श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 662, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २५ ]
- साधक-संजीवनी *
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सेवाके लिये ही है। परन्तु भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त मनुष्य उस तत्त्वको न जाननेके कारण उस भोग और ऐश्वर्यको अपना और अपने लिये मान लेते हैं, जिससे वे यही समझते हैं कि ये सब चीजें हमारे उपभोगमें आनेवाली हैं और हम इनके अधिपति हैं, मालिक हैं। पर वास्तवमें वे उन चीजोंके गुलाम हो जाते हैं। वे जितना ही उन चीजोंको अपनी और अपने लिये मानते हैं, उतने ही उनके पराधीन हो जाते हैं। फिर वे उन चीजोंके बनने-बिगड़नेसे अपना बनना-बिगड़ना मानने लगते हैं। इसलिये उनका
पतन हो जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरेको सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और मालिक जाननेसे मुक्ति हो जाती है और न जाननेसे पतन हो जाता है।
‘च्यवन्ति’ पदका तात्पर्य है कि भगवान्को प्राप्त न होनेसे उनका पतन हो जाता है। वे शुभकर्म करके ऊँचे ऊँचे लोकोंमें चले जायें, तो यह भी उनका पतन है; क्योंकि वहाँसे उनको पीछे लौटकर आना ही पड़ता है (गीता—नवै अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। वे आवागमनको प्राप्त होते ही रहते हैं; मुक्त नहीं हो सकते।
परिशिष्ट भाव —पाँचवें अध्यायके अन्तमें भी भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण यज्ञों और तपोका भोक्ता बताया है—‘भोक्तास् यज्ञतपसाम्’ (५।२९)। वहाँ तो भगवान्ने अन्ययरीतिसे अपनेको सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता जाननेवालोंको शान्ति प्राप्त होनेकी बात कही है और यहाँ व्यतिरेकरीतिसे वैसा न जाननेवालोंका पतन होनेकी बात कही है। स्वयं भोक्ता बननेसे ही पतन होता है। भगवान्को सम्पूर्ण शुभकर्मोंका भोक्ता माननेसे अपनेमें भोक्तापन या भोगेच्छा नहीं रहती। भोगेच्छा न रहनेसे शान्ति प्राप्त हो जाती है।
वास्तवमें सम्पूर्ण कर्मोंके महाकर्ता और महाभोक्ता भगवान् ही हैं। परन्तु कर्ता-भोक्ता होते हुए भी भगवान् वास्तवमें निर्लिप्त ही हैं अर्थात् उनमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है—‘तस्य कर्तारमपि मां विदध्यकर्तारमव्ययम्’ (गीता ४।१३), ‘न मां कर्माणि लिप्यन्ति न मे कर्मफलं स्पृहा’ (गीता ४।१४)।
सम्बन्ध—जो भगवान्को सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और मालिक न मानकर देवता आदिका सकामभावसे पूजन करते हैं, उनकी गतियोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ २५ ॥
| देवव्रताः | = (सकामभावसे) देवताओंका पूजन करनेवाले (शरीर छोड़नेपर) | पितृव्रताः | = पितरोंका पूजन करनेवाले | भूतानि | = भूत-प्रेतोंको |
|---|---|---|---|---|---|
| देवान् | = देवताओंको | पितृन् | = पितरोंको | यान्ति | = प्राप्त होते हैं। |
| यान्ति | = प्राप्त होते हैं। | यान्ति | = प्राप्त होते हैं। | मद्याजिनः | = (परन्तु) मेरा पूजन करनेवाले |
| भूतेज्याः | = भूत-प्रेतोंका पूजन करनेवाले | माम् | = मुझे | ||
| अपि | = ही | ||||
| यान्ति | = प्राप्त होते हैं। |
व्याख्या —[पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि मैं ही सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और सम्पूर्ण संसारका मालिक हूँ, परन्तु जो मनुष्य मेरेको भोक्ता और मालिक न मानकर स्वयं भोक्ता और मालिक बन जाते हैं, उनका पतन हो जाता है। अब इस श्लोकमें उनके पतनका विवेचन करते हैं।]
‘यान्ति देवव्रता देवान्’—भगवान्को ठीक तरहसे न जाननेके कारण भोग और ऐश्वर्यको चाहनेवाले पुरुष वेदों और शास्त्रोंमें वर्णित नियमों, व्रतों, मन्त्रों, पूजन-विधियों आदिके अनुसार अपने-अपने उपास्य देवताओंका विधि-
विधानसे सांगोपांग पूजन करते हैं, अनुष्ठान करते हैं और सर्वथा उन देवताओंके परायण हो जाते हैं (गीता—सातवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। वे उपास्य देवता अपने उन भक्तोंको अधिक-से-अधिक और ऊँचा-से-ऊँचा फल यही देंगे कि उनको अपने-अपने लोकोंमें ले जायेंगे, जिन लोकोंको भगवान्ने पुनरावर्ती कहा है (आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)।
तेईसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि देवताओंका पूजन भी मेरा ही पूजन है; परन्तु वह पूजन अविधिपूर्वक