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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 721

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

गुडाकेश= हे नींदको जीतनेवाले= तथासर्वभूताशय-
अर्जुन!अन्तः= अन्तमेंस्थितः
भूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकेअहम्= मैंकरण- (हृदय- )में स्थित
आदिः= आदि,एव= ही हूँआत्मा
मध्यम्= मध्य= औरअहम्
= मैं ही हूँ।

व्याख्या —[ भगवान्का चिन्तन दो तरहसे होता है— (१) साधक अपना जो इष्ट मानता है, उसके सिवाय दूसरा कोई भी चिन्तन न हो। कभी हो भी जाय तो मनको वहाँसे हटाकर अपने इष्टदेवके चिन्तनमें ही लगा दे; और (२) मनमें सांसारिक विशेषताको लेकर चिन्तन हो, तो उस विशेषताको भगवान्की ही विशेषता समझे। इस दूसरे चिन्तनके लिये ही यहाँ विभूतियोंका वर्णन है। तात्पर्य है कि किसी विशेषताको लेकर जहाँ-कहीं वृत्ति जाय, वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये, उस वस्तु-व्यक्तिका नहीं। इसीके लिये भगवान् विभूतियोंका वर्णन कर रहे हैं। ]

‘अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च’* —यहाँ भगवान्ने अपनी सम्पूर्ण विभूतियोंका सार कहा है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। यह नियम है कि जो वस्तु उत्पत्ति-विनाशशील होती है, उसके आरम्भ और अन्तमें जो तत्त्व रहता है, वही तत्त्व उसके मध्यमें भी रहता है (चाहे दीखे या न दीखे) अर्थात् जो वस्तु जिस तत्त्वसे उत्पन्न होती है और जिसमें लीन होती है, उस वस्तुके आदि, मध्य और अन्तमें (सब समयमें) वही तत्त्व रहता है। जैसे, सोनेसे बने गहने पहले सोनारूप होते हैं और अन्तमें (गहनोंके सोनेमें लीन होनेपर) सोनारूप ही रहते हैं तथा बीचमें भी सोनारूप ही रहते हैं। केवल नाम, आकृति, उपयोग, माप, तौल आदि अलग-अलग होते हैं; और इनके अलग-अलग होते हुए भी गहने सोना ही रहते हैं। ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी आदिमें भी परमात्मस्वरूप थे और अन्तमें लीन होनेपर भी परमात्मस्वरूप रहेंगे तथा मध्यमें नाम, रूप, आकृति, क्रिया, स्वभाव आदि अलग-अलग होनेपर भी तत्त्वतः

परमात्मस्वरूप ही हैं—यह बतानेके लिये ही यहाँ भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्तमें कहा है।

भगवान्ने विभूतियोंके इस प्रकारणमें आदि, मध्य और अन्तमें—तीन जगह साररूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। पहले इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि ‘सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ,’ बीचके बत्तीसवें श्लोकमें कहा कि ‘सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ,’ और अन्तके उन्तालीसवें श्लोकमें कहा कि ‘सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह मैं ही हूँ; क्योंकि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है।’ चिन्तन करनेके लिये यही विभूतियोंका सार है। तात्पर्य यह है कि किसी विशेषता आदिको लेकर जो विभूतियाँ कही गयी हैं, उन विभूतियोंके अतिरिक्त भी जो कुछ दिखायी दे, वह भी भगवान्की ही विभूति है—यह बतानेके लिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें विद्यमान कहा है। तत्त्वसे सब कुछ परमात्मा ही है—‘वासुदेवः सर्वम्’—इस लक्ष्यको बतानेके लिये ही विभूतियाँ कही गयी हैं।

इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने प्राणियोंमें जो आत्मा है, जीवोंका जो स्वरूप है, उसको अपनी विभूति बताया है। फिर बत्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने सृष्टिरूपसे अपनी विभूति बताया कि जो जड़-चेतन, स्थावर-जंगम सृष्टि है, उसके आदिमें ‘मैं एक ही बहुत रूपोंमें हो जाऊँ’ (‘बहु स्यां प्रजायेयेति’ छान्दोग्य० ६।२।३)—ऐसा संकल्प करता हूँ और अन्तमें मैं ही शेष रहता हूँ—‘शिष्यते शेषसंज्ञः’ (श्रीमद्भ० १०।३।२५)। अतः बीचमें भी सब कुछ मैं ही हूँ—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९) ‘सदसच्चाहमर्जुन’

  • यहाँ ‘आदिः’ और ‘अन्तः’ शब्दका प्रयोग पुँल्लिंगमें और ‘मध्यम्’ शब्दका प्रयोग नपुंसकलिंगमें किया गया है। इसका तात्पर्य है कि आदिमें अकेले परमपुरुष भगवान् रहते हैं—‘अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः’ (गीता १०।२), और अन्तमें भी अकेले परमपुरुष भगवान् रहते हैं—‘शिष्यते शेषसंज्ञः’ (श्रीमद्भ० १०।३।२५)। इसलिये भगवान्ने ‘आदि’ और ‘अन्त’ शब्दका प्रयोग पुँल्लिंगमें किया है। परन्तु मध्यमें अर्थात् सृष्टिके समय पुँल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग तीनों लिंगोंवाले व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ, क्रिया, भाव आदि रहते हैं। अतः इन तीनों लिंगोंमें नपुंसकलिंग ही शेष रहता है अर्थात् नपुंसकलिंगके अन्तर्गत ही तीनों लिंग आ जाते हैं। इसलिये भगवान्ने यहाँ और आगे बत्तीसवें श्लोकमें भी ‘मध्य’ शब्दका प्रयोग नपुंसकलिंगमें किया है।