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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ३४ ]

  • साधक-संजीवनी *

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रह। जो मनुष्य हानि और परलोकके भयसे मेरे चरणोंमें पड़ते हैं, मेरे शरण होते हैं, वे वास्तवमें अपने सुख और सुविधाके ही शरण होते हैं, मेरे शरण नहीं। मेरे शरण होनेपर किसीसे कुछ भी सुख-सुविधा पानेकी इच्छा होती है तो वह सर्वथा मेरे शरणागत कहाँ हुआ? कारण कि वह जबतक कुछ-न-कुछ सुख-सुविधा चाहता है, तबतक वह अपना कुछ स्वतन्त्र अस्तित्व मानता है।

वास्तवमें मेरे चरणोंमें पड़ा हुआ वही माना जाता है, जो अपनी कुछ भी मान्यता न रखकर मेरी मरजीमें अपने मनको मिला देता है। उसमें मेरसे ही नहीं प्रत्युत संसारमात्रसे भी अपनी सुख-सुविधा, सम्मानकी किंचित् गन्धमात्र भी नहीं रहती। अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान होनेपर भी उसपर उसका कुछ भी असर नहीं होता अर्थात् मेरे द्वारा कोई अनुकूल-प्रतिकूल घटना घटती है, तो मेरे परायण रहनेवाले भक्तकी उस घटनामें विषमता नहीं होती। अनुकूल-प्रतिकूलका ज्ञान होनेपर भी वह घटना उसको दो रूपसे नहीं दीखती, प्रत्युत केवल मेरी कृपारूपसे दीखती है।

मेरा किया हुआ विधान चाहे शरीरके अनुकूल हो, चाहे प्रतिकूल हो, मेरे विधानसे कैसी भी घटना घटे, उसको मेरा दिया हुआ प्रसाद मानकर परम प्रसन्न रहना चाहिये। अगर मनके प्रतिकूल-से-प्रतिकूल घटना घटती है, तो उसमें मेरी विशेष कृपा माननी चाहिये; क्योंकि उस घटनामें उसकी सम्मति नहीं है। अनुकूल घटनामें उसकी जितने अंशमें सम्मति हो जाती है, उतने अंशमें वह घटना उसके लिये अपवित्र हो जाती है। परन्तु प्रतिकूल घटनामें केवल मेरा ही किया हुआ शुद्ध विधान होता है—इस बातको लेकर उसको परम प्रसन्न होना चाहिये।

मनुष्य प्रतिकूल घटनाको चाहता नहीं, करता नहीं और उसमें उसका अनुमोदन भी नहीं रहता, फिर भी ऐसी घटना घटती है, तो उस घटनाको उपस्थित करनेमें कोई भी निमित्त क्यों न बने और वह भी भले ही किसीको निमित्त मान ले, पर वास्तवमें उस घटनाको घटानेमें मेरा ही हाथ है, मेरी ही मरजी है*। इसलिये मनुष्यको उस घटनामें दुःखी होना और चिन्ता करना तो दूर रहा, प्रत्युत उसमें अधिक-से-अधिक प्रसन्न होना चाहिये। उसकी यह प्रसन्नता मेरे विधानको लेकर नहीं होनी चाहिये; किन्तु मेरेको (विधान करनेवालेको) लेकर होनी चाहिये। कारण कि अगर उसमें उस मनुष्यका मंगल न होता, तो

प्राणिमात्रका परमसुहृद् में उसके लिये ऐसी घटना क्यों घटता? इसी प्रकार हे अर्जुन! तू भी सर्वथा मेरे चरणोंमें पड़ जा अर्थात् मेरे प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्न रह।

जैसे, कोई किसीका अपराध करता है, तो वह उसके सामने जाकर लम्बा पड़ जाता है और उससे कहता है कि आप चाहे दण्ड दें, चाहे पुरस्कार दें, चाहे दुष्कार दें, चाहे जो करें, उसीमें मेरी परम प्रसन्नता है। उसके मनमें यह नहीं रहता कि सामनेवाला मेरे अनुकूल ही फैसला दे। ऐसे ही भक्त भगवान्के सर्वथा शरण हो जाता है, तो भगवान्से कह देता है कि 'हे प्रभो! मैंने न जाने किन-किन जन्मोंमें आपके प्रतिकूल क्या-क्या आचरण किये हैं, इसका मेरेको पता नहीं है। परन्तु उन कर्मोंके अनुरूप आप जो परिस्थिति भेजेंगे, वह मेरे लिये सर्वथा कल्याणकारक ही होगी। इसलिये मेरेको किसी भी परिस्थितिमें किंचिन्मात्र भी असन्तोष न होकर प्रसन्नता-ही-प्रसन्नता होगी।'

'हे नाथ! मेरे कर्मोंका आप कितना खयाल रखते हैं कि मैंने न जाने किस-किस जन्ममें, किस-किस परिस्थितिमें परवश होकर क्या-क्या कर्म किये हैं, उन सम्पूर्ण कर्मोंसे सर्वथा रहित करनेके लिये आप कितना विचित्र विधान करते हैं! मैं तो आपके विधानको किंचिन्मात्र भी समझ नहीं सकता और मेरेमें आपके विधानको समझनेकी शक्ति भी नहीं है। इसलिये हे नाथ! मैं उसमें अपनी बुद्धि क्यों लगाऊँ? मेरेको तो केवल आपकी तरफ ही देखना है। कारण कि आप जो कुछ विधान करते हैं, उसमें आपका ही हाथ रहता है अर्थात् वह आपका ही किया हुआ होता है, जो कि मेरे लिये परम मंगलमय है। यही 'मां नमस्कुरु' का तात्पर्य है।

'मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः :'—यहाँ 'एवम्' का तात्पर्य है कि 'मद्भक्तः' से तू स्वयं मेरे अर्पित हो गया, 'मन्मनाः ' से तेरा अन्तःकरण मेरे परायण हो गया, 'मद्याजी ' से तेरी मात्र क्रियाएँ और पदार्थ मेरी पूजा-सामग्री बन गये और 'मां नमस्कुरु ' से तेरा शरीर मेरे चरणोंके अर्पित हो गया। इस प्रकार मेरे परायण हुआ तू मेरेको ही प्राप्त होगा।

'युक्त्वैवमात्मानम् ' (अपने-आपको मेरेमें लगाकर) कहनेका तात्पर्य यह हुआ कि 'मैं भगवान्का ही हूँ' ऐसे अपनी अहंताका परिवर्तन होनेपर शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, क्रिया—ये सब-के-सब मेरेमें ही लग

  • राम कीह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥ (मानस १।१२८।१)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

जार्थेंगे। इसीका नाम शरणागति है। ऐसी शरणागति होनेपर मेरी ही प्राप्ति होगी, इसमें सन्देह नहीं है। मेरी प्राप्तिमें सन्देह वहीं होता है, जहाँ मेरे सिवाय दूसरेकी कामना है, आदर है, महत्त्वबुद्धि है। कारण कि कामना, महत्त्वबुद्धि, आसक्ति आदि होनेपर सब जगह परिपूर्ण रहते हुए भी मेरी प्राप्ति नहीं होती।

‘मत्परायणः’ का तात्पर्य है कि मेरी मरजीके बिना कुछ भी करने-करानेकी किंचिन्मात्र भी स्फुरणा नहीं रहे। मेरे साथ सर्वथा अभिन्न होकर मेरे हाथका खिलौना बन जाय।

विशेष बात

(१)

भगवान्का भक्त बननेसे, भगवान्के साथ अपनापन करनेसे, ‘मैं भगवान्का हूँ’ इस प्रकार अहंताको बदल देनेसे मनुष्यमें बहुत जल्दी परिवर्तन हो जाता है। वह परिवर्तन यह होगा कि वह भगवान्में मनवाला हो जायगा, भगवान्का पूजन करनेवाला बन जायगा और भगवान्के मात्र विधानमें प्रसन्न रहेगा। इस प्रकार इन चारों बातोंसे शरणागति पूर्ण हो जाती है। परन्तु इन चारोंमें मुख्यता भगवान्का भक्त बननेकी ही है। कारण कि जो स्वयं भगवान्का हो जाता है, उसके न मन-बुद्धि अपने रहते हैं, न पदार्थ और क्रिया अपने रहते हैं और न शरीर अपना रहता है। तात्पर्य है कि लौकिक दृष्टिमें जो अपनी कहलानेवाली चीजें हैं, जो कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली हैं, उनमेंसे कोई भी चीज अपनी नहीं रहती। स्वयंके अर्पित हो जानेसे मात्र प्राकृत चीजें भगवान्की ही हो जाती हैं। उनमेंसे अपनी ममता उठ जाती है। उनमें ममता करना ही गलती थी, वह गलती सर्वथा मिट जाती है।

(२)

मनुष्य संसारके साथ कितनी ही एकता मान लें, तो भी वे संसारको नहीं जान सकते। ऐसे ही शरीरके साथ कितनी ही अभिन्नता मान लें, तो भी वे शरीरके साथ एक नहीं हो सकते और उसको जान भी नहीं सकते। वास्तवमें संसार-शरीरसे अलग होकर ही उनको जान सकते हैं। इस रीतिसे परमात्मासे अलग रहते हुए परमात्माको यथार्थरूपसे नहीं जान सकते। परमात्माको तो वे ही जान सकते हैं, जो परमात्मासे एक हो गये हैं अर्थात् जिन्होंने ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन सर्वथा भगवान्के

समर्पित कर दिया है। ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन तो दूर रहा, ‘मैं’ और ‘मेरे’-पनकी गन्ध भी अपनेमें न रहे कि मैं भी कुछ हूँ, मेरा भी कोई सिद्धान्त है, मेरी भी कुछ मान्यता है आदि।

जैसे, प्राणी शरीरके साथ अपनी एकता मान लेता है, तो स्वाभाविक ही शरीरका सुख-दुःख अपना सुख-दुःख दीखता है। फिर उसको शरीरसे अलग अपने अस्तित्वका भान नहीं होता। ऐसे ही भगवान्के साथ अपनी स्वतःसिद्ध एकताका अनुभव होनेपर भक्तका अपना किंचिन्मात्र भी अलग अस्तित्व नहीं रहता। जैसे संसारमें भगवान्की मरजीसे जो कुछ परिवर्तन होता है, उसका भक्तपर असर नहीं पड़ता, ऐसे ही उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरमें जो कुछ परिवर्तन होता है, उसका उसपर कुछ भी असर नहीं पड़ता। उसके शरीरद्वारा भगवान्की मरजीसे स्वतः-स्वाभाविक क्रिया होती रहती है। यही वास्तवमें भगवान्की परायणता है।

भगवान्को प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि भगवान्के साथ अभिन्नता हो जाती है, जो कि वास्तविकता है। यह अभिन्नता भेदभावसे भी होती है और अभेदभावसे भी होती है। जैसे, श्रीजीकी भगवान् श्रीकृष्णके साथ अभिन्नता है। मूलमें भगवान् श्रीकृष्ण ही श्रीजी और श्रीकृष्ण—इन दो रूपोंमें प्रकट हुए हैं। दो रूप होते हुए भी श्रीजी भगवान्से भिन्न नहीं हैं और भगवान् श्रीजीसे भिन्न नहीं हैं। परन्तु परस्पर रस-(प्रेम-) का आदान-प्रदान करनेके लिये उनमें योग और वियोगकी लीला होती रहती है। वास्तवमें उनके योगमें भी वियोग है और वियोगमें भी योग है अर्थात् योगसे वियोग और वियोगसे योग पुष्ट होता रहता है, जिसमें अनिर्वचनीय प्रेमकी वृद्धि होती रहती है। इस अनिर्वचनीय और प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमको प्राप्त हो जाना ही भगवान्को प्राप्त होना है।

सातवें और नवें अध्यायके विषयकी एकता

सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने विज्ञानसहित ज्ञान अर्थात् राजविद्याको पूर्णतया कहनेकी प्रतिज्ञा की थी— ‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः’ (७।२)। सातवें अध्यायमें भगवान्के कहनेका जो प्रवाह चल रहा था, आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनके प्रश्न करनेसे उसमें कुछ परिवर्तन आ गया। अतः आठवें अध्यायका विषय समाप्त होते ही भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही ‘इदं तु ते गृह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं………’ (९।१)

श्लोक ३४ ]

