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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 668, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 668

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

६६७

सब क्रियाएँ स्वाभाविक भगवान्के अर्पण हो जायँगी, भगवान्की प्रसन्नताका हेतु हो जायँगी। जैसे बालक अपनी माँके सामने खेलता है, कभी दौड़कर दूर चला जाता है और फिर दौड़कर गोदमें आ जाता है, कभी पीठपर चढ़ जाता है, आदि जो कुछ क्रिया बालक करता है, उस क्रियासे माँ प्रसन्न होती है। माँकी इस प्रसन्नतामें बालकका माँके प्रति अपनेपनका भाव ही हेतु है। ऐसे ही शरणागत भक्तका भगवान्के प्रति अपनेपनका भाव होनेसे भक्तकी प्रत्येक क्रियासे भगवान्को प्रसन्नता होती है।

यहाँ ‘करोषि’ क्रियाके साथ सामान्य ‘यत्’ पद होनेसे अर्थात् ‘तू जो कुछ करता है’—ऐसा कहनेसे निषिद्ध क्रिया भी आ सकती है। परन्तु अन्तमें ‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’ ‘वह मेरे अर्पण कर दे’—ऐसा आया है। अतः जो चीज या क्रिया भगवान्के अर्पण की जायगी, वह भगवान्की आज्ञाके

परिशिष्ट भाव —आदरपूर्वक देना और उसीकी वस्तु उसीको देना ‘अर्पण’ कहलाता है। भगवान्ने पदार्थोंको तो देनेकी बात बतायी है—‘प्रयच्छति’ और क्रियाओंको अर्पण करनेकी बात बतायी है—‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’; क्योंकि क्रियाएँ दी नहीं जातीं।

ज्ञानयोगी तो संसारके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग करता है, पर भक्त एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता मानता ही नहीं। दूसरे शब्दोंमें, ज्ञानयोगी ‘मैं’ और ‘मेरा’ का त्याग करता है तथा भक्त ‘तू’ और ‘तेरा’ को स्वीकार करता है। इसलिये ज्ञानयोगी पदार्थ और क्रियाका ‘त्याग’ करता है तथा भक्त पदार्थ और क्रियाको भगवान्के ‘अर्पण’ करता है अर्थात् उनको अपना न मानकर भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है।

जिस वस्तुमें मनुष्यकी सत्यत्व एवं महत्त्वबुद्धि होती है, उसको मिथ्या समझकर यों ही त्याग देनेकी अपेक्षा किसी व्यक्तिके अर्पण कर देना, उसकी सेवामें लगा देना सुगम पड़ता है। फिर जो परम श्रद्धास्पद, परम प्रेमास्पद भगवान् हैं, उनको अर्पण करनेकी सुगमताका तो कहना ही क्या है! दूसरी बात, त्यागीको त्यागका अभिमान भी आ सकता है, पर अर्पण करनेवालेको अभिमान नहीं आ सकता; क्योंकि जिसकी वस्तु है, उसीको देनेसे अभिमान कैसे आयेगा? ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’। सम्पूर्ण वस्तुएँ (मात्र संसार) सदासे ही भगवान्की हैं। उनको भगवान्के अर्पण करना केवल अपनी भूल (उनको अपना मान लिया—यह भूल) मिटाना है। भूल मिटनेपर अभिमान नहीं होता, प्रत्युत प्रसन्नता होती है।

संसारको भगवान्का मानते ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् संसार लुप्त हो जाता है, संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती (जो वास्तवमें है ही नहीं), प्रत्युत भगवान् ही रह जाते हैं (जो वास्तवमें हैं)। अतः संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये भक्तको विवेककी जरूरत नहीं है। वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद (त्याग) नहीं करता, प्रत्युत उसको भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है; क्योंकि अपरा प्रकृति भगवान्की ही है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा श्लोक)।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें पदार्थों और क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करनेका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें उस अर्पणका फल बताते हैं।

शुभाशुभफलैरिव मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