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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 718

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७१७

अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णको तो जानते थे, पर उनके समग्ररूपको नहीं जानते थे। उनमें भगवान्के समग्ररूपको जाननेकी जिज्ञासा थी। इसलिये वे पूछते हैं कि मैं आपके समग्ररूपको कैसे जानूँ? किन रूपोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ? इससे सिद्ध होता है कि विभूतियाँ गौण नहीं हैं, प्रत्युत भगवत्प्राप्तिका माध्यम होनेसे मुख्य हैं। विभूतिरूपसे साक्षात् भगवान् ही हैं। जबतक मनुष्य भगवान्को नहीं जानता, तबतक उसमें गौण अथवा मुख्यकी भावना रहती है। भगवान्को जाननेपर गौण अथवा मुख्यकी भावना नहीं रहती; क्योंकि भगवान्के सिवाय कुछ है ही नहीं, फिर उसमें क्या गौण और क्या मुख्य? तात्पर्य है कि गौण अथवा मुख्य साधककी दृष्टिमें है, भगवान् और सिद्धकी दृष्टिमें नहीं।

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।

भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥

जनार्दन= हे जनार्दन!विस्तरेण= विस्तारसेशृण्वतः= सुनते-सुनते
आत्मनः= (आप) अपनेभूयः= फिरमे= मेरी
योगम्= योग-(सामर्थ्य- )
कोकथय= कहिये;तृप्तिः= तृप्ति
= औरहि= क्योंकि= नहीं
विभूतिम्= विभूतियोंकोअमृतम्= (आपके) अमृतमय
वचनअस्ति= हो
रही है।

व्याख्या—‘विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन’— भगवान्ने सातवें और नवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानका विषय खूब कह दिया। इतना कहनेपर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये दसवाँ अध्याय अपनी ओरसे ही कहना शुरू कर दिया। भगवान्ने दसवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए कहा कि ‘तू फिर मेरे परम वचनको सुन।’ ऐसा सुनकर भगवान्की कृपा और महत्त्वकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि विशेषतासे जाती है और वे भगवान्से फिर सुनानेके लिये प्रार्थना करते हैं। अर्जुन कहते हैं कि ‘आप अपने योग और विभूतियोंको विस्तारपूर्वक फिरसे कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते हुए तृप्ति नहीं हो रही है। मन करता है कि सुनता ही चला जाऊँ।’

भगवान्की विभूतियोंको सुननेसे भगवान्में प्रत्यक्ष आकर्षण बढ़ता देखकर अर्जुनको लगा कि इन विभूतियोंका ज्ञान होनेसे भगवान्के प्रति मेरा विशेष आकर्षण हो जायगा और भगवान्में सहज ही मेरी दृढ़ भक्ति हो जायगी। इसलिये अर्जुन विस्तारपूर्वक फिरसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

‘भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्’— अर्जुन श्रेयका साधन चाहते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक), और भगवान्ने विभूति एवं योगको तत्त्वसे जाननेका फल अपनेमें दृढ़ भक्ति होना बताया (गीता—

दसवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। इसलिये अर्जुनको विभूतियोंको जाननेवाली बात बहुत सरल लगी कि मेरेको कोई नया काम नहीं करना है, नया चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत जहाँ-कहीं विशेषता आदिको लेकर मनका स्वाभाविक खिंचाव होता है, वहाँ उस विशेषताको भगवान्की मानना है। इससे मनकी वृत्तियोंका प्रवाह संसारमें न होकर भगवान्में हो जायगा, जिससे मेरी भगवान्में दृढ़ भक्ति हो जायगी और मेरा सुगमतासे कल्याण हो जायगा। कितनी सीधी, सरल और सुगम बात है! इसलिये अर्जुन विभूतियोंको फिर कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

जैसे, कोई भोजन करने बैठे और भोजनमें कोई वस्तु प्रिय (बढ़िया) मालूम दे, तो उसमें उसकी रुचि बढ़ती है और वह बार-बार उस प्रिय वस्तुको माँगता है। पर उस रुचिमें दो बाधाएँ लगती हैं—एक तो वह वस्तु अगर कम मात्रामें होती है तो पूरी तृप्तिपूर्वक नहीं मिलती; और दूसरी, वह वस्तु अधिक मात्रामें होनेपर भी पेट भर जानेसे अधिक नहीं खायी जा सकती! परन्तु भगवान्की विभूतियोंका और अर्जुनकी विभूतियाँ सुननेकी रुचिका अन्त ही नहीं आता। कानोंके द्वारा अमृतमय वचनोंको सुनते हुए न तो उन वचनोंका अन्त आता है, और न उनको सुनते हुए तृप्ति ही होती है। अतः अर्जुन भगवान्से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आप ऐसे अमृतमय वचन सुनाते ही जाइये।