श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
बदलता रहता है। वह काल ज्योतिष-शास्त्रका आधार है और उसीसे संसारमात्रके समयकी गणना होती है। परन्तु यहाँका जो 'अक्षय काल' है, वह परमात्मस्वरूप होनेसे कभी बदलता नहीं। वह अक्षयकाल सबको खा जाता है और स्वयं ज्यों-का-त्यों ही रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई विकार नहीं होता। उसी अक्षयकालको यहाँ भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। आगे ग्यारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने 'कालोऽस्मि' (११।३२) पदसे अक्षय कालको
अपना स्वरूप बताया है।
'धाताहं विश्वतोमुखः'—सब ओर मुखवाले होनेसे भगवान्की दृष्टि सभी प्राणियोंपर रहती है। अतः सबका धारण-पोषण करनेमें भगवान् बहुत सावधान रहते हैं। किस प्राणीको कौन-सी वस्तु कब मिलनी चाहिये, इसका भगवान् खूब ख्याल रखते हैं और समयपर उस वस्तुको पहुँचा देते हैं। इसलिये भगवान्ने अपना विभूतिरूपसे वर्णन किया है।
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीवाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥
सर्वहरः = सबका हरण करनेवाली मृत्युः = मृत्यु च = और भविष्यताम् = भविष्यमें उद्भवः = उत्पन्न होनेवाला
अहम् = मैं हूँ च = तथा नारीणाम् = स्त्री-जातिमें कीर्तिः = कीर्ति, श्रीः = श्री, वाक् = वाक् (वाणी),
स्मृतिः = स्मृति, मेधा = मेधा, धृतिः = धृति च = और क्षमा = क्षमा (मैं हूँ)।
व्याख्या —'मृत्युः सर्वहरश्चाहम्'—मृत्युमें हरण करनेकी ऐसी विलक्षण सामर्थ्य है कि मृत्युके बाद यहाँकी स्मृतिकत नहीं रहती, सब कुछ अपहत हो जाता है। वास्तवमें यह सामर्थ्य मृत्युकी नहीं है, प्रत्युत परमात्माकी है।
अगर सम्पूर्णका हरण करनेकी, विस्मृत करनेकी भगवत्प्रदत सामर्थ्य मृत्युमें न होती तो अपनेपने सम्बन्धको लेकर जैसी चिन्ता इस जन्ममें मनुष्यको होती है, वैसी ही चिन्ता पिछले जन्मके सम्बन्धको लेकर भी होती। मनुष्य न जाने कितने जन्म ले चुका है। अगर उन जन्मोंकी याद रहती तो मनुष्यकी चिन्ताओंका, उसके मोहका कभी अन्त आता ही नहीं। परन्तु मृत्युके द्वारा विस्मृति होनेसे पूर्वजन्मोंके कुटुम्ब, सम्पत्ति आदिकी चिन्ता नहीं होती। इस तरह मृत्युमें जो चिन्ता, मोह मिटानेकी सामर्थ्य है, वह सब भगवान्की ही है।
उद्भवश्च भविष्यताम् —जैसे पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि सबका धारण-पोषण करनेवाला मैं ही हूँ, वैसे ही यहाँ बताते हैं कि सब उत्पन्न होनेवालोंकी उत्पत्तिका हेतु भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाला मैं ही हूँ।
'कीर्तिः श्रीवाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा'—कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये सातों
संसारभरकी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इनमेंसे कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये पाँच प्रजापति दक्षकी कन्याएँ हैं, 'श्री' महर्षि भृगुकी कन्या है और 'वाक्' ब्रह्माजीकी कन्या है।
कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये सातों स्त्रीवाचक नामवाले गुण भी संसारमें प्रसिद्ध हैं। सदगुणोंको लेकर संसारमें जो प्रसिद्धि है, प्रतिष्ठा है, उसे 'कीर्ति' कहते हैं।
स्थावर और जंगम—यह दो प्रकारका ऐश्वर्य होता है। जमीन, मकान, धन, सम्पत्ति आदि स्थावर ऐश्वर्य हैं और गाय, भैंस, घोड़ा, ऊँट, हाथी आदि जंगम ऐश्वर्य हैं। इन दोनों ऐश्वर्योंको 'श्री' कहते हैं।
जिस वाणीको धारण करनेसे संसारमें यश-प्रतिष्ठा होती है और जिससे मनुष्य पण्डित, विद्वान् कहलाता है, उसे 'वाक्' कहते हैं।
पुरानी सुनी-समझी बातकी फिर याद आनेका नाम 'स्मृति' है।
बुद्धिकी जो स्थायीरूपसे धारण करनेकी शक्ति है अर्थात् जिस शक्तिसे विद्या ठीक तरहसे याद रहती है, उस शक्तिका नाम 'मेधा' है।
मनुष्यको अपने सिद्धान्त, मान्यता आदिपर डटे रखने
श्लोक ३५ ]
- साधक-संजीवनी *
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तथा उनसे विचलित न होने देनेकी शक्तिका नाम 'धृति' है। दूसरा कोई बिना कारण अपराध कर दे, तो अपनेमें दण्ड देनेकी शक्ति होनेपर भी उसे दण्ड न देना और उसे लोक-परलोकमें कहीं भी उस अपराधका दण्ड न मिले—इस तरहका भाव रखते हुए उसे माफ कर देनेका नाम 'क्षमा' है। कीर्ति, श्री और वाक्—ये तीन प्राणियोंके बाहर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं तथा स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा—ये चार प्राणियोंके भीतर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं। इन सातों विशेषताओंको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। यहाँ जो विशेष गुणोंको विभूतिरूपसे कहा है, उसका तात्पर्य केवल भगवान्की तरफ लक्ष्य करानेमें है। किसी व्यक्तिमें ये गुण दिखायी दें तो उस व्यक्तिकी विशेषता न मानकर भगवान्की ही विशेषता माननी चाहिये और भगवान्की ही याद आनी चाहिये। यदि ये गुण अपनेमें दिखायी दें तो इनको भगवान्के ही मानने चाहिये, अपने
नहीं। कारण कि यह देवी-( भगवान्की- ) सम्पत्ति है, जो भगवान्ने ही प्रकट हुई है। इन गुणोंको अपना मान लेनेसे अभिमान पैदा होता है, जिससे पतन हो जाता है; क्योंकि अभिमान सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्तिका जनक है।
साधकोंको जिस-किसीमें जो कुछ विशेषता, सामर्थ्य दीखे, उसे उस वस्तु-व्यक्तिका न मानकर भगवान्की ही मानना चाहिये। जैसे, लोमश ऋषिके शापसे काकभुशुण्डि ब्राह्मणसे चाण्डाल पक्षी बन गये, पर उनको न भय हुआ, न किसी प्रकारकी दीनता आयी और न कोई विचार ही हुआ, प्रत्युत उनको प्रसन्नता ही हुई। कारण कि उन्होंने इसमें ऋषिका दोष न मानकर भगवान्की प्रेरणा ही मानी—सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥ (मानस ७।११३।१)। ऐसे ही मनुष्य सब वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिके मूलमें भगवान्को देखने लगे तो हर समय आनन्द-ही-आनन्द रहेगा।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