  • साधक-संजीवनी *

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कहकर अपनी तरफसे पुनः विज्ञानसहित ज्ञान कहना शुरू कर देते हैं। सातवें अध्यायमें भगवान्ने जो विषय तीस श्लोकोंमें कहा था, उसी विषयको नवें अध्यायके आरम्भसे लेकर दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकतक लगातार कहते ही चले जाते हैं। इन श्लोकोंमें कही हुई बातोंका अर्जुनपर बड़ा प्रभाव पड़ता है, जिससे वे दसवें अध्यायके बारहवें श्लोकसे अठारहवें श्लोकतक भगवान्की स्तुति और प्रार्थना करते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि सातवें अध्यायमें कही गयी बातको भगवान्ने नवें अध्यायमें संक्षेपसे, विस्तारसे अथवा प्रकारान्तरसे कहा है।

सातवें अध्यायके पहले श्लोकमें 'मव्यासक्तमनाः' आदि पदोंसे जो विषय संक्षेपसे कहा था, उसीको नवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें 'मन्मनाः' आदि पदोंसे थोड़ा विस्तारसे कहा है।

सातवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा; जिसको जाननेसे फिर जानना बाकी नहीं रहेगा। यही बात भगवान्ने नवें अध्यायके पहले श्लोकमें कही कि मैं विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा जिसको जानकर तू अशुभ-(संसार-)से मुक्त हो जायगा। मुक्ति होनेसे फिर जानना बाकी नहीं रहता। इस प्रकार भगवान्ने सातवें और नवें—दोनों ही अध्यायोंके आरम्भमें विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा की और दोनोंका एक फल बताया।

सातवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा कि हजारोंमेंसे कोई एक मनुष्य वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और यत्न करनेवालोंमें कोई एक मेरेको तत्त्वसे जानता है। इसका कारण नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें बताते हैं कि इस विज्ञानसहित ज्ञानपर श्रद्धा न रखनेसे मनुष्य मेरेको प्राप्त न हो करके मौतके रास्तेमें चले जाते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

सातवें अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय बताया। यही बात नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें 'प्रभवः प्रलयः' पदोंसे बतायी।

सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भगवान्ने अपनेको सनातन बीज बताया और नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें अपनेको अव्यय बीज बताया।

सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें 'न त्वहं तेषु ते मयि' कहकर जिस राजविद्याका संक्षेपसे वर्णन किया था,

उसीका नवें अध्यायके चौथे और पाँचवें श्लोकमें विस्तारसे वर्णन किया है।

सातवें अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण प्राणियोंको तीनों गुणोंसे मोहित बताया और नवें अध्यायके आठवें श्लोकमें सम्पूर्ण प्राणियोंको प्रकृतिके परवश हुआ बताया।

सातवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो मनुष्य मेरे ही शरण हो जाते हैं, वे मायाको तर जाते हैं और नवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा कि जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।

सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने 'न मां दुष्कृतिनो मूढाः' कहा था, उसीको नवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें 'अवजानन्ति मां मूढाः' कहा है।

सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने 'आसुरं भावमाश्रिताः' पदोंसे जो बात कही थी, वही बात नवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें 'राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः' पदोंसे कही है।

सातवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें जिनको 'सुकृतिनः' कहा था, उनको ही नवें अध्यायके तेरहवें श्लोकमें 'महात्मानः' कहा है।

सातवें अध्यायके सोलहवेंसे अठारहवें श्लोकतक सकाम और निष्कामभावको लेकर भक्तोंके चार प्रकार बताये; और नवें अध्यायके तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक वर्ण, आचरण और व्यक्तिको लेकर भक्तोंके सात भेद बताये।

सातवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने महात्माकी दृष्टिसे 'वासुदेवः सर्वम्' कहा और नवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने अपनी दृष्टिसे 'सदसच्छाहम्' कहा।

भगवान्ने विमुख होकर अन्य देवताओंमें लगनेमें खास दो ही कारण हैं—पहला कामना और दूसरा भगवान्को न पहचानना। सातवें अध्यायके बीसवें श्लोकमें कामनाके कारण देवताओंके शरण होनेकी बात कही गयी और नवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भगवान्को न पहचाननेके कारण देवताओंका पूजन करनेकी बात कही गयी।

सातवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें सकाम पुरुषोंको अन्तवाला (नाशवान्) फल मिलनेकी बात कही और नवें

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें सकाम पुरुषोंके आवागमनको प्राप्त होनेकी बात कही।

सातवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि देवताओंके भक्त देवताओंको और मेरे भक्त मेरेको प्राप्त होते हैं। यही बात भगवान्ने नवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी कही।

सातवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने जो ‘अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः’ कहा था, उसीको नवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकके पूर्वार्धमें ‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्’ कहा है। ऐसे

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें अहंता-परिवर्तनकी अहंताको बदलता है और खुदका सम्बन्ध भगवान्से जोड़ता है। वह साधननिष्ठ न होकर भगवनिष्ठ होता है। इसलिये उसको संसारके सम्बन्धका त्याग करना नहीं पड़ता, प्रत्युत वह स्वतः छूट जाता है। कारण कि वर्ण, आश्रम, जाति, योग्यता, अधिकार, कर्म, गुण आदिका भेद होनेपर भी ये सब आगन्तुक हैं, पर स्वयंके साथ भगवान्का सम्बन्ध आगन्तुक नहीं है, प्रत्युत अनादि, नित्य और स्वतःसिद्ध है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगृह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादेमें ‘राजविद्याराजगृह्ययोग’ नामक नवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥

इस अध्यायमें भगवान्ने जो ‘मया तत्तमिदं सर्वम्’ आदि उपदेश दिया है, वह सब विद्याओंका राजा है और जो भगवान्ने अपने-आपको प्रकट करके अर्जुनको अपने शरण होने और अपनेमें मन लगानेके लिये कहा है, वह सम्पूर्ण गोपनीय भावोंका राजा है। इन दोनों—(राजविद्या और राजगृह्य-) को तत्त्वसे समझ लेनेपर ‘योग’—(नित्य-योग-)का अनुभव हो जाता है। अतः इस अध्यायका नाम ‘राजविद्याराजगृह्ययोग’ रखा गया है।

नवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें ‘अथ नवमोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके चार सौ छियालीस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग चार सौ चौसठ है।

(२) ‘अथ नवमोऽध्यायः’ के सात, ‘श्रीभगवानुवाच’ के सात, श्लोकोंके एक हजार एक सौ बारह और पुष्पिकाके इक्यावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका

ही सातवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें जो ‘परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनृतम्’ कहा था, उसीको नवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकके उत्तरार्धमें ‘परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्’ कहा है।

सातवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें भगवान्ने ‘सर्गं यान्ति’ कहा था, उसीको नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘मृत्युसंसारवर्त्तनि’ कहा है।

सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें भगवान्ने अपनेको जाननेकी बात मुख्य बतायी है और नवें अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अपर्ण करनेकी बात मुख्य बतायी है।

बात मुख्य है। भक्त ‘मैं भगवान्का हूँ’—इस प्रकार अपनी अहंताको बदलता है और खुदका सम्बन्ध भगवान्से जोड़ता है। वह साधननिष्ठ न होकर भगवनिष्ठ होता है। इसलिये उसको संसारके सम्बन्धका त्याग करना नहीं पड़ता, प्रत्युत वह स्वतः छूट जाता है। कारण कि वर्ण, आश्रम, जाति, योग्यता, अधिकार, कर्म, गुण आदिका भेद होनेपर भी ये सब आगन्तुक हैं, पर स्वयंके साथ भगवान्का सम्बन्ध आगन्तुक नहीं है, प्रत्युत अनादि, नित्य और स्वतःसिद्ध है।

योग एक हजार एक सौ सतहत्तर है। इस अध्यायके चौतीस श्लोकोंमेंसे बीसवाँ और इक्कीसवाँ—ये दो श्लोक चौवालीस अक्षरोंके हैं और शेष बत्तीस श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच’।

नवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके चौतीस श्लोकोंमेंसे बीसवाँ और इक्कीसवाँ—ये दो श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं। बचे हुए बत्तीस श्लोकोंमेंसे—पहले श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ और तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘संकीर्ण-विपुला’; दूसरे श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; तीसरे और दसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; सत्रहवें श्लोकके प्रथम चरणमें और तेरहवें तथा छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष पचीस श्लोक ठीक ‘पथ्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

नवें अध्यायका सार

भगवान्ने सातवें अध्यायसे 'ज्ञान' और 'विज्ञान' का विषय कहना आरम्भ किया है। 'ज्ञान' से संसारसे मुक्ति होती है और 'विज्ञान' से भगवान्में प्रेम होता है। बीचमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर आठवें अध्यायमें दूसरा विषय चला। परन्तु नवें अध्यायसे भगवान् पुनः वही विषय कहना आरम्भ करते हैं।

सातवें अध्यायमें भगवान्ने संसारकी उत्पत्तिका कारण बताया कि परा और अपरा—इन दोनों मेरी प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है (छठा श्लोक)। परन्तु नवें अध्यायमें संसारकी स्थिति बताते हैं कि जिनकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है, उन साधकोंके लिये संसार मेरेमें है और मैं संसारमें हूँ (चौथा, पाँचवाँ, छठा श्लोक)। इसीको छठे अध्यायमें कहा है—'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति' (६।३०)। परन्तु जिन सिद्ध महापुरुषोंकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, उनकी दृष्टिमें एक मैं-ही-मैं हूँ—'वासुदेवः सर्वम्'।

भगवान् कहते हैं कि यद्यपि सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला तथा धारण करनेवाला मैं ही हूँ, तथापि मैं उन प्राणियोंके आश्रित नहीं हूँ, प्रत्युत वे प्राणी ही मेरे आश्रित हैं (नवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। जैसे आकाशमें रहनेवाली वायु आकाशके आश्रित होती है, पर आकाश वायुके आश्रित नहीं होता, ऐसे ही परा और अपरा प्रकृति तो भगवान्का स्वभाव होनेसे भगवान्के आश्रित (अधीन) है, पर भगवान् परा और अपरा प्रकृतिके आश्रित नहीं हैं। इसलिये जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही स्थित रहती है और आकाशमें ही लीन होती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी महासर्गमें भगवान्से ही प्रकट होते हैं, भगवान्में ही स्थित रहते हैं और महाप्रलयमें भगवान्में ही लीन होते हैं (सातवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिके आश्रित हैं और प्रकृति भगवान्के आश्रित है (आठवाँ श्लोक)। दूसरे शब्दोंमें, भगवान्के एक अंशमें प्रकृति है और प्रकृतिके एक अंशमें प्राणी हैं। इसलिये सृष्टिकी रचना करनेपर भी भगवान् सृष्टि-रचनारूप कर्मसे बँधते नहीं (नवाँ श्लोक); क्योंकि वास्तवमें सृष्टि-रचनाका कार्य भगवान्के आश्रित रहनेवाली प्रकृति ही करती है (दसवाँ श्लोक)। इस रहस्यको न जाननेके कारण बेसमझ लोग भगवान्को भी अपनी तरह शरीर-(अपरा-)के आश्रित मान लेते हैं कि जैसे हम शरीरके बिना नहीं रह सकते, ऐसे ही भगवान् भी शरीरके बिना नहीं रह सकते (ग्यारहवाँ श्लोक)। ऐसे लोग आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिके आश्रित रहनेवाले होते हैं (बारहवाँ श्लोक)। वास्तवमें जैसे मनुष्यमें शरीर और शरीरीका भेद रहता है, ऐसे भगवान्में शरीर-शरीरीका भेद नहीं है—'सदसच्छाहमर्जुन' (९।१९)। इसलिये जो मनुष्य भगवान्को प्रकृतिके आश्रित नहीं समझते, वे दैवी प्रकृतिके आश्रित रहनेवाले होते हैं अर्थात् वे प्रकृतिके आश्रित न होकर भगवान्के आश्रित होते हैं (तेरहवाँ श्लोक)। भगवान्के आश्रित होनेके कारण वे 'महात्मा' कहलाते हैं।

