श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 702, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ७]
- साधक-संजीवनी *
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और तीन श्रोता बनकर भगवत्कथा करते और सुनते रहते हैं।
'मनवस्तथा' —ब्रह्माजीके एक दिन-(कल्प-) में चौदह मनु होते हैं। ब्रह्माजीके वर्तमान कल्पके स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सार्वणि, दक्षसार्वणि, ब्रह्मसार्वणि, धर्मसार्वणि, रुद्रसार्वणि, देवसार्वणि और इन्द्रसार्वणि नामवाले चौदह मनु हैं*। ये सभी ब्रह्माजीकी आज्ञासे सृष्टिके उत्पादक और प्रवर्तक हैं।
'मानसा जाताः' —मात्र सृष्टि भगवान्के संकल्पसे पैदा होती है। परन्तु यहाँ सप्तर्षि आदिको भगवान्के मनसे पैदा हुआ कहा है। इसका कारण यह है कि सृष्टिका विस्तार करनेवाले होनेसे सृष्टिमें इनकी प्रधानता है। दूसरा कारण यह है कि ये सभी ब्रह्माजीके मनसे अर्थात् संकल्पसे पैदा हुए हैं। स्वयं भगवान् ही सृष्टि-रचनाके लिये ब्रह्मारूपसे प्रकट हुए हैं। अतः सात महर्षि, चार सनकादि और चौदह मनु—इन पचीसोंको ब्रह्माजीके मानसपुत्र कहें अथवा भगवान्के मानसपुत्र कहें, एक ही
परिशिष्ट भाव —सात महर्षि, चार सनकादि तथा भगवान्से अभिन्न हैं।
बात है।
'मद्भावाः' —ये सभी मेरेमें ही भाव अर्थात् श्रद्धा-प्रेम रखनेवाले हैं।
'येषां लोकमिमाः प्रजाः' —संसारमें दो तरहकी प्रजा हैं—स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली और शब्दसे (दीक्षा, मन्त्र, उपदेश आदिसे) उत्पन्न होनेवाली। संयोगसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा 'बिन्दुज' कहलाती है और शब्दसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा 'नादज' कहलाती है। बिन्दुज प्रजा पुत्र-परम्परासे और नादज प्रजा शिष्य-परम्परासे चलती है।
सप्तर्षियों और चौदह मनुओंने तो विवाह किया था; अतः उनसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा 'बिन्दुज' है। परन्तु सनकादिकोने विवाह किया ही नहीं; अतः उनसे उपदेश प्राप्त करके पारमार्थिक मार्गमें लगनेवाली प्रजा 'नादज' है। निवृत्तिपरायण होनेवाले जितने सन्त-महापुरुष पहले हुए हैं, अभी हैं और आगे होंगे, वे सब उपलक्षणसे उनकी ही नादज प्रजा हैं।
चौदह मनु—ये सब भगवान्के मनसे पैदा होनेके कारण
सम्बन्ध—चौथेसे छठे श्लोकतक प्राणियोंके भावों तथा व्यक्तियोंके रूपमें अपनी विभूतियोंका और अपने योग-(प्रभाव-) का वर्णन करके अब भगवान् आगेके श्लोकमें उनको तत्त्वसे जाननेका फल बताते हैं।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥७॥
| यः | = जो मनुष्य | तत्त्वतः | = तत्त्वसे | अविकम्पेन | = अविचल |
|---|---|---|---|---|---|
| मम | = मेरी | वेत्ति | = जानता है अर्थात् | योगेन | = भक्तियोगसे |
| एताम् | = इस | दृढ़तापूर्वक (सन्देह- | युज्यते | = युक्त हो जाता है; | |
| विभूतिम् | = विभूतिको | रहित) स्वीकार कर | अत्र | = इसमें (कुछ भी) | |
| च | = और | लेता है, | संशयः | = संशय | |
| योगम् | = योग-(सामर्थ्य-)को | सः | = वह | न | = नहीं है। |
व्याख्या —'एतां विभूतिं योगं च मम'—'एताम्' सर्वनाम अत्यन्त समीपका लक्ष्य करता है। यहाँ यह शब्द चौथेसे छठे श्लोकतक कही हुई विभूति और योगका लक्ष्य करता है।
'विभूति' नाम भगवान्के ऐश्वर्यका है और 'योग' नाम भगवान्की अलौकिक विलक्षण शक्ति, अनन्त सामर्थ्यका है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्की शक्तिका नाम 'योग' है और उस योगसे प्रकट होनेवाली विशेषताओंका नाम
- (श्रीमद्भागवतके आठवें स्कन्धके पहले, पाँचवें और तेरहवें अध्यायमें इनका विस्तारसे वर्णन आया है।)
ब्रह्माजीका एक दिन एक हजार चतुर्वर्गीका होता है। उसमें एक मनुका राज्य इकहत्तर चतुर्वर्गीसे कुछ ज्यादा समयका माना गया है। इस समय ब्रह्माजीकी आयुका इक्यावनवाँ वर्ष चल रहा है और इसमें सातवें मनु 'वैवस्वत' का राज्य चल रहा है।