श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ सार ]
अविधिपूर्वक होती है। इसलिये उनका पतन हो जाता है अर्थात् वे जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं (नवें अध्यायका तेईसवाँ-चौबीसवाँ श्लोक)। परन्तु भगवान्की उपासना करनेवाले भगवान्को ही प्राप्त होते हैं।
जो लोग भगवान्को छोड़कर अन्य देवी-देवताओंकी उपासना करते हैं, उनको अनेक नियमों, विधियों आदिकी जरूरत पड़ती है, जिसमें बड़ी कठिनाता होती है। परन्तु भगवान्की उपासनामें भावकी जरूरत है, क्रियाओं-(नियमों, विधियों आदि-) की जरूरत नहीं है (नवें अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ श्लोक)। भगवान् क्रियाग्राही नहीं हैं, प्रत्युत भावग्राही हैं—‘भावग्राही जनार्दनः ’। इसलिये भक्तको सुगमतापूर्वक भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। इतना ही नहीं, मनुष्य किसी भी आचरण, वर्ण, आश्रम, जाति आदिका क्यों न हो, वह भगवान्का भक्त होकर सुगमतापूर्वक भगवान्को प्राप्त हो सकता है (नवें अध्यायके तीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक)।
नवें अध्यायके अन्तमें भगवान् कहते हैं—‘ममना भव० ’ (९।३४)। इसका तात्पर्य है कि जो कुछ भी है, वह मैं ही हूँ, मेरे सिवाय और कुछ है ही नहीं (सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। इस बातको दृढ़तासे स्वीकार करना ही ‘ममना भव० ’ आदि पदोंका तात्पर्य है।
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