श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 724, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २४-२५ ]
- साधक-संजीवनी *
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वसुओंमें अनल अर्थात् पावक (अग्नि) सबके अधिपति हैं। ये सब देवताओंको यज्ञकी हवि पहुँचानेवाले तथा भगवान्के मुख हैं। इसलिये इनको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
‘मेरुः शिखरिणामहम्’—सोने, चाँदी, ताँबे आदिके शिखरोंवाले जितने पर्वत हैं, उनमें सुमेरु पर्वत मुख्य है।
यह सोने तथा रत्नोंका भण्डार है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
इस श्लोकमें जो चार विभूतियाँ कही हैं, उनमें जो कुछ विशेषता—महत्ता दीखती है, वह विभूतियोंके मूलरूप परमात्मासे ही आयी है। अतः इन विभूतियोंमें परमात्माका ही चिन्तन होना चाहिये।
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ! | विद्धि | = समझो। | सरसाम् | = जलाशयोंमें |
|---|---|---|---|---|---|
| पुरोधसाम् | = पुरोहितोंमें | सेनानीनाम् | = सेनापतियोंमें | सागरः | = समुद्र |
| मुख्यम् | = मुख्य | स्कन्दः | = कार्तिकेय | अहम् | = मैं |
| बृहस्पतिम् | = बृहस्पतिको | च | = और | अस्मि | = हूँ। |
| माम् | = मेरा स्वरूप |
व्याख्या—‘पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्’—संसारके सम्पूर्ण पुरोहितोंमें और विद्या-बुद्धिमें बृहस्पति श्रेष्ठ हैं। ये इन्द्रके गुरु तथा देवताओंके कुलपुरोहित हैं। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे बृहस्पतिको अपनी विभूति जानने-(मानने-)के लिये कहा है।
‘सेनानीनामहं स्कन्दः’—स्कन्द (कार्तिकेय) शंकरजीके पुत्र हैं। इनके छः मुख और बारह हाथ हैं। ये देवताओंके सेनापति हैं और संसारके सम्पूर्ण सेनापतियोंमें श्रेष्ठ हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।
‘सरसामस्मि सागरः’—इस पृथ्वीपर जितने जलाशय हैं, उनमें समुद्र सबसे बड़ा है। समुद्र सम्पूर्ण जलाशयोंका अधिपति है और अपनी मर्यादामें रहनेवाला तथा गम्भीर है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
यहाँ इन विभूतियोंकी जो अलौकिकता दीखती है, यह उनकी खुदकी नहीं है, प्रत्युत भगवान्की है और भगवान्से ही आयी है। अतः इनको देखनेपर भगवान्की ही स्मृति होनी चाहिये।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥
| महर्षीणाम् | = महर्षियोंमें | अक्षरम् | = अक्षर अर्थात् | जपयज्ञः | = जपयज्ञ (और) |
|---|---|---|---|---|---|
| भृगुः | = भृगु (और) | प्रणव | स्थावराणाम् | = स्थिर | |
| गिराम् | = वाणियों-(शब्दों-) | अहम् | = मैं | रहनेवालोंमें | |
| में | में | अस्मि | = हूँ। | हिमालयः | = हिमालय |
| एकम् | = एक | यज्ञानाम् | = सम्पूर्ण यज्ञोंमें | अस्मि | = मैं हूँ। |
व्याख्या—‘महर्षीणां भृगुरहम्’—भृगु, अत्रि, मरीचि आदि महर्षियोंमें भृगुजी बड़े भक्त, ज्ञानी और तेजस्वी हैं। इन्होंने ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन तीनोंकी परीक्षा करके भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ सिद्ध किया था। भगवान् विष्णु भी अपने वक्षःस्थलपर इनके चरणचिह्नको ‘भुगुलता’ नामसे धारण किये रहते हैं। इसलिये भगवान्ने इनको
अपनी विभूति बताया है।
‘गिरामस्येकमक्षरम्’—सबसे पहले तीन मात्रा-वाला प्रणव प्रकट हुआ। फिर प्रणवसे त्रिपदा गायत्री, त्रिपदा गायत्रीसे वेद और वेदोंसे शास्त्र, पुराण आदि सम्पूर्ण वाङ्मय जगत् प्रकट हुआ। अतः इन सबका कारण होनेसे और इन सबमें श्रेष्ठ होनेसे भगवान्ने एक अक्षर—