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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

कहनेमें आप ही समर्थ हैं; आपके सिवाय उन विभूतियोंको और कोई नहीं कह सकता।

‘वक्तुमहैत्यशेषेण’ —आपने पहले (सातवें, नवें और यहाँ दसवें अध्यायके आरम्भमें) अपनी विभूतियाँ बतायीं और उनको जाननेका फल दृढ़ भक्तियोग होना बताया।

अतः मैं भी आपकी सब विभूतियोंको जान जाऊँ और मेरा भी आपमें दृढ़ भक्तियोग हो जाय, इसलिये आप

परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि अपनी सम्पूर्ण विभूतियोंका आप ही वर्णन कर सकते हैं; क्योंकि

आप स्वयं ही अपने-आपको जानते हैं (गीता—इसी अध्यायका पन्द्रहवाँ श्लोक)। दूसरा आपको जान ले—यह सम्भव

ही नहीं है (इसी अध्यायका दूसरा और चौदहवाँ श्लोक)। अतः आप स्वयं ही अपनी पूरी-की-पूरी विभूतियोंको

कह दें, जिससे मेरेको अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति हो जाय।

अपनी विभूतियोंको पूरी-की-पूरी कह दें, बाकी कुछ न रखें।

‘दिव्या ह्यात्मविभूतयः’ —विभूतियोंको दिव्य कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो कुछ विशेषता दीखती है वह मूलमें दिव्य परमात्माकी ही है, संसारकी नहीं। अतः

संसारकी विशेषता देखना भोग है और परमात्माकी विशेषता देखना विभूति है, योग है।

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥

योगिन्= हे योगिन्!कथम्= कैसेमया= मेरे द्वारा
सदा= निरन्तरविद्याम्= जानूँ?चिन्त्यः, असि= चिन्तन किये
परिचिन्तयन्= सांगोपांग चिन्तन करता हुआ= औरजा सकते हैं अर्थात्
अहम्= मैंभगवन्= हे भगवन्!किन-किन भावोंमें
त्वाम्= आपकोकेषु, केषु= किन-किनमैं आपका चिन्तन
भावेषु= भावोंमें (आप)करूँ?

व्याख्या —‘कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्’—सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसलिये अर्जुन भगवान्से पूछते हैं कि हरदम चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ?

‘केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया’ —आठवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस योगीको मैं सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ। फिर नवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा कि जो अनन्य भक्त निरन्तर मेरा चिन्तन करते रहते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। इस प्रकार चिन्तनकी महिमा सुनकर अर्जुन कहते हैं कि जिस चिन्तनसे मैं आपको तत्त्वसे जान जाऊँ, वह चिन्तन मैं कहाँ-कहाँ करूँ? किस वस्तु, व्यक्ति, देश,

काल, घटना, परिस्थिति आदिमें मैं आपका चिन्तन करूँ? [यहाँ चिन्तन करना साधन है और भगवान्को तत्त्वसे जानना साध्य है।]

यहाँ अर्जुने तो पूछा है कि मैं कहाँ-कहाँ, किस-किस वस्तु, व्यक्ति, स्थान आदिमें आपका चिन्तन करूँ, पर भगवान्ने आगे उत्तर यह दिया है कि जहाँ-जहाँ भी तू चिन्तन करता है, वहाँ-वहाँ ही तू मेरेको समझ। तात्पर्य यह है कि मैं तो सब वस्तु, व्यक्ति, देश, काल आदिमें परिपूर्ण हूँ। इसलिये किसी विशेषता, महत्ता, सुन्दरता आदिको लेकर जहाँ-जहाँ तेरा मन जाता है, वहाँ-वहाँ मेरा ही चिन्तन कर अर्थात् वहाँ उस विशेषता आदिको मेरी ही समझ। कारण कि संसारकी विशेषताको माननेसे संसारका चिन्तन होगा, पर मेरी विशेषताको माननेसे मेरा ही चिन्तन होगा। इस प्रकार संसारका चिन्तन मेरे चिन्तनमें परिणत होना चाहिये।

परिशिष्ट भाव —अर्जुनके प्रश्नका तात्पर्य है कि हे भगवन्! आप किन-किन रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जिन रूपोंमें मैं आपका चिन्तन कर सकूँ? अर्जुने यह प्रश्न सुगमतापूर्वक भगवत्प्राप्तिके उद्देश्यसे किया है। अर्जुन साधकमात्रके प्रतिनिधि हैं; अतः उनका प्रश्न साधकोंके लिये है।