कर्मयोग 'शरीर'-(अपरा-) की मुख्यतासे चलता है और ज्ञानयोग 'शरीरी'-(परा-) की मुख्यतासे चलता है। एक देश-(शरीर अथवा शरीरी-) को लेकर चलनेसे कर्मयोगी और ज्ञानयोगी एकदेशीय होते हैं। परन्तु भक्तियोग भगवान्की मुख्यतासे चलता है। इसलिये भक्तको भगवान्ने 'महात्मा' अर्थात् महान् आत्मा कहा है। वे अनन्यमनसे भगवान्का भजन करते हैं। कारण कि जब उनकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय अन्यकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं, तो फिर उनका मन भगवान्को छोड़कर कहाँ जाय? इसलिये वे भगवान्में नित्ययुक्त रहते हैं, कभी भगवान्से अलग होते ही नहीं—'नित्ययुक्ताः' (९।१४), 'नित्याभियुक्तानाम्' (९।२२)।

साधक कई प्रकारके होते हैं और अलग-अलग साधनोंसे भिन्न-भिन्न उपास्यदेवोंकी उपासना करते हैं। परन्तु वास्तवमें उन सभी साधकोंके द्वारा एक ही समग्र भगवान्की उपासना होती है—'मायुपासते' (९।१५), 'त्रैविद्या माम्' (९।२०), 'तेऽपि मामेव' (९।२३), 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभूरेव च' (९।२४)। कारण कि एक ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं (९।१६—१९)। इस रहस्यको न समझनेके कारण जो लोग अपने उपास्यदेवको भगवान्से अलग मानकर सकामभावसे उनकी उपासना करते हैं, उनको उपासना वास्तवमें भगवान्की होनेपर भी

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ सार ]

अविधिपूर्वक होती है। इसलिये उनका पतन हो जाता है अर्थात् वे जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं (नवें अध्यायका तेईसवाँ-चौबीसवाँ श्लोक)। परन्तु भगवान्की उपासना करनेवाले भगवान्को ही प्राप्त होते हैं।

जो लोग भगवान्को छोड़कर अन्य देवी-देवताओंकी उपासना करते हैं, उनको अनेक नियमों, विधियों आदिकी जरूरत पड़ती है, जिसमें बड़ी कठिनाता होती है। परन्तु भगवान्की उपासनामें भावकी जरूरत है, क्रियाओं-(नियमों, विधियों आदि-) की जरूरत नहीं है (नवें अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ श्लोक)। भगवान् क्रियाग्राही नहीं हैं, प्रत्युत भावग्राही हैं—‘भावग्राही जनार्दनः ’। इसलिये भक्तको सुगमतापूर्वक भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, मनुष्य किसी भी आचरण, वर्ण, आश्रम, जाति आदिका क्यों न हो, वह भगवान्का भक्त होकर सुगमतापूर्वक भगवान्को प्राप्त हो सकता है (नवें अध्यायके तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक)।

नवें अध्यायके अन्तमें भगवान् कहते हैं—‘ममना भव० ’ (९।३४)। इसका तात्पर्य है कि जो कुछ भी है, वह मैं ही हूँ, मेरे सिवाय और कुछ है ही नहीं (सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। इस बातको दृढ़तासे स्वीकार करना ही ‘ममना भव० ’ आदि पदोंका तात्पर्य है।

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ दशमोऽध्यायः

अवतरणिका—

श्रीभगवान् सातवें अध्यायमें अपने हृदयकी बात—विज्ञानसहित ज्ञान कह रहे थे। जब बीचमें ही आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर अपनी बात कहनेमें कुछ परिवर्तन हुआ, तब भगवान्ने पुनः विज्ञानसहित ज्ञान कहनेके लिये नवें अध्यायका विषय आरम्भ किया और उसकी समाप्ति भगवत्परायणतामें की। फिर भी भगवान्के मनमें और कहनेका भाव रहा। उन्हें अपने कथनपर संतोष नहीं हुआ। जैसे भक्तको भगवान्की बात सुनते हुए तृप्ति नहीं होती (गीता—दसवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), ऐसे ही अपने प्यारे भक्त अर्जुनके प्रति अपने हृदयकी बात कहते-कहते भगवान्को तृप्ति नहीं हो रही है। कारण कि भगवान्के हृदयकी गोपनीय बात भक्तके सिवाय संसारमें और कोई सुननेवाला नहीं है। अतः भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही कृपापूर्वक दसवें अध्यायका विषय आरम्भ कर देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।

यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले—

महाबाहो = हे महाबाहो अर्जुन!

मे = मेरे

परमम् = परम

वचः = वचनको (तुम)

भूयः = फिर

एव = भी

श्रृणु = सुनो,

यत् = जिसे

अहम् = मैं

प्रीयमाणाय = मुझमें अत्यन्त प्रेम रखनेवाले

ते = तुम्हारे लिये

हितकाम्यया = हितकी कामनासे

वक्ष्यामि = कहूँगा।

व्याख्या—'भूय एव'—भगवान्की विभूतियोंको तत्त्वसे जाननेपर भगवान्में भक्ति होती है, प्रेम होता है। इसलिये कृपावश होकर भगवान्ने सातवें अध्यायमें (आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक) कारणरूपसे सत्रह विभूतियाँ और नवें अध्यायमें (सोलहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक) कार्य-कारणरूपसे सैंतीस विभूतियाँ बतायीं। अब यहाँ और भी विभूतियाँ बतानेके लिये तथा (गीता—आठवें अध्यायके चौदहवें एवं नवें अध्यायके बाईसवें तथा चौंतीसवें श्लोकमें कही हुई) भक्तिका और भी विशेषतासे वर्णन करने लिये भगवान् 'भूय एव' कहते हैं।

'श्रृणु मे परमं वचः'—भगवान्के मनमें अपनी महिमाकी बात, अपने हृदयकी बात, अपने प्रभावकी बात कहनेकी विशेष आ रही है। इसलिये वे अर्जुनसे कहते हैं कि 'तू फिर मेरे परम वचनको सुन'।

दूसरा भाव यह है कि भगवान् जहाँ-जहाँ अर्जुनको अपनी विशेष महत्ता, प्रभाव, ऐश्वर्य आदि बताते हैं अर्थात् अपने-आपको खोल करके बताते हैं, वहाँ-वहाँ वे परम वचन, रहस्य आदि शब्दोंका प्रयोग करते हैं; जैसे—चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'रहस्यं ह्येतदुत्तमम्' पदोंसे बताते

१-इस (दसवें) अध्यायमें भगवान्ने चौथेसे छठे श्लोकतक अपनी पैंतालीस विभूतियाँ बतायी हैं।

२-भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी तरफसे उन भक्तोंपर कृपा करके उनको ज्ञान दे देता हूँ—'तेषामेवानुकम्पार्थम्' (गीता १०।११)—यह भगवान्का परम वचन है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

हैं कि जिसने सूर्यको उपदेश दिया था, वही मैं तेरे रथके घोड़े हाँकता हुआ तेरे सामने बैठा हूँ। अठारहवें अध्यायके चौसठवें श्लोकमें 'शृणु मे परमं वचः' पदोंसे यह परम वचन कहते हैं कि तू सम्पूर्ण धर्मोंका निर्णय करनेकी झंडटको छोड़कर एक मेरी शरणमें आ जा; मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर (१८।६६)। यहाँ 'शृणु मे परमं वचः' पदोंसे भगवान्का आशय है कि प्राणियोंके अनेक प्रकारके भाव मेरेसे ही पैदा होते हैं और मेरेमें ही भक्तिभाव रखनेवाले सात महर्षि, चार सनकादि तथा चौदह मनु—ये सभी मेरे मनसे पैदा होते हैं। तात्पर्य यह है कि सबके मूलमें मैं ही हूँ।

जैसे आगे तेरहवें अध्यायमें ज्ञानकी बात कहते हुए भी चौदहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने फिर ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की है, ऐसे ही सातवें और नवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानकी बात कहते हुए भी दसवें अध्यायके आरम्भमें फिर उसी विषयको कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं। चौदहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने 'परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्' कहा और यहाँ (दसवें अध्यायके आरम्भमें) 'शृणु मे परमं वचः' कहा। इनका तात्पर्य है कि ज्ञानमार्गमें समझकी, विवेक-विचारकी मुख्यता रहती है; अतः साधक वचनोंको सुन करके विचारपूर्वक तत्त्वको समझ लेता है। इसलिये वहाँ 'ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्' कहा है। भक्तिमार्गमें श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता रहती है; अतः साधक वचनोंको सुन करके श्रद्धा-विश्वासपूर्वक मान लेता

परिशिष्ट भाव —अर्जुन युद्धक्षेत्रमें आकर भी विजयकी कामना न रखकर अपना कल्याण चाहते हैं, इसलिये उनके लिये 'महाबाहो' सम्बोधन आया है। यह सम्बोधन अर्जुनकी श्रेष्ठताका, उपदेश धारण करनेकी सामर्थ्यका, अधिकारका सूचक है।

'परमं वचः'—जीवमात्रका कल्याण करनेवाले होनेसे भगवान्के वचन 'परम' अर्थात् अत्यन्त श्रेष्ठ हैं। मात्र जीवोंका कल्याण करनेवाली होनेसे ही गीता विश्वमात्रको प्रिय, विश्ववन्ध है।

'वक्ष्यामि हितकाम्यया'—अर्जुन जीवमात्रके प्रतिनिधि हैं और अपना हित ही चाहते हैं*। अतः भगवान् उनके अर्थात् जीवमात्रके हितके उद्देश्यसे परम वचन कहते हैं। कल्याणके सिवाय जीवका अन्य कोई हित है ही नहीं। भगवान्के वचन भी कल्याण करनेवाले हैं और उनका उद्देश्य भी कल्याण करनेका है, इसलिये भगवान्की वाणीमें जीवका विशेष कल्याण (परमहित) भरा हुआ है। जीवका जितना हित भगवान् कर सकते हैं, उतना दूसरा कोई कर सकता ही नहीं—

उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं॥

(मानस, किष्किन्धा १२।१)

  • 'यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे' (गीता २।७)

तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥ (गीता ३।२)

यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥ (गीता ५।१)

है। इसलिये यहाँ 'परमं वचः' कहा गया है।

'यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया'—सुननेवाला वक्तामें श्रद्धा और प्रेम रखनेवाला हो और वक्ताके भीतर सुननेवालेके प्रति कृपापूर्वक हित-भावना हो तो वक्ताके वचन, उसके द्वारा कहा हुआ विषय श्रोताके भीतर अटलरूपसे जम जाता है। इससे श्रोताकी भगवान्में स्वतः रुचि पैदा हो जाती है, भक्ति हो जाती है, प्रेम हो जाता है।

यहाँ 'हितकाम्यया' पदसे एक शंका हो सकती है कि भगवान्ने गीतामें जगह-जगह कामनाका निषेध किया है, फिर वे स्वयं अपनेमें कामना क्यों रखते हैं? इसका समाधान यह है कि वास्तवमें अपने लिये भोग, सुख, आराम आदि चाहना ही 'कामना' है। दूसरोंके हितकी कामना 'कामना' है ही नहीं। दूसरोंके हितकी कामना तो त्याग है और अपनी कामनाको मिटानेका मुख्य साधन है। इसलिये भगवान् सबको धारण करनेके लिये आदर्शरूपसे कह रहे हैं कि जैसे मैं हितकी कामनासे कहता हूँ, ऐसे ही मनुष्यमात्रको चाहिये कि वह प्राणिमात्रके हितकी कामनासे ही सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करे। इससे अपनी कामना मिट जायगी और कामना मिटनेपर मेरी प्राप्ति सुगमतासे हो जायगी। प्राणिमात्रके हितकी कामना रखनेवालेको मेरे सगुण स्वरूपकी प्राप्ति भी हो जाती है— 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः' (गीता १२।४), और निर्गुण स्वरूपकी प्राप्ति भी हो जाती है— 'लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणं "" सर्वभूतहिते रताः' (गीता ५।२५)।

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

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दूसरोंकी वाणीमें तो मतभेद रहता है, पर भगवान्‌की वाणी सर्वसम्मत है। भगवान्‌ योगमें स्थित होकर गीता कह रहे हैं; अतः उनके वचन विशेष कल्याण करनेवाले हैं। भगवान्‌का योगमें स्थित होना क्या है? भगवान्‌ सामान्यरूपसे मात्र प्राणियोंके परम सुहृद् हैं, पर जब कोई व्याकुल होकर उनकी शरणमें आता है, तब भगवान्‌के हृदयमें उसके हितके विशेष भाव प्रकट होते हैं—यही भगवान्‌का योगमें स्थित होना है; जैसे—बछड़ेके सामने आते ही गायके शरीरमें रहनेवाला दूध उसके थनोंमें आ जाता है!

