श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 656, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
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रसको सोमरस कहते हैं। यज्ञ करनेवाले उस सोमरसको वैदिक मन्त्रोंके द्वारा अभिमन्त्रित करके पीते हैं, इसलिये उनको 'सोमपाः' कहा गया है।
वेदोंमें वर्णित यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले और वेदमन्त्रोंसे अभिमन्त्रित सोमरसको पीनेवाले मनुष्योंके स्वर्गके प्रतिबन्धक पाप नष्ट हो जाते हैं। इसलिये उनको 'पूतपापाः' कहा गया है।
भगवान्ने पूर्वश्लोकमें कहा है कि सत्-असत् सब कुछ मैं ही हूँ, तो इन्द्र भी भगवत्स्वरूप ही हुए। अतः यहाँ 'माम्' पदसे इन्द्रको ही लेना चाहिये; क्योंकि सकाम यज्ञका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य स्वर्गप्राप्तिकी इच्छासे स्वर्गके अधिपति इन्द्रका ही पूजन करते हैं और इन्द्रसे ही
परिशिष्ट भाव —यहाँ ऐसे मनुष्योंका वर्णन हुआ है, जिनके भीतर संसारकी सत्ता और महत्ता बैठी हुई है और जो भगवान्की अवधिपूर्वक उपासना करनेवाले हैं (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। ऐसी मनुष्योंकी उपासनाका फल नाशवान् ही होता है (गीता—सातवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।
समग्ररूपके अन्तर्गत होनेसे सब भगवान् ही हैं, इसलिये यहाँ इन्द्रके लिये भी 'माम्' पद आया है। मनुष्यलोककी अपेक्षा पवित्र होनेसे इन्द्रलोकके लिये 'पुण्यम्' पद आया है।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं-
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं
त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना-
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
| ते | = वे | पुण्ये | = पुण्य | हुए सकाम धर्मका |
|---|---|---|---|---|
| तम् | = उस | क्षीणे | = क्षीण होनेपर | अनुप्रपन्नाः = आश्रय लिये हुए |
| विशालम् | = विशाल | मर्त्यलोकम् | = मृत्युलोकमें | कामकामाः = भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य |
| स्वर्गलोकम् | = स्वर्गलोकके (भोगोंको) | विशन्ति | = आ जाते हैं। | गतागतम् = आवागमनको |
| भुक्त्वा | = भोगकर | एवम् | = इस प्रकार | लभन्ते = प्राप्त होते हैं। |
| त्रयीधर्मम् | = तीनों वेदोंमें कहे |
इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा। अनया बद्धसूतेन्द्रो लक्ष्मिष्वेधी प्रजायते ॥
(रसेन्द्रचूडामणि ६।६—१)
'जिसके पन्द्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्पकी तरह होती है, जहाँसे पत्ते निकलते हैं—वे गौंठे जिसकी लाल होती हैं, ऐसी वह पूर्णिमाके दिन लायी हुई पंचांग-(मूल, डण्डी, पत्ते, फूल और फल- ) से युक्त सोमवल्ली पारदको बद्ध कर देती है। पूर्णिमाके दिन लाया हुआ पंचांग-(मूल, छाल, पत्ते, फूल और फल- ) से युक्त सोमवृक्ष भी पारदको बांधना, पारदकी भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परन्तु सोमवल्ली और सोमवृक्ष—इन दोनोंमें सोमवल्ली अधिक गुणोंवाली है। इस सोमवल्लीका कृष्णपक्षमें प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है और शुक्लपक्षमें पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह यह लता बढ़ती रहती है। पूर्णिमाके दिन इस लताका कन्द निकाला जाय तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरेके सहित इस कन्दमें बँधा हुआ पारद देहको लोहेकी तरह दृढ़ बना देता है और इससे बँधा हुआ पारद लक्ष्मिष्वेधी हो जाता है अर्थात् एकगुणा बद्ध पारद लाखगुणा लोहेको सोना बना देता है। यह सोम नामकी लता अत्यन्त ही दुर्लभ है।'