श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
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सब क्रियाएँ स्वाभाविक भगवान्के अर्पण हो जायँगी, भगवान्की प्रसन्नताका हेतु हो जायँगी। जैसे बालक अपनी माँके सामने खेलता है, कभी दौड़कर दूर चला जाता है और फिर दौड़कर गोदमें आ जाता है, कभी पीठपर चढ़ जाता है, आदि जो कुछ क्रिया बालक करता है, उस क्रियासे माँ प्रसन्न होती है। माँकी इस प्रसन्नतामें बालकका माँके प्रति अपनेपनका भाव ही हेतु है। ऐसे ही शरणागत भक्तका भगवान्के प्रति अपनेपनका भाव होनेसे भक्तकी प्रत्येक क्रियासे भगवान्को प्रसन्नता होती है।
यहाँ ‘करोषि’ क्रियाके साथ सामान्य ‘यत्’ पद होनेसे अर्थात् ‘तू जो कुछ करता है’—ऐसा कहनेसे निषिद्ध क्रिया भी आ सकती है। परन्तु अन्तमें ‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’ ‘वह मेरे अर्पण कर दे’—ऐसा आया है। अतः जो चीज या क्रिया भगवान्के अर्पण की जायगी, वह भगवान्की आज्ञाके
परिशिष्ट भाव —आदरपूर्वक देना और उसीकी वस्तु उसीको देना ‘अर्पण’ कहलाता है। भगवान्ने पदार्थोंको तो देनेकी बात बतायी है—‘प्रयच्छति’ और क्रियाओंको अर्पण करनेकी बात बतायी है—‘तत्कुरुष्व मदर्पणम्’; क्योंकि क्रियाएँ दी नहीं जातीं।
ज्ञानयोगी तो संसारके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग करता है, पर भक्त एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता मानता ही नहीं। दूसरे शब्दोंमें, ज्ञानयोगी ‘मैं’ और ‘मेरा’ का त्याग करता है तथा भक्त ‘तू’ और ‘तेरा’ को स्वीकार करता है। इसलिये ज्ञानयोगी पदार्थ और क्रियाका ‘त्याग’ करता है तथा भक्त पदार्थ और क्रियाको भगवान्के ‘अर्पण’ करता है अर्थात् उनको अपना न मानकर भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है।
जिस वस्तुमें मनुष्यकी सत्यत्व एवं महत्त्वबुद्धि होती है, उसको मिथ्या समझकर यों ही त्याग देनेकी अपेक्षा किसी व्यक्तिके अर्पण कर देना, उसकी सेवामें लगा देना सुगम पड़ता है। फिर जो परम श्रद्धास्पद, परम प्रेमास्पद भगवान् हैं, उनको अर्पण करनेकी सुगमताका तो कहना ही क्या है! दूसरी बात, त्यागीको त्यागका अभिमान भी आ सकता है, पर अर्पण करनेवालेको अभिमान नहीं आ सकता; क्योंकि जिसकी वस्तु है, उसीको देनेसे अभिमान कैसे आयेगा? ‘त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये’। सम्पूर्ण वस्तुएँ (मात्र संसार) सदासे ही भगवान्की हैं। उनको भगवान्के अर्पण करना केवल अपनी भूल (उनको अपना मान लिया—यह भूल) मिटाना है। भूल मिटनेपर अभिमान नहीं होता, प्रत्युत प्रसन्नता होती है।
संसारको भगवान्का मानते ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है अर्थात् संसार लुप्त हो जाता है, संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती (जो वास्तवमें है ही नहीं), प्रत्युत भगवान् ही रह जाते हैं (जो वास्तवमें हैं)। अतः संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये भक्तको विवेककी जरूरत नहीं है। वह संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद (त्याग) नहीं करता, प्रत्युत उसको भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है; क्योंकि अपरा प्रकृति भगवान्की ही है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा श्लोक)।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें पदार्थों और क्रियाओंको भगवान्के अर्पण करनेका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें उस अर्पणका फल बताते हैं।
शुभाशुभफलैरिव मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। सन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
६६८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
| एवम् | = इस प्रकार (मेरे | (निषिद्ध) सम्पूर्ण | सब कुछ मेरे अर्पण |
|---|---|---|---|
| अर्पण करनेसे) | कर्मके फलोंसे | करनेवाला (और) | |
| कर्मबन्धनैः | = कर्मबन्धनसे | मोक्ष्यसे | = (तू) मुक्त हो |
| (और) | जायगा। | ||
| शुभाशुभफलैः | = शुभ (विहित) | सन्यासयोग- | विमुक्तः |
| और अशुभ | युक्तात्मा | = मुझे | |
| = ऐसे अपनेसहित | उपैष्यसि | ||
| = प्राप्त हो जायगा। |
व्याख्या—‘शुभाशुभफलैरेव मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः’— पूर्वांक प्रकारसे सब पदार्थ और क्रियाएँ मेरे अर्पण करनेसे अर्थात् तेरे स्वयंके मेरे अर्पित हो जानेसे अनन्त जन्मोंके जो शुभ-अशुभ कर्मके फल हैं, उन सबसे तू मुक्त हो जायगा। वे कर्मफल तेरेको जन्म-मरण देनेवाले नहीं होंगे।
यहाँ शुभ और अशुभ कर्मोंसे अनन्त जन्मोंके किये हुए संचित शुभ-अशुभ कर्म लेने चाहिये। कारण कि भक्त वर्तमानमें भगवदज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म ही भगवान्को अर्पण करता है। भगवदज्ञाके अनुसार किये हुए कर्म शुभ ही होते हैं, अशुभ होते ही नहीं। हाँ, अगर किसी रीतिसे, किसी परिस्थितिके कारण, किसी पूर्वाभ्यासके प्रवाहके कारण भक्तके द्वारा कदाचित् किंचिन्मात्र भी कोई आनुषंगिक अशुभकर्म बन जाय, तो उसके हृदयमें विराजमान भगवान् उस अशुभकर्मको नष्ट कर देते हैं।
जितने भी कर्म किये जाते हैं, वे सभी बाह्य होते हैं अर्थात् शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके द्वारा ही होते हैं। इसलिये उन शुभ और अशुभकर्मोंका अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें जो फल आता है, वह भी बाह्य ही होता है। मनुष्य भूलसे उन परिस्थितियोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर सुखी-दुःखी होता रहता है। यह सुखी-दुःखी होना ही कर्मबन्धन है और इसीसे वह जन्मता-मरता है। परन्तु भक्तकी दृष्टि अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंपर न रहकर भगवान्की कृपापर रहती है अर्थात् भक्त उनको भगवान्का विधान ही मानता है, कर्मोंका फल मानता ही नहीं। इसलिये वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिरूप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
‘सन्यासयोगयुक्तात्मा’ —सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेका नाम ‘सन्यासयोग’ है। इस संन्यासयोग
अर्थात् समर्पणयोगसे युक्त होनेवालेको यहाँ ‘सन्यासयोगयुक्तात्मा’ कहा गया है। ऐसे तो गीतामें बहुत जगह ‘संन्यास’ शब्द सांख्ययोगका वाचक आता है, पर इसका प्रयोग भक्तिमें भी होता है; जैसे—‘मयि सन्यस्य’ (१८।५७)।
जैसे सांख्ययोगी सम्पूर्ण कर्मोंको मनसे नवद्वारवाले शरीरमें रखकर स्वयं सुखपूर्वक अपने स्वरूपमें स्थित रहता है (गीता—पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), ऐसे ही भक्त कर्मोंके साथ अपने माने हुए सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे कोई सज्जन अपनी धरोहरको कहीं रख देता है, ऐसे ही भक्त अपनेसहित अनन्त जन्मोंके संचित कर्मोंको, उनके फलोंको और उनके सम्बन्धको भगवान्में रख देता है। इसलिये इसको ‘सन्यासयोग’ कहा गया है।
‘विमुक्तो मामुपैष्यसि’ —पूर्वश्लोकमें ‘तत्कुरुष्व मदर्पणाम्’ कहकर अर्पण करनेकी आज्ञा दी। यहाँ कहते हैं कि ‘इस प्रकार अर्पण करनेसे तू शुभ-अशुभ कर्मफलोंसे मुक्त हो जायगा। शुभ-अशुभ कर्मफलोंसे मुक्त होनेपर तू मेरेको प्राप्त हो जायगा।’ तात्पर्य यह हुआ कि सम्पूर्ण कर्मफलोंसे मुक्त होना तो प्रेम-प्राप्तिका साधन है और भगवान्की प्राप्ति होना प्रेमकी प्राप्ति है।
विशेष बात
शुभ और अशुभ कर्मोंका बन्धन क्या है?
शुभ अथवा अशुभ किसी भी कर्मको किया जाय, उस कर्मका आरम्भ और अन्त होता है। ऐसे ही उन कर्मोंके फलस्वरूपमें जो परिस्थिति आती है, उसका भी संयोग और वियोग होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब कर्म और उनके फल निरन्तर नहीं रहते, तो फिर उनके साथ सम्बन्ध निरन्तर कैसे रह सकता है? परन्तु जब कर्ता (कर्म करनेवाला)
१-विकर्म यच्चोत्पत्तितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥ (श्रीमद्भा० ११।५।४२)
२-जैसे अशुभकर्म बन्धनकारक हैं, ऐसे ही शुभकर्म भी बन्धनकारक हैं। जैसे, बेड़ी लोहेकी हो चाहे सोनेकी, पर बन्धन दोनोंसे ही होता है। शुभकर्म भी जन्मारम्भक होनेसे बन्धनकारक होता है और अशुभकर्म तो जबर्दस्ती बांधनेवाला होता ही है।
श्लोक २८ ]
- साधक-संजीवनी *
६६९
कर्मोंके साथ अपनापन कर लेता है, तब उसका फलके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। यद्यपि कर्म और फलके साथ सम्बन्ध कभी रह नहीं सकता, तथापि कर्ता उस सम्बन्धको अपनेमें मान लेता है। कर्ता स्वयं (स्वरूपसे) नित्य है, इसलिये उस सम्बन्धको अपनेमें स्वीकार करनेसे वह सम्बन्ध भी नित्य प्रतीत होने लगता है।
कर्ता शुभकर्मोंका फल चाहता है, जो कि अनुकूल परिस्थितिके रूपमें सामने आता है। उस परिस्थितिमें यह सुख मानता है। जबतक इस सुखकी चाहना रहती है, तबतक वह दुःखसे बच नहीं सकता। कारण कि सुखके आदिमें और अन्तमें दुःख ही रहता है तथा सुखसे भी प्रतिक्षण स्वाभाविक वियोग होता रहता है। जिसके वियोगको यह प्राणी नहीं चाहता, उसका वियोग तो हो ही जाता है, यह नियम है। तात्पर्य यह हुआ कि सुखकी इच्छाको यह नहीं छोड़ता और दुःख इसको नहीं छोड़ता।
जीव जब अपने-आपको प्रभुके समर्पित कर देता है, तब (साक्षात् परमात्माका ही अंश होनेसे) इसकी परमात्माके साथ स्वतः अभिन्नता हो जाती है; और शरीरके साथ भूलसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जाता है। यह परमात्माके साथ अभिन्न तो पहलेसे ही था। केवल अपने लिये कर्म करनेसे इस अभिन्नताका अनुभव नहीं होता था। अब अपनेसहित कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेसे उसकी अपने लिये कर्म करनेकी मान्यता मिट जाती है, तो उसको स्वाभाविक प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है। इसीको भगवान्ने
परिशिष्ट भाव— भगवान्ने 'यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्' (१।२५) से जो बात कहनी आरम्भ की थी, उसीका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थोंको अपनेसहित मेरे अर्पण करनेसे तू कर्मबन्धनसे तथा शुभ-अशुभ दोनों कर्मोंके फलोंसे मुक्त होकर मेरेको ही प्राप्त हो जायगा।
'कर्म' भी शुभ-अशुभ होते हैं और 'फल' भी शुभ-अशुभ होता है। दूसरोंके हितके लिये करना 'शुभकर्म' है और अपने लिये करना 'अशुभकर्म' है। अनुकूल परिस्थिति 'शुभ फल' है और प्रतिकूल परिस्थिति 'अशुभ फल' है। भगवान्का भक्त शुभकर्मोंको भगवान्के अर्पण कर देता है, अशुभकर्म करता ही नहीं और शुभ-अशुभ फलसे अर्थात् अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिसे सुखी-दुःखी नहीं होता। उसके अनन्त जन्मोंके संचित शुभाशुभ-कर्म भस्म हो जाते हैं; जैसे—जलता हुआ घासका टुकड़ा फेंकनेसे सब घास जल जाता है!
