भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

व्याख्या —‘ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं’ कामकामालभन्ते—स्वर्गलोक भी विशाल (विस्तृत) है, वहाँकी आयु भी विशाल (लम्बी) है और वहाँकी भोग-सामग्री भी विशाल (बहुत) है। इसलिये इन्द्रलोकको ‘विशाल’ कहा गया है।

स्वर्गकी प्राप्ति चाहनेवाले न तो भगवान्का आश्रय लेते हैं और न भगवत्प्राप्तिके किसी साधनका ही आश्रय लेते हैं। वे तो केवल तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मों- (अनुष्ठानों-)का ही आश्रय लेते हैं। इसलिये उनको त्रयीधर्मके शरण बताया गया है।

‘गातागतम्’ का अर्थ है—जाना और आना। सकाम अनुष्ठान करनेवाले स्वर्गके प्राप्तक जिन पुण्योंके फलस्वरूप स्वर्गमें जाते हैं, उन पुण्योंके समाप्त होनेपर वे पुनः मृत्युलोकमें लौट आते हैं। इस प्रकार उनका घटीयन्त्रकी

तरह बार-बार सकाम शुभकर्म करके स्वर्गमें जाने और फिर लौटकर मृत्युलोकमें आनेका चक्कर चलता ही रहता है। इस चक्करसे वे कभी छूट नहीं पाते।

अगर पूर्वश्लोकमें आये ‘पूतपापाः ’ पदसे जिनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये हैं और यहाँ आये ‘क्षीणे पुण्ये ’ पदोंसे जिनके सम्पूर्ण पुण्य क्षीण हो गये हैं—ऐसा अर्थ लिया जाय, तो उनको (पाप-पुण्य दोनों क्षीण होनेसे) मुक्त हो जाना चाहिये? परन्तु वे मुक्त नहीं होते, प्रत्युत आवागमनको प्राप्त होते हैं। इसलिये यहाँ ‘पूतपापाः ’ पदसे वे लिये गये हैं, जिनके स्वर्गके प्रतिबन्धक पाप यज्ञ करनेसे नष्ट हो गये हैं और ‘क्षीणे पुण्ये ’ पदोंसे वे लिये गये हैं, जिनके स्वर्गके प्राप्तक पुण्य वहाँका सुख भोगनेसे समाप्त हो गये हैं। अतः सम्पूर्ण पापों और पुण्योंके नाशकी बात यहाँ नहीं आयी है।

सम्बन्ध —जो त्रयीधर्मका आश्रय लेते हैं, उनको तो देवताओंसे प्रार्थना—याचना करनी पड़ती है; परन्तु जो केवल मेरा ही आश्रय लेते हैं, उनको अपने योगक्षेमके लिये मनमें चिन्ता, संकल्प अथवा याचना नहीं करनी पड़ती—यह बात भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

अनन्याश्रित्यन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥

ये= जोपर्युपासते= (मेरी) भलीभाँतियोगक्षेमम्= योगक्षेम (अप्राप्त-
अनन्याः= अनन्यउपासना करते हैं,की प्राप्ति और
जनाः= भक्तनित्याभि-प्राप्तकी रक्षा)
माम्= मेरायुक्तानाम्= (मुझमें) निरन्तरअहम्= मैं
चिन्तयन्तः= चिन्तन करतेलगे हुएवहामि= वहन करता हूँ।
हुएतेषाम्= उन भक्तोंका

व्याख्या —‘अनन्याश्रित्यन्तो मां ये जनाः पर्युपासते’—जो कुछ देखने, सुनने और समझनेमें आ रहा है, वह सब-का-सब भगवान्का स्वरूप ही है और उसमें जो कुछ परिवर्तन तथा चेष्टा हो रही है, वह सब-की-सब भगवान्की लीला है—ऐसा जो दृढ़तासे मान लेते हैं, समझ लेते हैं, उनकी फिर भगवान्के सिवाय कहीं भी महत्त्वबुद्धि नहीं होती। वे भगवान्में ही लगे रहते हैं। इसलिये वे ‘अनन्य’ हैं। केवल भगवान्में ही महत्ता और प्रियता होनेसे उनके द्वारा स्वतः भगवान्का ही चिन्तन होता है।

‘अनन्याः’ कहनेका दूसरा भाव यह है कि उनके साधन और साध्य केवल भगवान् ही हैं अर्थात् केवल भगवान्के ही शरण होना है, उन्हींका चिन्तन करना है, उन्हींकी उपासना करनी है और उन्हींको प्राप्त करना है—ऐसा उनका दृढ़ भाव

है। भगवान्के सिवाय उनका कोई अन्य भाव है ही नहीं; क्योंकि भगवान्के सिवाय अन्य सब नाशवान् है। अतः उनके मनमें भगवान्के सिवाय अन्य कोई इच्छा नहीं है; अपने जीवन-निर्वाहकी भी इच्छा नहीं है। इसलिये वे अनन्य हैं।

वे खाना-पीना, चलना-फिरना, बातचीत करना, व्यवहार करना आदि जो कुछ भी काम करते हैं, वह सब भगवान्की ही उपासना है; क्योंकि वे सब काम भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही करते हैं।

‘तेषां नित्याभियुक्तानाम्’ —जो अनन्य होकर भगवान्का ही चिन्तन करते हैं और भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही सब काम करते हैं, उन्हींके लिये यहाँ ‘नित्याभि- युक्तानाम् ’ पद आया है।

इसको दूसरे शब्दोंमें इस प्रकार समझें कि वे संसारसे