श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 694, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ दशमोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान् सातवें अध्यायमें अपने हृदयकी बात—विज्ञानसहित ज्ञान कह रहे थे। जब बीचमें ही आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर अपनी बात कहनेमें कुछ परिवर्तन हुआ, तब भगवान्ने पुनः विज्ञानसहित ज्ञान कहनेके लिये नवें अध्यायका विषय आरम्भ किया और उसकी समाप्ति भगवत्परायणतामें की। फिर भी भगवान्के मनमें और कहनेका भाव रहा। उन्हें अपने कथनपर संतोष नहीं हुआ। जैसे भक्तको भगवान्की बात सुनते हुए तृप्ति नहीं होती (गीता—दसवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), ऐसे ही अपने प्यारे भक्त अर्जुनके प्रति अपने हृदयकी बात कहते-कहते भगवान्को तृप्ति नहीं हो रही है। कारण कि भगवान्के हृदयकी गोपनीय बात भक्तके सिवाय संसारमें और कोई सुननेवाला नहीं है। अतः भगवान् अर्जुनके बिना पूछे ही कृपापूर्वक दसवें अध्यायका विषय आरम्भ कर देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
महाबाहो = हे महाबाहो अर्जुन!
मे = मेरे
परमम् = परम
वचः = वचनको (तुम)
भूयः = फिर
एव = भी
श्रृणु = सुनो,
यत् = जिसे
अहम् = मैं
प्रीयमाणाय = मुझमें अत्यन्त प्रेम रखनेवाले
ते = तुम्हारे लिये
हितकाम्यया = हितकी कामनासे
वक्ष्यामि = कहूँगा।
व्याख्या—'भूय एव'—भगवान्की विभूतियोंको तत्त्वसे जाननेपर भगवान्में भक्ति होती है, प्रेम होता है। इसलिये कृपावश होकर भगवान्ने सातवें अध्यायमें (आठवें श्लोकसे बारहवें श्लोकतक) कारणरूपसे सत्रह विभूतियाँ और नवें अध्यायमें (सोलहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक) कार्य-कारणरूपसे सैंतीस विभूतियाँ बतायीं। अब यहाँ और भी विभूतियाँ बतानेके लिये तथा (गीता—आठवें अध्यायके चौदहवें एवं नवें अध्यायके बाईसवें तथा चौंतीसवें श्लोकमें कही हुई) भक्तिका और भी विशेषतासे वर्णन करने लिये भगवान् 'भूय एव' कहते हैं।
'श्रृणु मे परमं वचः'—भगवान्के मनमें अपनी महिमाकी बात, अपने हृदयकी बात, अपने प्रभावकी बात कहनेकी विशेष आ रही है। इसलिये वे अर्जुनसे कहते हैं कि 'तू फिर मेरे परम वचनको सुन'।
दूसरा भाव यह है कि भगवान् जहाँ-जहाँ अर्जुनको अपनी विशेष महत्ता, प्रभाव, ऐश्वर्य आदि बताते हैं अर्थात् अपने-आपको खोल करके बताते हैं, वहाँ-वहाँ वे परम वचन, रहस्य आदि शब्दोंका प्रयोग करते हैं; जैसे—चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें 'रहस्यं ह्येतदुत्तमम्' पदोंसे बताते
१-इस (दसवें) अध्यायमें भगवान्ने चौथेसे छठे श्लोकतक अपनी पैंतालीस विभूतियाँ बतायी हैं।
२-भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी तरफसे उन भक्तोंपर कृपा करके उनको ज्ञान दे देता हूँ—'तेषामेवानुकम्पार्थम्' (गीता १०।११)—यह भगवान्का परम वचन है।