भगवान्के अर्पण करनेसे संसारका सम्बन्ध (गुणसंग) नहीं रहता, केवल भगवान्का सम्बन्ध रह जाता है, जो कि स्वतः पहलेसे ही है—'ममैवांशो जीवलोकै जीवभूतः सनातनः' (गीता १५।७)। जो अपना नहीं है, उसको अपना माननेसे सिवाय बन्धनके कुछ नहीं होता। अपना माननेसे वस्तु तो रहती नहीं, केवल बन्धन रह जाता है। भक्तका किसी भी वस्तु, व्यक्ति और क्रियामें अपनापन न रहनेसे वह 'विमुक्त' हो जाता है।
यहाँ समर्पणयोगको 'संन्यासयोग' नामसे कहा गया है।
'मामुपैष्यसि ' पदका तात्पर्य है कि भक्त भगवान्से अभिन्न हो जाता है, उसकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती—'ज्ञानी त्वामैव मे मतम् ' (गीता ७।१८)। इसीको प्रेमाद्वैत कहा गया है।
यहाँ 'विमुक्तो मामुपैष्यसि ' कहा है।
जब यह जीव अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर देता है तो फिर उसके सामने जो कुछ अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आती है, वह सब दया और कृपाके रूपमें परिणत हो जाती है। तात्पर्य है कि जब उसके सामने अनुकूल परिस्थिति आती है, तब वह उसमें भगवान्की 'दया' को मानता है और जब प्रतिकूल परिस्थिति आती है, तब वह उसमें भगवान्की 'कृपा' को मानता है। दया और कृपामें भेद यह है कि कभी भगवान् प्यार, स्नेह करके जीवको कर्मबन्धनसे मुक्त करते हैं—यह 'दया' है और कभी शासन करके, ताड़ना करके उसके पापोंका नाश करते हैं—यह 'कृपा' है। इस प्रकार दया और कृपा करके भगवान् भक्तको सबल, सहिष्णु बनाते हैं। परन्तु भक्त तो दोनोंमें ही प्रसन्न रहता है। कारण कि उसकी दृष्टि अनुकूलता-प्रतिकूलताकी तरफ न रहकर केवल भगवान्की तरफ ही रहती है। अतः उसकी दृष्टिमें भगवान्की दया और कृपा दो रूपसे नहीं होती, प्रत्युत एक ही रूपसे होती है। जैसा कि कहा है—
लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथाभ्येके।
तद्वदेव महेशस्य नियन्त्रुणोदोषयोः॥
'जिस प्रकार बालकका पालन करने और ताड़ना करने—दोनोंमें माँकी कहीं अकृपा नहीं होती, उसी प्रकार जीवोंके गुण-दोषोंका नियन्त्रण करनेवाले परमेश्वरकी कहीं किसीपर अकृपा नहीं होती।'
६७०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
सम्बन्ध—अब एक शंका होती है कि जो भगवान् के समर्पित होते हैं, उनको तो भगवान् मुक्त कर देते हैं और जो भगवान् के समर्पित नहीं होते, उनको भगवान् मुक्त नहीं करते—इसमें तो भगवान्की दयालुता और समता नहीं हुई, प्रत्युत विषम-दृष्टि और पक्षपात हुआ? इसपर कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥
| अहम् | = मैं | अस्ति | = है (और) | भजन्ति | = भजन करते हैं, |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वभूतेषु | = सम्पूर्ण प्राणियोंमें | न | = न कोई | ते | = वे |
| समः | = समान हूँ। | प्रियः | = प्रिय है। | मयि | = मुझमें हैं |
| न | = (उन प्राणियोंमें) न | तु | = परन्तु | च | = और |
| तो कोई | ये | = जो | अहम् | = मैं | |
| मे | = मेरा | भक्त्या | = प्रेमपूर्वक | अपि | = भी |
| द्वेष्यः | = द्वेषी | माम् | = मेरा | तेषु | = उनमें हूँ।१ |
व्याख्या —‘समोऽहं सर्वभूतेषु’—मैं स्थावर-जंगम आदि सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्यापकरूपसे और कृपा-दृष्टिसे सम हूँ। तात्पर्य है कि मैं सबमें समानरूपसे व्यापक, परिपूर्ण हूँ—‘मया तत्तमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना’ (गीता ९।४), और मेरी सबपर समानरूपसे कृपादृष्टि है—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)।
मैं कहीं कम हूँ और कहीं अधिक हूँ अर्थात् चींटी छोटी होनेसे उसमें कम हूँ और हाथी बड़ा होनेसे उसमें अधिक हूँ; अन्त्यजमें कम हूँ और ब्राह्मणमें अधिक हूँ; जो मेरे प्रतिकूल चलते हैं, उनमें मैं कम हूँ और जो मेरे अनुकूल चलते हैं, उनमें मैं अधिक हूँ—यह बात है ही नहीं। कारण कि सब-के-सब प्राणी मेरे अंश हैं, मेरे स्वरूप हैं। मेरे स्वरूप होनेसे वे मेरेसे कभी अलग नहीं हो सकते और मैं भी उनसे कभी अलग नहीं हो सकता। इसलिये मैं सबमें समान हूँ, मेरा कहीं कोई पक्षपात नहीं है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राणियोंमें जन्मसे, कर्मसे, परिस्थितिसे, घटनासे, संयोग, वियोग आदिसे अनेक तरहसे विषमता होनेपर भी मैं सर्वथा-सर्वदा सबमें समान रीतिसे व्यापक हूँ, कहीं कम और कहीं ज्यादा नहीं हूँ।
‘न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः’२—पहले भगवान्ने कहा कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ, अब उसीका विवेचन करते हुए कहते हैं कि कोई भी प्राणी मेरे राग-द्वेषका
विषय नहीं है। तात्पर्य है कि मेरेसे विमुख होकर कोई प्राणी शास्त्रीय यज्ञ, दान आदि कितने ही शुभकर्म करे, तो भी वह मेरे ‘राग’ का विषय नहीं है और दूसरा शास्त्रनिषिद्ध अन्याय, अत्याचार आदि कितने ही अशुभकर्म करे, तो भी वह मेरे ‘द्वेष’ का विषय नहीं है। कारण कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान रीतिसे व्याप्त हूँ, सबपर मेरी समान रीतिसे कृपा है और सब प्राणी मेरे अंश होनेसे मेरेको समान रीतिसे प्यारे हैं। हाँ, यह बात जरूर है कि जो सकामभावपूर्वक शुभकर्म करेगा, वह ऊँची गतिमें जायगा और जो अशुभ-कर्म करेगा, वह नीची गतिमें अर्थात् नरकों तथा चौरासी लाख योनियोंमें जायगा। परन्तु वे दोनों पुण्यात्मा और पापात्मा होनेपर भी मेरे राग-द्वेषके विषय नहीं हैं।
मेरे रचे हुए पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये भौतिक पदार्थ भी प्राणियोंके अच्छे-बुरे आचरणों तथा भावोंको लेकर उनको रहनेका स्थान देनेमें, उनकी प्यास बुझानेमें, उनको प्रकाश देनेमें, उनको चलने-फिरनेके लिये अवकाश देनेमें राग-द्वेषपूर्वक विषमता नहीं करते, प्रत्युत सबको समान रीतिसे देते हैं। फिर प्राणी अपने अच्छे-बुरे आचरणोंको लेकर मेरे राग-द्वेषके विषय कैसे बन सकते हैं? अर्थात् नहीं बन सकते। कारण कि वे साक्षात् मेरे ही अंश हैं, मेरे ही स्वरूप हैं।
जैसे, किसी व्यक्तिके एक हाथमें पीड़ा हो रही है, वह
१-इस श्लोकके दो विभाग हैं—पूर्वार्धमें तो भजन न करनेवालोंका वर्णन है और उत्तरार्धमें भजन करनेवालोंका वर्णन है।
२-यहाँ ‘प्रिय’ शब्दको रागका ही वाचक मानना चाहिये; क्योंकि प्राणिमात्रपर भगवान्की समान रीतिसे प्रियता है—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस ७।८६।२); अतः भगवान् इसका निषेध कैसे कर सकते हैं? दूसरी बात, ‘द्वेष’ शब्दके साथ ‘राग’ शब्द ही ठीक बैठ सकता है; क्योंकि राग और द्वेष—यह द्वन्द्व है। इसी द्वन्द्वका यहाँ निषेध किया गया है।
श्लोक २१ ]
- साधक-संजीवनी *
६७१
हाथ शरीरके किसी काममें नहीं आता, दर्द होनेसे रातमें नींद नहीं लेने देता, काम करनेमें बाधा डालता है और दूसरा हाथ सब प्रकारसे शरीरके काम आता है। परन्तु उस व्यक्तिका किसी हाथके प्रति राग या द्वेष नहीं होता कि यह तो अच्छा है और यह मन्द है; क्योंकि दोनों ही हाथ उसके अंग हैं और अपने अंगके प्रति किसीके राग-द्वेष नहीं होते। ऐसे ही कोई मेरे वचनों, सिद्धान्तोंके अनुसार चलनेवाला हो, पुण्यात्मा-से-पुण्यात्मा हो और दूसरा कोई मेरे वचनों, सिद्धान्तोंका खण्डन करनेवाला हो, मेरे विरुद्ध चलनेवाला हो, पापी-से-पापी हो, तो उन दोनोंको लेकर मेरे राग-द्वेष नहीं होते। उनके अपने-अपने बर्तावोंमें, आचरणोंमें भेद है, इसलिये उनके परिणाम-(फल-) में भेद होगा, पर मेरा किसीके प्रति राग-द्वेष नहीं है। अगर किसीके प्रति राग-द्वेष होता; तो 'समोऽहं सर्वभूतेषु' यह कहना ही नहीं बनता; क्योंकि विषमताके कारण ही राग-द्वेष होते हैं।
'ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्'—परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं अर्थात् जिनकी संसारमें आसक्ति, राग, खिंचाव नहीं है, जो केवल मेरेको ही अपना मानते हैं, केवल मेरे ही परायण रहते हैं, केवल मेरी प्रसन्नताके लिये ही रात-दिन काम करते हैं और जो शरीर, इन्द्रियाँ, मन, वाणीके द्वारा मेरी तरफ ही चलते हैं (गीता—नवें अध्यायका चौदहवाँ और दसवें अध्यायका नवाँ श्लोक), वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ।
प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ—इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो सामान्य जीव हैं तथा मेरी आज्ञाके विरुद्ध चलनेवाले हैं, वे मेरेमें और मैं उनमें नहीं हूँ, प्रत्युत वे अपनेको मेरेमें मानते ही नहीं। वे ऐसा कह देते हैं कि हम तो संसारी जीव हैं, संसारमें रहनेवाले हैं! वे यह नहीं समझते कि संसार, शरीर तो कभी एकरूप, एकरस रहता ही नहीं, तो ऐसे संसार, शरीरमें हम कैसे स्थित रह सकते हैं? इसको न जाननेके कारण ही वे अपनेको संसार, शरीरमें स्थित मानते हैं। उनकी अपेक्षा जो रात-दिन मेरे भजन-स्मरणमें लगे हुए हैं, बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे, सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया आदिमें और अपने-आपमें भी मेरेको ही मानते हैं, वे मेरेमें विशेषरूपसे
हैं और मैं उनमें विशेषरूपसे हूँ।
दूसरा भाव यह है कि जो मेरे साथ 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं' ऐसा सम्बन्ध जोड़ लेते हैं, उनकी मेरे साथ इतनी घनिष्ठता हो जाती है कि मैं और वे एक हो जाते हैं—'तस्मिन्स्तज्जे भेदाभावात्' (नारदभक्तिसूत्र ४१)। इसलिये वे मेरेमें और मैं उनमें हूँ।
तीसरा भाव यह है कि उनमें 'मैं'-पन नहीं रहता; क्योंकि 'मैं'-पन एक परिच्छिन्ना है। इस परिच्छिन्ना-(एक-देशीयता-) के मिटनेसे वे मेरेमें ही रहते हैं।
अब कोई भगवान्से कहे कि आप भक्तोंमें विशेषतासे प्रकट हो जाते हैं और दूसरोंमें कमरूपसे प्रकट होते हैं—यह आपकी विषमता क्यों? तो भगवान् कहते हैं कि भैया! मेरेमें यह विषमता तो भक्तोंके कारण है। अगर कोई मेरा भजन करे, मेरे परायण हो जाय, शरण हो जाय और मैं उससे विशेष प्रेम न करूँ, उसमें विशेषतासे प्रकट न होऊँ; तो यह मेरी विषमता हो जायगी। कारण कि भजन करनेवाले और भजन न करनेवाले—दोनोंमें मैं बराबर ही रहूँ, तो यह न्याय नहीं होगा; प्रत्युत मेरी विषमता होगी। इससे भक्तोंके भजनका और उनका मेरी तरफ लगनेका कोई मूल्य ही नहीं रहेगा। यह विषमता मेरेमें न आ जाय, इसलिये जो जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं भी उसी प्रकार उनको आश्रय देता हूँ—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (गीता ४। ११)। अतः यह विषमता मेरेमें भक्तोंके भावोंको लेकर ही है।*
