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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 701

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

सभी लीलाएँ एक ही रामायणके अंग हैं तथा इन अंगोंसे रामायण सांगोपांग होती है। ऐसे ही संसारमें प्राणियोंके तरह-तरहके भाव हैं, क्रियाएँ हैं। कहींपर कोई हैस रहा है तो कहींपर कोई रो रहा है, कहींपर विद्वदगोष्ठी हो रही है तो कहींपर आपसमें लड़ाई हो रही है, कोई जन्म ले

परिशिष्ट भाव —ज्ञानकी दृष्टिसे तो सभी भाव प्रकृतिसे होते हैं, पर भक्तिकी दृष्टिसे सभी भाव भगवान्से होते हैं। अगर इन भावोंको जीवका मानें तो जीव भी भगवान्की ही परा प्रकृति होनेसे भगवान्से अभिन्न है; अतः ये भाव भगवान्के ही हुए। भगवान्में तो ये भाव निरन्तर रहते हैं, पर जीवमें अपराके संगसे आते-जाते रहते हैं। भगवान्से उत्पन्न होनेके कारण सभी भाव भगवत्स्वरूप ही हैं।

‘पृथग्विधाः’ कहनेका तात्पर्य है कि जैसे हाथ एक ही होता है, पर उसमें अँगुलियाँ अलग-अलग होती हैं, ऐसे ही भगवान् एक ही हैं, पर उनसे प्रकट होनेवाले भाव अलग-अलग हैं। एक ही भगवान्में अनेक प्रकारके परस्परविरुद्ध भाव एक साथ रहते हैं!

महर्षयः सप्त पूर्व चत्वारो मनवस्तथा।

मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥ ६ ॥

सप्त= सातमनवः= चौदह मनु (—ये सब-के-सब)येषाम्= जिनकी
महर्षयः= महर्षि (और)मानसाः= (मेरे) मनसेलोके= संसारमें
पूर्व= उनसे भी पहले होनेवालेजाताः= पैदा हुए हैं (और)इमाः= यह
चत्वारः= चार सनकादिमद्भावाः= मुझमें भाव (श्रद्धा-भक्ति) रखनेवाले हैं,प्रजाः= सम्पूर्ण प्रजा है।
तथा= तथा

व्याख्या —[पीछेके दो श्लोकोंमें भगवान्ने प्राणियोंके भाव-रूपसे बीस विभूतियाँ बतायीं। अब इस श्लोकमें व्यक्ति-रूपसे पचीस विभूतियाँ बता रहे हैं, जो कि प्राणियोंमें विशेष प्रभावशाली और जगत्की कारण हैं।]

‘महर्षयः सप्त’ —जो दीर्घ आयुवाले; मन्त्रोंको प्रकट करनेवाले; ऐश्वर्यवान्; दिव्य दृष्टिवाले; गुण, विद्या आदिसे वृद्ध; धर्मका साक्षात् करनेवाले और गोत्रोंके प्रवर्तक हैं—ऐसे सातों गुणोंसे युक्त ऋषि सप्तर्षि कहे जाते हैं। मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु और वसिष्ठ—ये सातों ऋषि उपर्युक्त सातों ही गुणोंसे युक्त हैं। ये सातों ही वेदवेत्ता हैं, वेदोंके आचार्य माने गये हैं, प्रवृत्ति-

रहा है तो कोई मर रहा है, आदि-आदि जो विविध भाँतिकी चेष्टाएँ हो रही हैं, वे सब भगवान्की लीलाएँ हैं। लीलाएँ करनेवाले ये सब भगवान्के रूप हैं। इस प्रकार भक्तकी दृष्टि हृदय भगवान्पर ही रहनी चाहिये; क्योंकि इन सबके मूलमें एक परमात्मतत्व ही है।

धर्मका संचालन करनेवाले हैं और प्रजापतिके कार्यमें नियुक्त किये गये हैं। इन्हीं सात ऋषियोंको यहाँ ‘महर्षि’ कहा गया है।

‘पूर्व चत्वारः’ —सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—ये चारों ही ब्रह्माजीके तप करनेपर सबसे पहले प्रकट हुए हैं। ये चारों भगवत्स्वरूप हैं। सबसे पहले प्रकट होनेपर भी ये चारों सदा पाँच वर्षकी अवस्थावाले बालकरूपमें ही रहते हैं। ये तीनों लोकोंमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्यका प्रचार करते हुए घूमते रहते हैं। इनकी वाणीसे सदा ‘हरिः शरणम्’ का उच्चारण होता रहता है। ये भगवत्कथाके बहुत प्रेमी हैं। अतः इन चारोंमेंसे एक वक्ता

१-सप्तैते सप्तभिश्चैव गुणैः सप्तर्षयः स्मृताः ॥

दीर्घायुषो मन्त्रकृत ईश्वरो दिव्यचक्षुषः। वृद्धाः प्रत्यक्षधर्माणो गोत्रप्रवर्तकाश्च ये ॥ (वायुपुराण ६१।१३-१४)

२-मरीचिरांगिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः ऋतुः। वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥

एते वेदविदो मुख्या वेदाचार्याश्च कल्पिताः। प्रवृत्तिधर्मिणश्चैव प्राजापत्ये च कल्पिताः ॥

(महा०, शान्तिपर्व ३४७।६९-७०)

३-हरिः शरणमेवं हि नित्यं येषां मुखे वचः। (पद्मपुराणोक्त श्रीमद्भगवत-माहात्म्य २।४८)