श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ३५ ]
- साधक-संजीवनी *
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तथा उनसे विचलित न होने देनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। दूसरा कोई बिना कारण अपराध कर दे, तो अपनेमें दण्ड देनेकी शक्ति होनेपर भी उसे दण्ड न देना और उसे लोक-परलोकमें कहीं भी उस अपराधका दण्ड न मिले—इस तरहका भाव रखते हुए उसे माफ कर देनेका नाम 'क्षमा' है। कीर्ति, श्री और वाक्—ये तीन प्राणियोंके बाहर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं तथा स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये चार प्राणियोंके भीतर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं। इन सातों विशेषताओंको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। यहाँ जो विशेष गुणोंको विभूतिरूपसे कहा है, उसका तात्पर्य केवल भगवान्की तरफ लक्ष्य करानेमें है। किसी व्यक्तिमें ये गुण दिखायी दें तो उस व्यक्तिकी विशेषता न मानकर भगवान्की ही विशेषता माननी चाहिये और भगवान्की ही याद आनी चाहिये। यदि ये गुण अपनेमें दिखायी दें तो इनको भगवान्के ही मानने चाहिये, अपने
नहीं। कारण कि यह देवी-( भगवान्की- ) सम्पत्ति है, जो भगवान्ने ही प्रकट हुई है। इन गुणोंको अपना मान लेनेसे अभिमान पैदा होता है, जिससे पतन हो जाता है; क्योंकि अभिमान सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्तिका जनक है।
साधकोंको जिस-किसीमें जो कुछ विशेषता, सामर्थ्य दीखे, उसे उस वस्तु-व्यक्तिका न मानकर भगवान्की ही मानना चाहिये। जैसे, लोमश ऋषिके शापसे काकभुशुण्डि ब्राह्मणसे चाण्डाल पक्षी बन गये, पर उनको न भय हुआ, न किसी प्रकारकी दीनता आयी और न कोई विचार ही हुआ, प्रत्युत उनको प्रसन्नता ही हुई। कारण कि उन्होंने इसमें ऋषिका दोष न मानकर भगवान्की प्रेरणा ही मानी—सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥ (मानस ७।११३।१)। ऐसे ही मनुष्य सब वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिके मूलमें भगवान्को देखने लगे तो हर समय आनन्द-ही-आनन्द रहेगा।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
| साम्नाम् | = गायी जानेवाली श्रुतियोंमें | छन्दसाम् | = सब छन्दोंमें | मार्गशीर्षः | = मार्गशीर्ष (और) |
|---|---|---|---|---|---|
| बृहत्साम | = बृहत्साम | गायत्री | = गायत्री छन्द | ऋतूनाम् | = छः ऋतुओंमें |
| तथा | = और | अहम् | = मैं हूँ। | कुसुमाकरः | = वसन्त |
| मासानाम् | = बारह महीनोंमें | अहम् | = मैं हूँ। |
व्याख्या —'बृहत्साम तथा साम्नाम्'—सामवेदमें बृहत्साम नामक एक गीति है। इसके द्वारा इन्द्ररूप परमेश्वरकी स्तुति की गयी है। अतिरात्रयागमें यह एक पृष्ठस्तोत्र है। सामवेदमें सबसे श्रेष्ठ होनेसे इस बृहत्सामको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है*।
'गायत्री छन्दसामहम्'—वेदोंकी जितनी छन्दोबद्ध ऋचाएँ हैं, उनमें गायत्रीकी मुख्यता है। गायत्रीको वेद-जननी कहते हैं; क्योंकि इसीसे वेद प्रकट हुए हैं। स्मृतियों और शास्त्रोंमें गायत्रीकी बड़ी भारी महिमा गायी गयी है। गायत्रीमें स्वरूप, प्रार्थना और ध्यान—तीनों परमात्माके ही होनेसे इससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। इसलिये भगवान्ने गायत्रीको अपनी विभूति बताया है।
'मासानां मार्गशीर्षोऽहम्'—जिस अन्तसे सम्पूर्ण
प्रजा जीवित रहती है, उस ( वर्षासे होनेवाले) अन्नकी उत्पत्ति मार्गशीर्ष महीनेमें होती है। इस महीनेमें नये अन्नसे यज्ञ भी किया जाता है। महाभारत-कालमें नया वर्ष मार्गशीर्षसे ही आरम्भ होता था। इन विशेषताओंके कारण भगवान्ने मार्गशीर्षको अपनी विभूति बताया है।
'ऋतूनां कुसुमाकरः'—वसन्त-ऋतुमें बिना वर्षाके ही वृक्ष, लता आदि पत्र-पुष्पोंसे युक्त हो जाते हैं। इस ऋतुमें न अधिक गरमी रहती है और न अधिक सरदी। इसलिये भगवान्ने वसन्त-ऋतुको अपनी विभूति कहा है।
इन सब विभूतियोंमें जो महत्ता, विशेषता दीखती है, वह केवल भगवान्की ही है। अतः चिन्तन केवल भगवान्का ही होना चाहिये।
- इस ( दसवें ) अध्यायके बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने वेदोंमें 'सामवेद' को अपनी विभूति बताया है और यहाँ ( पैंतीसवें श्लोकमें ) भगवान्ने सामवेदमें भी 'बृहत्साम' को अपनी विभूति बताया है।