भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

भगवान्ने सातवें अध्यायमें अपनेको 'सनातन बीज' बताया—'बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्' (७।१०)। अब यहाँ भगवान् अपनेको 'अव्यय बीज' बताते हैं—'बीजमव्ययम्'। कारण कि लौकिक बीज तो अंकुर पैदा करके नष्ट हो जाता है, पर भगवान्‌रूपी अलौकिक बीज अनन्त ब्रह्माण्ड पैदा करके भी ज्यों-का-त्यों रहता है, उसमें किंचिन्मात्र भी विकार नहीं होता। तात्पर्य है कि भगवान् सम्पूर्ण जगत्के आदिमें भी रहते हैं और अन्तमें भी रहते हैं। जो आदि और अन्तमें रहता है, वही मध्य-(वर्तमान-) में भी रहता है— यह सिद्धान्त है। जैसे अनेक तरहकी चीजें मिट्टीसे पैदा होती हैं, मिट्टीमें ही रहती हैं और अन्तमें मिट्टीमें ही मिल जाती हैं। ऐसे ही संसारमात्रके जितने भी बीज हैं, वे सब भगवान्‌से ही पैदा होते हैं, भगवान्‌में ही रहते हैं और अन्तमें भगवान्‌में ही लीन हो जाते हैं, (गीता—दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि सांसारिक बीज तो उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, पर भगवान्‌रूपी अविनाशी बीज आदि, मध्य और अन्तमें ज्यों-का-त्यों रहता है। अतः वर्तमानमें संसाररूपसे भगवान् ही हैं। भगवान्‌के सिवाय कुछ नहीं है।

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥

अर्जुन= हे अर्जुन!करता हूँ= और
(संसारके= और (फिर उसमृत्युः= मृत्यु
हितकेजलको)= तथा
लिये)वर्षम्= (मैं ही)सत्= सत्
अहम्= मैं (ही)वर्षरूपसे= और
तपामि= सूर्यरूपसेउत्सृजामि= बरसा देता हूँ।असत्= असत्
तपता हूँ,(और तो(भी)
अहम्= मैं (ही)क्या कहूँ)अहम्, एव= मैं ही
निगृह्णामि= जलको ग्रहणअमृतम्= अमृतहूँ।

व्याख्या—'तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च' —पृथ्वीपर जो कुछ अशुद्ध, गंदी चीजें हैं, जिनसे रोग पैदा होते हैं, उनका शोषण करके प्राणियोंको नीरोग करनेके लिये* अर्थात् ओषधियों, जड़ी-बूटियोंमें जो जहरीला भाग है, उसका शोषण करनेके लिये और पृथ्वीका जो जलीय भाग है, जिससे अपवित्रता होती है, उसको सुखानेके लिये मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ। सूर्यरूपसे उन सबके जलीय भागको ग्रहण करके और उस जलको शुद्ध तथा मीठा बना करके समय आनेपर वर्षरूपसे प्राणिमात्रके हितके लिये बरसा देता हूँ, जिससे प्राणिमात्रका जीवन चलता है।

'अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन' —मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ अर्थात् मात्र जीवोंका प्राण धारण करते हुए जीवित रहना (न मरना) और सम्पूर्ण जीवोंके

पिण्डप्राणोंका वियोग होना (मरना) भी मैं ही हूँ।

और तो क्या कहूँ, सत्-असत्, नित्य-अनित्य, कारण-कार्यरूपसे जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि जैसे महात्माकी दृष्टिमें सब कुछ वासुदेव (भगवत्स्वरूप) ही है—'वासुदेवः सर्वम्', ऐसे ही भगवान्‌की दृष्टिमें सत्-असत्, कारण-कार्य सब कुछ भगवान् ही हैं। परन्तु सांसारिक लोगोंकी दृष्टिमें सब एक-दूसरेसे विरुद्ध दीखते हैं; जैसे—जीना और मरना अलग-अलग दीखता है, उत्पत्ति और विनाश अलग-अलग दीखता है, स्थूल और सूक्ष्म अलग-अलग दीखते हैं, सत्त्व-रज-तम—ये तीनों अलग-अलग दीखते हैं, कारण और कार्य अलग-अलग दीखते हैं, जल और बर्फ अलग-अलग दीखते हैं। परन्तु वास्तवमें संसाररूपमें भगवान् ही प्रकट होनेसे, भगवान् ही बने हुए होनेसे सब

  • नीरोगता सूर्यसे ही होती है—'आरोग्यं भास्करादिच्छेत्' (लौगाक्षिस्मृति)
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