श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 652, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १६-१८]
- साधक-संजीवनी *
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सामवेद और यजुर्वेद—ये तीनों वेद हैं। जिसमें नित्याक्षरवाले मन्त्रोंकी ऋचाएँ होती हैं, उन ऋचाओंके समुदायको 'ऋग्वेद' कहते हैं। जिसमें स्वर्गसहित गानेमें आनेवाले मन्त्र होते हैं, वे सब मन्त्र 'सामवेद' कहलाते हैं। जिसमें अनित्याक्षरवाले मन्त्र होते हैं, वे मन्त्र 'यजुर्वेद' कहलाते हैं। ये तीनों वेद भगवान्के ही स्वरूप हैं।
'पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः'—इस जड-चेतन, स्थावर-जंगम आदि सम्पूर्ण संसारको मैं ही उत्पन्न करता हूँ—'अहं कृतन्मस्य जगतः प्रभवः' (गीता ७।६) और बार-बार अवतार लेकर मैं ही इसकी रक्षा करता हूँ। इसलिये मैं 'पिता' हूँ। ग्यारहवें अध्यायके तैत्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनने भी कहा है कि 'आप ही इस चराचर जगत्के पिता हैं'—'पितासि लोकस्य चराचरस्य'।
इस संसारको सब तरहसे मैं ही धारण करता हूँ और संसारमात्रका जो कुछ विधान बनता है, उस विधानको बनानेवाला भी मैं हूँ। इसलिये मैं 'धाता' हूँ।
जीवोंकी अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जिस-जिस योनिमें, जैसे-जैसे शरीरोंकी आवश्यकता पड़ती है, उस-उस योनिमें वैसे-वैसे शरीरोंको पैदा करनेवाली 'माता' मैं हूँ अर्थात् मैं सम्पूर्ण जगत्की माता हूँ।
प्रसिद्धिमें ब्रह्माजी सम्पूर्ण सृष्टिको पैदा करनेवाले हैं—इस दृष्टिसे ब्रह्माजी प्रजाके पिता हैं। वे ब्रह्माजी भी मेरेसे प्रकट होते हैं—इस दृष्टिसे मैं ब्रह्माजीका पिता और प्रजाका 'पितामह' हूँ। अर्जुनने भी भगवान्को ब्रह्माके आदिकर्ता कहा है—'ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे' (११।३७)।
परिशिष्ट भाव —जैसे ज्ञानकी दृष्टिसे गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं—'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' (गीता ३।२८), ऐसे ही भक्तिकी दृष्टिसे भगवान्की वस्तु ही भगवान्के अपित हो रही है। जैसे कोई गंगाजलसे गंगाका पूजन करे, दीपकसे सूर्यका पूजन करे, पुष्पोंसे पृथ्वीका पूजन करे, ऐसे ही भगवान्की वस्तुसे भगवान्का ही पूजन हो रहा है! वास्तवमें देखा जाय तो पूज्य भी भगवान् हैं, पूजाकी सामग्री भी भगवान् हैं, पूजा भी भगवान् हैं तथा पूजक भी भगवान् हैं!
लौकिक बीज तो खेतीसे पैदा होनेवाला होता है, पर भगवान्रूपी अलौकिक बीज पैदा होनेवाला नहीं है, इसलिये
१-जिन मन्त्रोंमें अस्त्र-शस्त्र, भवन आदिका निर्माण करनेवाली लौकिक विद्याओंका वर्णन है, वे सब मन्त्र 'अश्र्ववेद' कहलाते हैं। यद्यपि अनुसमूच्चयार्थ 'च' अव्ययसे अश्र्ववेदका ग्रहण किया जा सकता है, तथापि उसमें लौकिक विद्याओंका वर्णन होनेसे क्रतु, यज्ञ आदिके अनुष्ठानमें उसका नाम नहीं लिया गया है। इसी कारणसे आगे बीसवें-इक्कीसवें श्लोकोंमें आये 'त्रैविद्याः' और 'त्रयीधर्ममनुप्रपन्नाः' पदोंमें भी ऋक्, साम, यजुः—इन तीनोंका ही संकेत किया गया है।
२-महासर्ग अवस्थामें सम्पूर्ण प्राणी जिसमें रहते हैं, वह 'निवास' है और महाप्रलय-अवस्थामें प्रकृतिसहित सारा संसार जिसमें रहता है, वह 'स्थान' है। यही निवास और स्थानमें अन्तर है।
'गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्'—प्राणियोंके लिये जो सर्वोपरि प्रापणीय तत्त्व है, वह 'गति'-स्वरूप मैं ही हूँ। संसारमात्रका भरण-पोषण करनेवाला 'भर्ता' और संसारका मालिक 'प्रभु' मैं ही हूँ। सब समयमें सबको ठीक तरहसे जाननेवाला 'साक्षी' मैं हूँ। मेरे ही अंश होनेसे सभी जीव स्वरूपसे नित्य-निरन्तर मेरेमें ही रहते हैं, इसलिये उन सबका 'निवास'-स्थान मैं ही हूँ। जिसका आश्रय लिया जाता है, वह 'शरण' अर्थात् शरणगतवत्सल मैं ही हूँ। बिना कारण प्राणिमात्रका हित करनेवाला 'सुहृद्' अर्थात् हितैषी भी मैं हूँ।
'प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्'—सम्पूर्ण संसार मेरेसे ही उत्पन्न होता है और मेरेमें ही लीन होता है, इसलिये मैं 'प्रभव' और 'प्रलय' हूँ अर्थात् मैं ही संसारका निमित्तकारण और उपादानकारण हूँ (गीता—सातवें अध्यायका छठा श्लोक)।
महाप्रलय होनेपर प्रकृतिसहित सारा संसार मेरेमें ही रहता है, इसलिये मैं संसारका 'स्थान' हूँ।
संसारकी चाहे सर्ग-अवस्था हो, चाहे प्रलय-अवस्था हो, इन सब अवस्थाओंमें प्रकृति, संसार, जीव तथा जो कुछ देखने, सुनने, समझनेमें आता है, वह सब-का-सब मेरेमें ही रहता है, इसलिये मैं 'निधान' हूँ।
सांसारिक बीज तो वृक्षसे पैदा होता है और वृक्षको पैदा करके नष्ट हो जाता है; परन्तु ये दोनों ही दोष मेरेमें नहीं हैं। मैं अनादि हूँ अर्थात् पैदा होनेवाला नहीं हूँ और अनन्त सृष्टियाँ पैदा करके भी जैसा-का-तैसा ही रहता हूँ। इसलिये मैं 'अव्यय बीज' हूँ।