| साम्नाम् | = गायी जानेवाली श्रुतियोंमें | छन्दसाम् | = सब छन्दोंमें | मार्गशीर्षः | = मार्गशीर्ष (और) |
|---|---|---|---|---|---|
| बृहत्साम | = बृहत्साम | गायत्री | = गायत्री छन्द | ऋतूनाम् | = छः ऋतुओंमें |
| तथा | = और | अहम् | = मैं हूँ। | कुसुमाकरः | = वसन्त |
| मासानाम् | = बारह महीनोंमें | अहम् | = मैं हूँ। |
व्याख्या —'बृहत्साम तथा साम्नाम्'—सामवेदमें बृहत्साम नामक एक गीति है। इसके द्वारा इन्द्ररूप परमेश्वरकी स्तुति की गयी है। अतिरात्रयागमें यह एक पृष्ठस्तोत्र है। सामवेदमें सबसे श्रेष्ठ होनेसे इस बृहत्सामको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है*।
'गायत्री छन्दसामहम्'—वेदोंकी जितनी छन्दोबद्ध ऋचाएँ हैं, उनमें गायत्रीकी मुख्यता है। गायत्रीको वेद-जननी कहते हैं; क्योंकि इसीसे वेद प्रकट हुए हैं। स्मृतियों और शास्त्रोंमें गायत्रीकी बड़ी भारी महिमा गायी गयी है। गायत्रीमें स्वरूप, प्रार्थना और ध्यान—तीनों परमात्माके ही होनेसे इससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। इसलिये भगवान्ने गायत्रीको अपनी विभूति बताया है।
'मासानां मार्गशीर्षोऽहम्'—जिस अन्तसे सम्पूर्ण
प्रजा जीवित रहती है, उस ( वर्षासे होनेवाले) अन्नकी उत्पत्ति मार्गशीर्ष महीनेमें होती है। इस महीनेमें नये अन्नसे यज्ञ भी किया जाता है। महाभारत-कालमें नया वर्ष मार्गशीर्षसे ही आरम्भ होता था। इन विशेषताओंके कारण भगवान्ने मार्गशीर्षको अपनी विभूति बताया है।
'ऋतूनां कुसुमाकरः'—वसन्त-ऋतुमें बिना वर्षाके ही वृक्ष, लता आदि पत्र-पुष्पोंसे युक्त हो जाते हैं। इस ऋतुमें न अधिक गरमी रहती है और न अधिक सरदी। इसलिये भगवान्ने वसन्त-ऋतुको अपनी विभूति कहा है।
इन सब विभूतियोंमें जो महत्ता, विशेषता दीखती है, वह केवल भगवान्की ही है। अतः चिन्तन केवल भगवान्का ही होना चाहिये।
- इस ( दसवें ) अध्यायके बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने वेदोंमें 'सामवेद' को अपनी विभूति बताया है और यहाँ ( पैंतीसवें श्लोकमें ) भगवान्ने सामवेदमें भी 'बृहत्साम' को अपनी विभूति बताया है।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
द्युतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥
| छलयताम् | = छल करनेवालोंमें | अस्मि | = हूँ। | सत्त्ववताम् | = (और) सात्त्विक |
|---|---|---|---|---|---|
| द्युतम् | = जुआ | ||||
| (और) | जयः | = (जीतनेवालोंकी) | |||
| विजय | मनुष्योंका | ||||
| तेजस्विनाम् | = तेजस्वियोंमें | अस्मि | = मैं हूँ। | सत्त्वम् | = सात्त्विक |
| तेजः | = तेज | व्यवसायः | = (निश्चय करने- | ||
| वालोंका) निश्चय | अहम् | = भाव | |||
| = मैं | |||||
| अहम् | = मैं | अस्मि | = हूँ। |
व्याख्या —‘द्युतं छलयतामस्मि ’—छल करके दूसरोंके राज्य, वैभव, धन, सम्पत्ति आदिका (सर्वस्वका) अपहरण करनेकी विशेष सामर्थ्य रखनेवाली जो विद्या है, उसको जुआ कहते हैं। इस जुएको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
शंका —यहाँ भगवान्ने छल करनेवालोंमें जुएको अपनी विभूति बताया है तो फिर इसके खेलनेमें क्या दोष है? अगर दोष नहीं है तो फिर शास्त्रोंने इसका निषेध क्यों किया है।
समाधान —‘ऐसा करो और ऐसा मत करो’—यह शास्त्रोंका विधि-निषेध कहलाता है। ऐसे विधि-निषेधका वर्णन यहाँ नहीं है। यहाँ तो विभूतियोंका वर्णन है। ‘मैं आपका चिन्तन कहीं-कहाँ करूँ?’—अर्जुनके इस प्रश्नके अनुसार भगवान्ने विभूतियोंके रूपमें अपने चिन्तनकी बात ही बतायी है अर्थात् भगवान्का चिन्तन सुगमतासे हो जाय, इसका उपाय विभूतियोंके रूपमें बताया है। अतः जिस समुदायमें मनुष्य रहता है, उस समुदायमें जहाँ दृष्टि पड़े, वहाँ संसारको न देखकर भगवान्को ही देखें; क्योंकि भगवान् कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरेसे व्याप्त है अर्थात् इस जगत्में मैं ही व्याप्त हूँ, परिपूर्ण हूँ (गीता—नवें अध्यायका चौथा श्लोक)।
जैसे किसी साधकका पहले जुआ खेलनेका व्यसन रहा हो और अब वह भगवान्के भजनमें लगा है। उसको कभी जुआ याद आ जाय तो उस जुएका चिन्तन छोड़नेके लिये वह उसमें भगवान्का चिन्तन करे कि इस जुएके खेलमें हार-जीतकी जो विशेषता है, वह भगवान्की ही
है। इस प्रकार जुएमें भगवान्को देखनेसे जुएका चिन्तन तो छूट जायगा और भगवान्का चिन्तन होने लगेगा। ऐसे ही किसी दूसरेको जुआ खेलते देखा और उसमें हार-जीतको देखा, तो हराने और जितानेकी शक्तिको जुएकी न मानकर भगवान्की ही माने। कारण कि खेल तो समाप्त हो रहा है और समाप्त हो जायगा, पर परमात्मा उसमें निरन्तर रहते हैं और रहेंगे। इस प्रकार जुआ आदिको विभूति कहनेका तात्पर्य भगवान्के चिन्तनमें है।
जीव स्वयं साक्षात् परमात्माका अंश है, पर इसने भूलसे असत् शरीर-संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। अगर यह संसारमें दीखनेवाली महत्ता, विशेषता, शोभा आदिको परमात्माकी ही मानकर परमात्माका चिन्तन करेगा तो यह परमात्माकी तरफ जायगा अर्थात् इसका उद्धार हो जायगा (गीता—आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); और अगर महत्ता, विशेषता, शोभा आदिको संसारकी मानकर संसारका चिन्तन करेगा तो यह संसारकी तरफ जायगा अर्थात् इसका पतन हो जायगा (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)। इसलिये परमात्माका चिन्तन करते हुए परमात्माको तत्त्वसे जाननेके उद्देश्यसे ही इन विभूतियोंका वर्णन किया गया है।
‘तेजस्तेजस्विनामहम् ’१—महापुरुषोंके उस दैवी-सम्पत्तिवाले प्रभावका नाम तेज है, जिसके सामने पापी पुरुष भी पाप करनेमें हिचकते हैं। इस तेजको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
‘जयोऽस्मि ’—विजय प्रत्येक प्राणीको प्रिय लगती है। विजयकी यह विशेषता भगवान्की है। इसलिये विजयको
१-किसी ग्रन्थके किसी अंशपर शंका हो, तो उस ग्रन्थका आदिसे अन्ततक अध्ययन करके उसमें वक्ताके उद्देश्यको, लक्ष्यको और आशयको समझनेसे उस शंकाका समाधान हो जाता है।
२-सातवें अध्यायमें जहाँ भगवान्ने कारणरूपसे विभूतियोंका वर्णन किया है, वहाँ भी यही पद आया है—‘तेजस्तेजस्विनामहम्’ (७।१०)।