जैसे, कोई पुत्र अच्छा काम करता है तो सुपुत्र कहलाता है और खराब काम करता है तो कुपुत्र कहलाता है। यह सुपुत्र-कुपुत्रका भेद तो उनके आचरणोंके कारण हुआ है। माँ-बापके पुत्रभावमें कोई फरक नहीं पड़ता। गायके थनोंमें चींचड़ रहते हैं, वे दूध न पीकर खून पीते हैं, तो यह विषमता गायकी नहीं है, प्रत्युत चींचड़ोंकी अपनी बनायी हुई है। बिजलीके द्वारा कहीं बर्फ जम जाती है और कहीं आग पैदा हो जाती है, तो यह विषमता बिजलीकी नहीं है, प्रत्युत यन्त्रोंकी है। ऐसे ही जो भगवान्में रहते हुए भी भगवान्को नहीं मानते, उनका भजन नहीं करते, तो यह विषमता उन प्राणियोंकी ही है, भगवान्की नहीं। जैसे लकड़ीका टुकड़ा,
- तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥ (मानस २। २११। ३)
केवल भगवान्में ही नहीं, प्रत्युत जीवन्मुक्त श्रेष्ठ महापुरुषोंमें भी सामनेवालेके गुणों, भावों, आचरणों आदिको लेकर पक्षपात हो जाता है—
वीतस्यूहाणामपि मुक्तिभाजं भवन्ति भव्येषु हि पक्षपाताः ॥ (किराता ३। १२)
६७२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
काँचका टुकड़ा और आतशी शीशा—इन तीनोंमें सूर्यकी कोई विषमता नहीं है; परन्तु सूर्यके सामने (धूपमें) रखनेपर लकड़ीका टुकड़ा सूर्यकी किरणोंको रोक देता है, काँचका टुकड़ा किरणोंको नहीं रोकता और आतशी शीशा किरणोंको एक जगह केन्द्रित करके अग्नि प्रकट कर देता है। तात्पर्य है कि यह विषमता सामने आनेवाले पदार्थोंकी है, सूर्यकी नहीं। सूर्यकी किरणें तो सबपर एक समान ही पड़ती हैं। वे पदार्थ उन किरणोंको जितनी पकड़ लेते हैं, उतनी ही वे किरणें उनमें प्रकट हो जाती हैं। ऐसे ही भगवान् सब प्राणियोंमें समानरूपसे व्यापक हैं, परिपूर्ण हैं। परन्तु जो प्राणी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं, भगवान्का और भगवान्की कृपाका प्राकट्य उनमें विशेषतासे हो जाता है। उनकी भगवान्में जितनी अधिक प्रियता होती है, भगवान्की भी उतनी ही अधिक प्रियता प्रकट हो जाती है। वे अपने-आपको भगवान्को दे देते हैं, तो भगवान् भी अपने-आपको उनको दे देते हैं। इस प्रकार भक्तोंके भावोंके अनुसार ही भगवान्की विशेष कृपा, प्रियता आदि प्रकट होती है।
परिशिष्ट भाव—‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ —जीव भगवान्को अपनी क्रियाएँ और पदार्थ अर्पण करे अथवा न करे, भगवान्में कुछ फर्क नहीं पड़ता। वे तो सदा समान ही रहते हैं। किसी वर्णविशेष, आश्रमविशेष, जातिविशेष, कर्मविशेष, योग्यताविशेष आदिका भी भगवान्पर कोई असर नहीं पड़ता। अतः प्रत्येक वर्ण, आश्रम, जाति आदिका मनुष्य उनके सम्मुख हो सकता है, उनका भक्त हो सकता है, उनको प्राप्त कर सकता है।
‘न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः’ —भगवान्की दृष्टिमें भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं, फिर उनके द्वेष और प्रेमका विषय दूसरा कैसे हो सकता है? जीव ही शुभाशुभ-कर्म और उनके फलसे राग-द्वेष करके संसारमें बँध जाता है और राग-द्वेषका त्याग करके मुक्त हो जाता है। इसलिये बन्धन और मुक्ति जीवकी ही होती है, भगवान्की नहीं। विषमता जीव करता है, भगवान् नहीं। भगवान् तो ज्यों-के-त्यों ही रहते हैं।
चौथे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ’, वही बात भगवान्ने यहाँ ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ’ पदोंसे कही है। भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंमें समानरूपसे परिपूर्ण हैं, उनमें विषमता नहीं है। परन्तु जो प्रेमपूर्वक भगवान्का भजन करते हैं, वे भगवान्में हैं और भगवान् उनमें हैं अर्थात् भगवान् उनमें विशेषरूपसे प्रकट हैं। तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें जल सब जगह रहता है, पर कुएँमें वह विशेष प्रकट (आवरणरहित) होता है, ऐसे ही भगवान् संसारमात्रमें परिपूर्ण होते हुए भी भक्तोंमें विशेष प्रकट होते हैं। भक्तोंमें यह विलक्षणता प्रेमपूर्वक भगवान्का भजन करनेसे भगवत्कृपासे ही आयी है। जैसे गायके शरीरमें रहनेवाला घी गायके काम नहीं आता, प्रत्युत उसके दूधसे निकाला हुआ घी ही उसके काम आता है, ऐसे ही संसारमें परिपूर्ण होनेमात्रसे भगवान्के द्वारा लोगोंके पाप नहीं कटते, प्रत्युत जो भगवान्के सम्मुख होते हैं, प्रेमपूर्वक उनका भजन करते हैं, उनके ही पाप कटते हैं*। सामान्य प्राणी भगवान्के अन्तर्गत होते हुए भी भगवान्को नहीं देखते, पर भक्त सब जगह भगवान्को देखते हैं (गीता—छठें अध्यायका तीसवाँ श्लोक)। भक्त भगवान्से प्रेम करते हैं और भगवान् भक्तसे प्रेम करते हैं—‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ’ (गीता ७।१७)। इसलिये भक्त भगवान्में हैं और भगवान् भक्तोंमें
तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य सांसारिक रागके कारण ही अपनेको संसारमें मानते हैं। जब वे भगवान्का प्रेमपूर्वक भजन करने लग जाते हैं, तब उनका सांसारिक राग मिट जाता है और वे अपनी दृष्टिसे भगवान्में हो जाते हैं और भगवान् उनमें हो जाते हैं। भगवान्की दृष्टिसे तो वे वास्तवमें भगवान्में ही थे और भगवान् भी उनमें थे। केवल रागके कारण वे अपनेको भगवान्में और भगवान्को अपनेमें नहीं मानते थे।
भगवान्ने यहाँ ‘ये भजन्ति ’ पदोंमें ‘ये ’ सर्वनाम पद दिया है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य किसी भी देशके हों, किसी भी वेशमें हों, किसी भी अवस्थाके हों, किसी भी सम्प्रदायके हों, किसी भी वर्णके हों, किसी भी आश्रमके हों, कैसी ही योग्यतावाले हों, वे अगर भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, तो वे मेरेमें और मैं उनमें हूँ। अगर भगवान् यहाँ किसी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, जाति आदिको लेकर कहते, तब तो भगवान्में विषमता, पक्षपातका होना सिद्ध हो जाता। परन्तु भगवान्ने ‘ये ’ पदसे सबको भजन करनेकी और ‘मैं भगवान्में हूँ और भगवान् मेरेमें हैं’—इसका अनुभव करनेकी पूरी स्वतन्त्रता दे रखी है।
- सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस, सुन्दर० ४४।१)
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
६७३
है—‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’। तात्पर्य यह निकला कि विषमता भगवान्में नहीं है, प्रत्युत प्राणियोंने ही विषमता की है, जो कि भगवान्से विमुख हैं।
तत्त्वसे तो भगवान् ‘समोऽहं सर्वभूतेषु’ हैं, पर अनुभव करनेमें भगवान् ‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ हैं। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें समानरूपसे परिपूर्ण होनेपर भी भगवान्का अनुभव भक्त ही करते हैं, अन्य प्राणी नहीं। वास्तवमें अनुभव करनेकी शक्ति भी भगवान्से ही प्राप्त होती है। मनुष्यका काम केवल भगवान्के सम्मुख होना है।
रामायणमें आया है—
सातवें सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ॥
(मानस, अरण्य० ३६। २)
तात्पर्य है कि भगवान्की सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान व्यापकता, प्रियता, कृपा तथा आत्मीयता है, पर भक्तोंमें वे विशेष दीखते हैं। भक्तोंमें यह विशेषता भगवान्में प्रेम होनेसे भगवत्कृपासे आती है और भगवान्की ही दी हुई होती है। भक्तोंकी भगवान्में जैसी तल्लीनता, प्रियता होती है, वैसी दूसरोंकी नहीं होती। इसलिये भगवान्की भी भक्तोंमें प्रियता होती है। भक्त और भगवान्की परस्पर प्रियताको ‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ पदोंसे कहा गया है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने ‘ये भजन्ति तु मां भक्त्या’ पदोंसे भक्तिपूर्वक अपना भजन करनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें भजन करनेवालोंका विवेचन आरम्भ करते हैं।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥
| चेत् | = अगर (कोई) | भजते | = भजन करता | हि | = कारण कि |
|---|---|---|---|---|---|
| सुदुराचारः | = दुराचारी-से- | है (तो) | सः | = उसने | |
| दुराचारी | सः | = उसको | सम्यक्, | ||
| अपि | = भी | साधुः | = साधु | व्यवसितः | = निश्चय बहुत |
| अनन्यभाक् | = अनन्यभक्त होकर | एव | = ही | अच्छी तरह | |
| माप् | = मेरा | मन्तव्यः | = मानना चाहिये। | कर लिया है। |
व्याख्या —[कोई करोड़पति या अरबपति यह बात कह दे कि मेरे पास जो कोई आयेगा, उसको मैं एक लाख रुपये दूँगा, तो उसके इस वचनकी परीक्षा तब होगी, जब उससे सर्वथा ही विरुद्ध चलनेवाला, उसके साथ वैर रखनेवाला, उसका अनिष्ट करनेवाला भी आकर उससे एक लाख रुपये माँगे और वह उसको दे दे। इससे सबको यह विश्वास हो जायगा कि यह जो माँगे, उसको दे देता है। इसी भावको लेकर भगवान् सबसे पहले दुराचारीका नाम लेते हैं।]
‘अपि चेत्’—सातवें अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें आया है कि जो पापी होते हैं, वे मेरे शरण नहीं होते और यहाँ कहा है कि दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है—इन दोनों बातोंमें आपसमें विरोध प्रतीत होता है। इस विरोधको दूर करनेके लिये ही यहाँ
‘अपि’ और ‘चेत्’ ये दो पद दिये गये हैं। तात्पर्य है कि सातवें अध्यायमें ‘दुष्कृती मनुष्य मेरे शरण नहीं होते’ ऐसा कहकर उनके स्वभावका वर्णन किया है। परन्तु वे भी किसी कारणसे मेरे भजनमें लगना चाहें तो लग सकते हैं। मेरी तरफसे किसीको कोई मना नहीं है*; क्योंकि किसी भी प्राणीके प्रति मेरा द्वेष नहीं है। ये भाव प्रकट करनेके लिये ही यहाँ ‘अपि’ और ‘चेत्’ पदोंका प्रयोग किया है।
‘सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्’—जो सुष्ठु दुराचारी है, सांगोपांग दुराचारी है अर्थात् दुराचार करनेमें कोई कमी न रहे, दुराचारका अंग-उपांग न छूटे—ऐसा दुराचारी है, वह भी अनन्यभाक् होकर मेरे भजनमें लग जाय तो उसका उद्धार हो जाता है।
यहाँ ‘भजते’ क्रिया वर्तमानकी है, जिसका कर्ता
- कोटि बिप्र बध लागहि जाहू।आई सरन तजई नहि ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस ५। ४४। १)
६७४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
