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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 733

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

द्युतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥

छलयताम्= छल करनेवालोंमेंअस्मि= हूँ।सत्त्ववताम्= (और) सात्त्विक
द्युतम्= जुआ
(और)जयः= (जीतनेवालोंकी)
विजयमनुष्योंका
तेजस्विनाम्= तेजस्वियोंमेंअस्मि= मैं हूँ।सत्त्वम्= सात्त्विक
तेजः= तेजव्यवसायः= (निश्चय करने-
वालोंका) निश्चयअहम्= भाव
= मैं
अहम्= मैंअस्मि= हूँ।

व्याख्या —‘द्युतं छलयतामस्मि ’—छल करके दूसरोंके राज्य, वैभव, धन, सम्पत्ति आदिका (सर्वस्वका) अपहरण करनेकी विशेष सामर्थ्य रखनेवाली जो विद्या है, उसको जुआ कहते हैं। इस जुएको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

शंका —यहाँ भगवान्ने छल करनेवालोंमें जुएको अपनी विभूति बताया है तो फिर इसके खेलनेमें क्या दोष है? अगर दोष नहीं है तो फिर शास्त्रोंने इसका निषेध क्यों किया है।

समाधान —‘ऐसा करो और ऐसा मत करो’—यह शास्त्रोंका विधि-निषेध कहलाता है। ऐसे विधि-निषेधका वर्णन यहाँ नहीं है। यहाँ तो विभूतियोंका वर्णन है। ‘मैं आपका चिन्तन कहीं-कहाँ करूँ?’—अर्जुनके इस प्रश्नके अनुसार भगवान्ने विभूतियोंके रूपमें अपने चिन्तनकी बात ही बतायी है अर्थात् भगवान्का चिन्तन सुगमतासे हो जाय, इसका उपाय विभूतियोंके रूपमें बताया है। अतः जिस समुदायमें मनुष्य रहता है, उस समुदायमें जहाँ दृष्टि पड़े, वहाँ संसारको न देखकर भगवान्को ही देखें; क्योंकि भगवान् कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरेसे व्याप्त है अर्थात् इस जगत्में मैं ही व्याप्त हूँ, परिपूर्ण हूँ (गीता—नवें अध्यायका चौथा श्लोक)।

जैसे किसी साधकका पहले जुआ खेलनेका व्यसन रहा हो और अब वह भगवान्के भजनमें लगा है। उसको कभी जुआ याद आ जाय तो उस जुएका चिन्तन छोड़नेके लिये वह उसमें भगवान्का चिन्तन करे कि इस जुएके खेलमें हार-जीतकी जो विशेषता है, वह भगवान्की ही

है। इस प्रकार जुएमें भगवान्को देखनेसे जुएका चिन्तन तो छूट जायगा और भगवान्का चिन्तन होने लगेगा। ऐसे ही किसी दूसरेको जुआ खेलते देखा और उसमें हार-जीतको देखा, तो हराने और जितानेकी शक्तिको जुएकी न मानकर भगवान्की ही माने। कारण कि खेल तो समाप्त हो रहा है और समाप्त हो जायगा, पर परमात्मा उसमें निरन्तर रहते हैं और रहेंगे। इस प्रकार जुआ आदिको विभूति कहनेका तात्पर्य भगवान्के चिन्तनमें है।

जीव स्वयं साक्षात् परमात्माका अंश है, पर इसने भूलसे असत् शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। अगर यह संसारमें दीखनेवाली महत्ता, विशेषता, शोभा आदिको परमात्माकी ही मानकर परमात्माका चिन्तन करेगा तो यह परमात्माकी तरफ जायगा अर्थात् इसका उद्धार हो जायगा (गीता—आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); और अगर महत्ता, विशेषता, शोभा आदिको संसारकी मानकर संसारका चिन्तन करेगा तो यह संसारकी तरफ जायगा अर्थात् इसका पतन हो जायगा (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। इसलिये परमात्माका चिन्तन करते हुए परमात्माको तत्त्वसे जाननेके उद्देश्यसे ही इन विभूतियोंका वर्णन किया गया है।

तेजस्तेजस्विनामहम् ’१—महापुरुषोंके उस दैवी-सम्पत्तिवाले प्रभावका नाम तेज है, जिसके सामने पापी पुरुष भी पाप करनेमें हिचकते हैं। इस तेजको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

जयोऽस्मि ’—विजय प्रत्येक प्राणीको प्रिय लगती है। विजयकी यह विशेषता भगवान्की है। इसलिये विजयको

१-किसी ग्रन्थके किसी अंशपर शंका हो, तो उस ग्रन्थका आदिसे अन्ततक अध्ययन करके उसमें वक्ताके उद्देश्यको, लक्ष्यको और आशयको समझनेसे उस शंकाका समाधान हो जाता है।

२-सातवें अध्यायमें जहाँ भगवान्ने कारणरूपसे विभूतियोंका वर्णन किया है, वहाँ भी यही पद आया है—‘तेजस्तेजस्विनामहम्’ (७।१०)।