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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 720

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

७१९

सामर्थ्य बतायी तो भगवान्ने संक्षेपसे सुननेके लिये कहा; और जब अर्जुनने एक रूपको देखनेमें नम्रतापूर्वक अपनी असमर्थता प्रकट की तो भगवान्ने अनेक रूप देखनेके लिये कहा! इसका कारण यह है कि गीतामें अर्जुनका भगवद्विषयक ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। इस दसवें अध्यायमें जब भगवान्ने यह कहा कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है, तब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की अनन्तताकी तरफ चली गयी। उन्होंने समझा कि भगवान्के विषयमें तो मैं कुछ भी नहीं जानता; क्योंकि भगवान् अनन्त हैं, असीम हैं, अपार हैं। परन्तु अर्जुनने भूलसे कह दिया कि आप अपनी सब-की-सब विभूतियाँ कह दीजिये। इसलिये अर्जुन आगे चलकर सावधान हो जाते हैं और नम्रतापूर्वक एक रूपको दिखानेके लिये ही भगवान्से प्रार्थना करते हैं। नेत्रोंकी शक्ति सीमित होते हुए भी भगवान् दिव्य चक्षु प्रदान करके अर्थात् चर्मचक्षुओंमें विशेष शक्ति प्रदान करके

अपने अनेक रूपोंको देखनेकी आज्ञा देते हैं।

दूसरी बात, वक्ताकी व्यक्तिगत बात पूछी जाय और अपनी अज्ञता तथा अयोग्यतापूर्वक अपने जाननेके लिये प्रार्थना की जाय—इन दोनोंमें फरक होता है। यहाँ अर्जुनने विस्तारपूर्वक विभूतियाँ कहनेके लिये कहकर भगवान्की थाह लेनी चाही, तो भगवान्ने कह दिया कि मैं तो संक्षेपसे कहूँगा; क्योंकि मेरी विभूतियोंकी थाह नहीं है। ग्यारहवें अध्यायमें अर्जुनने अपनी अज्ञता और अयोग्यता प्रकट करते हुए भगवान्से अपना अव्यय रूप दिखानेकी प्रार्थना की, तो भगवान्ने अपने अनन्तरूप देखनेके लिये आज्ञा दी और उनको देखनेकी सामर्थ्य (दिव्य दृष्टि) भी दी! इसलिये साधकको किंचिन्मात्र भी अपना आग्रह, अहंकार न रखकर और अपनी सामर्थ्य, बुद्धि न लगाकर केवल भगवान्पर ही सर्वथा निर्भर हो जाना चाहिये; क्योंकि भगवान्की निर्भरतासे जो चीज मिलती है, वह अपार मिलती है।

परिशिष्ट भाव —भगवान् अनन्त हैं; अतः उनकी विभूतियाँ भी अनन्त हैं। इस कारण भगवान्की विभूतियोंके विस्तारको न तो कोई कह सकता है और न कोई सुन ही सकता है। अगर कोई कह-सुन ले तो फिर वे अनन्त कैसे रहेंगी? इसलिये भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा।

अर्जुनको ‘कुरुश्रेष्ठ’ कहनेमें भगवान्का तात्पर्य है कि तेरे मनमें मेरेको जाननेकी इच्छा हो गयी, इसलिये तू श्रेष्ठ है!

सम्बन्ध—विभूतियाँ और योग—इन दोनोंमेंसे पहले भगवान् बीसवें श्लोकसे उन्तालीसवें श्लोकतक अपनी बयासी विभूतियोंका वर्णन करते हैं।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ २०॥

मनुष्य सोता है तो नींदमें इन्द्रियाँ संकुचित होकर मनमें, मन संकुचित होकर बुद्धिमें और बुद्धि संकुचित होकर अज्ञान- (अविद्या- ) में लीन हो जाती है। इस तरह यद्यपि नींदमें इन्द्रियाँ बहुत छिपी रहती हैं, तथापि सोये हुए आदमीका नाम लेकर पुकारा जाय तो वह जग जाता है। शब्दमें इतनी शक्ति है कि वह अविद्यामें लीन हुएको भी जगा देता है। अतः शब्दमें अनन्त शक्ति है। दृष्टि तो पदार्थतक जाकर रुक जाती है। पर शब्द केवल कानतक ही नहीं जाता, प्रत्युत स्वयंतक चला जाता है।

नेत्रोंमें रूप पकड़ जाता है। जैसे दर्पणमें मुख देखते समय काँचके भीतर रूप चला जाता है तो उसमें मुख दिखायी देने लगता है, ऐसे ही आँखमें भी एक काँच है, जिसके भीतर पदार्थका रूप चला जाता है तो वह पदार्थ दिखायी देने लगता है। नेत्रोंमें एक विशेष शक्ति यह है कि वे पहले रूपको पकड़ें हुए ही दूसरे रूपको देख लेते हैं, इसी कारण जब बिजलीसे पंखा चलता है, तब उसके तीनों पर अलग-अलग घूमनेपर भी नेत्रोंको (अलग-अलग पर घूमते दिखायी न देकर) एक चक्र-सा दिखायी देता है। ऐसे होते हुए भी कानोंमें जितनी शक्ति है, उतनी नेत्रोंमें नहीं है।

इन्द्रियाँ केवल अपने-अपने विषयोंको ही पकड़ सकती हैं, परमात्मतत्त्वको नहीं पकड़ सकती; क्योंकि परमात्मतत्त्व इन्द्रियोंका विषय नहीं है। परमात्मतत्त्व स्वयंका विषय है अर्थात् उसका ज्ञान स्वयंसे ही होता है। इसलिये अर्जुनने इस अध्यायमें कहा है कि आप स्वयंको स्वयंसे ही जानते हैं—‘स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम्’ (गीता १०।१५)। दूसरे अध्यायमें भगवान्ने बताया है कि मनमें आयी हुई सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़नेपर मनुष्य अपनेसे ही अपने-आपमें सन्तुष्ट होता है—‘प्रजहाति यदा कामात्मर्त्यार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ (२।५५)। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मतत्त्वका ज्ञान करण-निर्पेक्ष है। उस ज्ञानको आँखें नहीं पकड़ सकती, पर कान शब्दोंके द्वारा पकड़ करके स्वयंतक पहुँचा देता है।