भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

वासुदेव ही है (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और मेरी दृष्टिमें भी सत्-असत् सब कुछ मैं ही हूँ (नवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। जब सब कुछ मैं ही हूँ, तो कोई किसी देवताकी पुष्टिके लिये यज्ञ करता है, उस यज्ञके द्वारा देवतारूपमें मेरी ही पुष्टि होती है। कोई किसीको दान देता है, तो दान लेनेवालेके रूपमें मेरा ही अभाव दूर होता है, उससे मेरी ही सहायता होती है। कोई तप करता है, तो उस तपसे तपस्वीके रूपमें मेरेको ही सुख-शान्ति मिलती है। कोई किसीको भोजन कराता है, तो उस भोजनसे प्राणोंके रूपमें मेरी ही तृप्ति होती है। कोई शौच-स्नान करता है, तो उससे उस मनुष्यके रूपमें मेरेको ही प्रसन्नता होती है। कोई पेड़-पौधोंको खाद देता है, उनको जलसे सींचता है तो वह खाद और जल पेड़-पौधोंके रूपमें मेरेको ही मिलता है और उनसे मेरी ही पुष्टि होती है। कोई किसी दीन-दुःखी, अपाहिजकी तन-मन-धनसे सेवा करता है तो वह मेरी ही सेवा होती है। कोई वैद्य-डॉक्टर किसी रोगीका इलाज करता है, तो वह इलाज मेरा ही होता है। कोई कुत्तोंको रोटी डालता है; कबूतरोंको दाना डालता है; गायोंकी सेवा करता है; भूखोंको अन्न देता है; प्यासोंको जल पिलाता है; तो उन सबके रूपमें मेरी ही सेवा होती है। उन सब वस्तुओंको मैं ही ग्रहण करता हूँ*। जैसे कोई किसी मनुष्यकी सेवा करे, उसके किसी अंगकी सेवा करे, उसके कुटुम्बकी सेवा करे, तो वह सब सेवा उस मनुष्यकी ही होती है। ऐसे ही मनुष्य जहाँ-कहीं सेवा करे, जिस-किसीकी सहायता करे, वह सेवा और सहायता मेरेको ही मिलती है। कारण कि मेरे बिना अन्य कोई है ही नहीं। मैं ही अनेक रूपोंमें प्रकट हुआ हूँ—‘बहु स्यां प्रजायेय’ (तैत्तिरीय० २।६)। तात्पर्य यह हुआ कि अनेक रूपोंमें सब कुछ ग्रहण करना ही भगवान्का भोक्ता बनना है। भगवान्का मालिक बनना क्या है?

भगवत्त्वको जाननेवाले भक्तोंकी दृष्टिमें अपरा और परा-प्रकृतिरूप मात्र संसारके मालिक भगवान् ही हैं।

  • एक कथा सुनी है कि एक बार श्रीनामदेवजी महाराज तीर्थयात्रामें गये। यात्रामें कहींपर एक वृक्षके नीचे उन्होंने रोटियाँ बनायीं और सामानमेंसे घी लेनेके लिये पीछे घूमे तो इतनेमें ही एक कुत्ता आकर मुँहमें रोटी लेकर भागा। नामदेवजी महाराजने घी लेकर देखा कि कुत्ता रोटी लेकर भाग रहा है तो वे भी हाथमें घीका पात्र लिये उसके पीछे भागते हुए कहने लगे—‘हे नाथ! आपको ही तो भोग लगाना है, फिर रूखी रोटी लेकर क्यों भाग रहे हो? रोटीपर थोड़ा घी तो लगाने दीजिये।’ नामदेवजीके ऐसा कहते ही कुत्तेमेंसे भगवान् प्रकट हो गये। कुत्तेमें भगवान्के सिवाय और था ही कौन? नामदेवजी जान गये तो वे प्रकट हो गये। इस प्रकार प्राणिमात्रमें तत्त्वसे भगवान् ही हैं। इसलिये जिस किसीको जो कुछ दिया जाता है, वह भगवान्को ही मिलता है।

संसारमात्रपर उनका ही अधिकार है। सृष्टिकी रचना करें या न करें, संसारकी स्थिति रखें या न रखें, प्रलय करें या न करें; प्राणियोंको चाहे जहाँ रखें, उनका चाहे जैसा संचालन करें, चाहे जैसा उपभोग करें, अपनी मरजीके मुताबिक चाहे जैसा परिवर्तन करें, आदि मात्र परिवर्तन-परिवर्द्धन करनेमें भगवान्की बिलकुल स्वतन्त्रता है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे भोगी पुरुष भोग और संग्रहका चाहे जैसा उपभोग करनेमें स्वतन्त्र है (जबकि उसकी स्वतन्त्रता मानी हुई है, वास्तवमें नहीं है), ऐसे ही भगवान् मात्र संसारका चाहे जैसा परिवर्तन-परिवर्द्धन करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र हैं। भगवान्की वह स्वतन्त्रता वास्तविक है। यही भगवान्का मालिक बनना है।

‘न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते’—वास्तवमें सत्-असत्, जड़-चेतन आदि सब कुछ मैं ही हूँ। अतः जो भी कर्तव्य-कर्म किये जायें, उन कर्मोंका और उनके फलोंका भोक्ता मैं ही हूँ, तथा सम्पूर्ण सामग्रीका मालिक भी मैं ही हूँ। परन्तु जो मनुष्य इस तत्त्वको नहीं जानते, वे तो यही समझते हैं कि हम जिस किसीको जो कुछ देते हैं, खिलाते हैं, पिलाते हैं, वह सब उन-उन प्राणियोंको ही मिलता है; जैसे—हम यज्ञ करते हैं, तो यज्ञके भोक्ता देवता बनते हैं; दान देते हैं, तो दानका भोक्ता वह लेनेवाला बनता है? कुत्तेको रोटी और गायको घास देते हैं, तो उस रोटी और घासके भोक्ता कुत्ता और गाय बनते हैं; हम भोजन करते हैं, तो भोजनके भोक्ता हम स्वयं बनते हैं, आदि-आदि। तात्पर्य यह हुआ कि वे सब रूपोंमें मेरेको न मानकर अन्यको ही मानते हैं, इसीसे उनका पतन होता है। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह किसी अन्यको भोक्ता और मालिक न मानकर केवल मेरेको ही भोक्ता और मालिक माने अर्थात् जो कुछ चीज दी जाय, उसको मेरी ही समझकर मेरे अर्पण करें—‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।’

दूसरा भाव यह है कि मनुष्यके पास जो कुछ भोग और ऐश्वर्य है, वह सब मेरा ही है और मेरे विराटरूप संसारकी