श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 731, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें७३०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
बदलता रहता है। वह काल ज्योतिष-शास्त्रका आधार है और उसीसे संसारमात्रके समयकी गणना होती है। परन्तु यहाँका जो 'अक्षय काल' है, वह परमात्मस्वरूप होनेसे कभी बदलता नहीं। वह अक्षयकाल सबको खा जाता है और स्वयं ज्यों-का-त्यों ही रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई विकार नहीं होता। उसी अक्षयकालको यहाँ भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। आगे ग्यारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने 'कालोऽस्मि' (११।३२) पदसे अक्षय कालको
अपना स्वरूप बताया है।
'धाताहं विश्वतोमुखः'—सब ओर मुखवाले होनेसे भगवान्की दृष्टि सभी प्राणियोंपर रहती है। अतः सबका धारण-पोषण करनेमें भगवान् बहुत सावधान रहते हैं। किस प्राणीको कौन-सी वस्तु कब मिलनी चाहिये, इसका भगवान् खूब ख्याल रखते हैं और समयपर उस वस्तुको पहुँचा देते हैं। इसलिये भगवान्ने अपना विभूतिरूपसे वर्णन किया है।
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीवाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥
सर्वहरः = सबका हरण करनेवाली मृत्युः = मृत्यु च = और भविष्यताम् = भविष्यमें उद्भवः = उत्पन्न होनेवाला
अहम् = मैं हूँ च = तथा नारीणाम् = स्त्री-जातिमें कीर्तिः = कीर्ति, श्रीः = श्री, वाक् = वाक् (वाणी),
स्मृतिः = स्मृति, मेधा = मेधा, धृतिः = धृति च = और क्षमा = क्षमा (मैं हूँ)।
व्याख्या —'मृत्युः सर्वहरश्चाहम्'—मृत्युमें हरण करनेकी ऐसी विलक्षण सामर्थ्य है कि मृत्युके बाद यहाँकी स्मृतिकत नहीं रहती, सब कुछ अपहत हो जाता है। वास्तवमें यह सामर्थ्य मृत्युकी नहीं है, प्रत्युत परमात्माकी है।
अगर सम्पूर्णका हरण करनेकी, विस्मृत करनेकी भगवत्प्रदत सामर्थ्य मृत्युमें न होती तो अपनेपने सम्बन्धको लेकर जैसी चिन्ता इस जन्ममें मनुष्यको होती है, वैसी ही चिन्ता पिछले जन्मके सम्बन्धको लेकर भी होती। मनुष्य न जाने कितने जन्म ले चुका है। अगर उन जन्मोंकी याद रहती तो मनुष्यकी चिन्ताओंका, उसके मोहका कभी अन्त आता ही नहीं। परन्तु मृत्युके द्वारा विस्मृति होनेसे पूर्वजन्मोंके कुटुम्ब, सम्पत्ति आदिकी चिन्ता नहीं होती। इस तरह मृत्युमें जो चिन्ता, मोह मिटानेकी सामर्थ्य है, वह सब भगवान्की ही है।
उद्भवश्च भविष्यताम् —जैसे पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि सबका धारण-पोषण करनेवाला मैं ही हूँ, वैसे ही यहाँ बताते हैं कि सब उत्पन्न होनेवालोंकी उत्पत्तिका हेतु भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाला मैं ही हूँ।
'कीर्तिः श्रीवाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा'—कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये सातों
संसारभरकी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इनमेंसे कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये पाँच प्रजापति दक्षकी कन्याएँ हैं, 'श्री' महर्षि भृगुकी कन्या है और 'वाक्' ब्रह्माजीकी कन्या है।
कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये सातों स्त्रीवाचक नामवाले गुण भी संसारमें प्रसिद्ध हैं। सदगुणोंको लेकर संसारमें जो प्रसिद्धि है, प्रतिष्ठा है, उसे 'कीर्ति' कहते हैं।
स्थावर और जंगम—यह दो प्रकारका ऐश्वर्य होता है। जमीन, मकान, धन, सम्पत्ति आदि स्थावर ऐश्वर्य हैं और गाय, भैंस, घोड़ा, ऊँट, हाथी आदि जंगम ऐश्वर्य हैं। इन दोनों ऐश्वर्योंको 'श्री' कहते हैं।
जिस वाणीको धारण करनेसे संसारमें यश-प्रतिष्ठा होती है और जिससे मनुष्य पण्डित, विद्वान् कहलाता है, उसे 'वाक्' कहते हैं।
पुरानी सुनी-समझी बातकी फिर याद आनेका नाम 'स्मृति' है।
बुद्धिकी जो स्थायीरूपसे धारण करनेकी शक्ति है अर्थात् जिस शक्तिसे विद्या ठीक तरहसे याद रहती है, उस शक्तिका नाम 'मेधा' है।
मनुष्यको अपने सिद्धान्त, मान्यता आदिपर डटे रखने