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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 730

श्लोक ३३ ]

  • साधक-संजीवनी *

७२९

परिशिष्ट भाव —लौकिक विद्याओंमें ‘अध्यात्मविद्या’ अर्थात् आत्मज्ञान श्रेष्ठ है। इसीको गीताके अध्यायोंकी पुष्पिकामें ‘ब्रह्मविद्या’ कहा गया है।

अध्यात्मविद्या अर्थात् आत्मज्ञानको अपनी विभूति बतानेका कारण है कि यह सबसे सरल है, सबसे सुगम है और सबके प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है। इसको करनेमें, समझनेमें और पानेमें कोई कठिनता है ही नहीं। इसमें करना, समझना और पाना लागू होता ही नहीं। कारण कि यह नित्यप्राप्त है और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें सदा ज्यों-का-त्यों मौजूद है। आत्मज्ञान जितना प्रत्यक्ष है, उतना प्रत्यक्ष यह संसार भी नहीं है। तात्पर्य है कि हमारे अनुभवमें आत्मज्ञान जितना स्पष्ट आता है, उतना स्पष्ट संसार नहीं आता। इस बातको इस प्रकार समझना चाहिये। हम अपने बालकपनको देखें और वर्तमान अवस्थाको देखें तो शरीर वही नहीं रहा, आदत वही नहीं रही, भाषा वही नहीं रही, व्यवहार वही नहीं रहा, स्थान वही नहीं रहा, समय वही नहीं रहा, साथी वही नहीं रहे, क्रियाएँ वही नहीं रहीं, विचार वही नहीं रहे; सब कुछ बदल गया, पर सत्तारूपसे हम स्वयं नहीं बदले, तभी हम कहते हैं कि ‘मैं तो वही हूँ, जो बालकपनमें था’। तात्पर्य यह हुआ कि जो बदल गया, वह अलग स्वभाववाला है और जो नहीं बदला, वह अलग स्वभाववाला है। जो नहीं बदला, वह हमारा असली स्वरूप अर्थात् शरीरी है और जो बदल गया, वह शरीर है। यह आत्मज्ञान है।

अक्षराणामकारोऽस्मि द्रुद्धः सामासिकस्य च।

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥

अक्षराणाम् | = अक्षरोंमें | अस्मि | = हूँ। | मुखवाला | ---|---|---|---|---|--- अकारः | = अकार | अक्षयः, कालः | = अक्षयकाल | धाता | = धाता (सबका च | = और | | अर्थात् | | पालन- सामासिकस्य | = समासोंमें | | कालका भी | | पोषण द्रुद्धः | = द्रुद्ध समास | | महाकाल (तथा) | | करनेवाला भी) अहम् | = मैं | विश्वतोमुखः | = सब ओर | अहम्, एव | = मैं ही हूँ।

व्याख्या —‘अक्षराणामकारोऽस्मि’—वर्णमालामें सर्वप्रथम अकार आता है। स्वर और व्यंजन—दोनोंमें अकार मुख्य है। अकारके बिना व्यंजनोंका उच्चारण नहीं होता। इसलिये अकारको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

‘द्रुद्धः सामासिकस्य च’ —जिससे दो या दोसे अधिक शब्दोंको मिलाकर एक शब्द बनता है, उसको समास कहते हैं। समास कई तरहके होते हैं। उनमें अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुब्रीहि और द्रुद्ध—ये चार मुख्य हैं। दो शब्दोंके समासमें यदि पहला शब्द प्रधानता रखता है तो वह ‘अव्ययीभाव समास’ होता है। यदि आगेका शब्द प्रधानता रखता है तो वह ‘तत्पुरुष समास’ होता है। यदि दोनों शब्द अन्यके वाचक होते हैं तो वह ‘बहुब्रीहि समास’ होता है। यदि दोनों

शब्द प्रधानता रखते हैं तो वह ‘द्रुद्ध समास’ होता है।

द्रुद्ध समासमें दोनों शब्दोंका अर्थ मुख्य होनेसे भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।

‘अहमेवाक्षयः कालः’ —जिस कालका कभी क्षय नहीं होता अर्थात् जो कालातीत है और अनादि-अनन्तरूप है, वह काल भगवान् ही हैं।

सर्ग और प्रलयकी गणना तो सूर्यसे होती है, पर महाप्रलयमें जब सूर्य भी लीन हो जाता है, तब समयकी गणना परमात्मासे ही होती है*। इसलिये परमात्मा अक्षय काल हैं।

तीसवें श्लोकके ‘कालः कलयतामहम्’ पदोंमें आये ‘काल’में और यहाँ आये ‘अक्षय काल’में क्या अन्तर है? वहाँका जो ‘काल’ है, वह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता,

  • महाप्रलयमें ब्रह्माजी लीन हो जाते हैं। महामर्गका अर्थात् ब्रह्माजीकी आयुका जितना समय होता है, उतना ही समय महाप्रलयका होता है। अतः इतने लम्बे (महाप्रलयके) समयकी गणना अक्षयकालरूप परमात्मासे ही होती है।