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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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आवश्यकता भी नहीं होती। उनमें शरीर-शरीरीका भाव भी नहीं है। वे तो स्वतः-स्वाभाविक अपने-आपसे ही अपने-आपको जानते हैं। उनका यह ज्ञान करण-निरपेक्ष है, करण-सापेक्ष नहीं।

इस श्लोकका भाव यह है कि जैसे भगवान् अपने-आपको अपने-आपसे ही जानते हैं, ऐसे ही भगवान्‌के अंश

परिशिष्ट भाव —आप स्वयं ही अपने-आपसे अपने-आपको जानते हैं—इसका तात्पर्य है कि जाननेवाले भी आप ही हैं, जाननेमें आनेवाले भी आप ही हैं और जानना भी आप ही हैं अर्थात् सब कुछ आप ही हैं। जब आपके सिवाय और कोई है ही नहीं तो फिर कौन किसको जाने?

तत्त्वको जाननेकी चेष्टा करेंगे तो तत्त्वसे दूर हो जायेंगे; क्योंकि तत्त्वको ज्ञेय (जाननेका विषय) बनायेंगे, तभी तो उसको जानना चाहेंगे! तत्त्व तो सबका ज्ञाता है, ज्ञेय नहीं। सबके ज्ञाताका कोई और ज्ञाता नहीं हो सकता। जैसे, आँखसे सबको देखते हैं, पर आँखसे आँखको नहीं देख सकते; क्योंकि आँखकी देखनेकी शक्ति इन्द्रियका विषय नहीं है अर्थात् इन्द्रियाँ खुद अतीन्द्रिय हैं। अतः वह परमात्मतत्त्व स्वयं ही स्वयंका ज्ञाता है।

सम्बन्ध—विभूतियोंका ज्ञान भगवान्‌में दृढ़ भक्ति करानेवाला है (गीता १०।७)। अतः अब आगेके तीन श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्‌से विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

वक्तुमहंस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।

याभिर्विभूतिभिलोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥ १६ ॥

हि= इसलियेलोकोंकोविभूतियोंका
याभिः= जिनव्याप्य= व्याप्त करके
विभूतिभिः= विभूतियोंसेतिष्ठसि= स्थित हैं,
त्वम्= आप(उन सभी)
इमान्= इनदिव्याः,
लोकान्= सम्पूर्णआत्मविभूतयः= अपनी दिव्य
अशेषेण = सम्पूर्णतासे
वक्तुम् = वर्णन
करनेमें
अहंसि = (आप ही)
समर्थ हैं।

व्याख्या —‘याभिर्विभूतिभिलोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि’—भगवान्‌ने पहले (सातवें श्लोकमें) यह बात कही थी कि जो मनुष्य मेरी विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जानता है, उसका मेरेमें अटल भक्तियोग हो जाता है। उसे सुनेपर अर्जुनके मनमें आया कि भगवान्‌में दृढ़ भक्ति होनेका यह बहुत सुगम और श्रेष्ठ उपाय है; क्योंकि भगवान्‌की विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जाननेपर मनुष्यका मन भगवान्‌की तरफ स्वाभाविक ही खिंच जाता है और भगवान्‌में उसकी स्वाभाविक ही भक्ति जाग्रत्‌ हो जाती है। अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं और कल्याणके लिये उनको भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ उपाय दीखती है। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि जिन विभूतियोंसे आप सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं, उन अलौकिक, विलक्षण विभूतियोंका विस्तारपूर्वक सम्पूर्णतासे वर्णन कीजिये। कारण कि उनको

१-‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा’ (बृहदारण्यक० ३।७।२३)

‘इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है।’

‘विज्ञातारमे केन विजानीयात्’ (बृहदारण्यक० २।४।१४)

‘सबके विज्ञाताको किसके द्वारा जाना जाय?’

२-इन्द्रियोंको देखनेवाली इन्द्रियाँ नहीं हैं, मन है। मनको देखनेवाला मन नहीं है, बुद्धि है। बुद्धिको देखनेवाली बुद्धि नहीं है, अहम् है। अहम्‌को देखनेवाला अहम्‌ नहीं है, स्वयं है। स्वयंको देखनेवाला स्वयं ही है।