श्लोक ३७ ]
- साधक-संजीवनी *
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भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
अपने मनके अनुसार अपनी विजय होनेसे जो सुख होता है, उसका उपभोग न करके उसमें भगवदबुद्धि करनी चाहिये कि विजयरूपसे भगवान् आये हैं।
‘व्यवसायोऽस्मि’ —व्यवसाय नाम एक निश्चयका है। इस एक निश्चयकी भगवान्ने गीतामें बहुत महिमा गायी है; जैसे—कर्मयोगीकी निश्चयात्मिका बुद्धि एक होती है (दूसरे अध्यायका इकतालसीवर्ग श्लोक); भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त पुरुषोंकी निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती (दूसरे अध्यायका चौवालीसवर्ग श्लोक)। अब तो मैं केवल भगवान्का भजन ही करूँगा।—इस एक निश्चयके बलपर दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्यको भी भगवान् साधु बताते हैं (नवें अध्यायका तीसवर्ग श्लोक)। इस प्रकार भगवान्की तरफ चलनेका जो निश्चय है, उसको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
निश्चयको अपनी विभूति बतानेका तात्पर्य है कि साधकको ऐसा निश्चय तो रखना ही चाहिये, पर इसको अपना गुण नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत ऐसा मानना चाहिये कि यह भगवान्की विभूति है और उन्हींकी कृपासे मुझे प्राप्त हुई है।
‘सत्त्वं सत्त्ववतामहम्’ —सात्त्विक मनुष्योंमें जो सत्त्व गुण है, जो सात्त्विक भाव और आचरण है, वह भी भगवान्की विभूति है। तात्पर्य है कि रजोगुण और तमोगुणको दबाकर जो सात्त्विक भाव बढ़ता है, उस सात्त्विक भावको साधक अपना गुण न मानकर भगवान्की विभूति माने।
तेज, व्यवसाय, सात्त्विक भाव आदि अपनेमें अथवा दूसरोंमें देखनेमें आये तो साधक इनको अपना अथवा किसी वस्तु-व्यक्तिका गुण न माने, प्रत्युत भगवान्का ही गुण माने। उन गुणोंकी तरफ दृष्टि जानेपर उनमें तत्त्वतः भगवान्को देखकर भगवान्को ही याद करना चाहिये।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
| वृष्णीनाम् | = वृष्णिवंशियोंमें | धनञ्जयः | = अर्जुन | कवीनाम् | = कवियोंमें |
|---|---|---|---|---|---|
| वासुदेवः | = वसुदेवपुत्र श्रीकृष्ण | ||||
| (और) | अस्मि | = मैं हूँ। | उशना, कविः | = कवि शुक्राचार्य | |
| पाण्डवानाम् | = पाण्डवोंमें | मुनीनाम् | = मुनियोंमें | अपि | = भी |
| व्यासः | = वेदव्यास (और) | अहम् | = मैं हूँ। |
व्याख्या —‘वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि’—यहाँ भगवान् श्रीकृष्णके अवतारका वर्णन नहीं है, प्रत्युत वृष्णिवंशियोंमें अपनी जो विशेषता है, उस विशेषताको लेकर भगवान्ने अपना विभूतिरूपसे वर्णन किया है।
यहाँ भगवान्का अपनेको विभूतिरूपसे कहना तो संसारकी दृष्टिसे है, स्वरूपकी दृष्टिसे तो वे साक्षात् भगवान् ही हैं। इस अध्यायमें जितनी विभूतियाँ आयी हैं, वे सब संसारकी दृष्टिसे ही हैं। तत्त्वतः तो वे परमात्मस्वरूप ही हैं।
‘पाण्डवानां धनंजयः’ —पाण्डवोंमें अर्जुनकी जो विशेषता है, वह विशेषता भगवान्की ही है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनको अपनी विभूति बताया है।
‘मुनीनामप्यहं व्यासः’ —वेदका चार भागोंमें विभाग, पुराण, उपपुराण, महाभारत आदि जो कुछ संस्कृत वाङ्मय है, वह सब-का-सब व्यासजीकी कृपाका ही फल है। आज भी कोई नयी रचना करता है तो उसे भी व्यासजीका
ही उच्छिष्ट माना जाता है। कहा भी है—‘व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्।’ इस तरह सब मुनियोंमें व्यासजी मुख्य हैं। इसलिये भगवान्ने व्यासजीको अपनी विभूति बताया है। तात्पर्य है कि व्यासजीमें विशेषता दीखते ही भगवान्की याद आनी चाहिये कि यह सब विशेषता भगवान्की है और भगवान्से ही आयी है।
‘कवीनामुशना कविः’ —शास्त्रीय सिद्धान्तोंको ठीक तरहसे जाननेवाले जितने भी पण्डित हैं, वे सभी ‘कवि’ कहलाते हैं। उन सब कवियोंमें शुक्राचार्यजी मुख्य हैं। शुक्राचार्यजी संजीवनी विद्याके ज्ञाता हैं। इनकी शुक्रनीति प्रसिद्ध है। इस प्रकार अनेक गुणोंके कारण भगवान्ने इन्हें अपनी विभूति बताया है।
इन विभूतियोंकी महत्ता देखकर कहीं भी बुद्धि अटकें, तो उस महत्ताको भगवान्की ही माननी चाहिये; क्योंकि वह महत्ता एक क्षण भी स्थायीरूपसे न टिकनेवाले संसारकी नहीं हो सकती।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवासिम् गृह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
| दमयताम् | = दमन करनेवालोंमें | अस्मि | = मैं हूँ। | ज्ञानवताम् | = ज्ञानवानोंमें |
|---|---|---|---|---|---|
| दण्डः | = दण्डनीति (और) | गृह्यानाम् | = गोपनीय भावोंमें | ज्ञानम् | = ज्ञान |
| जिगीषताम् | = विजय चाहने- | ||||
| वालोंमें | मौनम् | = मौन | अहम् | = मैं | |
| नीतिः | = नीति | अस्मि | = मैं हूँ | एव | = ही |
| च | = और | अस्मि | = हूँ। |
व्याख्या —‘दण्डो दमयतामस्मि’—दुष्टोंको दुष्टतासे बचाकर सन्मार्गपर लानेके लिये दण्डनीति मुख्य है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।
‘नीतिरस्मि जिगीषताम्’—नीतिका आश्रय लेनेसे ही मनुष्य विजय प्राप्त करता है और नीतिसे ही विजय ठहरती है। इसलिये नीतिको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
‘मौनं चैवासिम् गृह्यानाम्’—गुप्त रखनेयोग्य जितने भाव हैं, उन सबमें मौन (वाणीका संयम अर्थात् चुप रहना) मुख्य है; क्योंकि चुप रहनेवालेके भावोंको हरेक व्यक्ति नहीं जान सकता। इसलिये गोपनीय भावोंमें
भगवान्ने मौनको अपनी विभूति बताया है।
‘ज्ञानं ज्ञानवतामहम्’—संसारमें कला-कौशल आदिको जाननेवालोंमें जो ज्ञान (जानकारी) है, वह भगवान्की विभूति है। तात्पर्य है कि ऐसा ज्ञान अपनेमें और दूसरोंमें देखनेमें आये, तो इसे भगवान्की ही विभूति माने।
यहाँ सामान्य शास्त्रज्ञानसे लेकर तत्त्वज्ञानतक सब-का-सब ज्ञान ‘ज्ञानं ज्ञानवतामहम्’ के अन्तर्गत ले सकते हैं।
इन सब विभूतियोंमें जो विलक्षणता है, वह इनकी व्यक्तिगत नहीं है, प्रत्युत परमात्माकी ही है। इसलिये परमात्माकी तरफ ही दृष्टि जानी चाहिये।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