‘यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया’ पदोंसे भगवान्‌ कहते हैं कि तुम्हारे भीतर मेरे प्रति प्रेमका भाव है और मेरे भीतर तुम्हारे प्रति हितका भाव है, इसलिये मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान पुनः कहूँगा, जो मैंने सातवें और नवें अध्यायमें कहा है। इससे सिद्ध होता है कि सातवों, नवों और दसवों—तीनों अध्यायोंमें भगवान्‌ने प्राणिमात्रके हितकी कामनासे अपने हृदयकी बात कही है!

सम्बन्ध—परम वचनके विषयमें, जिसे मैं आगे कहूँगा, मेरे सिवाय पूरा-पूरा बतानेवाला अन्य कोई नहीं मिल सकता। इसका कारण क्या है? इसे भगवान्‌ आगेके श्लोकमें बताते हैं।

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः । अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥ २ ॥

मे= मेरे(और)सर्वशः= सब प्रकारसे
प्रभवम्= प्रकट होनेको= नदेवानाम्
= नमहर्षयः= महर्षि;
सुरगणाः= देवताहि= क्योंकिमहर्षीणाम्
विदुः= जानते हैंअहम्= मैंआदिः

व्याख्या—‘न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः’—यद्यपि देवताओंके शरीर, बुद्धि, लोक, सामग्री आदि सब दिव्य हैं, तथापि वे मेरे प्रकट होनेको नहीं जानते। तात्पर्य है कि मेरा जो विश्वरूपसे प्रकट होना है, मत्स्य, कच्छप आदि अवताररूपसे प्रकट होना है, सृष्टिमें क्रिया, भाव और विभूतिरूपसे प्रकट होना है, ऐसे मेरे प्रकट होनेके उद्देश्यको, लक्ष्यको, हेतुओंको देवता भी पूरा-पूरा नहीं जानते। मेरे प्रकट होनेको पूरा-पूरा जानना तो दूर रहा, उनको तो मेरे दर्शन भी बड़ी कठिनासे होते हैं। इसलिये वे मेरे दर्शनके लिये हरदम लालायित रहते हैं (गीता—ग्यारहवें अध्यायके बावनवें श्लोकमें)।

ऐसे ही जिन महर्षियोंने अनेक ऋचाओंको, मन्त्रोंको,

विद्याओंको, विलक्षण-विलक्षण शक्तियोंको प्रकट किया है, जो संसारसे ऊँचे उठे हुए हैं, जो दिव्य अनुभवसे युक्त हैं, जिनके लिये कुछ करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहा है, ऐसे तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महर्षि लोग भी मेरे प्रकट होनेको अर्थात् मेरे अवतारोंको, अनेक प्रकारकी लीलाओंको, मेरे महत्त्वको पूरा-पूरा नहीं जानते।

यहाँ भगवान्‌ने देवता और महर्षि—इन दोनोंका नाम लिया है। इसमें ऐसा मालूम देता है कि ऊँचे पदकी दृष्टिसे देवताका नाम और ज्ञानकी दृष्टिसे महर्षिका नाम लिया गया है। इन दोनोंका मेरे प्रकट होनेको न जाननेमें कारण यह है कि मैं देवताओं और महर्षियोंका सब प्रकारसे आदि हूँ—‘अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।’ उनमें जो

१-न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः ॥

परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया। (महाभारत, आश्व० १६।१२-१३)

‘(भगवान्‌ अर्जुनसे बोले—) वह सब-का-सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात नहीं है। उस समय योगयुक्त होकर ही मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था।’

२-ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गृह्णाम्युत। (श्रीमद्भग० १।१।८; १०।१३।३)

‘गुरुजन’ अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त-से-गुप्त बात भी बतला दिया करते हैं।’

गृह्णु तत्त्वं न साधु दुरावर्हि। आरत अधिकारी जहं पावर्हि ॥ (मानस, बाल० ११०।१)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

कुछ बुद्धि है, शक्ति है, सामर्थ्य है, पद है, प्रभाव है, महत्ता है, वह सब उन्होंने मेरेसे ही प्राप्त की है। अतः मेरेसे प्राप्त किये हुए प्रभाव, शक्ति, सामर्थ्य आदिसे वे मेरेको पूरा कैसे जान सकते हैं? अर्थात् नहीं जान सकते। जैसे बालक जिस माँसे पैदा हुआ है, उस माँके विवाहको और अपने शरीरके पैदा होनेको नहीं जानता, ऐसे ही देवता और महर्षि मेरेसे ही प्रकट हुए हैं; अतः वे मेरे प्रकट होनेको और अपने कारणको नहीं जानते। कार्य अपने कारणमें लीन तो हो सकता है, पर उसको जान नहीं सकता। ऐसे ही देवता और महर्षि मेरेसे उत्पन्न होनेसे, मेरा कार्य होनेसे कारणरूप मेरेको नहीं जान सकते, प्रत्युत मेरेमें लीन हो सकते हैं।

तात्पर्य यह हुआ कि देवता और महर्षि भगवान्के आदिको, अन्तको और वर्तमानकी इयत्ताको अर्थात् भगवान् ऐसे ही हैं, इतने ही अवतार लेते हैं—इस माप-

परिशिष्ट भाव —सातवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने 'मनुष्याणां सहस्रेषु०' पदोंसे जो बात कही थी, वह यहाँ 'न मे विदुः०' पदोंसे कहते हैं। वे भगवान्को क्यों नहीं जानते—इसका हेतु बताते हैं कि मैं सब तरहसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ। सातवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि भूत, भविष्य और वर्तमानके सब प्राणियोंको मैं जानता हूँ पर मेरेको कोई नहीं जानता। इसलिये अर्जुनने भी आगे चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें कहा है कि आपको न देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं, प्रत्युत आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं।

इस श्लोकमें भगवान्ने 'राजगृह्य' बात कही है। भगवान् विद्या, बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य आदिसे जाननेमें नहीं आते, प्रत्युत जिज्ञासुके श्रद्धा-विश्वाससे एवं भगवत्कृपासे ही जाननेमें आते हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कहा गया कि देवता और महर्षिलोग भी भगवान्के प्रकट होनेको सर्वथा नहीं जान सकते, तो फिर मनुष्य भगवान्को कैसे जानेगा और उसका कल्याण कैसे होगा? इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।

असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३ ॥

यः= जो (मनुष्य)महान् ईश्वरमर्त्येषु= मनुष्योंमें
माम्= मुझेवेत्ति= जानता है अर्थात्असम्मूढः
अजम्= अजन्मा,दृढ़तासे (सन्देहरहित)
अनादिम्= अनादिस्वीकार करसर्वपापैः
= औरलेता है,
लोकमहेश्वरम्= सम्पूर्ण लोकोंकासः= वहप्रमुच्यते

व्याख्या —'यो मामजमनादिं च वेत्ति लोक-महेश्वरम्'—पीछेके श्लोकमें भगवान्के प्रकट होनेको जाननेका विषय नहीं बताया है। इस विषयको तो मनुष्य भी नहीं जानता, पर जितना जाननेसे मनुष्य अपना कल्याण कर ले, उतना तो वह जान ही सकता है। वह जानना

तौलको नहीं जान सकते। कारण कि इन देवताओं और महर्षियोंके प्रकट होनेसे पहले भी भगवान् ज्यों-के-त्यों ही थे और उनके लीन होनेपर भी भगवान् ज्यों-के-त्यों ही रहेंगे। अतः जिनके शरीरोंका आदि और अन्त होता रहता है, वे देवता और महर्षि अनादि-अनन्तको अर्थात् असीम परमात्माको अपनी सीमित बुद्धि, योग्यता, सामर्थ्य आदिके द्वारा कैसे जान सकते हैं? असीमको अपनी सीमित बुद्धिके अन्तर्गत कैसे ला सकते हैं? अर्थात् नहीं ला सकते।

इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें अर्जुनने भी भगवान्से कहा है कि आपको देवता और दानव नहीं जानते; क्योंकि देवताओंके पास भोग-सामग्रीकी और दानवोंके पास माया-शक्तिकी अधिकता है। तात्पर्य है कि भोगोंमें लगे रहनेसे देवताओंको (मेरेको जाननेके लिये) समय ही नहीं मिलता और माया-शक्तिसे छल-कपट करनेसे दानव मेरेको जान ही नहीं सकते।

अर्थात् मानना यह है कि भगवान् अज अर्थात् जन्मरहित हैं। वे अनादि हैं अर्थात् यह जो काल कहा जाता है, जिसमें आदि-अनादि शब्दोंका प्रयोग होता है, भगवान् उस कालके भी काल हैं। उन कालातीत भगवान्में कालका भी आदि और अन्त हो जाता है। भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

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महान् ईश्वर हैं अर्थात् स्वर्ग, पृथ्वी और पातालरूप जो त्रिलोकी है तथा उस त्रिलोकीमें जितने प्राणी हैं और उन प्राणियोंपर शासन करनेवाले (अलग-अलग अधिकार-प्राप्त) जितने ईश्वर (मालिक) हैं, उन सब ईश्वरोंके भी महान् ईश्वर भगवान् हैं। इस प्रकार जाननेसे अर्थात् श्रद्धा-विश्वासपूर्वक दृढ़तासे माननेसे मनुष्यको भगवान्के अज, अविनाशी और लोकमहेश्वर होनेमें कभी किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं होता।

‘असम्मूढः स मत्स्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते’ — भगवान्को अज, अविनाशी और लोकमहेश्वर जाननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त कैसे होगा ? भगवान् जन्मरहित हैं, नाशरहित हैं अर्थात् उनमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। वे अजन्मा तथा अविनाशी रहते हुए ही सबके महान् ईश्वर हैं। वे सब देशमें रहनेके नाते यहाँ भी हैं, सब समयमें होनेके नाते अभी भी हैं, सबके होनेके नाते मेरे भी हैं और सबके मालिक होनेके नाते मेरे अकेलेके भी मालिक हैं—इस प्रकार दृढ़तासे मान ले। इसमें सन्देहकी गन्ध भी न रहे। साथ-ही-साथ, यह जो क्षणभंगुर संसार है, जिसका प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है और जिसको जिस क्षणमें जिस रूपमें देखा है, उसको दूसरे क्षणमें उस रूपमें दुबारा कोई भी देख नहीं सकता; क्योंकि वह दूसरे क्षणमें वैसा रहता ही नहीं—इस प्रकार संसारको यथार्थरूपसे जान ले। जिसने अपनेसहित सारे

संसारके मालिक भगवान्को दृढ़तासे मान लिया है और संसारकी क्षणभंगुरताको तत्त्वसे ठीक जान लिया है, उसका संसारमें ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन रह ही नहीं सकता; प्रत्युत एकमात्र भगवान्में ही अपनापन हो जाता है। तो फिर वह पापोंसे मुक्त नहीं होगा, तो और क्या होगा ? ऐसा मूढ़तारहित मनुष्य ही भगवान्को तत्त्वसे अज, अविनाशी और लोकमहेश्वर जानता है और वही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसके क्रियमाण, संचित आदि सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं। मनुष्यको इस वास्तविकताका अनुभव करनेकी आवश्यकता है, केवल तोतेकी तरह सीखनेकी आवश्यकता नहीं। तोतेकी तरह सीखा हुआ ज्ञान पूरा काम नहीं देता।

असम्मूढ़ता क्या है ? संसार (शरीर) किसीके भी साथ कभी रह नहीं सकता तथा कोई भी संसारके साथ कभी रह नहीं सकता और परमात्मा किसीसे भी कभी अलग हो नहीं सकते और कोई भी परमात्मासे कभी अलग हो नहीं सकता—यह वास्तविकता है। इस वास्तविकताको न जानना ही सम्मूढ़ता है और इसको यथार्थ जानना ही असम्मूढ़ता है। यह असम्मूढ़ता जिसमें रहती है, वह मनुष्य असम्मूढ़ कहा जाता है। ऐसा असम्मूढ़ पुरुष मेरे सगुण-निर्गुण, साकार-निराकाररूपको तत्त्वसे जान लेता है, तो उसे मेरी लीला, रहस्य, प्रभाव, ऐश्वर्य आदिमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता।

परिशिष्ट भाव —नवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भगवान्ने व्यतिरेकरीतिसे कहा कि जो मेरेको नहीं जानता, उसका पतन हो जाता है और यहाँ अन्यरीतिसे कहते हैं कि जो मेरेको जानता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

