सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 669, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 669

६६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

एवम्= इस प्रकार (मेरे(निषिद्ध) सम्पूर्णसब कुछ मेरे अर्पण
अर्पण करनेसे)कर्मके फलोंसेकरनेवाला (और)
कर्मबन्धनैः= कर्मबन्धनसेमोक्ष्यसे= (तू) मुक्त हो
(और)जायगा।
शुभाशुभफलैः= शुभ (विहित)सन्यासयोग-विमुक्तः
और अशुभयुक्तात्मा= मुझे
= ऐसे अपनेसहितउपैष्यसि
= प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या—‘शुभाशुभफलैरेव मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः’— पूर्वांक प्रकारसे सब पदार्थ और क्रियाएँ मेरे अर्पण करनेसे अर्थात् तेरे स्वयंके मेरे अर्पित हो जानेसे अनन्त जन्मोंके जो शुभ-अशुभ कर्मके फल हैं, उन सबसे तू मुक्त हो जायगा। वे कर्मफल तेरेको जन्म-मरण देनेवाले नहीं होंगे।

यहाँ शुभ और अशुभ कर्मोंसे अनन्त जन्मोंके किये हुए संचित शुभ-अशुभ कर्म लेने चाहिये। कारण कि भक्त वर्तमानमें भगवदज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्को अर्पण करता है। भगवदज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म शुभ ही होते हैं, अशुभ होते ही नहीं। हाँ, अगर किसी रीतिसे, किसी परिस्थितिके कारण, किसी पूर्वाभ्यासके प्रवाहके कारण भक्तके द्वारा कदाचित् किंचिन्मात्र भी कोई आनुषंगिक अशुभकर्म बन जाय, तो उसके हृदयमें विराजमान भगवान् उस अशुभकर्मको नष्ट कर देते हैं।

जितने भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी बाह्य होते हैं अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके द्वारा ही होते हैं। इसलिये उन शुभ और अशुभकर्मोंका अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें जो फल आता है, वह भी बाह्य ही होता है। मनुष्य भूलसे उन परिस्थितियोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता रहता है। यह सुखी-दुःखी होना ही कर्मबन्धन है और इसीसे वह जन्मता-मरता है। परन्तु भक्तकी दृष्टि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंपर न रहकर भगवान्की कृपापर रहती है अर्थात् भक्त उनको भगवान्का विधान ही मानता है, कर्मोंका फल मानता ही नहीं। इसलिये वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिरूप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

‘सन्यासयोगयुक्तात्मा’ —सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेका नाम ‘सन्यासयोग’ है। इस संन्यासयोग

अर्थात् समर्पणयोगसे युक्त होनेवालेको यहाँ ‘सन्यासयोगयुक्तात्मा’ कहा गया है। ऐसे तो गीतामें बहुत जगह ‘संन्यास’ शब्द सांख्ययोगका वाचक आता है, पर इसका प्रयोग भक्तिमें भी होता है; जैसे—‘मयि सन्यस्य’ (१८।५७)।

जैसे सांख्ययोगी सम्पूर्ण कर्मोंको मनसे नवद्वारवाले शरीरमें रखकर स्वयं सुखपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), ऐसे ही भक्त कर्मोंके साथ अपने माने हुए सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे कोई सज्जन अपनी धरोहरको कहीं रख देता है, ऐसे ही भक्त अपनेसहित अनन्त जन्मोंके संचित कर्मोंको, उनके फलोंको और उनके सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। इसलिये इसको ‘सन्यासयोग’ कहा गया है।

‘विमुक्तो मामुपैष्यसि’ —पूर्वश्लोकमें ‘तत्कुरुष्व मदर्पणाम्’ कहकर अर्पण करनेकी आज्ञा दी। यहाँ कहते हैं कि ‘इस प्रकार अर्पण करनेसे तू शुभ-अशुभ कर्मफलोंसे मुक्त हो जायगा। शुभ-अशुभ कर्मफलोंसे मुक्त होनेपर तू मेरेको प्राप्त हो जायगा।’ तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण कर्मफलोंसे मुक्त होना तो प्रेम-प्राप्तिका साधन है और भगवान्की प्राप्ति होना प्रेमकी प्राप्ति है।

विशेष बात

शुभ और अशुभ कर्मोंका बन्धन क्या है?

शुभ अथवा अशुभ किसी भी कर्मको किया जाय, उस कर्मका आरम्भ और अन्त होता है। ऐसे ही उन कर्मोंके फलस्वरूपमें जो परिस्थिति आती है, उसका भी संयोग और वियोग होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब कर्म और उनके फल निरन्तर नहीं रहते, तो फिर उनके साथ सम्बन्ध निरन्तर कैसे रह सकता है? परन्तु जब कर्ता (कर्म करनेवाला)

१-विकर्म यच्चोत्पत्तितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ (श्रीमद्भा० ११।५।४२)

२-जैसे अशुभकर्म बन्धनकारक हैं, ऐसे ही शुभकर्म भी बन्धनकारक हैं। जैसे, बेड़ी लोहेकी हो चाहे सोनेकी, पर बन्धन दोनोंसे ही होता है। शुभकर्म भी जन्मारम्भक होनेसे बन्धनकारक होता है और अशुभकर्म तो जबर्दस्ती बांधनेवाला होता ही है।