| च | = और | अपि | = भी | अस्ति | = है, |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | अहम् | = मैं ही हूँ; | ||
| (क्योंकि) | यत् | = जो | |||
| सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंका | तत् | = वह | मया | = मेरे |
| यत् | = जो | चराचरम् | = चर-अचर (कोई) | विना | = बिना |
| बीजम् | = बीज (मूल कारण) | ||||
| है, | भूतम् | = प्राणी | स्यात् | = हो अर्थात् चर- | |
| अचर सब कुछ | |||||
| तत् | = वह बीज | न | = नहीं | मैं ही हूँ। |
व्याख्या —[भगवान्ने बीसवें श्लोकसे उन्तालीसवें श्लोकतक अपनी कुल बयासी विभूतियोंका वर्णन किया है; जैसे—बीसवें श्लोकमें चार, इक्कीसवें श्लोकमें चार, बाईसवें श्लोकमें चार, तेईसवें श्लोकमें चार, चौबीसवें श्लोकमें तीन, पचीसवें श्लोकमें चार, छब्बीसवें श्लोकमें चार, सत्ताईसवें श्लोकमें तीन, अट्ठाईसवें श्लोकमें चार, उन्तीसवें श्लोकमें चार, तीसवें श्लोकमें चार, इकतीसवें श्लोकमें चार, बत्तीसवें श्लोकमें पाँच, तैंतीसवें श्लोकमें चार, चौंतीसवें श्लोकमें नौ, पैंतीसवें श्लोकमें चार, छत्तीसवें श्लोकमें पाँच, सैंतीसवें श्लोकमें चार, अड़तीसवें
श्लोकमें चार और उन्तालीसवें श्लोकमें एक विभूतिका वर्णन किया है। ]
‘यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन’—यहाँ भगवान् समस्त विभूतियोंका सार बताते हैं कि सबका बीज अर्थात् कारण मैं ही हूँ। बीज कहनेका तात्पर्य है कि इस संसारका निमित्त कारण भी मैं हूँ और उपादान कारण भी मैं हूँ अर्थात् संसारको बनानेवाला भी मैं हूँ और संसाररूपसे बननेवाला भी मैं हूँ।
भगवान्ने सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें अपनेको ‘सनातन बीज’, नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें ‘अव्यय
श्लोक ३१]
- साधक-संजीवनी *
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बीज' और यहाँ केवल 'बीज' बताया है। इसका तात्पर्य है कि मैं ज्यों-का-त्यों रहता हुआ ही संसाररूपसे प्रकट हो जाता हूँ और संसाररूपसे प्रकट होनेपर भी मैं उसमें ज्यों-का-त्यों व्यापक रहता हूँ।
'न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्'— संसारमें जड़-चेतन, स्थावर-जंगम, चर-अचर आदि जो कुछ भी देखनेमें आता है, वह सब मेरे बिना नहीं हो सकता। सब मेरेसे ही होते हैं अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ। इस वास्तविक मूल तत्त्वको जानकर साधककी इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि जहाँ-कहीं जायँ अथवा मन-बुद्धिमें संसारकी जो कुछ बात याद आये, उन सबको भगवान्का ही स्वरूप माने। ऐसा माननेसे साधकको भगवान्का ही चिन्तन होगा, दूसरेका नहीं; क्योंकि तत्त्वसे भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं।
यहाँ भगवान्ने कहा है कि मेरे सिवाय चर-अचर कुछ नहीं है अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें कहा है कि सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके सिवाय कुछ नहीं है अर्थात् सब गुणोंका ही कार्य है। इस भेदका तात्पर्य है कि यहाँ भक्तियोगका प्रकरण है। इस प्रकरणमें अर्जुने प्रश्न किया है कि मैं आपका कहाँ-कहाँ चिन्तन करूँ? इसलिये उत्तरमें भगवान्ने कहा कि तेरे मनमें जिस-जिसका चिन्तन होता है, वह सब मैं ही हूँ। परन्तु वहाँ (१८।४० में) सांख्ययोगका प्रकरण है। सांख्ययोगमें प्रकृति और पुरुष—दोनोंके विवेककी तथा प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी प्रधानता है। प्रकृतिका कार्य होनेसे मात्र सृष्टि त्रिगुणमयी है। इसलिये वहाँ तीनों गुणोंसे रहित कोई नहीं है—ऐसा कहा गया है।
विशेष बात
भगवान्ने 'अहमात्मा गुडाकेश' (१०।२०)से लेकर 'बीजं तदहमर्जुन' (१०।३९) तक जो बयासी विभूतियाँ कही हैं, उनका तात्पर्य छोट-बड़ा, उत्तम-मध्यम-अधम
परिशिष्ट भाव —सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पत्तिके चार खानि (स्थान) हैं—१. जरायुज —जेरेके साथ पैदा होनेवाले मनुष्य, गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि; २. अण्डज —अण्डेसे पैदा होनेवाले पक्षी, साँप, गिलहरी, छिपकली आदि; ३. उद्भिज्ज —पृथ्वीका भेदन करके उपरकी तरफ निकलनेवाले वृक्ष, लता, दूब, घास, अनाज आदि; और ४. स्वेदज —
बतानेमें नहीं है, प्रत्युत यह बतानेमें है कि कोई भी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि सामने आये तो उसमें भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। कारण कि मूलमें अर्जुनका प्रश्न यही था कि आपका चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और किन-किन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ? (सत्रहवाँ श्लोक)। उस प्रश्नके उत्तरमें चिन्तन करनेके लिये ही भगवान्ने अपनी विभूतियोंका संक्षिप्त वर्णन किया है।
जैसे यहाँ गीतामें भगवान्ने अर्जुनसे अपनी विभूतियाँ कही हैं, ऐसे ही श्रीमद्भगवतमें (ग्यारहवें स्कन्धके सोलहवें अध्यायमें) भगवान्ने उद्धवजीसे अपनी विभूतियाँ कही हैं। गीतामें कही कुछ विभूतियाँ भगवतमें नहीं आयी हैं और भगवतमें कही कुछ विभूतियाँ गीतामें नहीं आयी हैं। गीता और भगवतमें कही गयी कुछ विभूतियोंमें तो समानता है, पर कुछ विभूतियोंमें दोनों जगह अलग-अलग बात आयी है; जैसे—गीतामें भगवान्ने पुरोहितोंमें बृहस्पतिको अपनी विभूति बताया है—'पुरोधसां च मुखं मां विद्भिद पार्थ बृहस्पतिम्'(१०।२४) और भगवतमें भगवान्ने पुरोहितोंमें वसिष्ठजीको अपनी विभूति बताया है—'पुरोधसां वसिष्ठोऽहम्'(११।१६।२२)। अब शंका यह होती है कि गीता और भगवतकी विभूतियोंका वका एक होनेपर भी दोनोंमें एक समान बात क्यों नहीं मिलती? इसका समाधान यह है कि वास्तवमें विभूतियाँ कहनेमें भगवान्का तात्पर्य किसी वस्तु, व्यक्ति आदिकी महत्ता बतानेमें नहीं है, प्रत्युत अपना चिन्तन करानेमें है। अतः गीता और भगवत—दोनों ही जगह कही हुई विभूतियोंमें भगवान्का चिन्तन करना ही मुख्य है। इस दृष्टिसे जहाँ-जहाँ विशेषता दिखायी दे, वहाँ-वहाँ वस्तु, व्यक्ति आदिकी विशेषता न देखकर केवल भगवान्की ही विशेषता देखनी चाहिये और भगवान्की ही तरफ वृत्ति जानी चाहिये।