यहाँ ‘वेत्ति’ का अर्थ है—दृढ़तापूर्वक, सन्देहरहित स्वीकार कर लेना; क्योंकि भगवान्को इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे जान नहीं सकते (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा श्लोक)। अतः भगवान् जाननेका विषय नहीं हैं, प्रत्युत मानने और अनुभव करनेका विषय हैं। जाननेका विषय खुद प्रकृति भी नहीं है; फिर प्रकृतिसे अतीत भगवान् जाननेका विषय कैसे हो सकते हैं। अनुभव करनेका तात्पर्य है—अपनेको भगवान्में लीन कर देना, भगवान्से अभिन्न हो जाना। भगवान्से अभिन्न होकर ही भगवान्को जान सकते हैं; क्योंकि वास्तवमें अभिन्न ही हैं। (इसी तरह संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकते हैं; क्योंकि वास्तवमें अलग ही हैं।)

महर्षिगण भगवान्को आदिको तो नहीं जान सकते, पर वे भगवान्को अज-अनादि तो जानते ही हैं। भगवान्का अंश होनेसे जीव भी अज-अनादि है। अतः वह भगवान्को अज-अनादि जानेगा तो अपनेको भी वैसा ही (अज-अनादि) जानेगा; क्योंकि जीव भगवान्से अभिन्न होकर ही भगवान्को जानता है। अपनेको अज-अनादि जाननेपर वह मूढ़तारहित हो जाता है, फिर उसमें पाप कैसे रहेंगे ? क्योंकि पाप तो पीछे पैदा हुए हैं, अज-अनादि पहलेसे है। ‘सर्वपापैः प्रमुच्यते’ का तात्पर्य है—गुणोंके संगसे रहित होना। गुणोंका संग रहते हुए मनुष्य पापोंसे मुक्त नहीं हो सकता; क्योंकि गुणोंका संग पापोंका मूल कारण है।

आगे चौथेसे छठे श्लोकतक असम्मूढ़ताका ही विवेचन हुआ है, जिसमें भगवान्ने अपनेको सबका ‘आदि’ बताया है। भगवान् स्वयं ‘अनादि’ हैं और भावोंके तथा महर्षियोंके ‘आदि’ हैं।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

सम्बन्ध—पहले श्लोकमें भगवान्ने जिस परम वचनको सुननेकी आज्ञा दी थी, उसको अब आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ ४ ॥

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥ ५ ॥

बुद्धिः= बुद्धि,भवः= उत्पत्ति,यशः= यश
ज्ञानम्= ज्ञान,अभावः= विनाश,= और
असम्मोहः= असम्मोह,भयम्= भय,अयशः= अपयश—
क्षमा= क्षमा,अभयम्= अभयभूतानाम्= प्राणियोंके (ये)
सत्यम्= सत्य,= औरपृथग्विधाः= अनेक प्रकारके
अलग-अलग
दमः= दम,अहिंसा= अहिंसा,भावाः= (बीस) भाव
शमः= शमसमता= समता,मत्तः= मुझसे
एव= तथातुष्टिः= सन्तोष,एव= ही
सुखम्= सुख,तपः= तप,भवन्ति= होते हैं।
दुःखम्= दुःख,दानम्= दान,

व्याख्या—‘बुद्धिः’ —उद्देश्यको लेकर निश्चय करने वाली वृत्तिका नाम ‘बुद्धि’ है।

‘ज्ञानम्’ —सार-असार, ग्राह्य-अग्राह्य, नित्य-अनित्य, सत्-असत्, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य—ऐसा जो विवेक अर्थात् अलग-अलग जानकारी है, उसका नाम ‘ज्ञान’ है। यह ज्ञान (विवेक) मानवमात्रको भगवान्से मिला है।

‘असम्मोहः’ —शरीर और संसारको उत्पत्ति-विनाशशील जानते हुए भी उनमें ‘मैं’ और ‘मेरा’-पन करनेका नाम सम्मोह है और इसके न होनेका नाम ‘असम्मोह’ है।

‘क्षमा’ —कोई हमारे प्रति कितना ही बड़ा अपराध करे, अपनी सामर्थ्य रहते हुए भी उसे सह लेना और उस अपराधीको अपनी तथा ईश्वरकी तरफसे यहाँ और परलोकमें कहीं भी दण्ड न मिले—ऐसा विचार करनेका नाम ‘क्षमा’ है।

‘सत्यम्’ —सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके लिये सत्यभाषण करना अर्थात् जैसा सुना, देखा और समझा है, उसीके अनुसार अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये न ज्यादा, न कम—वैसा-का-वैसा

कह देनेका नाम ‘सत्य’ है।

‘दमः शमः’ —परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखते हुए इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंसे हटाकर अपने वशमें करनेका नाम ‘दम’ है, और मनको सांसारिक भोगोंके चिन्तनसे हटानेका नाम ‘शम’ है।

‘सुखं दुःखम्’ —शरीर, मन, इन्द्रियोंके अनुकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो प्रसन्नता होती है, उसका नाम ‘सुख’ है और प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो अप्रसन्नता होती है, उसका नाम ‘दुःख’ है।

‘भवोऽभावः’ —सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, भाव आदिके उत्पन्न होनेका नाम ‘भव’ है और इन सबके लीन होनेका नाम ‘अभाव’ है।

‘भयं चाभयमेव च’ —अपने आचरण, भाव आदि शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध होनेसे अन्तःकरणमें अपना अनिष्ट होनेकी जो एक आशंका होती है, उसको ‘भय’ कहते हैं। मनुष्यके आचरण, भाव आदि अच्छे हैं, वह किसीको कष्ट नहीं पहुँचाता, शास्त्र और सन्तोंके सिद्धान्तसे विरुद्ध कोई आचरण नहीं करता, तो उसके हृदयमें अपना अनिष्ट होनेकी आशंका नहीं रहती अर्थात्

श्लोक ४-५]

  • साधक-संजीवनी *

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उसको किसीसे भय नहीं होता। इसीको 'अभय' कहते हैं।

'अहिंसा'—अपने तन, मन और वचनसे किसी भी देश, काल, परिस्थिति आदिमें किसी भी प्राणीको किंचिन्मात्र भी दुःख न देनेका नाम 'अहिंसा' है।

'समता'—तरह-तरहकी अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिके प्राप्त होनेपर भी अपने अन्तःकरणमें कोई विषमता न आनेका नाम 'समता' है।

'तुष्टिः'—आवश्यकता ज्यादा रहनेपर भी कम मिले तो उसमें सन्तोष करना तथा और मिले—ऐसी इच्छाका न रहना 'तुष्टि' है। तात्पर्य है कि मिले अथवा न मिले, कम मिले अथवा ज्यादा मिले आदि हर हालतमें प्रसन्न रहना 'तुष्टि' है।

'तपः'—अपने कर्तव्यका पालन करते हुए जो कुछ कष्ट आ जाय, प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय, उन सबको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नाम 'तप' है। एकादशी-व्रत आदि करनेका नाम भी तप है।

'दानम्'—प्रत्युपकार और फलकी किंचिन्मात्र भी इच्छा न रखकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी शुद्ध कमाईका हिस्सा सत्पात्रको देनेका नाम 'दान' है (गीता—सत्रहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।

'यशोऽयशः'—मनुष्यके अच्छे आचरणों, भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी प्रसिद्धि, प्रशंसा आदि होते हैं, उनका नाम 'यश' है। मनुष्यके बुरे आचरणों, भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी निन्दा होती है, उसको 'अयश' (अपयश) कहते हैं।

'भवन्ति भावा भूतानां मत् एव पृथग्विधाः'—प्राणियोंके ये पृथक्-पृथक् और अनेक तरहके भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उन सबको सत्ता, स्फूर्ति, शक्ति, आधार और प्रकाश मुझ लोकमहेश्वरसे ही मिलता है। तात्पर्य है कि तत्त्वसे सबके मूलमें मैं ही हूँ।

यहाँ 'मत्तः' पदसे भगवान्का योग, सामर्थ्य, प्रभाव और 'पृथग्विधाः' पदसे अनेक प्रकारकी अलग-अलग विभूतियाँ जाननी चाहिये।

संसारमें जो कुछ विहित तथा निषिद्ध हो रहा है; शुभ तथा अशुभ हो रहा है और संसारमें जितने सद्भाव तथा दुर्भाव हैं, वह सब-की-सब भगवान्की लीला है—इस प्रकार भक्त भगवान्को तत्त्वसे समझ लेता है तो उसका भगवान्में अविकम्प (अविचल) योग हो जाता है (गीता—दसवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।

यहाँ प्राणियोंके जो बीस भाव बताये गये हैं, उनमें बारह भाव तो एक-एक (अकेले) हैं और वे सभी अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाले हैं और भयके साथ आया हुआ अभय भी अन्तःकरणमें पैदा होनेवाला भाव है तथा बचे हुए सात भाव परस्परविरोधी हैं। उनमेंसे भव (उत्पत्ति), अभाव, यश और अयश—ये चार तो प्राणियोंके पूर्वकृत कर्मके फल हैं और सुख, दुःख तथा भय—ये तीन मूर्खताके फल हैं। इस मूर्खताको मनुष्य मिटा सकता है।

यहाँ प्राणियोंके बीस भावोंको अपनेसे पैदा हुए और अपनी विभूति बतानेमें भगवान्का तात्पर्य है कि ये बीस भाव तो पृथक्-पृथक् हैं, पर इन सब भावोंका आधार मैं एक ही हूँ। इन सबके मूलमें मैं ही हूँ, ये सभी मेरेसे ही होते हैं एवं मेरेसे ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने 'मत् एव' पदोंसे बताया है कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उनके मूलमें मैं ही हूँ, वे मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सत्ता-स्फूर्ति पाते हैं। अतः यहाँ भी भगवान्का आशय विभूतियोंके मूल तत्त्वकी तरफ साधककी दृष्टि करानेमें ही है।

विशेष बात

साधक संसारको कैसे देखे ? ऐसे देखे कि संसारमें जो कुछ क्रिया, पदार्थ, घटना आदि है, वह सब भगवान्का रूप है। चाहे उत्पत्ति हो, चाहे प्रलय हो; चाहे अनुकूलता हो, चाहे प्रतिकूलता हो; चाहे अमृत हो, चाहे मृत्यु हो; चाहे स्वर्ग हो, चाहे नरक हो; यह सब भगवान्की लीला है। भगवान्की लीलामें बालकाण्ड भी है, अयोध्याकाण्ड भी है, अरण्यकाण्ड भी है और लंकाकाण्ड भी है। पुरियोंमें देखा जाय तो अयोध्यापुरीमें भगवान्का प्राकट्य है; राजा, रानी और प्रजाका वात्सल्यभाव है। जनकपुरीमें रामजीके प्रति राजा जनक, महारानी सुनयना और प्रजाके विलक्षण-विलक्षण भाव हैं। वे रामजीको दामादरूपसे खिलते हैं, खेलाते हैं, विनोद करते हैं। वनमें (अरण्यकाण्डमें) भक्तोंका मिलना भी है और राक्षसोंका मिलना भी। लंकापुरीमें युद्ध होता है, मार-काट होती है, खूनकी नदियाँ बहती हैं। इस तरह अलग-अलग पुरियोंमें, अलग-अलग काण्डोंमें भगवान्की तरह-तरहकी लीलाएँ होती हैं। परन्तु तरह-तरहकी लीलाएँ होते हुए भी रामायण एक है और ये

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

सभी लीलाएँ एक ही रामायणके अंग हैं तथा इन अंगोंसे रामायण सांगोपांग होती है। ऐसे ही संसारमें प्राणियोंके तरह-तरहके भाव हैं, क्रियाएँ हैं। कहींपर कोई हैस रहा है तो कहींपर कोई रो रहा है, कहींपर विद्वदगोष्ठी हो रही है तो कहींपर आपसमें लड़ाई हो रही है, कोई जन्म ले

परिशिष्ट भाव —ज्ञानकी दृष्टिसे तो सभी भाव प्रकृतिसे होते हैं, पर भक्तिकी दृष्टिसे सभी भाव भगवान्से होते हैं। अगर इन भावोंको जीवका मानें तो जीव भी भगवान्की ही परा प्रकृति होनेसे भगवान्से अभिन्न है; अतः ये भाव भगवान्के ही हुए। भगवान्में तो ये भाव निरन्तर रहते हैं, पर जीवमें अपराके संगसे आते-जाते रहते हैं। भगवान्से उत्पन्न होनेके कारण सभी भाव भगवत्स्वरूप ही हैं।

‘पृथग्विधाः’ कहनेका तात्पर्य है कि जैसे हाथ एक ही होता है, पर उसमें अँगुलियाँ अलग-अलग होती हैं, ऐसे ही भगवान् एक ही हैं, पर उनसे प्रकट होनेवाले भाव अलग-अलग हैं। एक ही भगवान्में अनेक प्रकारके परस्परविरुद्ध भाव एक साथ रहते हैं!

