श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 654, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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कुछ भगवत्स्वरूप ही है। भगवान्के सिवाय उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। जैसे सूतसे बने हुए सब कपड़ोंमें केवल सूत-ही-सूत है, ऐसे ही वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, पदार्थ आदि सब कुछ केवल भगवान्-ही-भगवान् हैं।
परिशिष्ट भाव —सुष्ठिसे पहले भी परमात्मा थे और अन्तमें भी परमात्मा रहेंगे, फिर बीचमें दूसरा कहाँसे आया? इसलिये अमृत भी भगवान्का स्वरूप है और मृत्यु भी भगवान्का स्वरूप है। सत् (परा प्रकृति) भी भगवान्का स्वरूप है और असत् (अपरा प्रकृति) भी भगवान्का स्वरूप है। जैसे अन्नकूटके प्रसादमें रसगुल्ले, गुलाबजामुन आदि भी होते हैं और मेथी, करेला आदिका साग भी होता है अर्थात् मीठा भी भगवान्का प्रसाद होता है और कड़वा भी भगवान्का प्रसाद होता है। ऐसे ही जो हमारे मनको सुहाये, वह भी भगवान्का स्वरूप है और जो नहीं सुहाये, वह भी भगवान्का स्वरूप है। सूर्यरूपसे जलको ग्रहण करना और फिर उसको बरसा देना—ये दोनों विपरीत कार्य (ग्रहण और त्याग) भी भगवान् करते हैं। इतना ही नहीं, जलरूपसे ग्रहण किये जानेवाले भी भगवान् हैं, बरसनेवाले भी भगवान् हैं और वर्षारूप क्रिया भी भगवान् हैं!
‘सदसच्चाहमर्जुन’ —संसारमें सत् (परा) और असत्-(अपरा-) के सिवाय अन्य कुछ नहीं है। संसार असत् है और उसमें रहनेवाला परमात्मतत्त्व सत् है। शरीर असत् है और उसमें रहनेवाला जीवात्मा सत् है। शरीर और संसार परिवर्तनशील हैं, जीवात्मा और परमात्मा अपरिवर्तनशील हैं। शरीर और संसार नाशवान् हैं, जीवात्मा और परमात्मा अविनाशी हैं (गीता—दूसरे अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। भगवान् कहते हैं कि परिवर्तनशील भी मैं हूँ और अपरिवर्तनशील भी मैं हूँ, नाशवान् भी मैं हूँ और अविनाशी भी मैं हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ भगवान्-ही-भगवान् हैं। भगवान्के सिवाय और कुछ भी नहीं है (गीता—सातवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।
‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ —इसमें तो विवेक है, पर ‘सदसच्चाहम्’ —इसमें विवेक नहीं है, प्रत्युत विश्वास है। सब कुछ भगवान् ही हैं—यह विश्वास विवेकसे भी तेज है। कारण कि विवेक वहीं काम करता है, जहाँ सत् और असत् दोनोंका विचार होता है। जब असत् है ही नहीं तो फिर विवेक क्या करे? असत्को मानें तो विवेक है और असत्को न मानें तो विश्वास है। विवेकमें सत्-असत्का विभाग है, पर विश्वासमें विभाग है ही नहीं। विश्वासमें केवल सत्-ही-सत् अर्थात् परमात्मा-ही-परमात्मा हैं।
ज्ञानमार्गमें विवेककी और भक्तिमार्गमें विश्वास तथा प्रेमकी मुख्यता है। ज्ञानमार्गमें सत्-असत्, जड़-चेतन, नित्य-अनित्य आदिका विवेक मुख्य होनेसे इसमें ‘द्वैत’ है, पर भक्तिमार्गमें एक भगवान्का ही विश्वास मुख्य होनेसे इसमें ‘अद्वैत’ है। तात्पर्य है कि दो सत्ता न होनेसे वास्तविक अद्वैत भक्तिमें ही है।
ज्ञानमार्गमें साधक असत्का निषेध करता है। निषेध करनेसे असत्की सत्ताका भाव बना रह सकता है। साधक असत्के निषेधपर जितना जोर लगाता है, उतना ही असत्की सत्ताका भाव दृढ़ होता है। अतः असत्का निषेध करना उतना बढ़िया नहीं है, जितना उसकी उपेक्षा करना बढ़िया है। उपेक्षा करनेकी अपेक्षा भी ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’—यह भाव और भी बढ़िया है। अतः भक्त न असत्को हटाता है, न असत्की उपेक्षा करता है प्रत्युत सत्-असत् सबमें परमात्माका ही दर्शन करता है; क्योंकि वास्तवमें सब कुछ परमात्मा ही हैं। भगवान् कहते हैं—
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत् सोऽस्यहम्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता १।१।३२)
‘सुष्ठिसे पहले भी मैं ही विद्यमान था, मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं था और सुष्ठि उत्पन्न होनेके बाद जो कुछ भी यह संसार दीखता है, वह भी मैं ही हूँ। सत्, असत् तथा सत्-असत्से परे जो कुछ हो सकता है, वह भी मैं ही हूँ। सुष्ठिके सिवाय भी जो कुछ है, वह मैं ही हूँ और सुष्ठिका नाश होनेपर जो शेष रहता है, वह भी मैं ही हूँ।’
शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, अहम् आदि सब कुछ भगवान् ही हैं। जैसे हम मनसे हरिद्वारका चिन्तन करें तो हरिकी पैड़ी, घंटाघर आदि स्थावर भी मन ही बनता है और गंगाजी तथा उसमें तैरती हुई मछलियाँ, स्नान करते हुए मनुष्य आदि जंगम भी मन ही बनता है अर्थात् स्थावर भी मन ही हुआ और जंगम भी मन ही हुआ। इसी तरह सत् भी भगवान्