१-इदं गुणमयं विद्भि त्रिविधं मायया कृतम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२८।७)
२-यच्च किंचिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥
(महानारायणोपनिषद् ११।६)
'यह जो कुछ भी जगत् देखने या सुननेमें आता है, इस सबको बाहर और भीतरसे व्याप्त करके भगवान् नारायण स्थित है।'
७३६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
पसीनेसे पैदा होनेवाले जूँ, लीख आदि तथा वर्षामें जमीनसे पैदा होनेवाले केंचुए आदि जीव। इन चार स्थानोंसे चौरासी लाख योनियों पैदा होती हैं। इन योनियोंमें दो तरहके जीव होते हैं—स्थायर और जंगम। वृक्ष, लता, दूब, घास आदि एक ही जगह रहनेवाले जीव 'स्थायर' हैं और मनुष्य, पशु, पक्षी आदि चलने-फिरनेवाले जीव 'जंगम' हैं। इन जीवोंमें भी कोई जलमें रहनेवाले हैं, कोई आकाशमें रहनेवाले हैं और कोई भूमिपर रहनेवाले हैं। इन चौरासी लाख योनियोंके सिवाय देवता, पितर, गन्धर्व, भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, पूतना, बालग्रह आदि कई योनियाँ हैं। इन सम्पूर्ण योनियोंके बीज अर्थात् मूल कारण भगवान् हैं। तात्पर्य है कि अनन्त ब्रह्माण्डोंमें अनन्त जीव हैं, पर उन सबका बीज एक ही है! इसलिये सब रूपोंमें एक भगवान् ही हैं—'वासुदेवः सर्वम्'।
जैसे बीजसे खेती होती है, ऐसे ही एक भगवान्से यह सम्पूर्ण संसार हुआ है। जिस प्रकार बाजरीसे बाजरी ही पैदा होती है, गेहूँसे गेहूँ ही होता है, पशुसे पशु ही होते हैं, मनुष्यसे मनुष्य ही होते हैं, इसी प्रकार भगवान्से भगवान् ही होते हैं अर्थात् संसाररूपसे भगवान् ही प्रकट होते हैं! जैसे सोनेसे बने गहने सोनारूप ही होते हैं, लोहेसे बने औजार लोहारूप ही होते हैं, मिट्टीसे बने बर्तन मिट्टीरूप ही होते हैं, रईसे बने वस्त्र रईरूप ही होते हैं, ऐसे ही भगवान्से होनेवाला संसार भी भगवद्रूप ही है।
लौकिक बीजसे तो एक ही प्रकारकी खेती पैदा होती है। जैसे, गेहूँके बीजसे गेहूँ ही पैदा होता है, ऐसा नहीं होता कि एक ही बीजसे गेहूँ भी पैदा हो जाय, बाजरी भी पैदा हो जाय, मोठ भी पैदा हो जाय, मूँग भी पैदा हो जाय। सबके बीज अलग-अलग होते हैं। परन्तु भगवान्रूपी बीज इतना विलक्षण बीज है कि उस एक ही बीजसे अनेक प्रकारकी सुष्ठि पैदा हो जाती है (गीता—चौदहवें अध्यायका चौथा श्लोक) और सब प्रकारकी सुष्ठि पैदा होनेपर भी उसमें कोई विकृति नहीं आती, वह ज्यों-का-त्यों रहता है; क्योंकि वह बीज 'अव्यय' है (गीता—नवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक) और 'सनातन' है। (गीता—सातवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनी दिव्य विभूतियोंके कथनका उपसंहार करते हैं।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
परन्तप | = हे परन्तप अर्जुन! | न | = नहीं | प्रोक्तः | = कहा है, ---|---|---|---|---|--- मम | = मेरी | अस्ति | = है। | एषः | = यह दिव्यानाम् | = दिव्य | मया | = मैंने (तुम्हारे सामने अपनी) | तु | = तो (केवल) विभूतीनाम् | = विभूतियोंका | विभूतेः | = विभूतियोंका जो | उद्देशतः | = संक्षेपसे नाममात्र कहा है। अन्तः | = अन्त | विस्तारः | = विस्तार | |
व्याख्या—'मम दिव्यानां * विभूतीनाम्'—'दिव्य' शब्द अलौकिकता, विलक्षणताका द्योतक है। साधकका मन जहाँ चला जाय, वहाँ भगवान्का चिन्तन करनेसे यह दिव्यता वहाँ प्रकट हो जायगी; क्योंकि भगवान्के समान दिव्य कोई है ही नहीं। देवता जो दिव्य कहे जाते हैं, वे भी नित्य ही भगवान्के दर्शनकी इच्छा रखते हैं—'नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः' (गीता ११।५२)। इससे यही सिद्ध होता है कि दिव्यातिदिव्य
तो एक भगवान् ही हैं। इसलिये भगवान्की जितनी भी विभूतियाँ हैं, तत्त्वसे वे सभी दिव्य हैं। परन्तु साधकके सामने उन विभूतियोंकी दिव्यता तभी प्रकट होती है, जब उसका उद्देश्य केवल एक भगवत्प्राप्तिका ही होता है और भगवतत्त्व जाननेके लिये राग-द्वेषसे रहित होकर उन विभूतियोंमें केवल भगवान्का ही चिन्तन करता है।
- अर्जुनने पहले प्रार्थनाके रूपमें पूछा था—'वकुर्मह्यस्थेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः' (१०।१६)। भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन आरम्भ करते हुए कहा—'हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः' (१०।१९)। और यहाँ उसका उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं—'नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप' (१०।४०)। इस तरह प्रार्थना- (प्रश्न- ) में, उपक्रममें और उपसंहारमें—तीनों जगह 'दिव्य' पदकी एकता है।
श्लोक ४० ]
- साधक-संजीवनी *
७३७
‘नान्तोऽस्ति’—भगवान्की दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है। कारण कि भगवान् अनन्त हैं तो उनकी विभूतियाँ, गुण, लीलाएँ आदि भी अनन्त हैं—‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’ (मानस १। १४०। ५)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंके उपक्रममें और उपसंहारमें—दोनों ही जगह कहा है कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंके विषयमें कहा है कि ‘मेरे द्वारा परमाणुओंकी संख्या समयसे गिनी जा सकती है, पर करोड़ों ब्रह्माण्डोंको रचनेवाली मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं पाया जा सकता।’
भगवान् अनन्त, असीम और अगाध हैं। संख्याकी दृष्टिसे भगवान् ‘अनन्त’ हैं अर्थात् उनकी गणना परार्द्धतक नहीं हो सकती। सीमाकी दृष्टिसे भगवान् ‘असीम’ हैं। सीमा दो तरहकी होती है—कालकृत और देशकृत। अमुक समय पैदा हुआ और अमुक समयतक रहेगा—यह कालकृत सीमा हुई; और यहाँसे लेकर वहाँतक—यह देशकृत सीमा हुई। भगवान् ऐसे सीमामें बँधे हुए नहीं हैं। तलकी दृष्टिसे भगवान् ‘अगाध’ हैं। अगाध शब्दमें ‘गाध’ नाम ‘तल’ का है; जैसे, जलमें नीचेका तल होता है। अगाधका
अर्थ हुआ—जिसका तल है ही नहीं, ऐसा अथाह गहरा।