महर्षयः सप्त पूर्व चत्वारो मनवस्तथा।

मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥

सप्त= सातमनवः= चौदह मनु (—ये सब-के-सब)येषाम्= जिनकी
महर्षयः= महर्षि (और)मानसाः= (मेरे) मनसेलोके= संसारमें
पूर्व= उनसे भी पहले होनेवालेजाताः= पैदा हुए हैं (और)इमाः= यह
चत्वारः= चार सनकादिमद्भावाः= मुझमें भाव (श्रद्धा-भक्ति) रखनेवाले हैं,प्रजाः= सम्पूर्ण प्रजा है।
तथा= तथा

व्याख्या —[पीछेके दो श्लोकोंमें भगवान्ने प्राणियोंके भाव-रूपसे बीस विभूतियाँ बतायीं। अब इस श्लोकमें व्यक्ति-रूपसे पचीस विभूतियाँ बता रहे हैं, जो कि प्राणियोंमें विशेष प्रभावशाली और जगत्की कारण हैं।]

‘महर्षयः सप्त’ —जो दीर्घ आयुवाले; मन्त्रोंको प्रकट करनेवाले; ऐश्वर्यवान्; दिव्य दृष्टिवाले; गुण, विद्या आदिसे वृद्ध; धर्मका साक्षात् करनेवाले और गोत्रोंके प्रवर्तक हैं—ऐसे सातों गुणोंसे युक्त ऋषि सप्तर्षि कहे जाते हैं। मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु और वसिष्ठ—ये सातों ऋषि उपर्युक्त सातों ही गुणोंसे युक्त हैं। ये सातों ही वेदवेत्ता हैं, वेदोंके आचार्य माने गये हैं, प्रवृत्ति-

रहा है तो कोई मर रहा है, आदि-आदि जो विविध भाँतिकी चेष्टाएँ हो रही हैं, वे सब भगवान्की लीलाएँ हैं। लीलाएँ करनेवाले ये सब भगवान्के रूप हैं। इस प्रकार भक्तकी दृष्टि हृदय भगवान्पर ही रहनी चाहिये; क्योंकि इन सबके मूलमें एक परमात्मतत्व ही है।

धर्मका संचालन करनेवाले हैं और प्रजापतिके कार्यमें नियुक्त किये गये हैं। इन्हीं सात ऋषियोंको यहाँ ‘महर्षि’ कहा गया है।

‘पूर्व चत्वारः’ —सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—ये चारों ही ब्रह्माजीके तप करनेपर सबसे पहले प्रकट हुए हैं। ये चारों भगवत्स्वरूप हैं। सबसे पहले प्रकट होनेपर भी ये चारों सदा पाँच वर्षकी अवस्थावाले बालकरूपमें ही रहते हैं। ये तीनों लोकोंमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्यका प्रचार करते हुए घूमते रहते हैं। इनकी वाणीसे सदा ‘हरिः शरणम्’ का उच्चारण होता रहता है। ये भगवत्कथाके बहुत प्रेमी हैं। अतः इन चारोंमेंसे एक वक्ता

१-सप्तैते सप्तभिश्चैव गुणैः सप्तर्षयः स्मृताः ॥

दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरो दिव्यचक्षुषः। वृद्धाः प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्च ये ॥ (वायुपुराण ६१।१३-१४)

२-मरीचिरांगिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः ऋतुः। वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥

एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः। प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ॥

(महा०, शान्तिपर्व ३४७।६९-७०)

३-हरिः शरणमेवं हि नित्यं येषां मुखे वचः। (पद्मपुराणोक्त श्रीमद्भगवत-माहात्म्य २।४८)

श्लोक ७]

  • साधक-संजीवनी *

७०९

और तीन श्रोता बनकर भगवत्कथा करते और सुनते रहते हैं।

'मनवस्तथा' —ब्रह्माजीके एक दिन-(कल्प-) में चौदह मनु होते हैं। ब्रह्माजीके वर्तमान कल्पके स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सार्वणि, दक्षसार्वणि, ब्रह्मसार्वणि, धर्मसार्वणि, रुद्रसार्वणि, देवसार्वणि और इन्द्रसार्वणि नामवाले चौदह मनु हैं*। ये सभी ब्रह्माजीकी आज्ञासे सृष्टिके उत्पादक और प्रवर्तक हैं।

'मानसा जाताः' —मात्र सृष्टि भगवान्के संकल्पसे पैदा होती है। परन्तु यहाँ सप्तर्षि आदिको भगवान्के मनसे पैदा हुआ कहा है। इसका कारण यह है कि सृष्टिका विस्तार करनेवाले होनेसे सृष्टिमें इनकी प्रधानता है। दूसरा कारण यह है कि ये सभी ब्रह्माजीके मनसे अर्थात् संकल्पसे पैदा हुए हैं। स्वयं भगवान् ही सृष्टि-रचनाके लिये ब्रह्मारूपसे प्रकट हुए हैं। अतः सात महर्षि, चार सनकादि और चौदह मनु—इन पचीसोंको ब्रह्माजीके मानसपुत्र कहें अथवा भगवान्के मानसपुत्र कहें, एक ही

परिशिष्ट भाव —सात महर्षि, चार सनकादि तथा भगवान्से अभिन्न हैं।

बात है।

'मद्भावाः' —ये सभी मेरेमें ही भाव अर्थात् श्रद्धा-प्रेम रखनेवाले हैं।

'येषां लोकमिमाः प्रजाः' —संसारमें दो तरहकी प्रजा हैं—स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली और शब्दसे (दीक्षा, मन्त्र, उपदेश आदिसे) उत्पन्न होनेवाली। संयोगसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा 'बिन्दुज' कहलाती है और शब्दसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा 'नादज' कहलाती है। बिन्दुज प्रजा पुत्र-परम्परासे और नादज प्रजा शिष्य-परम्परासे चलती है।

सप्तर्षियों और चौदह मनुओंने तो विवाह किया था; अतः उनसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा 'बिन्दुज' है। परन्तु सनकादिकोने विवाह किया ही नहीं; अतः उनसे उपदेश प्राप्त करके पारमार्थिक मार्गमें लगनेवाली प्रजा 'नादज' है। निवृत्तिपरायण होनेवाले जितने सन्त-महापुरुष पहले हुए हैं, अभी हैं और आगे होंगे, वे सब उपलक्षणसे उनकी ही नादज प्रजा हैं।

चौदह मनु—ये सब भगवान्के मनसे पैदा होनेके कारण

सम्बन्ध—चौथेसे छठे श्लोकतक प्राणियोंके भावों तथा व्यक्तियोंके रूपमें अपनी विभूतियोंका और अपने योग-(प्रभाव-) का वर्णन करके अब भगवान् आगेके श्लोकमें उनको तत्त्वसे जाननेका फल बताते हैं।

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥७॥

यः= जो मनुष्यतत्त्वतः= तत्त्वसेअविकम्पेन= अविचल
मम= मेरीवेत्ति= जानता है अर्थात्योगेन= भक्तियोगसे
एताम्= इसदृढ़तापूर्वक (सन्देह-युज्यते= युक्त हो जाता है;
विभूतिम्= विभूतिकोरहित) स्वीकार करअत्र= इसमें (कुछ भी)
= औरलेता है,संशयः= संशय
योगम्= योग-(सामर्थ्य-)कोसः= वह= नहीं है।

व्याख्या —'एतां विभूतिं योगं च मम'—'एताम्' सर्वनाम अत्यन्त समीपका लक्ष्य करता है। यहाँ यह शब्द चौथेसे छठे श्लोकतक कही हुई विभूति और योगका लक्ष्य करता है।

'विभूति' नाम भगवान्के ऐश्वर्यका है और 'योग' नाम भगवान्की अलौकिक विलक्षण शक्ति, अनन्त सामर्थ्यका है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्की शक्तिका नाम 'योग' है और उस योगसे प्रकट होनेवाली विशेषताओंका नाम

  • (श्रीमद्भागवतके आठवें स्कन्धके पहले, पाँचवें और तेरहवें अध्यायमें इनका विस्तारसे वर्णन आया है।)

ब्रह्माजीका एक दिन एक हजार चतुर्वर्गीका होता है। उसमें एक मनुका राज्य इकहत्तर चतुर्वर्गीसे कुछ ज्यादा समयका माना गया है। इस समय ब्रह्माजीकी आयुका इक्यावनवाँ वर्ष चल रहा है और इसमें सातवें मनु 'वैवस्वत' का राज्य चल रहा है।

७०२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

‘विभूति’ है। चौथेसे छठे श्लोकतक कही हुई भाव और व्यक्तिके रूपमें जितनी विभूतियाँ हैं, वे तो भगवान्के सामर्थ्यसे, प्रभावसे प्रकट हुई विशेषताएँ हैं और ‘मेरेसे पैदा होते हैं’ (‘मत्त:’; ‘मानसा जाता:’)—यह भगवान्का योग है, प्रभाव है। इसीको नवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘पश्य मे योगमैश्वरम् ’ (मेरे इस ईश्वरीय योगको देख) पदोंसे कहा गया है। ऐसे ही आगे ग्यारहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें अर्जुनको विश्वरूप दिखाते समय भगवान्ने ‘पश्य मे योगमैश्वरम् ’ पदोंसे अपना ऐश्वर्यमय योग देखनेके लिये कहा है।

विशेष बात

जब मनुष्य भोग-बुद्धिसे भोग भोगता है, भोगोंसे सुख लेता है, तब अपनी शक्तिका ह्रास और भोग्य वस्तुका विनाश होता है। इस प्रकार दोनों तरफसे हानि होती है। परन्तु जब वह भोगोंको भोगबुद्धिसे नहीं भोगता अर्थात् उसके भीतर भोग भोगनेकी किंचिन्मात्र भी लालसा उत्पन्न नहीं होती, तब उसकी शक्तिका ह्रास नहीं होता। उसकी शक्ति, सामर्थ्य निरन्तर बनी रहती है।

वास्तवमें भोगोंके भोगनेमें सुख नहीं है। सुख है—भोगोंके संयममें। यह संयम दो तरहका होता है—(१) दूसरोंपर शासनरूप संयम और (२) अपनेपर शासनरूप संयम। दूसरोंपर शासनरूप संयमका तात्पर्य है—‘दूसरोंका दुःख मिट जाय और वे सुखी हो जायें’—इस भावसे दूसरोंको उन्मार्गसे बचाकर सन्मार्गपर लगाना। अपनेपर शासनरूप संयमका तात्पर्य है—‘अपने स्वार्थ तथा अभिमानका त्याग करना और स्वयं किंचिन्मात्र भी सुख न भोगना।’ इन्हीं दोनों संयमोंका नाम ‘योग’ अथवा ‘प्रभाव’ है। ऐसा योग अथवा प्रभाव सर्वोपरि परमात्मामें स्वतः-स्वाभाविक होता है। दूसरोंमें यह साधन-साध्य होता है।

स्वार्थ और अभिमानपूर्वक दूसरोंपर शासन करनेसे, अपना हुक्म चलानेसे दूसरा वशमें हो जाता है तो शासन करनेवालेको एक सुख होता है। इस सुखमें शासककी शक्ति, सामर्थ्य क्षीण हो जाती है और जिसपर वह शासन करता है, वह पराधीन हो जाता है। इसलिये स्वार्थ और अभिमानपूर्वक दूसरोंपर शासन करनेकी अपेक्षा स्वार्थ और अभिमानका सर्वथा त्याग करके ‘दूसरोंका हित हो, मनुष्य नश्वर भोगोंमें न फँसें, मनुष्य अनादिकालसे अनन्त दुःखोंको भोगते आये हैं; अतः वे सदाके लिये इन दुःखोंसे

छूटकर महान् आनन्दको प्राप्त हो जायें’—ऐसी बुद्धिसे दूसरोंपर शासन करना बहुत श्रेष्ठ और विलक्षण शासन (संयम) है। इस शासनकी आखिरी हद है—भगवान्का शासन अर्थात् संयमन। इसीका नाम ‘योग’ है।

