श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवें अध्यायका सार
भगवान्ने सातवें अध्यायसे 'ज्ञान' और 'विज्ञान' का विषय कहना आरम्भ किया है। 'ज्ञान' से संसारसे मुक्ति होती है और 'विज्ञान' से भगवान्में प्रेम होता है। बीचमें अर्जुनके प्रश्न करनेपर आठवें अध्यायमें दूसरा विषय चला। परन्तु नवें अध्यायसे भगवान् पुनः वही विषय कहना आरम्भ करते हैं।
सातवें अध्यायमें भगवान्ने संसारकी उत्पत्तिका कारण बताया कि परा और अपरा—इन दोनों मेरी प्रकृतियोंके संयोगसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है (छठा श्लोक)। परन्तु नवें अध्यायमें संसारकी स्थिति बताते हैं कि जिनकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है, उन साधकोंके लिये संसार मेरेमें है और मैं संसारमें हूँ (चौथा, पाँचवाँ, छठा श्लोक)। इसीको छठे अध्यायमें कहा है—'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति' (६।३०)। परन्तु जिन सिद्ध महापुरुषोंकी दृष्टिमें संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, उनकी दृष्टिमें एक मैं-ही-मैं हूँ—'वासुदेवः सर्वम्'।
भगवान् कहते हैं कि यद्यपि सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला तथा धारण करनेवाला मैं ही हूँ, तथापि मैं उन प्राणियोंके आश्रित नहीं हूँ, प्रत्युत वे प्राणी ही मेरे आश्रित हैं (नवें अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। जैसे आकाशमें रहनेवाली वायु आकाशके आश्रित होती है, पर आकाश वायुके आश्रित नहीं होता, ऐसे ही परा और अपरा प्रकृति तो भगवान्का स्वभाव होनेसे भगवान्के आश्रित (अधीन) है, पर भगवान् परा और अपरा प्रकृतिके आश्रित नहीं हैं। इसलिये जैसे वायु आकाशसे ही उत्पन्न होती है, आकाशमें ही स्थित रहती है और आकाशमें ही लीन होती है, ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी महासर्गमें भगवान्से ही प्रकट होते हैं, भगवान्में ही स्थित रहते हैं और महाप्रलयमें भगवान्में ही लीन होते हैं (सातवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिके आश्रित हैं और प्रकृति भगवान्के आश्रित है (आठवाँ श्लोक)। दूसरे शब्दोंमें, भगवान्के एक अंशमें प्रकृति है और प्रकृतिके एक अंशमें प्राणी हैं। इसलिये सृष्टिकी रचना करनेपर भी भगवान् सृष्टि-रचनारूप कर्मसे बँधते नहीं (नवाँ श्लोक); क्योंकि वास्तवमें सृष्टि-रचनाका कार्य भगवान्के आश्रित रहनेवाली प्रकृति ही करती है (दसवाँ श्लोक)। इस रहस्यको न जाननेके कारण बेसमझ लोग भगवान्को भी अपनी तरह शरीर-(अपरा-)के आश्रित मान लेते हैं कि जैसे हम शरीरके बिना नहीं रह सकते, ऐसे ही भगवान् भी शरीरके बिना नहीं रह सकते (ग्यारहवाँ श्लोक)। ऐसे लोग आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिके आश्रित रहनेवाले होते हैं (बारहवाँ श्लोक)। वास्तवमें जैसे मनुष्यमें शरीर और शरीरीका भेद रहता है, ऐसे भगवान्में शरीर-शरीरीका भेद नहीं है—'सदसच्छाहमर्जुन' (९।१९)। इसलिये जो मनुष्य भगवान्को प्रकृतिके आश्रित नहीं समझते, वे दैवी प्रकृतिके आश्रित रहनेवाले होते हैं अर्थात् वे प्रकृतिके आश्रित न होकर भगवान्के आश्रित होते हैं (तेरहवाँ श्लोक)। भगवान्के आश्रित होनेके कारण वे 'महात्मा' कहलाते हैं।
कर्मयोग 'शरीर'-(अपरा-) की मुख्यतासे चलता है और ज्ञानयोग 'शरीरी'-(परा-) की मुख्यतासे चलता है। एक देश-(शरीर अथवा शरीरी-) को लेकर चलनेसे कर्मयोगी और ज्ञानयोगी एकदेशीय होते हैं। परन्तु भक्तियोग भगवान्की मुख्यतासे चलता है। इसलिये भक्तको भगवान्ने 'महात्मा' अर्थात् महान् आत्मा कहा है। वे अनन्यमनसे भगवान्का भजन करते हैं। कारण कि जब उनकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय अन्यकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं, तो फिर उनका मन भगवान्को छोड़कर कहाँ जाय? इसलिये वे भगवान्में नित्ययुक्त रहते हैं, कभी भगवान्से अलग होते ही नहीं—'नित्ययुक्ताः' (९।१४), 'नित्याभियुक्तानाम्' (९।२२)।
साधक कई प्रकारके होते हैं और अलग-अलग साधनोंसे भिन्न-भिन्न उपास्यदेवोंकी उपासना करते हैं। परन्तु वास्तवमें उन सभी साधकोंके द्वारा एक ही समग्र भगवान्की उपासना होती है—'मायुपासते' (९।१५), 'त्रैविद्या माम्' (९।२०), 'तेऽपि मामेव' (९।२३), 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभूरेव च' (९।२४)। कारण कि एक ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं (९।१६—१९)। इस रहस्यको न समझनेके कारण जो लोग अपने उपास्यदेवको भगवान्से अलग मानकर सकामभावसे उनकी उपासना करते हैं, उनको उपासना वास्तवमें भगवान्की होनेपर भी