‘एष दृहेश्तः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया’—अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि आप अपनी दिव्य विभूतियोंको विस्तारसे कहिये, तो उत्तरमें भगवान्ने कहा कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। ऐसा कहकर भी भगवान्ने अर्जुनकी जिज्ञासाके कारण कृपापूर्वक अपनी विभूतियोंका विस्तारसे वर्णन किया। परन्तु यह विस्तार केवल लौकिक दृष्टिसे ही है। इसलिये भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि मैंने यहाँ जो विभूतियोंका विस्तार किया है, वह विस्तार केवल तेरी दृष्टिसे ही है। मेरी दृष्टिसे तो यह विस्तार भी वास्तवमें बहुत ही संक्षेपसे (नाममात्रका) है; क्योंकि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है।
[इस अध्यायमें बतायी गयी सम्पूर्ण विभूतियाँ सबके काम नहीं आतीं, प्रत्युत ऐसी अनेक दूसरी विभूतियाँ भी काममें आती हैं, जिनका यहाँ वर्णन नहीं हुआ है। अतः साधकको चाहिये कि जहाँ-जहाँ किसी विशेषताको लेकर मन खिंचता हो, वहाँ-वहाँ उस विशेषताको भगवान्की ही माने और भगवान्का ही चिन्तन करे; चाहे वह विभूति यहाँ भगवान्द्वारा कही गयी हो अथवा न कही गयी हो।]
परिशिष्ट भाव —गीतामें भगवान्ने कारणरूपसे सत्रह विभूतियाँ (सातवें अध्यायके आठवेंसे बारहवें श्लोकतक), कार्य-कारणरूपसे सौतीस विभूतियाँ (नवें अध्यायके सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक), भावरूपसे बीस विभूतियाँ (दसवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक), व्यक्तिरूपसे पचीस विभूतियाँ (दसवें अध्यायका छठा श्लोक), मुख्यरूपसे तथा अधिपतिरूपसे इक्यासी विभूतियाँ (दसवें अध्यायके बीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक), साररूपसे एक विभूति (दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक) और प्रभावरूपसे तेरह विभूतियाँ (पन्द्रहवें अध्यायके बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक) बतायी हैं। इन सबका तात्पर्य यही है कि एक भगवान्के सैवाय कुछ नहीं है। सब रूपोंमें एक भगवान्-ही-भगवान् हैं। सब भगवान्का ही समग्ररूप है। असत् परिवर्तनशील है और सत् अपरिवर्तनशील है। ये सत् (परा) और असत् (अपरा)—दोनों ही भगवान्की विभूतियाँ हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९)। तात्पर्य है कि विभूतिरूपसे साक्षात् भगवान् ही हैं। अतः जिसमें हमारा आकर्षण होता है, वह वास्तवमें भगवान्का ही आकर्षण है। परंतु भोगबुद्धिके कारण वह आकर्षण भगवत्प्रेममें परिणत न होकर काम, आसक्तिमें परिणत हो जाता है, जो संसारमें बाँधनेवाला है।
गीतामें भगवान्ने ब्रह्मको भी ‘माम्’ (अपना स्वरूप) कहा है (आठवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), देवताओंको भी ‘माम्’ कहा है (नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), इन्द्रको भी ‘माम्’ कहा है (नवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), उत्तम गतिको भी ‘माम्’ कहा है (सातवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), क्षेत्रज्ञ-(जीवात्मा-)को भी ‘माम्’ कहा है (तेरहवें अध्यायका दूसरा श्लोक), सबके शरीरमें रहनेवाले अन्तर्यामीको भी ‘माम्’ कहा है (सोलहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), सम्पूर्ण प्राणियोंके बीजको भी ‘माम्’ कहा है (सातवें अध्यायका दसवाँ श्लोक) आदि। तात्पर्य है कि सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार तथा मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, भूत, प्रेत, पिशाच आदि जो कुछ भी है, वह सब मिलकर भगवान्का ही समग्ररूप है अर्थात् सब भगवान्की ही विभूतियाँ हैं, उनका ही ऐश्वर्य है। ये सब-की-सब
१-संख्यान परमाणूनां कालेन क्रियते मया। न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ (श्रीमद्भा० ११। १६। ३९)
२-सर्वे च देवा मनवस्समस्तासप्तर्षयो ये मनुमूनवश्च। इन्द्रश्च योऽयं त्रिदशेशभूतो विष्णोरशेषास्तु विभूतयस्ताः ॥
(विष्णुपुराण ३। १। ४६)
७३८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
विभूतियाँ अव्यय (अविनाशी) हैं।
यहाँ शंका होती है कि जब सम्पूर्ण संसार ही भगवत्स्वरूप है, तो फिर विभूति-वर्णनका तात्पर्य क्या है? इसका समाधान है कि अर्जुनका प्रश्न ही यही था कि मैं कहाँ-कहाँ आपका चिन्तन करूँ (इसी अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)? वास्तवमें सब कुछ भगवान्का समग्ररूप ही है, पर मनुष्यको जिस वस्तुमें विशेषता दीखती है, उस वस्तुमें भगवान्को देखना, उनका चिन्तन करना सुगम पड़ता है; क्योंकि मनमें उसकी विशेषता अंकित रहनेसे मन स्वतः उसमें जाता है। इसीलिये भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। मुख्य-मुख्य विभूतियोंका वर्णन करते हुए भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण प्राणियोंका एवं सृष्टिमात्रका आदि, मध्य तथा अन्त मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ और बत्तीसवाँ श्लोक), सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज मैं ही हूँ, मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है (इसी अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक), और सम्पूर्ण जगत् मेरे एक अंशमें स्थित है (इसी अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक), फिर भगवान्के सिवाय बाकी क्या रहा? कुछ भी बाकी नहीं रहा! सब कुछ भगवान् ही हुए—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)।
गीतामें विभूति-वर्णन गौण नहीं है, प्रत्युत यह भगवत्प्राप्तिका मुख्य साधन है, जिसकी सिद्धि ‘वासुदेवः सर्वम्’ में होती है। कारण कि संसारमें हमें जहाँ भी कोई विशेषता दिखायी दे, उसको भगवान्की ही विशेषता माननेसे हमारा आकर्षण उस वस्तु, व्यक्ति आदिमें न होकर भगवान्में ही होगा। जड़ताका आकर्षण, प्रियता ही मनुष्यको बाँधनेवाली है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिन्यम्सु’ (गीता १३।२१)। अतः विभूति-वर्णनका तात्पर्य संसारकी सत्ता, महत्ता और प्रियताको हटाकर मनुष्यको ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव कराना है, जो कि गीताका खास ध्येय है।
