श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
‘नक्षत्राणामहं शशी’—अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं, उन सबका अधिपति चन्द्रमा मैं हूँ।
इन विभूतियोंमें जो विशेषता—महत्ता है, वह वास्तवमें भगवान्की है।
[ इस प्रकरणमें जिन विभूतियोंका वर्णन आया है,
उनको भगवान्ने विभूतिरूपसे ही कहा है, अवताररूपसे नहीं; जैसे—अदितिके पुत्रोंमें वामन मैं हूँ (इक्कीसवाँ श्लोक), शस्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ (इकतीसवाँ श्लोक), वृष्णिर्वशियोंमें वासुदेव (कृष्ण) और पाण्डवोंमें धनंजय (अर्जुन) मैं हूँ (सैंतीसवाँ श्लोक) इत्यादि। कारण कि यहाँ प्रसंग विभूतियोंका है। ]
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
| वेदानाम् | = (मैं) | वासवः | = इन्द्र | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| वेदोंमें | अस्मि | = हूँ, | भूतानाम् | = प्राणियोंकी | |
| सामवेदः | = सामवेद | इन्द्रियाणाम् | = इन्द्रियोंमें | चेतना | = चेतना |
| अस्मि | = हूँ, | मनः | = मन | अस्मि | = हूँ। |
| देवानाम् | = देवताओंमें | अस्मि | = हूँ |
व्याख्या— ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’—वेदोंकी जो ऋचाएँ स्वरसहित गायी जाती हैं, उनका नाम सामवेद है। सामवेदमें इन्द्ररूपसे भगवान्की स्तुतिका वर्णन है। इसलिये सामवेद भगवान्की विभूति है।
‘देवानामस्मि वासवः’ —सूर्य, चन्द्रमा आदि जितने भी देवता हैं, उन सबमें इन्द्र मुख्य है और सबका अधिपति है। इसलिये भगवान्ने उसको अपनी विभूति बताया है।
‘इन्द्रियाणां मनश्चास्मि’ —नेत्र, कान आदि सब इन्द्रियोंमें मन मुख्य है। सब इन्द्रियाँ मनके साथ रहनेसे (मनको साथमें लेकर) ही काम करती हैं। मन साथमें न
रहनेसे इन्द्रियाँ अपना काम नहीं करतीं। यदि मनका साथ न हो तो इन्द्रियोंके सामने विषय आनेपर भी विषयोंका ज्ञान नहीं होता। मनमें यह विशेषता भगवान्से ही आयी है। इसलिये भगवान्ने मनको अपनी विभूति बताया है।
‘भूतानामस्मि चेतना’ —सम्पूर्ण प्राणियोंकी जो चेतना-शक्ति, प्राणशक्ति है, जिससे मेरे हुए आदमीकी अपेक्षा सोये हुए आदमीमें विलक्षणता दीखती है, उसे भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
इन विभूतियोंमें जो विशेषता है, वह भगवान्से ही आयी है। इनकी स्वतन्त्र विशेषता नहीं है।
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वितेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
| रुद्राणाम् | = रुद्रोंमें | अस्मि | = मैं हूँ। | शिखरिणाम् | = शिखरवाले |
|---|---|---|---|---|---|
| शङ्करः | = शंकर | वसूनाम् | = वसुओंमें | पर्वतोंमें | |
| च | = और | पावकः | = पवित्र करनेवाली | मेरुः | = सुमेरु |
| यक्षरक्षसाम् | = यक्ष-राक्षसोंमें | अग्नि | अहम् | = मैं | |
| वितेशः | = कुबेर | च | = और | अस्मि | = हूँ। |
व्याख्या— ‘रुद्राणां शङ्करश्चास्मि’—हर, बहुरूप, त्र्यम्बक आदि ग्यारह रुद्रोंमें शम्भु अर्थात् शंकर सबके अधिपति हैं। ये कल्याण प्रदान करनेवाले और कल्याणस्वरूप हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
‘वितेशो यक्षरक्षसाम्’ —कुबेर यक्ष तथा राक्षसोंके अधिपति हैं और इनको धनाध्यक्षके पदपर नियुक्त किया गया है। सब यक्ष-राक्षसोंमें मुख्य होनेसे ये भगवान्की विभूति हैं।
‘वसूनां पावकश्चास्मि’ —धर, ध्रुव, सोम आदि आठ