‘योग’ नाम समता, सम्बन्ध और सामर्थ्यका है। जो स्थिर परमात्मतत्त्व है, उसीसे अपार सामर्थ्य आती है। कारण कि वह निर्विकार परमात्मतत्त्व महान् सामर्थ्यशाली है। उसके समान सामर्थ्य किसीमें हुई नहीं, होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। मनुष्यमें आंशिकरूपसे वह सामर्थ्य निष्काम होनेसे आती है। कारण कि कामना होनेसे शक्तिका क्षय होता है और निष्काम होनेसे शक्तिका संचय होता है।

आदमी काम करते-करते थक जाता है तो विश्राम करनेसे फिर काम करनेकी शक्ति आ जाती है, बोलते-बोलते थक जाता है तो चुप होनेसे फिर बोलनेकी शक्ति आ जाती है। जीते-जीते आदमी मर जाता है तो फिर जीनेकी शक्ति आ जाती है। सर्गमें शक्ति क्षीण होती है और प्रलयमें शक्तिका संचय होता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्रकृतिके सम्बन्धसे शक्ति क्षीण होती है और उससे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर महान् शक्ति आ जाती है।

यो वेति तत्त्वतः ’—विभूति और योगको तत्त्वसे जाननेका तात्पर्य है कि संसारमें कारणरूपसे मेरा जो कुछ प्रभाव, सामर्थ्य है और उससे कार्यरूपमें प्रकट होनेवाली जितनी विशेषताएँ हैं अर्थात् वस्तु, व्यक्ति आदिमें जो कुछ विशेषता दीखनेमें आती है, प्राणियोंके अन्तःकरणमें प्रकट होनेवाले जितने भाव हैं और प्रभावशाली व्यक्तियोंमें ज्ञान-दृष्टिसे, विवेक-दृष्टिसे तथा संसारकी उत्पत्ति और संचालनकी दृष्टिसे जो कुछ विलक्षणता है, उन सबके मूलमें मैं ही हूँ और मैं ही सबका आदि हूँ। इस प्रकार जो मेरेको समझ लेता है, तत्त्वसे ठीक मान लेता है, तो फिर वह उन सब विलक्षणताओंके मूलमें केवल मेरेको ही देखता है। उसका भाव केवल मेरेमें ही होता है, व्यक्तियों, वस्तुओंकी विशेषताओंमें नहीं। जैसे, सुनारकी दृष्टि गहनोंपर जाती है तो गहनोंके नाम, आकृति, उपयोगपर दृष्टि रहते हुए भी भीतर यह भाव रहता है कि तत्त्वसे यह सब सोना ही है। ऐसे ही जहाँ-कहीं जो कुछ भी विशेषता दीखे, उसमें दृष्टि भगवान्पर ही जानी चाहिये कि उसमें जो कुछ विशेषता है, वह भगवान्की ही है; वस्तु, व्यक्ति, क्रिया

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

७०३

आदिकी नहीं।

संसारमें क्रिया और पदार्थ निरन्तर परिवर्तनशील हैं। इनमें जो कुछ विशेषता दीखती है, वह स्थायीरूपसे व्यापक परमात्माकी ही है। जहाँ-जहाँ विलक्षणता, अलौकिकता आदि दीखे, वहाँ-वहाँ वस्तु, व्यक्ति आदिकी ही विलक्षणता माननेसे मनुष्य उसीमें उलझ जाता है और मिलता कुछ नहीं। कारण कि वस्तुओंमें जो विलक्षणता दीखती है, वह उस अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्वकी ही झलक है, परिवर्तनशील वस्तुकी नहीं। इस प्रकार उस मूल तत्त्वकी तरफ दृष्टि जाना ही उसे तत्त्वसे जानना अर्थात् श्रद्धासे दृढ़तापूर्वक मानना है।

यहाँ जो विभूतियोंका वर्णन किया गया है, इसका तात्पर्य इनमें परिपूर्णरूपसे व्यापक परमात्माके ऐश्वर्यसे है। विभूतियोंके रूपमें प्रकट होनेवाला मात्र ऐश्वर्य परमात्माका है। वह ऐश्वर्य प्रकट हुआ है परमात्माकी योगशक्तिये। इसलिये जिस-किसीमें जहाँ-कहीं विलक्षणता दिखायी दे, वह विलक्षणता भगवान्की योगशक्तिये प्रकट हुए ऐश्वर्य-(विभूति-) की ही है, न कि उस वस्तुकी। इस प्रकार योग और विभूति परमात्माकी हुई तथा उस योग और

परिशिष्ट भाव —संसारमें जो कुछ विलक्षणता (विशेषता) देखनेमें आती है, वह सब भगवान्का ‘योग’ अर्थात् विलक्षण प्रभाव, सामर्थ्य है। उस विलक्षण प्रभावसे प्रकट होनेवाली विशेषता ‘विभूति’ है—इस प्रकार जो मनुष्य भगवान्की विभूति और योगको तत्त्वसे जान लेता है, उसकी भगवान्में दृढ़ भक्ति हो जाती है। एक भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता है ही नहीं—ऐसा सन्देहरहित दृढ़तापूर्वक स्वीकार कर लेना ही तत्त्वसे जानना है। इस प्रकार तत्त्वसे जाननेवालेको भगवान्ने ‘ज्ञानान्’ कहा है (गीता—सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)।

‘अविकम्प (अविचल) योग’ कहनेका तात्पर्य है कि वह भक्तियोग खुद भी नहीं हिलता और उसको कोई हिला भी नहीं सकता; क्योंकि इसमें एक भगवान्के सिवाय दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है।

जैसे रुप्योंसे सब वस्तुएँ मिल जाती हैं—ऐसा मानकर साधारण मनुष्य रुप्योंको ही महत्व देता है और उसका रुप्योंमें आकर्षण हो जाता है। ऐसे ही जो कुछ प्रभाव, महत्व दीखता है, वह सब भगवान्का ही है—ऐसा जाननेपर मनुष्यकी भगवान्में ही दृढ़ भक्ति हो जाती है।

‘नात्र संशयः’ कहनेका तात्पर्य है कि जब भगवान्के सिवाय दूसरी सत्ता ही नहीं है तो फिर इसमें संशय कैसे हो?

  • भक्तिका प्रकरण होनेसे यहाँ ‘तत्त्वतः वेत्ति’ (तत्त्वतः जानना) का अर्थ ‘तत्त्वतः मानना’ ही लेना चाहिये। कारण कि यहाँ भगवान्ने ‘तत्त्वतः वेत्ति’ का फल अपनेमें दृढ़ भक्ति होना बताया है और आगेके श्लोकमें भी ‘संसारमात्रका मूल कारण मैं ही हूँ और सब संसार मेरेसे ही चेष्टा करता है’ ऐसा मानकर (इति मत्वा) भजन करनेकी बात कही है।

जैसे जानना दृढ़ होता है, ऐसे ही मानना भी दृढ़ होता है अर्थात् दृढ़ मान्यता तत्त्वज्ञानकी तरह ही फल देती है। जैसे, ‘मैं हिन्दू हूँ’ ‘मैं अमुक वर्णवाला हूँ’ आदि मान्यताओंको जबतक स्वयं नहीं छोड़ता, तबतक ये मान्यताएँ छूटती नहीं। इसी तरह ‘इन सब विभूतियोंके मूलमें भगवान् ही हैं, यह मान्यता कभी मिटती नहीं। वर्ण, सम्प्रदाय आदिकी मान्यता सच्ची नहीं है, प्रत्युत शरीरको लेकर होनेसे प्राकृत है और मिटनेवाली है। परन्तु सबके मूलमें परमात्मा है’ यह मान्यता सच्ची है, वास्तविक है। अतः यह मान्यता कभी मिटती नहीं, प्रत्युत ज्ञान (तत्त्वसे जानना) में परिणत होकर ज्ञानस्वरूप हो जाती है।

विभूतिको तत्त्वसे जाननेका तात्पर्य यह हुआ कि उसमें विलक्षणता परमात्माकी है। अतः द्रष्टाकी दृष्टि केवल उस परमात्माकी तरफ ही जानी चाहिये। यही इनको तत्त्वसे जानना अर्थात् मानना है।*

‘सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते’ —उसकी मेरेमें दृढ़ भक्ति हो जाती है। दृढ़ कहनेका तात्पर्य है कि उसकी मेरे सिवाय कहीं भी किंचिन्मात्र भी महत्त्वबुद्धि नहीं होती। अतः उसका आकर्षण दूसरेमें न होकर एक मेरेमें ही होता है।

‘नात्र संशयः’ —इसमें कोई संदेहकी बात नहीं—ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि अगर उसको कहीं भी किंचिन्मात्र भी संदेह होता है तो उसने मेरेको तत्त्वसे नहीं माना है। कारण कि उसने मेरे योगको अर्थात् विलक्षण प्रभावको और उससे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंको (ऐश्वर्यको) मेरेसे अलग मानकर महत्व दिया है।

मेरेको तत्त्वसे जान लेनेके बाद उसके सामने लौकिक दृष्टिये किसी तरहकी विलक्षणता आ जाय, तो वह उसपर प्रभाव नहीं डाल सकेगी। उसकी दृष्टि उस विलक्षणताकी तरफ न जाकर मेरी तरफ ही जायगी। अतः उसकी मेरेमें स्वाभाविक ही दृढ़ भक्ति होती है।

७०४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

इसमें संशय होनेका अवकाश ही नहीं है; क्योंकि जहाँ दो सत्ता होती है, वहीं संशय होता है। एक भगवान्के सिवाय और कोई है ही नहीं तो फिर वृत्ति कहाँ जायगी, क्यों जायगी, किसमें जायगी और कैसे जायगी? इसलिये एक भगवान्में ही अविचल भक्ति हो जाती है—इसमें सन्देह नहीं है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जाननेवाला अविचल भक्तिसे युक्त हो जाता है। अतः विभूति और योगको तत्त्वसे जानना क्या है? इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥ ८ ॥

अहम्= मैंप्रवर्तते= प्रवृत्त हो रहा हैप्रेम रखते हुए
सर्वस्य= संसारमात्रकाअर्थात् चेष्टा करबुधाः = बुद्धिमान् भक्त
प्रभवः= प्रभव (मूल कारण)रहा है—माम् = मेरा ही
हूँ,इति= ऐसाभजन्ते = भजन करते हैं—
मत्तः= (और) मुझसे हीमत्वा= मानकरसब प्रकारसे मेरे
सर्वम्= सारा संसारभावसमन्विताः= मुझमें ही श्रद्धा-ही शरण होते हैं।

व्याख्या—[पूर्व श्लोककी बात ही इस श्लोकमें कही गयी है। 'अहं सर्वस्य प्रभवः' में 'सर्वस्य' भगवान्की विभूति है अर्थात् देखने, सुनने, समझनेमें जो कुछ आ रहा है, वह सब-की-सब भगवान्की विभूति ही है। 'मत्तः सर्वं प्रवर्तते' में 'मत्तः' भगवान्का योग (प्रभाव) है, जिससे सभी विभूतियाँ प्रकट होती हैं। सातवें, आठवें और नवें अध्यायमें जो कुछ कहा गया है, वह सब-का-सब इस श्लोकके पूर्वार्धमें आ गया है।]

'अहं सर्वस्य प्रभवः'—मानस, नादज, बिन्दुज, उद्भिज्ज, जरायुज, अण्डज, स्वेदज अर्थात् जड-चेतन, स्थावर-जंगम यावन्मात्र जितने प्राणी पैदा होते हैं, उन सबकी उत्पत्तिके मूलमें परमपिता परमेश्वरके रूपमें मैं ही हूँ।* यहाँ 'प्रभव' का तात्पर्य है कि मैं सबका 'अभिन्न-निमितोपादानकारण' हूँ अर्थात् स्वयं मैं ही सृष्टिरूपसे प्रकट हुआ हूँ।

'मत्तः सर्वं प्रवर्तते'—संसारमें उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, पालन, संरक्षण आदि जितनी भी चेष्टाएँ होती हैं, जितने भी कार्य होते हैं, वे सब मेरेसे ही होते हैं। मूलमें उनको सत्ता-स्फूर्ति आदि जो कुछ मिलता है, वह सब मेरेसे ही मिलता है। जैसे बिजलीकी शक्तिसे सब कार्य होते हैं, ऐसे

ही संसारमें जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका मूल कारण मैं ही हूँ।

'अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते'—कहनेका तात्पर्य है कि साधककी दृष्टि प्राणिमात्रके भाव, आचरण, क्रिया आदिकी तरफ न जाकर उन सबके मूलमें स्थित भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये। कार्य, कारण, भाव, क्रिया, वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदिके मूलमें जो तत्त्व है, उसकी तरफ ही भक्तोंकी दृष्टि रहनी चाहिये।

सातवें अध्यायके सातवें तथा बारहवें श्लोकमें और दसवें अध्यायके पाँचवें और इस (आठवें) श्लोकमें 'मत्तः' पद बार-बार कहनेका तात्पर्य है कि ये भाव, क्रिया, व्यक्ति आदि सब भगवान्से ही पैदा होते हैं, भगवान्में ही स्थित रहते हैं और भगवान्में लीन हो जाते हैं। अतः तत्त्वसे सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है—इस बातको जान लें अथवा मान लें, तो भगवान्के साथ अविकम्प (कभी विचलित न किया जानेवाला) योग अर्थात् सम्बन्ध हो जायगा।

यहाँ 'सर्वस्य' और 'सर्वम्'—दो बार 'सर्व' पद देनेका तात्पर्य है कि भगवान्के सिवाय इस सृष्टिका न कोई उत्पादक है और न कोई संचालक है। इस सृष्टिके उत्पादक

  • जैसे सातवें अध्यायके छठे श्लोकमें भगवान्ने अपनेको अपरा और परा प्रकृतिका कारण बताया है और चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें अपनेको बीज प्रदान करनेवाला पिता बताया है, ऐसे ही यहाँ भगवान्ने अपनेको सबका उत्पादक बताया है।

श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७०५

और संचालक केवल भगवान् ही हैं।

‘इति मत्वा भावसमन्विताः’ —भगवान्से ही सब संसारकी उत्पत्ति होती है और सारे संसारको सत्ता-स्फूर्ति भगवान्से ही मिलती है अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा जो दृढ़तासे मान लेते हैं, वे ‘भगवान् ही सर्वोपरि हैं; भगवान्के समान कोई हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं तथा होना सम्भव भी नहीं’—ऐसे सर्वोच्च भावसे युक्त हो जाते हैं। इस प्रकार जब उनकी महत्त्वबुद्धि केवल भगवान्में हो जाती है तो फिर उनका आकर्षण, श्रद्धा, विश्वास, प्रेम आदि सब भगवान्में ही हो जाते हैं। भगवान्का ही आश्रय लेनेसे उनमें समता, निर्विकारता, निःशोकता, निश्चिन्तता, निभंयता आदि स्वतःस्वाभाविक ही आ जाते हैं। कारण कि जहाँ देव (परमात्मा) होते हैं, वहाँ दैवी-सम्पत्ति स्वाभाविक ही आ जाती है।

‘बुधाः’ —भगवान्के सिवाय अन्यकी सत्ता ही न मानना, भगवान्को ही सबके मूलमें मानना, भगवान्का ही आश्रय लेकर उनमें ही श्रद्धा-प्रेम करना—यही उनकी बुद्धिमानी है। इसलिये उनको बुद्धिमान् कहा गया है। इसी बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें कहा है कि जो मेरेको क्षर-(संसारमात्र-) से अतीत और अक्षर-(जीवात्मा-) से उत्तम जानता है, वह सर्ववित् है और सर्वभावसे मेरा ही भजन करता है।

‘माम् भजन्ते’ —भगवान्के नामका जप-कीर्तन करना, भगवान्के रूपका चिन्तन-ध्यान करना, भगवान्की कथा

परिशिष्ट भाव —लोग रुपयोंको इसलिये बहुत महत्त्व देते हैं कि उनसे सब वस्तुएँ मिल सकती हैं। रुपयोंसे तो वस्तुएँ मिलती हैं, पैदा नहीं होतीं, पर भगवान्से सम्पूर्ण वस्तुएँ पैदा भी होती हैं और मिलती भी हैं! इस प्रकार जो भगवान्के महत्त्वको जान लेते हैं, वे तुच्छ रुपयोंके लोभमें न फँसकर भगवान्के ही भजनमें लग जाते हैं—‘स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत’ (गीता १५।१९)।

भगवान् कहते हैं कि पदार्थ और व्यक्ति भी मेरेसे होते हैं (अहं सर्वस्य प्रभवः) और क्रियाएँ भी मेरेसे होती हैं (मत्तः सर्वं प्रवर्तते)। परन्तु जीव पदार्थों और क्रियाओंसे सम्बन्ध जोड़कर, उनको अपना मानकर, उनका भोक्ता और कर्ता बनकर बँध जाता है। भोक्ता बननेसे पदार्थ बन्धनकारक हो जाते हैं और कर्ता बननेसे क्रियाएँ बन्धनकारक हो जाती हैं। अगर जीव भोक्ता और कर्ता न बने तो बन्धन है ही नहीं।

संसारमें जो भी प्रभाव देखनेमें आता है, वह सब भगवान्का ही है—यह बात भगवान्ने गीतामें ‘मत्तः’ पदसे कई जगह कही है; जैसे—

‘मत्तः परतरं नात्यक्तिकिंचिदस्ति’ (७।७)

‘मेरे सिवाय इस संसारका दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी कारण तथा कार्य नहीं है।’

‘मत्त एवेति तान्विद्धि’ (७।१२)

‘ये (सात्त्विक, राजस और तामस) भाव मुझसे ही होते हैं—ऐसा उनको समझो।’

‘भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः’ (१०।५)

‘प्राणियोंके ये (बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह आदि) अनेक प्रकारके अलग-अलग भाव मुझसे ही होते हैं।’

सुनना, भगवत्सम्बन्धी ग्रन्थों-(गीता, रामायण, भागवत आदि) का पठन-पाठन करना—ये सब-के-सब भजन हैं। परन्तु असली भजन तो वह है, जिसमें हृदय भगवान्की तरफ ही खिंच जाता है, केवल भगवान् ही प्यारे लगते हैं, भगवान्की विस्मृति चुभती है, बुरी लगती है। इस प्रकार भगवान्में तल्लीन होना ही असली भजन है।

विशेष बात

सबके मूलमें परमात्मा है और परमात्मासे ही वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, घटना आदि सबको सत्ता-स्फूर्ति मिलती है—ऐसा ज्ञान होना परमात्माप्राप्ति चाहनेवाले सभी साधकोंके लिये बहुत आवश्यक है। कारण कि जब सबके मूलमें परमात्मा ही है, तब साधकका लक्ष्य भी परमात्माकी तरफ ही होना चाहिये। उस परमात्माकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही सम्पूर्ण विभूतियों और योगके ज्ञानका तात्पर्य है। यही बात गीतामें जगह-जगह बतायी गयी है; जैसे—जिससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्तव्य-कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये (अठारहवें अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक); जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें विराजमान है और जो सब प्राणियोंको प्रेरणा देता है, उस परमात्माकी सर्वभावसे शरण जाना चाहिये (अठारहवें अध्यायका इकसठवाँ-बासठवाँ श्लोक); इत्यादि। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये साधन तो अपनी-अपनी रूचिके अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, पर उपर्युक्त ज्ञान सभी साधकोंके लिये बहुत ही आवश्यक है।

७०६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १०

‘मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च’ (१५।१५)

‘मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषोंका नाश) होता है।’

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें उन भक्तोंका भजन किस रीतिसे होता है—यह बताते हैं।

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ ९॥

मच्चित्ताः = मुझमें चित्तवाले

मद्गतप्राणाः = मुझमें प्राणोंको अर्पण

करनेवाले

(भक्तजन)

परस्परम् = आपसमें

बोधयन्तः = (मेरे गुण, प्रभाव

आदिको) जनाते

हुए

च = और

कथयन्तः = उनका कथन करते

हुए

नित्यम् = नित्य-निरन्तर

तुष्यन्ति = सन्तुष्ट रहते हैं

च = और

माम् = मुझमें

च = ही

रमन्ति = प्रेम

करते हैं।

व्याख्या—[इस श्लोकमें छ: बातें हैं। उनमेंसे

‘मच्चित्ताः’ और ‘मद्गतप्राणाः’ ये दो बातें स्वयं

करनेकी हैं अर्थात् भक्त स्वयं स्वतन्त्रतापूर्वक ऐसे बन जाते

हैं, ‘बोधयन्तः’ और ‘कथयन्तः’—ये दो बातें आपसमें

मिलनेपर होती हैं तथा ‘तुष्यन्ति और रमन्ति’—ये दो

बातें फलरूपमें होती हैं।

भगवान्से ही सब उत्पन्न हुए हैं और भगवान्से ही

सबकी चेष्टा हो रही है अर्थात् सबके मूलमें परमात्मा है—

यह बात जिनको दृढ़तासे और निःसन्देहपूर्वक जँच गयी

है, उनके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी

नहीं रहता। बस, उनका एक ही काम रहता है—सब

प्रकारसे भगवान्में ही लगे रहना। यही बात इस श्लोकमें

बतायी गयी है।]

‘मच्चित्ताः’—वे मेरेमें चित्तवाले हैं। एक स्वयंका

भगवान्में लगना होता है और एक चित्तको भगवान्में

लगाना होता है। जहाँ ‘मैं भगवान्का हूँ’ ऐसे स्वयं

भगवान्में लग जाता है, वहाँ चित्त, बुद्धि आदि सब स्वतः

भगवान्में लग जाते हैं। कारण कि कर्ता-(स्वयं-) के

लगनेपर करण (मन, बुद्धि आदि) अलग थोड़े ही रहेंगे!

वे भी लग जायँगे। करणोंके लगनेपर तो कर्ता अलग रह

सकता है, पर कर्ताके लगनेपर करण अलग नहीं रह

सकते। जहाँ कर्ता रहेगा, वहीं करण भी रहेंगे। कारण कि

करण कर्ताके ही अधीन होते हैं। कर्ता स्वयं जहाँ लगता

है, करण भी वहीं लगते हैं। जैसे, कोई मनुष्य परमात्माप्राप्तिके

लिये सच्चे हृदयसे साधक बन जाता है, तो साधनमें उसका

मन स्वतः लगता है। उसका मन साधनके सिवाय अन्य

किसी कार्यमें नहीं लगता और जिस कार्यमें लगता है, वह

कार्य भगवान्का ही होता है। कारण कि स्वयं कर्ताके

विपरीत मन-बुद्धि आदि नहीं चलते। परन्तु जहाँ स्वयं

भगवान्में नहीं लगता, प्रत्युत ‘मैं तो संसारी हूँ’, ‘मैं तो

गृहस्थ हूँ’—इस प्रकार स्वयंको संसारमें लगाकर चित्तको

भगवान्में लगाना चाहता है, उसका चित्त भगवान्में निरन्तर

नहीं लगता। तात्पर्य है कि स्वयं तो संसारी बने रहे और

चित्तको भगवान्में लगाना चाहे, तो भगवान्में चित्त लगना

असम्भव-सा है।

दूसरी बात, चित्त वहीं लगता है, जहाँ प्रियता होती

है। प्रियता वहीं होती है, जहाँ अपनापन होता है, आत्मीयता

होती है। अपनापन होता है—भगवान्के साथ स्वयंका

सम्बन्ध जोड़नेसे। ‘मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल

भगवान् ही मेरे हैं, शरीर-संसार मेरा नहीं है। मेरेपर प्रभुका

पूरा अधिकार है, इसलिये वे मेरे प्रति चाहे जैसा बर्ताव

या विधान कर सकते हैं। परन्तु मेरा प्रभुपर कोई अधिकार

नहीं है अर्थात् वे मेरे हैं तो मैं जैसा चाहूँ, वे वैसा ही करें—

ऐसा कोई अधिकार नहीं है’—इस प्रकार जो स्वयंको

भगवान्का मान लेता है, अपने-आपको भगवान्के अर्पित

कर देता है, उसका चित्त स्वतः भगवान्में लग जाता है।

ऐसे भक्तोंको ही यहाँ ‘मच्चित्ताः’ कहा गया है।

यहाँ ‘मच्चित्ताः’ पदमें चित्तके अन्तर्गत ही मन है

अर्थात् मनोवृत्ति अलग नहीं है। गीतामें चित्त और मनको

एक भी कहा है और अलग-अलग भी; जैसे ‘भूमिरापोऽनलो

वायु: खं मनो बुद्धिरैव च’ (७।४)—यहाँ मनके

अन्तर्गत ही चित्त है और ‘मन: संयम्य मच्चित्त:’