श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
परिशिष्ट भाव —जैसे भूखेको अन्न और प्यासेको जल अच्छा लगता है, ऐसे ही जिज्ञासु अर्जुनको भगवान्के वचन बहुत विलक्षण लगते हैं। उनको भगवान्के वचन ज्यों-ज्यों विलक्षण दीखते हैं, त्यों-ही-त्यों उनका भगवान्के प्रति विशेष भाव प्रकट होता जाता है।
सम्बन्ध —अर्जुनकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् अब आगेके श्लोकसे अपनी विभूतियों और योगको कहना आरम्भ करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥ १९ ॥
श्रीभगवान् बोले—
| हन्त | = हॉ, ठीक है। | प्राधान्यतः | = प्रधानतासे | मे | = मेरी विभूतियोंके |
|---|---|---|---|---|---|
| दिव्याः, | (संक्षेपसे) | विस्तरस्य | = विस्तारका | ||
| आत्मविभूतयः= मैं अपनी दिव्य | कथयिष्यामि | = कहूँगा; | अन्तः | = अन्त | |
| विभूतियोंको | हि | = क्योंकि | न | = नहीं | |
| ते | = तेरे लिये | कुरुश्रेष्ठ | = हे कुरुश्रेष्ठ ! | अस्ति | = है। |
व्याख्या —‘हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्म-विभूतयः’—योग और विभूति कहनेके लिये अर्जुनकी जो प्रार्थना है, उसको ‘हन्त’ अव्ययसे स्वीकार करते हुए भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी दिव्य, अलौकिक, विलक्षण विभूतियोंको तेरे लिये कहूँगा (योगकी बात भगवान्ने आगे इकतालिसवें श्लोकमें कही है)।
‘दिव्याः’ कहनेका तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना आदिमें जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह वस्तुतः भगवान्की ही है। इसलिये उसको भगवान्की ही देखना दिव्यता है और वस्तु, व्यक्ति आदिकी देखना अदिव्यता अर्थात् लौकिकता है।
‘प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे’—जब अर्जुनने कहा कि भगवन्! आप अपनी विभूतियोंको विस्तारसे, पूरी-की-पूरी कह दें, तब भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा; क्योंकि मेरी
विभूतियोंका अन्त नहीं है। पर आगे ग्यारहवें अध्यायमें जब अर्जुन बड़े संकोचसे कहते हैं कि मैं आपका विश्वरूप देखना चाहता हूँ; अगर मेरे द्वारा वह रूप देखा जाना शक्य है तो दिखा दीजिये, तब भगवान् कहते हैं—‘पश्य मे पार्थ रूपाणि’ (११।५) अर्थात् तू मेरे रूपोंको देख ले। रूपोंमें कितने रूप? क्या दो-चार? नहीं-नहीं, सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख! इस प्रकार यहाँ अर्जुनकी विस्तारसे विभूतियाँ कहनेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् संक्षेपसे विभूतियाँ सुननेके लिये कहते हैं और वहाँ अर्जुनकी एक रूप दिखानेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् सैकड़ों-हजारों रूप देखनेके लिये कहते हैं!
यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि सुननेमें तो आदमी बहुत सुन सकता है, पर उतना नेत्रोंसे देख नहीं सकता; क्योंकि देखनेकी शक्ति कानोंकी अपेक्षा सीमित होती है। फिर भी जब अर्जुनने सम्पूर्ण विभूतियोंको सुननेमें अपनी
१-द्रष्टव्य—‘गीता-दर्पण’ पुस्तकका बारहवाँ लेख—‘गीतामें भगवान्का विविध रूपोंमें प्रकट होना’।
२-कानका विषय है शब्द और शब्द दो तरहका होता है—वर्णाम्बक और ध्वन्यात्मक। कानके द्वारा शब्दोंको सुनकर हमें प्रत्यक्षका भी ज्ञान होता है और अप्रत्यक्ष-(स्वर्ग, नरक आदि-) का भी ज्ञान होता है। इसीलिये वेदान्त-प्रक्रिया-(श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदिमें) ‘श्रवण’ सबसे पहले आया है। ऐसे ही भक्तिमें भी (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन आदिमें) ‘श्रवण’ पहले आया है। शास्त्रोंमें जिस परमात्मतत्त्वका वर्णन किया गया है, उसका ज्ञान (परोक्ष ज्ञान) हमें कानोंसे ही होता है अर्थात् कानोंसे सुनकर ही उसके अनुसार करने, मानने या जाननेसे हम उस परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं।
शब्दमें अचिन्त्य शक्ति है—
शब्दशकेरचित्यत्वाच्छब्दादेवापरोक्षधीः । प्रसुप्तः पुरुषो यद्वच्छब्देनावबुध्यते ॥ (सदाचारानुसन्धानम् १९)