संसारकी सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध ही मनुष्यको बाँधनेवाला है। इसलिये संसारमें जहाँ मनुष्यका ज्यादा आकर्षण होता है, वहाँ उसकी भोगबुद्धि न होकर भगवदबुद्धि हो जायगी तो उसके अन्तःकरणमें संसारकी सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध न होकर भगवान्की सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध हो जायगा*।
सम्बन्ध—अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से विभूति और योग बतानेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान्ने पहले अपनी विभूतियोंको बताया और अब आगेके श्लोकमें योग बताते हैं।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्भूजितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
| यत्, यत् | = जो-जो | सत्त्वम् | = प्राणी तथा पदार्थ है, | तेजः | = तेज-(योग अर्थात् सामर्थ्य- )के |
|---|---|---|---|---|---|
| विभूतिमत् | = ऐश्वर्ययुक्त, | तत्, तत् | = उस-उसको | अंशसम्भवम् | = अंशसे |
| श्रीमत् | = शोभायुक्त | त्वम् | = तुम | उत्पन्न हुई | |
| वा | = और | मम | = मेरे | अवगच्छ | = समझो। |
| ऊर्जितम् | = बलयुक्त | एव | = ही |
व्याख्या—‘यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्भूजितमेव वा’—संसारमात्रमें जिस-किसी सजीव-निजीव वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, गुण, भाव, क्रिया आदिमें जो कुछ ऐश्वर्य दीखे, शोभा या सौन्दर्य दीखे, बलवत्ता दीखे तथा
जो कुछ भी विशेषता, विलक्षणता, योग्यता दीखे, उन सबको मेरे तेजके किसी एक अंशसे उत्पन्न हुई जानो। तात्पर्य है कि उनमें वह विलक्षणता मेरे योगसे, सामर्थ्यसे, प्रभावसे ही आयी है—ऐसा तुम समझो—‘तत्तदेवावगच्छ
‘समस्त देवता, मनु, सप्तर्षि तथा मनुपुत्र और देवताओंके अधिपति इन्द्र तथा इनके सिवाय जो कुछ है—ये सब-की-सब भगवान् विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं।’
- ‘नेरुषभीक्षणं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्। स्पर्धासूयातिरस्काराः साहंकारा विद्यन्ति हि ॥
(श्रीमद्भा० ११।२९।१५)
‘जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है अर्थात् उनमें मुझे ही देखता है, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषद्वेष, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित सर्वथा दूर हो जाते हैं।
श्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
७३९
त्वं मम तेजोऽशसम्भवम्। मेरे बिना कहीं भी और कुछ भी विलक्षणता नहीं है।
मनुष्यको जिस-जिसमें विशेषता मालूम दे, उस-उसमें भगवान्की ही विशेषता मानते हुए भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। अगर भगवान्को छोड़कर दूसरे वस्तु, व्यक्ति आदिकी विशेषता दीखती है, तो यह पतनका कारण है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने मनमें यदि पतिके सिवाय दूसरे किसी पुरुषकी विशेषता रखती है, तो उसका पातिव्रत्य भंग हो जाता है, ऐसे ही भगवान्के सिवाय दूसरी किसी वस्तुकी विशेषताको लेकर मन खिंचता है, तो व्यभिचार-दोष आ जाता है अर्थात् भगवान्के अनन्यभावका व्रत भंग हो जाता है।
संसारमें छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी वस्तु, व्यक्ति, क्रिया आदिमें जो भी महत्ता, सुन्दरता, सुखरूपता दीखती है और जो कुछ लाभरूप, हितरूप दीखता है, वह वास्तवमें सांसारिक वस्तुका है ही नहीं। अगर उस वस्तुका होता तो वह सब समय रहता और सबको दीखता, पर वह न तो सब समय रहता है और न सबको दीखता है। इससे सिद्ध होता है कि वह उस वस्तुका नहीं है। तो फिर किसका है? उस वस्तुका जो आधार है, उस परमात्माका है। उस परमात्माकी झलक ही उस वस्तुमें सुन्दरता, सुखरूपता आदि रूपोंसे दीखती है। परन्तु जब मनुष्यकी वृत्ति परमात्माकी महिमाकी तरफ न जाकर उस वस्तुकी तरफ ही जाती है, तब वह संसारमें फँस जाता है। संसारमें फँसनेपर उसको न तो कुछ मिलता है और न उसकी तृप्ति ही होती है। इसमें सुख नहीं है, इससे तृप्ति नहीं होती—इतना अनुभव होनेपर भी मनुष्यका वस्तु आदिमें सुखरूपताका वहम मिटता नहीं। मनुष्यको सावधानीके साथ विचारपूर्वक देखना चाहिये कि प्रतिक्षण मिटनेवाली वस्तुमें जो सुख दीखता है, वह उसका कैसे हो सकता है! वह वस्तु प्रतिक्षण नष्ट हो रही है तो उसमें दीखनेवाली महत्ता, सुन्दरता उस वस्तुकी कैसे हो सकती है!
जैसे बिजलीके सम्बन्धसे रेडियो बोलता है तो मनुष्य राजी होता है कि देखो, इस यन्त्रसे कैसी आवाज आ रही है! पर वास्तवमें उस रेडियोमें जो कुछ शक्ति है, वह सब बिजलीकी ही है। बिजलीसे सम्बन्ध न होनेपर केवल यन्त्रसे आवाज नहीं निकाली जा सकती। अनजान व्यक्ति तो उस शक्तिको यन्त्रकी ही मान लेता है, पर जानकार
व्यक्ति उस शक्तिको बिजलीकी ही मानता है। ऐसे ही किसी वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया आदिमें जो कुछ विशेषता दीखती है, उसको अनजान मनुष्य तो उस वस्तु, व्यक्ति आदिकी ही मान लेता है, पर जानकार मनुष्य उस विशेषताको भगवान्की ही मानता है।
इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि सब मेरेसे ही पैदा होते हैं और सबमें मेरी ही शक्ति है। इसमें भगवान्का तात्पर्य यही है कि तुम्हें जहाँ-कहीं और जिस-किसीमें विशेषता, महत्ता, सुन्दरता, बलवत्ता आदि दीखे, वह सब मेरी ही है, उनकी नहीं। एक वेश्या बड़े सुन्दर स्वरोंमें गाना गा रही थी, तो उसको सुनकर एक सन्त मस्त हो गये कि देखो! ठाकुरजीने कैसा कण्ठ दिया है! कितनी सुन्दर आवाज दी है! तो सन्तकी दृष्टि वेश्यापर नहीं गयी, प्रत्युत भगवान्पर गयी कि इसके कण्ठमें जो आकर्षण है, मिठास है, वह भगवान्की है। ऐसे ही कोई फूल दीखे तो राजी हो जाय कि वाह-वाह, भगवान्ने इसमें कैसी सुन्दरता भरी है! कोई किसीको बढिया पढ़ा रहा है तो बढिया पढ़ानेकी शक्ति भगवान्की है, पढ़ानेवालेकी नहीं। देवताओंको बृहस्पति प्रिय लगते हैं, रघुवंशियोंको वसिष्ठजी प्रिय लगते हैं, किसीको सिंहमें विशेषता दीखती है, किसीको रूपये बहुत प्यारे लगते हैं, तो उनमें जिस शक्ति, महत्ता, विशेषता आदिको लेकर आकर्षण, प्रियता, खिंचाव हो रहा है, वह शक्ति, महत्ता आदि भगवान्की ही है, उनकी अपनी नहीं। इस तरह जिस-किसीमें जहाँ-कहीं विशेषता दीखे, वह भगवान्की ही दीखनी चाहिये। इसलिये भगवान्ने अनेक तरहकी विभूतियाँ बतायी हैं। इसका तात्पर्य है कि उन विभूतियोंमें श्रद्धा, रुचिके भेदसे आकर्षण हरेकका अलग-अलग होगा, एक समान सबको विभूतियाँ अच्छी नहीं लगेंगी, पर उन सबमें शक्ति भगवान्की है।