है—सांगोपांग दुराचारी। इसका तात्पर्य हुआ कि पहले भी उसके दुराचार बनते आये हैं और अभी वर्तमानमें वह अनन्यभावसे भजन करता है, तो भी उसके द्वारा दुराचार सर्वथा नहीं छूटे हैं अर्थात् कभी-कभी किसी परिस्थितिमें आकर पूर्वसंस्कारवश उसके द्वारा पाप-क्रिया हो सकती है। ऐसी अवस्थामें भी वह मेरा भजन करता है। कारण कि उसका ध्येय (लक्ष्य) अन्यका नहीं रहा है अर्थात् उसका लक्ष्य अब धन, सम्पत्ति, आदर-सत्कार, सुख-आराम आदि प्राप्त करनेका नहीं रहा है। उसका एकमात्र लक्ष्य अनन्यभावसे मेरेमें लगनेका ही है।
अब शंका यह होती है कि ऐसा दुराचारी अनन्यभावसे भगवान्के भजनमें कैसे लगेगा? उसके लगनेमें कई कारण हो सकते हैं; जैसे—
(१) वह किसी आफतमें पड़ जाय और उसको कहीं किंचिन्मात्र भी कोई सहारा न मिले। ऐसी अवस्थामें अचानक उसको सुनी हुई बात याद आ जाय कि 'भगवान् सबके सहायक हैं और उनकी शरणमें जानेसे सब काम ठीक हो जाता है' आदि।
(२) वह कभी किसी ऐसे वायुमण्डलमें चला जाय, जहाँ बड़े-बड़े अच्छे सन्त-महापुरुष हुए हैं और वर्तमानमें भी हैं, तो उनके प्रभावसे भगवान्में रुचि पैदा हो जाय।
(३) वाल्मीकि, अजामिल, सदन कसाई आदि पापी भी भगवान्के भक्त बन चुके हैं और भजनके प्रभावसे उनमें विलक्षणता आयी है—ऐसी कोई कथा सुन करके पूर्वका कोई अच्छा संस्कार जाग उठे, जो कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें रहता है*।
(४) कोई प्राणी ऐसी आफतमें आ गया, जहाँ उसके बचनेकी कोई सम्भावना ही नहीं थी, पर वह बच गया। ऐसी घटनाविशेषको देखनेसे उसके भीतर यह भाव पैदा हो जाय कि कोई ऐसी विलक्षण शक्ति है, जो ऐसी आफतसे बचाती है। वह विलक्षण शक्ति भगवान् ही हो सकते हैं; इसलिये अपनेको भी उनके परायण हो जाना चाहिये।
(५) उसको किसी सन्तके दर्शन हो जाय और उसका पतन करनेवाले दुष्कर्मोंको देखकर उसपर सन्तकी कृपा हो जाय; जैसे—वाल्मीकि, अजामिल आदि पापियोंपर सन्तोंकी कृपा हुई।
—ऐसे कई कारणोंसे अगर दुराचारीका भाव बदल जाय, तो वह भगवान्के भजनमें अर्थात् भगवान्की तरफ
लग सकता है। चोर, डाकू, लुटेरे, हत्या करनेवाले बंधिक आदि भी अचानक भाव बदल जानेसे भगवान्के अच्छे भक्त हुए हैं—ऐसी कई कथाएँ पुराणोंमें तथा भक्तमाल आदि ग्रन्थोंमें आती हैं।
अब एक शंका होती है कि जो वर्षोंसे भजन-ध्यान कर रहे हैं, उनका मन भी तत्परतासे भगवान्में नहीं लगता, फिर जो दुराचारी-से-दुराचारी है, उसका मन भगवान्में तैलधाराम्बुत कैसे लगेगा? यहाँ 'अनन्यभाक् ' का अर्थ 'वह तैलधाराम्बुत चिन्तन करता है'—यह नहीं है, प्रत्युत इसका अर्थ है—'न अन्यं भजति ' अर्थात् वह अन्यका भजन नहीं करता। उसका भगवान्के सिवाय अन्य किसीका सहारा, आश्रय नहीं है, केवल भगवान्का ही आश्रय है। जैसे पतिव्रता स्त्री केवल पतिका चिन्तन ही करती हो—ऐसी बात नहीं है। वह तो हरदम पतिकी ही बनी रहती है, स्वप्नमें भी वह दूसरोंकी नहीं होती। तात्पर्य है कि उसका तो एक पतिसे ही अपनापन रहता है। ऐसे ही उस दुराचारीका केवल भगवान्से ही अपनापन हो जाता है और एक भगवान्का ही आश्रय रहता है।
'अनन्यभाक् ' होनेमें खास बात है 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं' इस प्रकार अपनी अहंताको बदल देना। अहंता-परिवर्तनसे जितनी जल्दी शुद्धि आती है, जप, तप, यज्ञ, दान आदि क्रियाओंसे उतनी जल्दी शुद्धि नहीं आती। इस अहंताके परिवर्तनके विषयमें तीन बातें हैं—
(१) अहंताको मिटना —ज्ञानयोगसे अहंता मिट जाती है। जिस प्रकाशमें 'अहम्' (मैं-पन)-का भान होता है, वह प्रकाश मेरा स्वरूप है और एकदेशीयरूपमें प्रतीत होनेवाला 'अहम्' मेरा स्वरूप नहीं है। कारण यह है कि 'अहम्' दृश्य होता है, और जो दृश्य होता है, वह अपना स्वरूप नहीं होता। इस प्रकार दोनोंका विभाजन करके अपने ज्ञापिमात्र स्वरूपमें स्थित होनेसे 'अहंता' मिट जाती है।
(२) अहंताको शुद्ध करना —कर्मयोगसे अहंता शुद्ध हो जाती है। जैसे, पुत्र कहता है कि 'मैं पुत्र हूँ और ये मेरे पिता हैं' तो इसका तात्पर्य है कि पिताकी सेवा करनामात्र मेरा कर्तव्य है; क्योंकि पिता-पुत्रका सम्बन्ध केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही है। पिता मेरेको पुत्र न मानें, मेरेको दुःख दें, मेरा अहित करें, तो भी मेरेको उनकी सेवा करनी है, उनको सुख पहुँचाना है। ऐसे ही माता, भाई, भौजाई, स्त्री, पुत्र, परिवारके प्रति भी मेरेको केवल अपने
- सुमति कुमति सब के उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥ (मानस ५।४०।३)
श्लोक ३० ]
- साधक-संजीवनी *
६७५
कर्तव्यका ही पालन करना है। उनके कर्तव्यकी तरफ मेरेको देखना ही नहीं है कि वे मेरे प्रति क्या करते हैं, दुनियाके प्रति क्या करते हैं। उनके कर्तव्यको देखना मेरा कर्तव्य नहीं है; क्योंकि दूसरोंके कर्तव्यको देखनेवाला अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है। अतः उनका तो मेरेपर पूरा अधिकार है, पर वे मेरे अनुकूल चलें—ऐसा मेरा किसीपर भी अधिकार नहीं है। इस प्रकार दूसरोंका कर्तव्य न देखकर केवल अपना कर्तव्य-पालन करनेसे अहंता शुद्ध हो जाती है। कारण कि अपने सुख-आरामकी कामना होनेसे ही अहंता अशुद्ध होती है।
(३) अहंताका परिवर्तन करना —भक्तियोगसे अहंता बदल जाती है। जैसे, विवाहमें पतिके साथ सम्बन्ध होते ही कन्याकी अहंता बदल जाती है और वह पतिके घरको ही अपना घर, पतिके धर्मको ही अपना धर्म मानने लग जाती है। वह पतिव्रता अर्थात् एक पतिकी ही हो जाती है, तो फिर वह माता-पिता, सास-ससुर आदि किसीकी भी नहीं होती। इतना ही नहीं, वह अपने पुत्र और पुत्रीकी भी नहीं होती; क्योंकि जब वह सती होती है, तब पुत्र-पुत्रीके, माता-पिताके स्नेहकी भी परवाह नहीं करती। हाँ, वह पतिके नाते सेवा सबकी कर देती है, पर उसकी अहंता केवल पतिकी ही हो जाती है। ऐसे ही मनुष्यकी अहंता 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं' इस प्रकार भगवान्के साथ हो जाती है, तो उसकी अहंता बदल जाती है। इस अहंताके बदलनेको ही यहाँ 'अनन्यभाक् ' कहा है।
'साधुरेव स मन्तव्यः :'—अब यहाँ एक प्रश्न होता है कि वह पहले भी दुराचारी रहा है और वर्तमानमें भी उसके आचरण सर्वथा शुद्ध नहीं हुए हैं, तो दुराचारोंको लेकर उसको दुराचारी मानना चाहिये या अनन्यभावको लेकर साधु ही मानना चाहिये? तो भगवान् कहते हैं कि उसको तो साधु ही मानना चाहिये। यहाँ 'मन्तव्यः ' (मानना चाहिये) विधि-वचन है अर्थात् यह भगवान्की विशेष आज्ञा है।
माननेकी बात वहीँ कही जाती है, जहाँ साधुता नहीं दीखती। अगर उसमें किंचिन्मात्र भी दुराचार न होते, तो भगवान् 'उसको साधु ही मानना चाहिये' ऐसा क्यों कहते? तो भगवान्के कहनेसे यही सिद्ध होता है कि उसमें अभी दुराचार हैं। वह दुराचारोंसे सर्वथा रहित नहीं हुआ है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि वह अभी सांगोपांग साधु नहीं हुआ है, तो भी उसको साधु ही मानना चाहिये अर्थात्
बाहरसे उसके आचरणोंमें, क्रियाओंमें कोई कमी भी देखनेमें आ जाय, तो भी वह असाधु नहीं है। इसका कारण यह है कि वह 'अनन्यभाक् ' हो गया अर्थात् 'मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं; मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है' इस प्रकार वह भीतरसे ही भगवान्का हो गया, उसने भीतरसे ही अपनी अहंता बदल दी। इसलिये अब उसके आचरण सुधरते देरी नहीं लगेगी; क्योंकि अहंताके अनुसार ही सब आचरण होते हैं।
उसको साधु ही मानना चाहिये—ऐसा भगवान्को क्यों कहना पड़ रहा है? कारण कि लोगोंमें यह रीति है कि वे किसीके भीतरी भावोंको न देखकर बाहरसे जैसा आचरण देखते हैं, वैसा ही उसको मान लेते हैं। जैसे, एक आदमी वर्षोंसे परिचित है अर्थात् भजन करता है, अच्छे आचरणोंवाला है—ऐसा बीसों, पचीसों वर्षोंसे जानते हैं। पर एक दिन देखा कि वह रात्रिके समय एक वेश्याके यहाँसे बाहर निकला, तो उसे देखते ही लोगोंके मनमें आता है कि देखो! हम तो इसको बड़ा अच्छा मानते थे, पर यह तो वैसा नहीं है, यह तो वेश्यागामी है! ऐसा विचार आते ही उनका जो अच्छेपनका भाव था, वह उड़ जाता है। जो कई दिनोंकी श्रद्धा-भक्ति थी, वह उठ जाती है। इसी तरहसे लोग वर्षोंसे किसी व्यक्तिको जानते हैं कि वह अन्यायी है, पापी है, दुराचारी है और वही एक दिन गंगाके किनारे स्नान किये हुए, हाथमें गोमुखी लिये हुए बैठे है। उसका चेहरा बड़ा प्रसन्न है। उसको देखकर कोई कहता है कि देखो भगवान्का भजन कर रहा है, बड़ा अच्छा पुरुष है, तो दूसरा कहता है कि अरे! तुम इसको जानते नहीं, मैं जानता हूँ; यह तो ऐसा-ऐसा है, कुछ नहीं है, केवल पाखण्ड करता है। इस प्रकार भजन करनेपर भी लोग उसको वैसा ही पापी मान लेते हैं और उधर साधन-भजन करनेवालेको भी वेश्याके घरसे निकलता देखकर खराब मान लेते हैं। उसको न जाने किस कारणसे वेश्याने बुलाया था, क्या पता वह दयापरवश होकर वेश्याको शिक्षा देनेके लिये गया हो, उसके सुधारके लिये गया हो—उस तरफ उनकी दृष्टि नहीं जाती। जिनका अन्तःकरण मैला हो, वे मैलापनकी बात करके अपने अन्तःकरणको और मैला कर लेते हैं। उनका अन्तःकरण मैलापनकी बात ही पकड़ता है। परन्तु उपर्युक्त दोनों प्रकारकी बातें होनेपर भी भगवान्की दृष्टि मनुष्यके
६७६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ९
भावपर ही रहती है, आचरणोंपर नहीं-
‘रहित न प्रभु चित चूक किए की।
करत सुरति सय बार हिए की॥’
(मानस १।२९।३)
क्योंकि भगवान् भावग्राही हैं- ‘भावग्राही जनार्दन:।’
‘सम्यग्व्यवसितो हि स:’- दूसरे अध्यायमें कर्मयोगके
प्रकरणमें ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि’ की बात आयी है
(इकतालीसवाँ श्लोक) अर्थात् वहाँ बुद्धिमें यह
निश्चय होता है कि ‘मेरेको राग-द्वेष नहीं करने हैं,
कर्तव्य-कर्म करते हुए सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना है।’
अतः कर्मयोगीकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होती है और यहाँ
कर्ता स्वयं व्यवसित है- ‘सम्यग्व्यवसित:।’ कारण कि
‘मैं केवल भगवान्का ही हूँ, अब मेरा काम केवल भजन
करना ही है’- यह निश्चय स्वयंका है, बुद्धिका नहीं।
अतः सम्यक् निश्चयवालेकी स्थिति भगवान्में है। तात्पर्य
यह हुआ कि वहाँ निश्चय ‘करण’-(बुद्धि-) में है और
यहाँ निश्चय ‘कर्ता’-(स्वयं-) में है। करणमें निश्चय
होनेपर भी जब कर्ता परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है,
तो फिर कर्तामें निश्चय होनेपर करणमें भी निश्चय हो
जाय-इसमें तो कहना ही क्या है!
