सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 722, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 722

श्लोक २१ ]

  • साधक-संजीवनी *

७२९

(गीता ९।१९); क्योंकि जो तत्त्व आदि और अन्तमें होता है, वही तत्त्व बीचमें होता है। अन्तमें उनालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बीज-(कारण-) रूपसे अपनी विभूति बतायी कि मैं ही सबका बीज हूँ, मेरे बिना कोई भी प्राणी नहीं है। इस प्रकार इन तीन जगह—तीन श्लोकोंमें मुख्य विभूतियाँ बतायी गयी हैं और अन्य श्लोकोंमें जो समुदायमें मुख्य हैं, जिनका समुदायपर आधिपत्य है, जिनमें कोई विशेषता है, उनको लेकर विभूतियाँ बतायी गयी हैं। परन्तु साधकको चाहिये कि वह इन विभूतियोंकी महत्ता, विशेषता, सुन्दरता, आधिपत्य आदिकी तरफ खयाल न करे, प्रत्युत ये सब विभूतियाँ भगवान्से ही प्रकट होती हैं, इनमें जो महत्ता आदि है, वह केवल भगवान्की है; ये विभूतियाँ भगवत्स्वरूप ही हैं—इस तरफ खयाल रखे। कारण कि अर्जुनका प्रश्न भगवान्के चिन्तनके विषयमें है

(सत्रहवाँ श्लोक), किसी वस्तु, व्यक्तिके चिन्तनके विषयमें नहीं।

‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’—साधक इन विभूतियोंका उपयोग कैसे करे? इसे बताते हैं कि जब साधककी दृष्टि प्राणियोंकी तरफ चली जाय, तब वह ‘सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मारूपसे भगवान् ही हैं’—इस तरह भगवान्का चिन्तन करे। जब किसी विचारक साधककी दृष्टि सृष्टिकी तरफ चली जाय, तब वह ‘उत्पत्ति-विनाशशील और हरदम परिवर्तनशील सृष्टिके आदि, मध्य तथा अन्तमें एक भगवान् ही हैं’ इस तरह भगवान्का चिन्तन करे। कभी प्राणियोंके मूलकी तरफ उसकी दृष्टि चली जाय, तब वह ‘बीजरूपसे भगवान् ही हैं, भगवान्के बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है और हो सकता भी नहीं’—इस तरह भगवान्का चिन्तन करे।

परिशिष्ट भाव —सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भगवान् ही हैं—इसका तात्पर्य यह है कि एक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं।

भगवान् श्रीकृष्ण समग्र हैं और आत्मा उनकी विभूति है। आत्मा भगवान्की ‘परा प्रकृति’ है और अन्तःकरण ‘अपरा प्रकृति’ है (गीता—सातवें अध्यायका चौथा, पाँचवाँ श्लोक)। परा और अपरा—दोनों ही भगवान्से अभिन्न हैं।

आदित्यानामहं विष्णुज्योतिषां रविरंशुमान्।

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥ २१ ॥

अहम्= मैंअंशुमान्= किरणोंवाला(और)
आदित्यानाम्= अदितिके पुत्रोंमेंरविः= सूर्य हूँ।नक्षत्राणाम्
विष्णुः= विष्णु (वामन)अहम्= मैं
ज्योतिषाम्= (और) प्रकाशमानमरुताम्= मरुतोंकाशशी
वस्तुओंमेंमरीचिः= तेजअस्मि

व्याख्या —[इन विभूतियोंमें षष्ठीका प्रयोग किया गया है। षष्ठीका प्रयोग निर्धारण अर्थात् मुख्यताके अर्थमें भी होता है और सम्बन्धके अर्थमें भी। जहाँ निर्धारणमें षष्ठी होती है, वहाँ हिन्दीकी ‘मै’ विभक्तिका प्रयोग होता है, और जहाँ सम्बन्धमें षष्ठी होती है, वहाँ हिन्दीकी ‘का’, ‘की’ विभक्तियोंका प्रयोग होता है। उदाहरणार्थ, इस श्लोकके पूर्वार्धमें निर्धारणके अर्थमें और उत्तरार्धमें सम्बन्धके अर्थमें षष्ठीका प्रयोग हुआ है।]

‘आदित्यानामहं विष्णुः’—अदितिके भाता, मित्र आदि जितने पुत्र हैं, उनमें ‘विष्णु’ अर्थात् वामन मुख्य हैं। भगवान्ने ही वामनरूपसे अवतार लेकर दैत्योंकी सम्पत्तिको

दानरूपसे लिया और उसे अदितिके पुत्रों-(देवताओं-)को दे दिया*।

‘ज्योतिषां रविरंशुमान्’—चन्द्रमा, नक्षत्र, तारा, अग्नि आदि जितनी भी प्रकाशमान चीजें हैं, उनमें किरणोंवाला सूर्य मेरी विभूति है; क्योंकि प्रकाश करनेमें सूर्यकी मुख्यता है। सूर्यके प्रकाशसे ही सभी प्रकाशमान होते हैं।

‘मरीचिर्मरुतामस्मि’—सत्त्वज्योति, आदित्य, हरित आदि नामोंवाले जो उनचास मरुत हैं, उनका मुख्य तेज मैं हूँ। उस तेजके प्रभावसे ही इन्द्रके द्वारा दितिके गर्भके सात टुकड़े करनेपर और उन सातोंके फिर सात-सात टुकड़े करनेपर भी वे मेरे नहीं प्रत्युत एकसे उनचास हो गये।

  • बारह महिनोंमें जो बारह आदित्य होते हैं, उनमें कार्तिक मासके सूर्यका नाम भी ‘विष्णु’ है।