श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 691, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ९ ]
अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें सकाम पुरुषोंके आवागमनको प्राप्त होनेकी बात कही।
सातवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि देवताओंके भक्त देवताओंको और मेरे भक्त मेरेको प्राप्त होते हैं। यही बात भगवान्ने नवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें भी कही।
सातवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने जो ‘अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः’ कहा था, उसीको नवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकके पूर्वार्धमें ‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्’ कहा है। ऐसे
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें अहंता-परिवर्तनकी अहंताको बदलता है और खुदका सम्बन्ध भगवान्से जोड़ता है। वह साधननिष्ठ न होकर भगवनिष्ठ होता है। इसलिये उसको संसारके सम्बन्धका त्याग करना नहीं पड़ता, प्रत्युत वह स्वतः छूट जाता है। कारण कि वर्ण, आश्रम, जाति, योग्यता, अधिकार, कर्म, गुण आदिका भेद होनेपर भी ये सब आगन्तुक हैं, पर स्वयंके साथ भगवान्का सम्बन्ध आगन्तुक नहीं है, प्रत्युत अनादि, नित्य और स्वतःसिद्ध है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगृह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादेमें ‘राजविद्याराजगृह्ययोग’ नामक नवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥
इस अध्यायमें भगवान्ने जो ‘मया तत्तमिदं सर्वम्’ आदि उपदेश दिया है, वह सब विद्याओंका राजा है और जो भगवान्ने अपने-आपको प्रकट करके अर्जुनको अपने शरण होने और अपनेमें मन लगानेके लिये कहा है, वह सम्पूर्ण गोपनीय भावोंका राजा है। इन दोनों—(राजविद्या और राजगृह्य-) को तत्त्वसे समझ लेनेपर ‘योग’—(नित्य-योग-)का अनुभव हो जाता है। अतः इस अध्यायका नाम ‘राजविद्याराजगृह्ययोग’ रखा गया है।
नवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ नवमोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके चार सौ छियालीस और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग चार सौ चौसठ है।
(२) ‘अथ नवमोऽध्यायः’ के सात, ‘श्रीभगवानुवाच’ के सात, श्लोकोंके एक हजार एक सौ बारह और पुष्पिकाके इक्यावन अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका
ही सातवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें जो ‘परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनृतम्’ कहा था, उसीको नवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकके उत्तरार्धमें ‘परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्’ कहा है।
सातवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें भगवान्ने ‘सर्गं यान्ति’ कहा था, उसीको नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें ‘मृत्युसंसारवर्त्तनि’ कहा है।
सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें भगवान्ने अपनेको जाननेकी बात मुख्य बतायी है और नवें अध्यायके चौतीसवें श्लोकमें भगवान्ने अपर्ण करनेकी बात मुख्य बतायी है।
बात मुख्य है। भक्त ‘मैं भगवान्का हूँ’—इस प्रकार अपनी अहंताको बदलता है और खुदका सम्बन्ध भगवान्से जोड़ता है। वह साधननिष्ठ न होकर भगवनिष्ठ होता है। इसलिये उसको संसारके सम्बन्धका त्याग करना नहीं पड़ता, प्रत्युत वह स्वतः छूट जाता है। कारण कि वर्ण, आश्रम, जाति, योग्यता, अधिकार, कर्म, गुण आदिका भेद होनेपर भी ये सब आगन्तुक हैं, पर स्वयंके साथ भगवान्का सम्बन्ध आगन्तुक नहीं है, प्रत्युत अनादि, नित्य और स्वतःसिद्ध है।
योग एक हजार एक सौ सतहत्तर है। इस अध्यायके चौतीस श्लोकोंमेंसे बीसवाँ और इक्कीसवाँ—ये दो श्लोक चौवालीस अक्षरोंके हैं और शेष बत्तीस श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच’।
नवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके चौतीस श्लोकोंमेंसे बीसवाँ और इक्कीसवाँ—ये दो श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं। बचे हुए बत्तीस श्लोकोंमेंसे—पहले श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ और तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘संकीर्ण-विपुला’; दूसरे श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; तीसरे और दसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’; सत्रहवें श्लोकके प्रथम चरणमें और तेरहवें तथा छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष पचीस श्लोक ठीक ‘पथ्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।