जहाँ बुद्धिका निश्चय होता है, वहाँ वह निश्चय
तबतक एकरूप नहीं रहता, जबतक स्वयं कर्ता उस
निश्चयके साथ मिल नहीं जाता। जैसे; सत्संग-स्वाध्यायके
समय मनुष्योंका ऐसा निश्चय होता है कि अब तो हम
केवल भजन-स्मरण ही करेंगे। परन्तु यह निश्चय सत्संग-
स्वाध्यायके बाद स्थिर नहीं रहता। इसमें कारण यह है कि
उनकी स्वयंकी स्वाभाविक रुचि केवल परमात्माकी तरफ
चलनेकी नहीं है, प्रत्युत साथमें संसारका सुख-आराम
आदि लेनेकी भी रुचि रहती है। परन्तु जब स्वयंका यह
निश्चय हो जाता है कि अब हमें परमात्माकी तरफ ही
चलना है, तो फिर यह निश्चय कभी मिटता नहीं; क्योंकि
यह निश्चय स्वयंका है।
जैसे, कन्याका विवाह होनेपर ‘अब मैं पतिकी हो
गयी, अब मेरेको पतिके घरका काम ही करना है’ ऐसा
निश्चय स्वयंमें हो जानेसे यह कभी मिटता नहीं, प्रत्युत
बिना याद किये ही हरदम याद रहता है। इसका कारण
यह है कि उसने स्वयंको ही पतिका मान लिया। ऐसे ही
जब मनुष्य यह निश्चय कर लेता है कि ‘मैं भगवान्का
हूँ और अब केवल भगवान्का ही काम (भजन) करना
है, भजनके सिवाय और कोई काम नहीं, किसी कामसे
कोई मतलब नहीं, तो यह निश्चय स्वयंका होनेसे सदाके
लिये पक्का हो जाता है, फिर कभी मिटता ही नहीं।’
इसलिये भगवान् कहते हैं कि उसको साधु ही मानना
चाहिये। केवल माननेकी ही बात नहीं, स्वयंका निश्चय
होनेसे वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है- ‘क्षिप्रं
भवति धर्मात्मा’ (९।३१)।
भक्तियोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण दुर्गुण-दुराचार भगवान्की
विमुखतापर ही टिके रहते हैं। जब प्राणी अनन्यभावसे
भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब सभी दुर्गुण-दुराचार
मिट जाते हैं।
परिशिष्ट भाव-ज्ञानयोग और कर्मयोगमें बुद्धिकी प्रधानता रहती है- ‘एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोगे
त्विमां शृणु’ (गीता २।३९)। इसलिये ज्ञानयोगी और कर्मयोगीकी बुद्धि व्यवसित होती है- ‘व्यवसायात्मिका
बुद्धिरेकेह’ (गीता २।४१), ‘व्यवसायात्मिका बुद्धि:’ (गीता २।४४)। परन्तु भक्तियोगमें स्वयंकी प्रधानता रहती
है, इसलिये भक्त स्वयं व्यवसित होता है- ‘सम्यग्व्यवसितो हि स:।’
मन-बुद्धिमें बैठी हुई बातकी विस्मृति हो सकती है, पर स्वयंमें बैठी हुई बातकी विस्मृति नहीं हो सकती।
कारण कि मन-बुद्धि अपने साथ निरन्तर नहीं रहते, सुषुप्तिमें हमें उनके अभावका अनुभव होता है, पर स्वयंके
अभावका अनुभव कभी किसीको नहीं होता। उस स्वयंमें जो बात होती है, वह अखण्ड रहती है। इसलिये ‘मैं
भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’- यह स्वीकृति स्वयंमें होती है, मन-बुद्धिमें नहीं। एक बार यह स्वीकृति होनेपर
फिर कभी अस्वीकृति होती ही नहीं; क्योंकि स्वयं मूलमें भगवान्का ही अंश होनेसे भगवान्से अभिन्न है। परन्तु
भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध स्वीकार कर लेता है (गीता-पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। अतः
वास्तवमें केवल अपनी भूल ही मिटती है। भूल मिटते ही भगवान्के नित्य-सम्बन्धकी स्वतः जागृति हो जाती है-
‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (गीता १८।७३)। दूसरेके साथ सम्बन्ध माना था, यही भूल थी, मोह था।
सम्बन्ध-अब आगेके श्लोकमें सम्यक् निश्चयका फल बताते हैं।
श्लोक ३१ ]
- साधक-संजीवनी *
६७७
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
क्षिप्रम् | = (वह) तत्काल (उसी क्षण) | शश्वत् | = निरन्तर रहनेवाली | भक्तः | = भक्तका ---|---|---|---|---|--- धर्मात्मा | = धर्मात्मा | शान्तिम् | = शान्तिको | प्रणश्यति, न | = पतन नहीं होता— भवति | = हो जाता है | निगच्छति | = प्राप्त हो जाता है । | प्रतिजानीहि | = (ऐसी तुम) प्रतिज्ञा करो । | (और) | मे | = मेरे | |
व्याख्या—‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’— वह तत्काल धर्मात्मा हो जाता है अर्थात् महान् पवित्र हो जाता है। कारण कि यह जीव स्वयं परमात्माका अंश है और जब इसका उद्देश्य भी परमात्माकी प्राप्ति करना हो गया तो अब उसके धर्मात्मा होनेमें क्या देरी लगेगी? अब वह पापात्मा कैसे रहेगा? क्योंकि वह धर्मात्मा तो स्वतः था ही, केवल संसारके सम्बन्धके कारण उसमें पापात्मापन आया था, जो कि आगन्तुक था। अब जब अहंता बदलनेसे संसारका सम्बन्ध नहीं रहा, तो वह ज्यों-का-त्यों (धर्मात्मा) रह गया।
यह जीव जब पापात्मा नहीं बना था, तब भी पवित्र था और जब पापात्मा बन गया, तब भी वैसा ही पवित्र था। कारण कि परमात्माका अंश होनेसे जीव सदा ही पवित्र है। केवल संसारके सम्बन्धसे वह पापात्मा बना था। संसारका सम्बन्ध छूटते ही वह ज्यों-का-त्यों पवित्र रह गया।
पाप करनेकी भावना रहते हुए मनुष्य ‘मेरेको केवल भगवान्की तरफ ही चलना है’—ऐसा निश्चय नहीं कर सकता, यह बात ठीक है। परन्तु पापी मनुष्य ऐसा निश्चय नहीं कर सकता—यह नियम नहीं है। कारण कि जीवमात्र परमात्माका अंश होनेसे तत्त्वतः निर्दोष है। संसारकी आसक्तिके कारण ही उसमें आगन्तुक दोष आ जाते हैं। यदि उसके मनमें पापोंसे घृणा हो जाय और ऐसा निश्चय हो जाय कि अब भगवान्का ही भजन करना है, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है। कारण कि जहाँ संसारकी कामना है, वहीं भगवान्की तरफ चलनेकी रुचि भी है। अगर भगवान्की तरफ चलनेकी रुचि जम जाय, तो कामना, आसक्ति नष्ट हो जाती है। फिर भगवत्प्राप्तिमें देरी नहीं लग सकती।
वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है—इसका तात्पर्य यह हुआ कि उसमें जो यत्किंचित् दुराचार दीखते हैं, वे भी टिकेंगे नहीं। कारण कि सब-के-सब दुराचार टिके
हुए हैं—संसारको महत्त्व देनेपर। परन्तु जब वह संसारकी कामनासे रहित होकर केवल भगवान्को ही चाहता है, तब उसके भीतर संसारका महत्त्व न रहकर केवल भगवान्का महत्त्व हो जाता है। भगवान्का महत्त्व होनेसे वह धर्मात्मा हो जाता है।
मार्मिक बात
यह एक सिद्धान्त है कि कर्ताके बदलनेपर क्रियाएँ अपने-आप बदल जाती हैं, जैसे कोई धर्मरूपी क्रिया करके धर्मात्मा होना चाहता है, तो उसे धर्मात्मा होनेमें देरी लगेगी। परन्तु अगर वह कर्ताको ही बदल दे अर्थात् ‘मैं धर्मात्मा हूँ’ ऐसे अपनी अहंताको ही बदल दे, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जायगा। ऐसे ही दुराचारी-से-दुराचारी भी ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ ऐसे अपनी अहंताको बदल देता है, तो वह बहुत जल्दी धर्मात्मा हो जाता है, साधु हो जाता है, भक्त हो जाता है। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जब संसार-शरीरके साथ ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन करके संयोगजन्य सुख चाहने लगता है, तब वह ‘कामात्मा’ (गीता—दूसरे अध्यायका तैतालसीर्वा श्लोक) बन जाता है और जब संसारसे सर्वथा विमुख होकर भगवान्के साथ अनन्य सम्बन्ध जोड़ लेता है, जो कि वास्तवमें है, तब वह ‘धर्मात्मा’ बन जाता है।
साधारण दृष्टिसे लोग यही समझते हैं कि मनुष्य सत्य बोलनेसे सत्यवादी होता है और चोरी करनेसे चोर होता है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। जब स्वयं सत्यवादी होता है अर्थात् ‘मैं सत्य बोलनेवाला हूँ’ ऐसी अहंताको अपनेमें पकड़ लेता है, तब वह सत्य बोलता है और सत्य बोलनेसे उसकी सत्यवादिता दृढ़ हो जाती है। ऐसे ही चोर होता है, वह ‘मैं चोर हूँ’ ऐसी अहंताको पकड़कर ही चोरी करता है और चोरी करनेसे उसका चोरपना दृढ़ हो जाता है। परन्तु
६७८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ९
जिसकी अहंतामें 'मैं चोर हूँ ही नहीं' ऐसा दृढ़ भाव है,
वह चोरी नहीं कर सकता। तात्पर्य यह हुआ कि अहंताके
परिवर्तनसे क्रियाओंका परिवर्तन हो जाता है।
इन दोनों दृष्टान्तोंसे यह सिद्ध हुआ कि कर्ता जैसा
होता है, उसके द्वारा वैसे ही कर्म होते हैं और जैसे कर्म
होते हैं, वैसा ही कर्तापन दृढ़ हो जाता है। ऐसे ही यहाँ
दुराचारी भी 'अनन्यभाक्' होकर अर्थात् 'मैं केवल
भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं' ऐसे
अनन्यभावसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तो
उसकी अहंतामें 'मैं भगवान्का हूँ, संसारका नहीं हूँ' यह
भाव दृढ़ हो जाता है, जो कि वास्तवमें सत्य है। इस प्रकार
अहंताके बदल जानेपर क्रियाओंमें किंचिन्मात्र कमी
रहनेपर भी वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है।
यहाँ शंका हो सकती है कि पूर्वश्लोकमें भगवान्
'सुराचार:' कहकर आये हैं, तो फिर यहाँ भगवान्ने
उसको 'धर्मात्मा' क्यों कहा है? इसका समाधान है कि
दुराचारीके दुराचार मिट जायँ, तो वह सदाचारी अर्थात्
धर्मात्मा ही होगा। अतः सदाचारी कहो या धर्मात्मा कहो-
एक ही बात है।
'शश्वच्छान्तिं निगच्छति' - केवल धार्मिक क्रियाओंसे
जो धर्मात्मा बनता है, उसके भीतर भोग और ऐश्वर्यकी
कामना होनेसे उसको भोग और ऐश्वर्य तो मिल सकते
हैं, पर शाश्वती शान्ति नहीं मिल सकती। दुराचारीकी
अहंता बदलनेपर जब वह भगवान्के साथ भीतरसे एक
हो जाता है, तब उसके भीतर कामना नहीं रह सकती,
असत्का महत्त्व नहीं रह सकता। इसलिये उसको निरन्तर
रहनेवाली शान्ति मिल जाती है।
दूसरा भाव यह है कि स्वयं परमात्माका अंश होनेसे
'चेतन अमल सहज सुखरासी' है। अतः उसमें अपने
स्वरूपकी जो अनादि अनन्त स्वतःसिद्ध शान्ति है, धर्मात्मा
होनेसे अर्थात् भगवान्के साथ अनन्यभावसे सम्बन्ध होनेसे
वह शाश्वती शान्ति प्राप्त हो जाती है। केवल संसारके साथ
सम्बन्ध माननेसे ही उसका अनुभव नहीं हो रहा था।
'कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति'-
यहाँ 'मेरे भक्तका पतन नहीं होता' ऐसी प्रतिज्ञा भगवान्
अर्जुनसे करवाते हैं, स्वयं नहीं करते। इसका आशय यह
है कि अभी युद्धका आरम्भ होनेवाला है और भगवान्ने
पहले ही हाथमें शस्त्र न लेनेकी प्रतिज्ञा कर ली है; परन्तु
जब आगे भीष्मजी यह प्रतिज्ञा कर लेंगे कि 'आजु जौ
हरिहिं न शस्त्र गहाऊँ। तौ लाजों गंगा-जननीकों
शान्तनु सुत न कहाऊँ' तो उस समय भगवान्की प्रतिज्ञा
तो टूट जायगी, पर भक्त-(भीष्मजी-)की प्रतिज्ञा नहीं
टूटेगी। भगवान्ने चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'भक्तोऽसि
मे सखा चेति' कहकर अर्जुनको अपना भक्त स्वीकार
किया है। अतः भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि भैया! तू
प्रतिज्ञा कर ले। कारण कि तेरे द्वारा प्रतिज्ञा करनेपर अगर
मैं खुद भी तेरी प्रतिज्ञा तोड़ना चाहूँगा, तो भी तोड़ नहीं
सकूँगा, फिर और तोड़ेगा ही कौन? तात्पर्य हुआ कि अगर
भक्त प्रतिज्ञा करे, तो उस प्रतिज्ञाके विरुद्ध मेरी प्रतिज्ञा भी
नहीं चलेगी।
मेरे भक्तका विनाश अर्थात् पतन नहीं होता-यह
कहनेका तात्पर्य है कि जब वह सर्वथा मेरे सम्मुख हो गया
है, तो अब उसके पतनकी किंचिन्मात्र भी सम्भावना नहीं
रही। पतनका कारण तो शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मान
लेना ही था। उस माने हुए सम्बन्धसे सर्वथा विमुख होकर
जब वह अनन्यभावसे मेरे ही सम्मुख हो गया, तो अब
उसके पतनकी सम्भावना हो ही कैसे सकती है?
दुराचारी भी जब भक्त हो सकता है, तो फिर भक्त
होनेके बाद वह पुनः दुराचारी भी हो सकता है-ऐसा
न्याय कहता है। इस न्यायको दूर करनेके लिये भगवान्
कहते हैं कि यह न्याय यहाँ नहीं लगता। मेरे यहाँ तो
दुराचारी-से-दुराचारी भी भक्त बन सकते हैं, पर भक्त
होनेके बाद उनका फिर पतन नहीं हो सकता अर्थात् वे
फिर दुराचारी नहीं बन सकते। इस प्रकार भगवान्के
न्यायमें भी दया भरी हुई है। अतः भगवान् न्यायकारी और
दयालु-दोनों ही सिद्ध होते हैं।
परिशिष्ट भाव-जैसे रोगीका वैद्यके साथ सम्बन्ध हो जाता है, ऐसे ही अपनी निर्बलताका और भगवान्की
सर्वसमर्थताका विश्वास होनेपर मनुष्यका भगवान्के साथ सम्बन्ध हो जाता है। तात्पर्य है कि जब मनुष्य संसारके दुःखोंसे
घबरा जाता है और उनको मिटानेमें अपनी निर्बलता अनुभव करता है, पर साथ-ही-साथ उसमें यह विश्वास रहता
है कि सर्वसमर्थ भगवान्की कृपाशक्तिसे मेरी यह निर्बलता दूर हो सकती है, मैं सांसारिक दुःखोंसे बच सकता हूँ,
तब वह तत्काल 'भक्त' हो जाता है-'क्षिप्रं भवति धर्मात्मा'। भूखे व्यक्तिको अन्न मिल जाय तो क्या भोजन करनेमें
देरी लगेगी?
