भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

जगतः= सम्पूर्ण जगत्काभर्ता= भर्ता,प्रभवः= उत्पत्ति,
पिता= पिता,प्रभुः= प्रभु,प्रलयः= प्रलय,
धाता= धाता,साक्षी= साक्षी,स्थानम्= स्थान,
माता= माता,निवासः= निवास,निधानम्= निधान (भण्डार)
पितामहः= पितामह,शरणम्= आश्रय,अव्ययम्= (तथा) अविनाशी
गतिः= गति,सुहृत्= सुहृद्,बीजम्= बीज (भी में ही हूँ)।

व्याख्या —[सातवें अध्यायसे बारहवें अध्यायतकके इस मध्यम षट्कर्म भगवान्ने अपनी भक्तिका (उपासनाका) वर्णन किया है और उसमें 'अस्मत्' अर्थात् 'अहम्', 'मम', 'मया', 'मत्' आदि शब्दोंका प्रयोग किया है। यहाँ सोलहवें श्लोकमें तो 'अस्मत्' अर्थात् 'अहम्' शब्दका प्रयोग आठ बार किया गया है। 'अहम्' शब्दका इतना अधिक प्रयोग इस षट्कके दूसरे किसी भी श्लोकमें नहीं किया गया है।

अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वासके अनुसार किसीको भी साक्षात् परमात्माका स्वरूप मानकर उसके साथ सम्बन्ध जोड़ा जाय तो वास्तवमें यह सम्बन्ध सत्के साथ ही है। केवल अपने मन-बुद्धिमें किंचिन्मात्र भी संदेह न हो। जैसे ज्ञानके द्वारा मनुष्य सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदिमें एक परमात्मतत्त्वको ही जानता है। परमात्माके सिवाय दूसरी किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया आदिकी किंचिन्मात्र भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है—इसमें उसको किंचिन्मात्र भी संदेह नहीं होता। ऐसे ही भगवान् विराट्रूपसे अनेक रूपोंमें प्रकट हो रहे हैं; अतः सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं—इसमें अपनेको किंचिन्मात्र भी संदेह नहीं होना चाहिये। कारण कि 'यह सब भगवान् कैसे हो सकते हैं?' यह संदेह साधकको वास्तविक तत्त्वसे, मुक्तिसे वंचित कर देता है और महान् आफतमें फँसा देता है। अतः यह बात दृढ़तासे मान लें कि कार्य-कारणरूपसे स्थूल-सूक्ष्मरूप जो कुछ देखने, सुनने, समझने और माननेमें आता है, वह सब केवल भगवान् ही हैं। इसी कार्य-कारणरूपसे भगवान्की सर्वव्यापकताका वर्णन सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक किया गया है।]

'अहं कृतुहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्' —जो वैदिक रीतिसे किया जाय, वह 'कृतु' होता है। वह कृतु मैं ही हूँ। जो स्मार्त (पौराणिक) रीतिसे किया जाय, वह 'यज्ञ' होता है, जिसको पंचमहायज्ञ आदि स्मार्त-कर्म कहते हैं। वह यज्ञ मैं हूँ। पितरोंके लिये जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसको स्वधा कहते हैं। वह स्वधा मैं ही हूँ। उन कृतु,

यज्ञ और स्वधाके लिये आवश्यक जो शाकल्य है अर्थात् वनस्पतियाँ हैं, बूटियाँ हैं, तिल, जौ, छुहारा आदि औषध है, वह औषध भी मैं ही हूँ।

'मन्त्रोऽहमहेमाज्यमहमनिरहं हतुम्' —जिस मन्त्रसे कृतु, यज्ञ और स्वधा किये जाते हैं, वह मन्त्र भी मैं ही हूँ। यज्ञ आदिके लिये गो-घृत आवश्यक होता है, वह घृत भी मैं ही हूँ। जिस आहवनीय अग्निमें होम किया जाता है, वह अग्नि भी मैं ही हूँ और हवन करनेकी क्रिया भी मैं ही हूँ।

'वेद्यं पवित्रमौकार ऋक्साम यजुरेव च' —वेदोंकी बतायी हुई जो विधि है, उसको ठीक तरहसे जानना 'वेद्य' है। तात्पर्य है कि कामनापूर्तिके लिये अथवा कामना-निवृत्तिके लिये वैदिक और शास्त्रीय जो कुछ कृतु, यज्ञ आदिका अनुष्ठान किया जाता है, वह विधि-विधान-सहित सांगोपांग होना चाहिये। अतः विधि-विधानको जाननेयोग्य सब बातें 'वेद्य' कहलाती हैं। वह वेद्य मेरा स्वरूप है।

यज्ञ, दान और तप—ये तीनों निष्काम पुरुषोंको महान् पवित्र करनेवाले हैं—'यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्' (१८।५)। इनमें निष्कामभावसे जो हव्य आदि वस्तुएँ खर्च होती हैं, वे भी पवित्र हो जाती हैं और इनमें निष्कामभावसे जो क्रिया की जाती है, वह भी पवित्र हो जाती है। यह पवित्रता मेरा स्वरूप है।

कृतु, यज्ञ आदिका अनुष्ठान करनेके लिये जिन ऋचाओंका उच्चारण किया है, उन सबमें सबसे पहले 'ॐ' का ही उच्चारण किया जाता है। इसका उच्चारण करनेसे ही ऋचाएँ अभीष्ट फल देती हैं। वेदवादियोंकी यज्ञ, दान, तप आदि सभी क्रियाएँ 'ॐ' का उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं (गीता—सत्रहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। वैदिकोंके लिये प्रणवका उच्चारण मुख्य है। इसलिये भगवान्ने प्रणवको अपना स्वरूप बताया है।

उन कृतु, यज्ञ आदिकी विधि बतानेवाले ऋग्वेद,