यता, श्रद्धा, विश्वास आदि भिन्न-भिन्न होते हैं। इसलिये उनकी उपासनाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं।]

‘ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते एकत्वेन’ —कई ज्ञानयोगी साधक ज्ञानयज्ञसे अर्थात् विवेकपूर्वक असत्का त्याग करते हुए सर्वत्र व्यापक परमात्मतत्वको और अपने वास्तविक स्वरूपको एक मानते हुए मेरे निर्गुण-निराकार स्वरूपकी उपासना करते हैं।

इस परिवर्तनशील संसारकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है;

परिशिष्ट भाव —सभी साधक अपनी रुचि, योग्यता और श्रद्धा-विश्वासके अनुसार अलग-अलग साधनोंसे जिसकी भी उपासना करते हैं, वह भगवान्के समग्ररूपकी ही उपासना होती है। आगे सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक इसी समग्ररूपका वर्णन हुआ है।

सम्बन्ध—जब सभी उपासनाएँ अलग-अलग हैं, तो फिर सभी उपासनाएँ आपकी कैसे हुईं? इसपर आगेके चार श्लोक कहते हैं।

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हृतम् ॥ १६ ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च ॥ १७ ॥ गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥

क्रतुः= क्रतुअहम्= मैं हूँ,पवित्रम्= पवित्र
अहम्= मैं हूँ,आज्यम्= घृतओङ्कारः= ओंकार,
यज्ञः= यज्ञअहम्= मैं हूँ,ऋक्= ऋग्वेद,
अहम्= मैं हूँ,अग्निः= अग्निसाम= सामवेद
स्वधा= स्वधाअहम्= मैं हूँ (और)= और
अहम्= मैं हूँ,हृतम्= हवनरूप क्रियायजुः= यजुर्वेद
औषधम्= औषधएव= भीएव= भी
अहम्= मैं हूँ,अहम्= मैं हूँ।अहम्= मैं ही हूँ।
मन्त्रः= मन्त्रवेद्यम्= जाननेयोग्यअस्य= इस