जबतक मनुष्यको अपनेमें कुछ बल, योग्यता, विशेषता दीखती है, तबतक वह 'अनन्यभाक्' नहीं होता। वह
श्लोक ३१]
- साधक-संजीवनी *
६७९
‘अनन्यभाक्’ तभी होता है, जब उसको दूसरा कोई उसके दुःखोंको मिटानेवाला नहीं दीखता। ‘अनन्यभाक्’ होते ही वह धर्मात्मा अर्थात् भगवान्का भक्त हो जाता है।
भक्तका पतन नहीं होता; क्योंकि वह भगवन्निष्ठ होता है अर्थात् उसके साधन और साध्य भगवान् ही होते हैं; उसका अपना बल नहीं होता, प्रत्युत भगवान्का ही बल होता है। यहाँ शंका हो सकती है कि अगर भक्तका पतन नहीं होता तो भगवान्ने अठारहवें अध्यायमें अर्जुनको ‘अथ चैत्त्वमहंकारान श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि’ (१८।५८) ‘यदि तू अहंकारके कारण मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा’—ऐसा क्यों कहा? जबकि भगवान् अर्जुनको अपना भक्त भी मानते हैं—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति’ (गीता ४।३)? इसका समाधान है कि भक्तका पतन तभी हो सकता है, जब वह भगवान्का आश्रय छोड़कर अहंकारका आश्रय ले ले—‘अहंकारान श्रोष्यसि’। भगवान्का आश्रय रहते हुए उसका पतन नहीं हो सकता।
भक्त भगवान्के छोटे बालक हैं और ज्ञानी बड़े बालक हैं। जैसे माँको छोटे-बड़े सभी बालक समानरूपसे प्रिय लगते हैं, पर वह सँभाल छोटे बालककी ही करती है, बड़ेकी नहीं। कारण कि छोटा बालक सर्वथा माँके ही आश्रित रहता है; अतः उसके सँभालकी जितनी आवश्यकता है, उतनी बड़ेके लिये आवश्यकता नहीं है। ऐसे ही भगवान् अपने आश्रित भक्तकी पूरी सँभाल करते हैं और स्वयं उसके योगक्षेमका वहन करते हैं (गीता—नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)। परन्तु ज्ञानीके योगक्षेमका वहन कौन करे? इसलिये ज्ञानका साधक तो योगभ्रष्ट हो सकता है, पर भक्त योगभ्रष्ट नहीं हो सकता।
ब्रह्मादि देवता भगवान्से कहते हैं—
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वयस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुग्मद्वययः॥
(श्रीमद्भा० १०।२।३२)
‘हे कमलनयन! जो लोग आपके चरणोंकी शरण नहीं लेते और आपकी भक्तिसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपनेको मुक्त तो मानते हैं, पर वास्तवमें वे बद्ध ही हैं। वे यदि कष्टपूर्वक साधन करके ऊँचे-से-ऊँचे पदपर भी पहुँच जायँ, तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं।’
तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्विच्य बद्धसौहृदाः। त्व्याभिगुप्ता विचरन्ति निभंया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥
(श्रीमद्भा० १०।२।३३)
‘परन्तु भगवन्! जो आपके भक्त हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी उन ज्ञानाभिमानियोंकी तरह अपने साधनसे गिरते नहीं। प्रभो! आपके द्वारा सुरक्षित होनेके कारण वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवाली सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निभंय होकर विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकता।’
भगवान्की स्तुति करते हुए वेद कहते हैं—
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥ बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥
(मानस, उत्तर० १३।३)
ज्ञानयोगके साधकमें कुछ कमी रहनेसे पतन हो सकता है, पर भक्तियोगके साधकमें कुछ कमी रहनेपर भी पतन नहीं होता। इसलिये भगवान् कहते हैं—
बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयैरजितेन्द्रियः। प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।१८)
‘उद्धवजी! मेरा जो भक्त अभी जितेन्द्रिय नहीं हो सका है और संसारके विषय बार-बार उसे बाधा पहुँचाते रहते
६८०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
हैं, अपनी ओर खींचते रहते हैं तो भी वह प्रतिक्षण बढ़नेवाली मेरी भक्तिके प्रभावसे प्रायः विषयोंसे पराजित नहीं होता।' न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्।
(महाभारत, अनु० १४९।१३९)
‘भगवान्के भक्तोंका कहीं कभी भी अशुभ नहीं होता।’
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तामू। बड़ रखवार रमापति जासू॥
(मानस, बाल० १२६।४)
‘कौन्तेय प्रतिजानीहि’—भगवान् अर्जुनको प्रतिज्ञा करनेके लिये कहते हैं; क्योंकि भक्तको प्रतिज्ञा भगवान् भी टाल नहीं सकते। भक्ति भगवान्की कमजोरी है। इसलिये भगवान्ने दुर्वासासे कहा है—
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। साधुभिर्गस्तद्वयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
(श्रीमद्भ० ९।४।६३)
‘हे द्विज! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं। मुझे भक्तजन बहुत प्रिय हैं। उनका मेरे हृदयपर पूर्ण अधिकार है।’
‘कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति’—इन पदोंसे साधकको यह दृढ़ विश्वास करना चाहिये कि मेरा पतन हो ही नहीं सकता; क्योंकि मैं भगवान्का ही हूँ।
सम्बन्ध—इस प्रकरणमें भगवान्ने अपनी भक्तिके सात अधिकारी बताये हैं। उनमेंसे दुराचारीका वर्णन दो श्लोकोंमें किया। अब आगेके श्लोकमें भक्तिके चार अधिकारियोंका वर्णन करते हैं।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥ ३२॥
| पार्थ | = हे पृथानन्दन! | वैश्याः | = वैश्य | व्यपाश्रित्य | = सर्वथा मेरे शरण |
|---|---|---|---|---|---|
| ये | = जो | तथा | = और | होकर | |
| अपि | = भी | शूद्राः | = शूद्र (हों), | हि | = निःसन्देह |
| पापयोनयः | = पापयोंनिवाले | ते | = वे | पराम् | = परम |
| स्युः | = हों (तथा जो भी) | अपि | = भी | गतिम् | = गतिको |
| स्त्रियः | = स्त्रियाँ, | माम्, | यान्ति | = प्राप्त हो जाते हैं। |
व्याख्या —‘मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य ..... यान्ति परां गतिम्’—जिनके इस जन्ममें आचरण खराब हैं अर्थात् जो इस जन्मका पापी है, उसको भगवान्ने तीसवें श्लोकमें ‘दुराचारी’ कहा है। जिनके पूर्वजन्ममें आचरण खराब थे अर्थात् जो पूर्वजन्मके पापी हैं और अपने पुराने पापोंका फल भोगनेके लिये नीच योनियोंमें पैदा हुए हैं, उनको भगवान्ने यहाँ ‘पापयोंनि’ कहा है।
यहाँ ‘पापयोंनि’ शब्द ऐसा व्यापक है, जिसमें असुर, राक्षस, पशु, पक्षी आदि सभी लिये जा सकते हैं* और ये सभी भगवद्भक्तिके अधिकारी माने जाते हैं। शाण्डिल्य ऋषिने कहा है—‘आनिन्द्योऽन्यधिक्रियते परम्पर्यात्
सामान्यवत्।’ (शाण्डिल्य-भक्तिसूत्र ७८) अर्थात् जैसे दया, क्षमा, उदारता आदि सामान्य धर्मोंके मात्र मनुष्य अधिकारी हैं, ऐसे ही भगवद्भक्तिके नीची-से-नीची योनिसे लेकर ऊँची-से-ऊँची योनि तकके सब प्राणी अधिकारी हैं। इसका कारण यह है कि मात्र जीव भगवान्के अंश होनेसे भगवान्की तरफ चलनेमें, भगवान्की भक्ति करनेमें, भगवान्के सम्मुख होनेमें अनधिकारी नहीं हैं। प्राणियोंकी योग्यता-अयोग्यता आदि तो सांसारिक कार्योंमें हैं; क्योंकि ये योग्यता आदि बाह्य हैं और मिली हुई हैं तथा बिछुड़नेवाली हैं। इसलिये भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेमें योग्यता-अयोग्यता कोई कारण नहीं है अर्थात् जिसमें योग्यता है, वह
- केवलनेन हि भावेन गोष्यो गावो नगा मुगाः। येऽन्ये मूढधियो नागाः सिद्धा मामीयुरंजसा॥ (श्रीमद्भ० ११।१२।८)
‘गोपियाँ, गायें, वृक्ष, पशु, नाग तथा इस प्रकारके और भी मूढबुद्धि प्राणियोंने अनन्यभावके द्वारा सिद्ध होकर अनायास ही मेरी प्राप्ति कर ली है।’
श्लोक ३२ ]
- साधक-संजीवनी *
६८९
भगवान्में लग सकता है और जिसमें अयोग्यता है, वह भगवान्में नहीं लग सकता—यह कोई कारण नहीं है। प्राणी स्वयं भगवान्के हैं; अतः सभी भगवान्के सम्मुख हो सकते हैं। तात्पर्य हुआ कि जो हृदयसे भगवान्को चाहते हैं, वे सभी भगवद्भक्तिके अधिकारी हैं। ऐसे पापयोनिवाले भी भगवान्के शरण होकर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, परम पवित्र हो जाते हैं।
लौकिक दृष्टिसे तो आचरण भ्रष्ट होनेसे अपवित्रता मानी जाती है, पर वास्तवमें जो कुछ अपवित्रता आती है, वह सब-की-सब भगवान्से विमुख होनेसे ही आती है। जैसे, अंगार अग्निसे विमुख होते ही कोयला बन जाता है। फिर उस कोयलेको साबुन लगाकर कितना ही धो लें, तो भी उसका कालापन नहीं मिटता। अगर उसको पुनः अग्निमें रख दिया जाय, तो फिर उसका कालापन नहीं रहता और वह चमक उठता है। ऐसे ही भगवान्के अंश इस जीवमें कालापन अर्थात् अपवित्रता भगवान्से विमुख होनेसे ही आती है। अगर यह भगवान्के सम्मुख हो जाय, तो इसकी वह अपवित्रता सर्वथा मिट जाती है और यह महान् पवित्र हो जाता है तथा दुनियामें चमक उठता है। इसमें इतनी पवित्रता आ जाती है कि भगवान् भी इसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं!
जब स्वयं आर्त होकर प्रभुको पुकारता है, तो उस पुकारमें भगवान्को द्रवित करनेकी जो शक्ति है, वह शक्ति शुद्ध आचरणोंमें नहीं है। जैसे, माँका एक बेटा अच्छा काम करता है तो माँ उससे प्यार करती है और एक बेटा कुछ भी काम नहीं करता, प्रत्युत आर्त होकर माँको पुकारता है, रोता है, तो फिर माँ यह विचार नहीं करती कि यह तो कुछ भी अच्छा काम नहीं करता, इसको गोदमें कैसे लूँ? वह उसके रोनको सह नहीं सकती और चट उठाकर गोदमें ले लेती है। ऐसे ही खराब-से-खराब आचरण करनेवाला, पापी-से-पापी व्यक्ति भी आर्त होकर भगवान्को पुकारता है, रोता है, तो भगवान् उसको अपनी गोदमें ले लेते हैं, उससे प्यार करते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वयंके भगवान्की ओर लगनेपर जब इस जन्मके पाप भी बाधा नहीं दे सकते, तो फिर पुराने पाप बाधा कैसे दे
सकते हैं ?
