श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 715, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
कारण कि प्रकृति और प्रकृतिकी जितनी शक्तियाँ हैं, उन सबसे भगवान् अतीत हैं। भगवान् अनन्त हैं, असीम हैं और दानवोंकी माया-शक्ति कितनी ही विलक्षण होनेपर भी प्राकृत, सीमित और उत्पत्ति-विनाशशील है। सीमित और नाशवान् वस्तुके द्वारा असीम और अविनाशी तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है।
तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य, देवता, दानव आदि कोई भी अपनी शक्तिसे, सामर्थ्यसे, योग्यतासे, बुद्धिसे भगवान्को
परिशिष्ट भाव— भगवान्को अपनी शक्तिसे कोई जान नहीं सकता, प्रत्युत भगवान्की कृपासे ही जान सकता है—
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई॥ जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥ तुम्हरिहि कृपां तुम्हहि रघुनंदन॥ जानहि भगत भगत उर चंदन॥
(मानस २।१२७।२)
भगवान्के यहाँ बुद्धिके चमत्कार, सिद्धियाँ नहीं चल सकतीं। बड़े-बड़े भौतिक आविष्कारोंसे कोई भगवान्को नहीं जान सकता।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥
| भूतभावन | = हे भूतभावन ! | पुरुषोत्तम | = हे पुरुषोत्तम ! | आत्मना | = अपने-आपसे |
|---|---|---|---|---|---|
| भूतेश | = हे भूतेश ! | त्वम् | = आप | आत्मनाम् | = अपने- |
| देवदेव | = हे देवदेव ! | स्वयम् | = स्वयं | आपको | |
| जगत्पते | = हे जगत्पते ! | एव | = ही | वेत्थ | = जानते हैं। |
व्याख्या— ‘भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते पुरुषोत्तम’—सम्पूर्ण प्राणियोंको संकल्पमात्रसे उत्पन्न करनेवाले होनेसे आप ‘भूतभावन’ हैं; सम्पूर्ण प्राणियोंके और देवताओंके मालिक होनेसे आप ‘भूतेश’ और ‘देवदेव’ हैं; जड़-चेतन, स्थावर-जंगममात्र जगत्का पालन-पोषण करनेवाले होनेसे आप ‘जगत्पति’ हैं; और सम्पूर्ण पुरुषोंमें उत्तम होनेसे आप लोकमें और वेदमें ‘पुरुषोत्तम’ नामसे कहे गये हैं (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)।
इस श्लोकमें पाँच सम्बोधन आये हैं। इतने सम्बोधन गीताभरमें दूसरे किसी भी श्लोकमें नहीं आये। कारण है
१-काव्यमें भी भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ नामसे कहा गया है—
‘हरिर्यथैकः पुरुषोत्तमः स्मृतः’ (रघुवंश ३।४९)
२-यहाँ भूतभावन, भूतेश, देवदेव, जगत्पते और पुरुषोत्तम—इन पाँच सम्बोधनोंको क्रमशः सूर्य, शिव, गणेश, शक्ति और विष्णु—इन ईश्वरकोटिके पाँच देवताओंका वाचक मान सकते हैं। इन सम्बोधनोंका प्रयोग करके अर्जुन भगवान्से मानो यह कहते हैं कि ये पाँचों देवता मूलतः आप ही हैं।
नहीं जान सकते। कारण कि मनुष्य आदिमें जितनी जाननेकी योग्यता, सामर्थ्य, विशेषता है, वह सब प्राकृत है और भगवान् प्रकृतिसे अतीत हैं। त्याग, वैराग्य, तप, स्वाध्याय आदि अन्तःकरणको निर्मल करनेवाले हैं, पर इनके बलसे भी भगवान्को नहीं जान सकते। भगवान्को तो अनन्यभावसे उनके शरण होकर उनकी कृपासे ही जान सकते हैं (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ और ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)।
‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम्’—भगवान्
अपने-आपको अपने-आपसे ही जानते हैं। अपने-
आपको जाननेमें उन्हें किसी प्राकृत साधनकी
आवश्यकता नहीं होती। अपने-आपको जाननेमें उनकी
अपनी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती, कोई जिज्ञासा भी नहीं
होती, किसी करण-(अन्तःकरण और बहिःकरण-)
की