कारण कि पुराने पाप-कर्मोंका फल जन्म और भोगरूप प्रतिकूल परिस्थिति है; अतः वे भगवान्की ओर चलनेमें बाधा नहीं दे सकते।
यहाँ ‘स्त्रियः’ पद देनेका तात्पर्य है कि किसी भी वर्णकी, किसी भी आश्रमकी, किसी भी देशकी, किसी भी वेशकी कैसी ही स्त्रियाँ क्यों न हों, वे सभी मेरे शरण होकर परम पवित्र बन जाती हैं और परमगतिको प्राप्त होती हैं। जैसे, प्राचीन कालमें देवहूति, शबरी, कुन्ती, द्रौपदी, व्रजगोपियाँ आदि और अभीके जमानेमें मीरा, करमैती, करमाबाई, फूलीबाई आदि कई स्त्रियाँ भगवान्की भक्ता हो गयी हैं। ऐसे ही वैश्योंमें समाधि, तुलाधार आदि और शूद्रोंमें विदुर, संजय, निषादराज गुह आदि कई भगवान्के भक्त हुए हैं। तात्पर्य यह हुआ कि पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र—ये सभी भगवान्का आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त होते हैं।
विशेष बात
इस श्लोकमें ‘पापयोनयः’ पद स्वतन्त्ररूपसे आया है। इस पदको स्त्रियाँ, वैश्यों और शूद्रोंका विशेषण नहीं माना जा सकता; क्योंकि ऐसा माननेपर कई बाधाएँ आती हैं। स्त्रियाँ चारों वर्णोंकी होती हैं। उनमेंसे ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी स्त्रियोंको अपने-अपने पतियोंके साथ यज्ञ आदि वैदिक कर्मोंमें बैठनेका अधिकार है। अतः स्त्रियोंको पापयोनि कैसे कह सकते हैं? अर्थात् नहीं कह सकते। चारों वर्णोंमें आते हुए भी भगवान्ने स्त्रियोंका नाम अलगसे लिया है। इसका तात्पर्य है कि स्त्रियाँ पतिके साथ ही मेरा आश्रय ले सकती हैं, मेरी तरफ चल सकती हैं—ऐसा कोई नियम नहीं है। स्त्रियाँ स्वतन्त्रतापूर्वक मेरा आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो सकती हैं। इसलिये स्त्रियोंको किसी भी व्यक्तिका मनसे किंचिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल मेरा ही आश्रय लेना चाहिये।
अगर इस ‘पापयोनयः’ पदको वैश्योंका विशेषण माना जाय, तो यह भी युक्तिसंगत नहीं बैठता। कारण कि श्रुतिके अनुसार वैश्योंको पापयोनि नहीं माना जा सकता।
- ‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येन्न ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ च इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येश्चव्योनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।’ (छान्दोग्यो ५।१०।७)
‘अर्थात् जो अच्छे आचरणोंवाले हैं, उनका जन्म तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंमें होता है; परन्तु जो नीच आचरणोंवाले हैं, वे कुत्ते, सूकर तथा चाण्डालयोनियोंमें जन्म लेते हैं।’
६८२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
वैश्योंको तो वेदोंके पढ़नेका और यज्ञ आदि वैदिक कर्मों करनेका पूरा अधिकार दिया गया है।
अगर इस 'पापयोनयः' पदको शूद्रोंका विशेषण माना जाय, तो यह भी युक्तिसंगत नहीं बैठता; क्योंकि शूद्र तो चारों वर्णोंमें आ जाते हैं। अतः चारों वर्णोंके अतिरिक्त अर्थात् शूद्रोंकी अपेक्षा भी जो हीन जातिवाले यवन, हूण, खस आदि मनुष्य हैं, उन्हींको 'पापयोनयः' पदके अन्तर्गत लेना चाहिये।
जैसे माँकी गोदमें जानेके लिये किसी भी बच्चेके लिये मनाही नहीं है; क्योंकि वे बच्चे माँके ही हैं। ऐसे ही भगवान्का अंश होनेसे प्राणिमात्रके लिये भगवान्की तरफ चलनेमें (भगवान्की ओरसे) कोई मनाही नहीं है। पशु, पक्षी, वृक्ष, लता आदिमें भगवान्की तरफ चलनेकी समझ, योग्यता नहीं है, फिर भी पूर्वजन्मके संस्कारसे या अन्य किसी कारणसे वे भगवान्के सम्मुख हो सकते हैं। अतः यहाँ 'पापयोनयः' पदमें पशु, पक्षी आदिको भी अपवादरूपसे ले सकते हैं। पशु-पक्षियोंमें गजेन्द्र, जटायु आदि भगवद्भक्त हो चुके हैं।
मार्मिक बात
भगवान्की तरफ चलनेमें भावकी प्रधानता होती है, जन्मकी नहीं। जिसके अन्तःकरणमें जन्मकी प्रधानता होती है, उसमें भावकी प्रधानता नहीं होती और उसमें भगवान्की भक्ति भी पैदा नहीं होती। कारण कि जन्मकी प्रधानता माननेवालेके 'अहम्' में शरीरका सम्बन्ध मुख्य रहता है, जो भगवान्में नहीं लगने देता अर्थात् शरीर भगवान्का भक्त नहीं होता और भक्त शरीर नहीं होता, प्रत्युत स्वयं भक्त होता है। ऐसे ही जीव ब्रह्मको प्राप्त नहीं हो सकता; किन्तु ब्रह्म ही ब्रह्मको प्राप्त होता है अर्थात् ब्रह्ममें जीवभाव नहीं होता और जीवभावमें ब्रह्मभाव नहीं होता। जीव तो प्राणोंको लेकर ही है और ब्रह्ममें प्राण नहीं होते। इसलिये ब्रह्म ही ब्रह्मको प्राप्त होता है अर्थात् जीवभाव मिटकर
परिशिष्ट भाव —जिसमें दूसरेका आश्रय नहीं है, ऐसे अनन्य आश्रयको यहाँ 'व्यपाश्रय' अर्थात् विशेष आश्रय कहा गया है।
पूर्वजन्मके पापीकी अपेक्षा वर्तमानका पापी विशेष दोषी होता है, इसलिये पहले (तीसवें-इकतीसवें श्लोकोंमें) वर्तमान (इस जन्मके) पापीकी बात कहकर अब इस श्लोकमें पूर्वजन्मके पापीकी बात कहते हैं—'येऽपि स्युः पापयोनयः'।
ही ब्रह्मको प्राप्त होता है—'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' (बृहदारण्यक० ४।४।६)।
स्वयंमें शरीरका अभिमान नहीं होता। जहाँ स्वयंमें शरीरका अभिमान होता है, वहाँ 'मैं शरीरसे अलग हूँ' यह विवेक नहीं होता, प्रत्युत वह हाड़-मांसका, मल-मूत्र पैदा करनेवाली मशीनका ही दास (गुलाम) बना रहता है। यही अविवेक है, अज्ञान है। इस तरह अविवेककी प्रधानता होनेसे मनुष्य न तो भक्ति-मार्गमें चल सकता है और न ज्ञानमार्गमें ही चल सकता है। अतः शरीरको लेकर जो व्यवहार है, वह लौकिक मर्यादाके लिये बहुत आवश्यक है और उस मर्यादाके अनुसार चलना ही चाहिये। परन्तु भगवान्की तरफ चलनेमें स्वयंकी मुख्यता है, शरीरकी नहीं।
तात्पर्य यह हुआ कि जो भक्ति या मुक्ति चाहता है, वह स्वयं होता है, शरीर नहीं। यद्यपि तादात्म्यके कारण स्वयं शरीर धारण करता रहता है; परन्तु स्वयं कभी भी शरीर नहीं हो सकता और शरीर कभी भी स्वयं नहीं हो सकता। स्वयं स्वयं ही है और शरीर शरीर ही है। स्वयंकी परमात्माके साथ एकता है और शरीरकी संसारके साथ एकता है। जबतक शरीरके साथ तादात्म्य रहता है, तबतक वह न भक्तिका और न ज्ञानका ही अधिकारी होता है तथा न सम्पूर्ण शंकाओंका समाधान ही कर सकता है। वह शरीरका तादात्म्य मिटता है—भावसे। मनुष्यका जब भगवान्की तरफ भाव होता है, तब शरीर आदिकी तरफ उसकी वृत्ति ही नहीं जाती। वह तो केवल भगवान्में ही तल्लीन हो जाता है, जिससे शरीरका तादात्म्य मिट जाता है। इसलिये उसको विवेक-विचार नहीं करना पड़ता और उसमें वर्ण-आश्रम आदिकी किसी प्रकारकी शंका पैदा ही नहीं होती। ऐसे ही विवेकसे भी तादात्म्य मिटता है। तादात्म्य मिटनेपर उसमें किसी भी वर्ण या आश्रमका अभिमान नहीं होता। कारण कि स्वयंमें वर्ण-आश्रम नहीं है, वह वर्ण-आश्रमसे अतीत है।
सम्बन्ध—अब भक्तिके शेष दो अधिकारियोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
श्लोक ३३ ]
- साधक-संजीवनी *
६८३
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
पुण्याः | = (जो) पवित्र आचरण करने- वाले | भक्ताः | = भगवान्के भक्त हों, (वे परमगतिको प्राप्त हो जायें) | अनित्यम् | = अनित्य (और) ---|---|---|---|---|--- ब्राह्मणाः | = ब्राह्मण | किम्, पुनः | = इसमें तो कहना | असुखम् | = सुखरहित तथा | = और | ही क्या है ! | | लोकम् | = शरीरको राजर्षयः | = ऋषिस्वरूप क्षत्रिय | इमम् | = (इसलिये) इस | प्राप्य | = प्राप्त करके (तू) | | | | माम् | = मेरा | | | | भजस्व | = भजन कर।
व्याख्या —'किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता' राजर्षयस्तथा —जब वर्तमानमें पाप करनेवाला सांगोपांग दुराचारी और पूर्वजन्मके पापोंके कारण नीच योनियोंमें जन्म लेनेवाले प्राणी तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शुद्ध—ये सभी मेरे शरण होकर, मेरा आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं, परम पवित्र हो जाते हैं, तो फिर जिनके पूर्वजन्मके आचरण भी अच्छे हों और इस जन्ममें भी उत्तम कुलमें जन्म हुआ हो, ऐसे पवित्र ब्राह्मण और पवित्र क्षत्रिय अगर मेरे शरण हो जायें, मेरे भक्त बन जायें, तो वे परमगतिको प्राप्त हो जायेंगे, इसमें कहना ही क्या है ! अर्थात् वे निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जायेंगे।
पहले तीसवें श्लोकमें जिसको दुराचारी कहा है, उसके विपक्षमें यहाँ 'पुण्याः ' पद आया है और बत्तीसवें श्लोकमें जिनको 'पापयोनयः ' कहा है, उनके विपक्षमें यहाँ 'ब्राह्मणाः ' पद आया है। इसका आशय है कि ब्राह्मण सदाचारी भी हैं और पवित्र जन्मवाले भी हैं। ऐसे ही इस जन्ममें जो शुद्ध आचरणवाले क्षत्रिय हैं, उनकी वर्तमानकी पवित्रताको बतानेके लिये यहाँ 'ऋषि ' शब्द आया है, और जिनके जन्मराष्ट्रभक्त कर्म भी शुद्ध हैं, यह बतानेके लिये यहाँ 'राजन् ' शब्द आया है।
पवित्र ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय—इन दोनोंके बीचमें 'भक्ताः ' पद देनेका तात्पर्य है कि जिनके पूर्वजन्मके आचरण भी शुद्ध हैं और जो इस जन्ममें भी सर्वथा पवित्र हैं, वे (ब्राह्मण और क्षत्रिय) अगर भगवान्की भक्ति करने लग जायें तो उनके उद्धारमें सन्देह हो ही कैसे सकता है ?
'पुण्या ब्राह्मणाः ,' 'राजर्षयः ' और 'भक्ताः —'ये तीन बातें कहनेका तात्पर्य यह हुआ कि इस जन्मके आचरणसे पवित्र और पूर्वजन्मके शुद्ध आचरणोंके कारण इस जन्ममें ऊँचे कुलमें पैदा होनेसे पवित्र—ये दोनों तो बाह्य
चीजें हैं। कारण कि कर्ममात्र बाहरसे (मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और शरीरसे) बनते हैं तो उनसे जो पवित्रता होगी, वह भी बाह्य ही होगी। इस बाह्य शुद्धिके वाचक ही यहाँ 'पुण्या ब्राह्मणाः ,' और 'राजर्षयः —'ये दो पद आये हैं। परन्तु जो भीतरसे स्वयं भगवान्के शरण होते हैं, उनके लिये अर्थात् स्वयंके लिये यहाँ 'भक्ताः ,' पद आया है।
'अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् —' यह मनुष्यजन्म अनन्त जन्मोंका अन्त करनेवाला होनेसे अन्तिम जन्म है। इस जन्ममें मनुष्य भगवान्के शरण होकर भगवान्को भी सुख देनेवाला बन सकता है। अतः यह मनुष्यजन्म पवित्र तो है, पर अनित्य है—'अनित्यम् ' अर्थात् नित्य रहनेवाला नहीं है; किस समय छूट जाय, इसका कुछ पता नहीं है। इसलिये जल्दी-से-जल्दी अपने उद्धारमें लग जाना चाहिये।
इस मनुष्यशरीरमें सुख भी नहीं है—'असुखम् ।' आठवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने मनुष्यजन्मको दुःखालय बताया है। इसलिये मनुष्यशरीर मिलनेपर सुखभोगके लिये ललचना नहीं चाहिये। ललचानेमें और सुख भोगनेमें अपना भाव और समय खराब नहीं करना चाहिये।
यहाँ 'इमं लोकम् ,' पद मनुष्यशरीरका वाचक है, जो कि केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्यशरीर पानेके बाद किसी पूर्वकर्मके कारण भविष्यमें इस जीवका दूसरा जन्म होगा—ऐसा कोई विधान भगवान्ने नहीं बनाया है, प्रत्युत केवल अपनी प्राप्तिके लिये ही यह अन्तिम जन्म दिया है। अगर इस जन्ममें भगवत्प्राप्ति करना, अपना उद्धार करना भूल गये, तो अन्य शरीरोंमें ऐसा मौका मिलेगा नहीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि इस मनुष्यशरीरको प्राप्त करके केवल मेरा भजन कर। मनुष्यमें जो कुछ विलक्षणता आती
- यहाँ 'भक्ताः ,' पद देहली-दीपक-न्यायसे ब्राह्मण और राजर्षि (क्षत्रिय)—इन दोनोंके लिये आया है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
है, वह सब भजन करनेसे ही आती है।
'मां भजस्व' से भगवान्का यह तात्पर्य नहीं है कि मेरा भजन करनेसे मेरेको कुछ लाभ होगा, प्रत्युत तेरेको ही महान् लाभ होगा।* इसलिये तू तत्परतासे केवल मेरी तरफ ही लग जा, केवल मेरा ही उद्देश्य, लक्ष्य रख। सांसारिक पदार्थोंका आना-जाना तो मेरे विधानसे स्वतः होता रहेगा, पर तू अपनी तरफसे उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंका लक्ष्य, उद्देश्य मत रख, उनपर दृष्टि ही मत डाल; उनको महत्त्व ही मत दे। उनसे विमुख होकर तू केवल मेरे सम्मुख हो जा।
मार्मिक बात
जैसे माताकी दृष्टि बालकके शरीरपर रहती है, ऐसे ही भगवान् और उनके भक्तोंकी दृष्टि प्राणियोंके स्वरूपपर रहती है। वह स्वरूप भगवान्का अंश होनेसे शुद्ध है, चैतन है, अविनाशी है। परन्तु प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़कर वह तरह-तरहके आचरणोंवाला बन जाता है। उन्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हूँ। किसी भी प्राणीके प्रति मेरा राग और द्वेष नहीं है। मेरे सिद्धान्तसे, मेरी मान्यतासे और मेरे नियमोंसे सर्वथा विरुद्ध चलनेवाले जो दुराचारी-से-दुराचारी हैं, वे भी जब मेरेमें अपनापन करके मेरा भजन करते हैं तो उनके वास्तविक स्वरूपकी तरफ दृष्टि रखनेवाला मैं उनको पापी कैसे मान सकता हूँ? नहीं मान सकता। और उनके पवित्र होनेमें देरी कैसे लग सकती है? नहीं लग सकती। कारण कि मेरा अंश होनेसे वे सर्वथा पवित्र हैं ही। केवल उत्पन्न और नष्ट होनेवाले आगन्तुक दोषोंको लेकर वे स्वयंसे दोषी कैसे हो सकते हैं? और मैं उनको दोषी कैसे मान सकता हूँ? वे तो केवल उत्पत्ति-विनाशशील शरीरोंके साथ 'मैं' और 'मेरा'-पन करनेके कारण मायाके परवश होकर दुराचारमें, पापाचारमें लग गये थे, पर वास्तवमें वे हैं तो मेरे ही अंश! ऐसे ही जो पापयोनियाले हैं अर्थात् पूर्वके पापोंके कारण जिनका चाण्डाल आदि नीच योनियोंमें और पशु, पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंमें जन्म हुआ है, वे तो अपने पूर्वके पापोंसे मुक्त हो रहे हैं। अतः ऐसे पापयोनियाले प्राणी भी मेरे शरण होकर मेरेको पुकारें तो उनका भी उद्धार हो जाता है। इस प्रकार भगवान्ने वर्तमानके पापी और पूर्वजन्मके पापी—इन दो नीचे दर्जके मनुष्योंका वर्णन किया।
अब आगे भगवान्ने मध्यम दर्जके मनुष्योंका वर्णन किया। पहले 'स्त्रियः' पदसे स्त्री जातिमात्रको लिया। इसमें ब्राह्मणों और क्षत्रियोंकी स्त्रियाँ भी आ गयी हैं, जो वैश्योंके लिये भी वन्दनीया हैं। अतः इनको पहले रखा है। जो ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके समान पुण्यात्मा नहीं हैं, पर द्विजाति हैं, वे वैश्य हैं। जो द्विजाति नहीं हैं अर्थात् जो वैश्योंके समान पवित्र नहीं हैं, वे शुद्र हैं। वे स्त्रियाँ, वैश्य और शुद्र भी मेरा आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। जो उत्तम दर्जके मनुष्य हैं अर्थात् जो पूर्वजन्ममें अच्छे आचरण होनेसे और इस जन्ममें ऊँचे कुलमें पैदा होनेसे पवित्र हैं, ऐसे ब्राह्मण और क्षत्रिय भी मेरा आश्रय लेकर परमगतिको प्राप्त हो जायें, इसमें सन्देह ही क्या है!
भगवान्ने यहाँ (तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक) भक्तिके सात अधिकारियोंके नाम लिये हैं—दुराचारी, पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य, शुद्र, ब्राह्मण और क्षत्रिय। इन सातोंमें सबसे पहले भगवान्को श्रेष्ठ अधिकारीका अर्थात् पवित्र भक्त ब्राह्मण या क्षत्रियका नाम लेना चाहिये था। परन्तु भगवान्ने सबसे पहले दुराचारीका नाम लिया है। इसका कारण यह है कि भक्तिमें जो जितना छोटा और अभिमानरहित होता है, वह भगवान्को उतना ही अधिक प्यारा लगता है। दुराचारीमें अच्छाईका, सदगुण-सदाचारोंका अभिमान नहीं होता, इसलिये उसमें स्वाभाविक ही छोटापन और दीनता रहती है। अतः भगवान् सबसे पहले दुराचारीका नाम लेते हैं। इसी कारणसे बारहवें अध्यायमें भगवान्ने सिद्ध भक्तोंको प्यारा और साधक भक्तोंको अत्यन्त प्यारा बताया है (बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे बीसवें श्लोकतक)।
अब इस विषयमें एक ध्यान देनेकी बात है कि भगवान्ने यहाँ भक्तिके जो सात अधिकारी बताये हैं, उनका विभाग वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र), आचरण (दुराचारी और पापयोनि) और व्यक्तित्व (स्त्रियाँ)—को लेकर किया गया है। इससे सिद्ध होता है कि वर्ण (जन्म), आचरण और व्यक्तित्वसे भगवान्को भक्तिमें कोई फरक नहीं पड़ता; क्योंकि इन तीनोंका सम्बन्ध शरीरके साथ है। परन्तु भगवान्का सम्बन्ध स्वरूपके साथ है, शरीरके साथ नहीं। स्वरूपसे तो सभी भगवान्के ही अंश हैं। जब वे भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़कर, उनके सम्मुख होकर भगवान्का भजन करते हैं, तब उनके उद्धारमें कहीं
- इसी भावको लेकर भगवान्ने यहाँ आत्मनेपदी 'भजस्व' किया दी है।
श्लोक ३३ ]
- साधक-संजीवनी *
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किंचिन्मात्र भी फरक नहीं होता; क्योंकि भगवान्के अंश होनेसे वे पवित्र और उद्धारस्वरूप ही हैं। तात्पर्य यह हुआ कि भक्तिके सात अधिकारियोंमें जो कुछ विलक्षणता, विशेषता आयी है, वह किसी वर्ण, आश्रम, भाव, आचरण आदिको लेकर नहीं आयी है, प्रत्युत भगवान्के सम्बन्धसे, भगवद्भक्तिके आयी है।
सातवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें तो भगवान्ने भावोंके अनुसार भक्तोंके चार भेद बताये, और यहाँ वर्ण, आचरण एवं व्यक्तित्वके अनुसार भक्तिके अधिकारियोंके सात भेद बताये। इसका तात्पर्य है कि भावोंको लेकर तो भक्तोंमें भिन्नता है, पर वर्ण, आचरण आदिको लेकर कोई भिन्नता नहीं है
परिशिष्ट भाव —तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक भगवान्ने भक्तिके तथा भगवत्प्राप्तिके सात अधिकारियोंके नाम लिये हैं—दुराचारी, पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण और क्षत्रिय। इन सातोंसे बाहर कोई भी प्राणी नहीं है। कैसा ही जन्म हो, कैसी ही जाति हो और पूर्वजन्मके कितने ही पाप हों, पर भगवान् और उनकी भक्तिके मनुष्यमात्र अधिकारी हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंका नाम इन श्लोकोंमें आ गया। कोई चारों वर्णोंमें केवल पुरुष-ही-पुरुष न समझ ले, इसलिये स्त्रियोंका नाम अलगसे आया है। जो चारों वर्णोंसे नीचे हैं, वे यवन, हूण, खस आदि सब पापयोनिमें आ गये। मनुष्योंके सिवाय दूसरे जीव (पशु, पक्षी आदि) भी पापयोनिमें लिये जा सकते हैं; क्योंकि जीवमात्र भगवान्का ही अंश होनेसे भगवान्की तरफ चलनेमें (भगवान्की ओरसे) किसीके लिये भी मनाही नहीं है।
जो वर्तमानमें पाप कर रहा है, वह 'दुराचारी' है और पूर्वजन्मके पापोंके कारण जिसका नीच योनिमें जन्म हुआ है, वह 'पापयोनि' है। तात्पर्य है कि दुराचारी-से-दुराचारी और नीच-से-नीच योनिवाला भी भगवत्प्राप्तिका अधिकारी है। अतः जाति और आचरणको लेकर मनुष्यको भगवत्प्राप्तिसे निराश नहीं होना चाहिये। जाति और आचरण अनित्य तथा बनावटी हैं, पर भगवान्के साथ मनुष्यका सम्बन्ध नित्य तथा वास्तविक है। इसलिये भगवान् केवल भक्तिका नाता (सम्बन्ध) ही मानते हैं, जाति-आचरणका नहीं—
कह रघुपति सुनु भाभिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥ जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहड़ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥
(मानस, अरण्य० ३५। २-३)
संसारमें लोग बाहरके जाति-आचरणको देखते हैं, भीतरके तत्त्व-(वास्तविकता-) को नहीं देखते; परन्तु भगवान् तत्त्वको देखते हैं कि यह सदासे ही मेरा अंश है!
सातवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने भीतरके भावोंको लेकर भक्तोंके अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चार भेद बताये हैं और यहाँ बाहरकी मान्यता-(जाति तथा आचरण-) को लेकर लौकिक दृष्टिसे भक्तोंके सात भेद बताये हैं। सातवें अध्यायमें तो उन भक्तोंकी बात है, जो भगवान्में लगे हुए हैं और यहाँ उन मनुष्योंकी बात है, जो भगवान्में लग सकते हैं। तात्पर्य है कि वर्ण, आश्रम, वेश-भूषा, जाति, सम्प्रदाय आदि अलग-अलग होते हुए भी सभी मनुष्य अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी—ये चार प्रकारके भक्त बन सकते हैं और भगवान्को प्राप्त कर सकते हैं। भगवत्प्राप्तिके विषयमें सब एक है, कोई छोटो-बड़ा नहीं है। भगवत्प्राप्तिका अनधिकारी किसी भी योनिमें कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं।
'कि पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा' —इस श्लोकार्थके बीचमें 'भक्ताः' पद देनेका तात्पर्य है कि पवित्र आचरणवाले ब्राह्मणोंकी और ऋषिस्वरूप क्षत्रियोंकी महिमा नहीं है, प्रत्युत उनमें जो भक्ति है, उस भक्तिकी महिमा है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का न तो दुराचारी तथा पापयोनिके साथ द्वेष है और न पुण्यात्मा ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंके साथ पक्षपात
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
है। वे तो सब प्राणियोंमें समान हैं (गीता—इसी अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो प्रेमपूर्वक भगवान्का भजन करता है, वह किसी भी देश, वेश, वर्ण, आश्रम, जाति, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, उसका भगवान्से घनिष्ठ सम्बन्ध है—‘मयि ते तेषु चाप्यहम्’ (गीता ९। २९)। अतः दुराचारी, पापयोनि, स्त्रियाँ, वैश्य, शूद्र, ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये सातों भक्तोंमें एक हो जाते हैं, इनमें कोई भेद नहीं रहता। इसलिये भगवान् भजन करनेकी आज्ञा देते हैं—‘भजस्व माम्’। भजन करनेका अर्थ है—भगवान्के सम्मुख होना, भगवान्में प्रियता (अपनापन) होना, भगवान्की प्राप्तिका उद्देश्य होना। भगवद्वुद्धिसे दूसरोंकी सेवा करना, दूसरोंको देनेका भाव रखना, अभावग्रस्तोंकी सहायता करना—यह भी भजन है।
‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्’—अनित्य और सुखरहित इस शरीरको पाकर अर्थात् हम जीते रहें और सुख भोगते रहें—ऐसी कामनाको छोड़कर भगवान्का भजन करना चाहिये। कारण कि संसारमें सुख है ही नहीं, केवल सुखका भ्रम है। ऐसे ही जीनेका भी भ्रम है। हम जी नहीं रहे हैं, प्रत्युत प्रतिक्षण मर रहे हैं!
पहले उन्तीसवाँ श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि जो प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ। इसलिये यहाँ भगवान् भजन करनेकी आज्ञा देते हैं—‘भजस्व माम्’।
सम्बन्ध—उन्तीसवाँ श्लोकसे लेकर तैंतीसवाँ श्लोकतक भगवान्के भजनकी ही बात मुख्य आयी है। अब आगेके श्लोकमें उस भजनका स्वरूप बताते हैं।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्तवैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥
| मद्भक्तः | = (तू) मेरा भक्त | माम् | = (और) मुझे | मत्परायणः | = मेरे परायण हुआ |
|---|---|---|---|---|---|
| भव | = हो जा, | नमस्कुरु | = नमस्कार कर। | (तू) | |
| मन्मनाः | = मुझमें मनवाला हो जा, | एवम् | = इस प्रकार | माम् | = मुझे |
| मद्याजी | = मेरा पूजन करनेवाला हो जा | आत्मानम् | = अपने-आपको | एव | = ही |
| युक्त्वा | = (मेरे साथ) | एष्यसि | = प्राप्त होगा। | ||
| लगाकर |
व्याख्या—[अपने हृदयकी बात वहीं कही जाती है, जहाँ सुननेवालेमें कहनेवालेके प्रति दोषदृष्टि न हो, प्रत्युत आदरभाव हो। अर्जुन दोषदृष्टिसे रहित हैं, इसलिये भगवान्ने उनको ‘अनसूयवे’ (९। १) कहा है। इसी कारण भगवान् यहाँ अर्जुनके सामने अपने हृदयकी गोपनीय बात कह रहे हैं।]
‘मद्भक्तः’—‘मेरा भक्त हो जा’ कहनेका तात्पर्य है कि तू केवल मेरे साथ ही अपनापन कर; केवल मेरे साथ ही सम्बन्ध जोड़, जो कि अनादिकालसे स्वतःसिद्ध है। केवल भूलसे ही शरीर और संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान रखा है अर्थात् ‘मैं अमुक वर्णका हूँ, अमुक आश्रमका हूँ, अमुक सम्प्रदायका हूँ, अमुक नामवाला हूँ’—इस प्रकार वर्ण, आश्रम आदिको अपनी अहंतामें मान रखा है। इसलिये अब असत्-रूपसे बनी हुई अवास्तविक अहंताको वास्तविक सत्-रूपमें बदल दे कि ‘मैं तुम्हारा हूँ और तुम
मेरे हो’। फिर तेरा मेरे साथ स्वाभाविक ही अपनापन हो जायगा, जो कि वास्तवमें है।
‘मन्मना भव’—मन वहीं लगता है, जहाँ अपनापन होता है, प्रियता होती है। तेरा मेरे साथ जो अखण्ड सम्बन्ध है, उसको मैं तो नहीं भूल सकता, पर तू भूल सकता है; इसलिये तेरेको ‘मेरेमें मनवाला हो जा’—ऐसा कहना पड़ता है।
‘मद्याजी’—‘मेरा पूजन करनेवाला हो’ अर्थात् तू खाना-पीना, सोना-जगना, आना-जाना, काम-धन्या करना आदि जो कुछ क्रिया करता है, वह सब-की-सब मेरी पूजाके रूपमें ही कर; उन सबको मेरी पूजा ही समझ।
‘मां नमस्कुरु’—‘मेरेको नमस्कार कर’ कहनेका तात्पर्य है कि मेरा जो कुछ अनुकूल, प्रतिकूल या सामान्य विधान हो, उसमें तू परम प्रसन्न रह। मैं चाहे तेरे मन और मान्यतासे सर्वथा विरुद्ध फैसला दे दूँ, तो भी उसमें तू प्रसन्न