यद्यपि जिस-किसीमें जो भी विशेषता है, वह परमात्माकी है, तथापि जिनसे हमें लाभ हुआ है अथवा हो रहा है, उनके हम जरूर कृतज्ञ बनें, उनकी सेवा करें। परन्तु उनकी व्यक्तिगत विशेषता मानकर वहाँ फँस न जायें—यह सावधानी रखें।
विशेष बात
भगवान्ने बीसवें श्लोकसे लेकर उन्नालीसवें श्लोकतक जितनी विभूतियाँ कही हैं, उनमें प्रायः 'अस्मि' (मैं हूँ) पदका प्रयोग किया है। केवल तीन
७४०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
जगह—चौबीसवें और सताईसवें श्लोकमें ‘विद्धि’ तथा यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें ‘अवगच्छ’ पदका प्रयोग करके ‘जानने’ की बात कही है।
‘अस्मि’ (मैं हूँ) पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य विभूतियोंके मूल तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है कि इन सब विभूतियोंके मूलमें मैं ही हूँ। कारण कि सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मैं आपको कैसे जानूँ, तो भगवान्ने ‘अस्मि’ का प्रयोग करके सब विभूतियोंमें अपनेको जाननेकी बात कही।
दो जगह ‘विद्धि’ पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य मनुष्यको सावधान, सावचेत करानेमें है। मनुष्य दोके द्वारा सावचेत होता है—जानके द्वारा और शासनके द्वारा। ज्ञान गुरुके द्वारा प्राप्त होता है और शासन स्वयं राजा करता है। अतः चौबीसवें श्लोकमें जहाँ गुरु बृहस्पतिका वर्णन आया है, वहाँ ‘विद्धि’ कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग गुरुके द्वारा मेरी विभूतियोंके तत्त्वको ठीक तरहसे समझो। विभूतियोंके तत्त्वको समझनेका फल है—मेरेमें दृढ़ भक्ति होना (गीता—इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक)। सताईसवें श्लोकमें जहाँ राजाका वर्णन आया है, वहाँ ‘विद्धि’ कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग राजाके शासनद्वारा उन्मागसे बचकर सम्मार्गमें लगना अर्थात् अपना जीवन शुद्ध बनाना
परिशिष्ट भाव —पहले कही गयी विभूतियोंके सिवाय भी साधकको स्वतः जिस-जिसमें व्यक्तिगत आकर्षण दीखता है, वहाँ-वहाँ भगवान्को ही देखना चाहिये अर्थात् वह विशेषता भगवान्की ही है—ऐसा दृढ़तासे धारण कर लेना चाहिये। भगवद्वुद्धि की दृढ़ता होनेसे संसार लुप्त हो जायगा; जैसे—सोनेके गहनोंमें सोनाबुद्धि होनेसे गहने लुप्त हो जाते हैं, खाँड़के खिलीनोंमें खाँड़बुद्धि होनेसे खिलीने लुप्त हो जाते हैं। कारण कि वास्तवमें संसार है नहीं। केवल जीवने ही अपने राग-द्वेषसे संसारको धारण कर रखा है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। सार बात यह है कि किसी भी तरह साधकको अन्तमें ‘वासुदेवः सर्वम्’ (सब कुछ भगवान् ही हैं) में ही पहुँचना है। इसीलिये भगवान्ने अरुन्धतीन्यायसे ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करानेके लिये ही विभूतियोंका वर्णन किया है; क्योंकि विभूतियोंमें भगवान्को देखनेसे फिर सब जगह भगवान् दीखने लग जायेंगे अर्थात् वस्तुरूपसे आकर्षण न रहकर भगवद्रूपसे आकर्षण हो जायगा।
मनुष्यमें जो भी विशेषता, विलक्षणता आती है, वह सब वास्तवमें भगवान्से ही आती है। अगर भगवान्में विशेषता, विलक्षणता न होती तो वह मनुष्यमें कैसे आती? जो चीज अंशोंमें नहीं है, वह अंशमें कैसे आ सकती है? मनुष्यसे यही भूल होती है कि वह उस विशेषताको अपनी विशेषता मानकर अभिमान कर लेता है और जहाँसे वह विशेषता आयी है, उस तरफ खयाल करता ही नहीं।
सृष्टिकी प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति आदि प्रतिक्षण नाशकी ओर जा रहे हैं। हम जिस वस्तु, व्यक्ति आदिमें सुन्दरता, बलवत्ता आदि विशेषता देखते हैं, वे एक दिन नष्ट हो जाते हैं। अतः सृष्टिकी प्रत्येक वस्तु मानो यह क्रियात्मक उपदेश दे रही है कि मेरी तरफ मत देखो, मैं तो रहूँगी नहीं, मेरेको बनानेवाले और बननेवालेकी तरफ देखो। मेरेमें जो सुन्दरता, सामर्थ्य, विलक्षणता आदि दीख रही है, यह मेरी नहीं है, प्रत्युत उसकी है! ऐसा जान लेनेपर फिर वस्तु, व्यक्ति आदिमें हमारा आकर्षण नहीं रहेगा और प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति आदिमें भगवान्के ही दर्शन होंगे। ऐसा होनेपर फिर भोग नहीं होगा, प्रत्युत स्वतः योग (भगवान्के साथ नित्य-सम्बन्ध) हो जायगा।
समझो। गुरु प्रेमसे समझाता है और राजा बलसे, भयसे समझाता है। गुरुके समझानेमें उद्धारकी बात मुख्य रहती है और राजाके समझानेमें लौकिक मर्यादाका पालन करनेकी बात मुख्य रहती है।
सताईसवें श्लोकमें जो ‘उच्चैःश्रवा’ और ‘ऐरावत’ का वर्णन आया है, वे दोनों राजाके वैभवके उपलक्षण हैं। कारण कि घोड़े, हाथी आदि राजाके ऐश्वर्य हैं और ऐश्वर्यवान् राजा ही शासन करता है। इसलिये उस श्लोकमें ‘विद्धि’ पदका प्रयोग खास करके राजाके लिये ही किया हुआ मालूम देता है।
यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें जो ‘अवगच्छ’ पद आया है, उसका अर्थ है—वास्तविकतासे समझना कि जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह वस्तुतः भगवान्की ही है।
इस प्रकार दो बार ‘विद्धि’ और एक बार ‘अवगच्छ’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि गुरु और राजाके द्वारा समझानेपर भी जबतक मनुष्य स्वयं उनकी बातको वास्तविकतासे नहीं समझेगा, उनकी बातको नहीं मानेगा, तबतक गुरुका ज्ञान और राजाका शासन उसके काम नहीं आयेगा। अन्तमें तो स्वयंको ही मानना पड़ेगा और वही उसके काम आयेगा।
श्लोक ४२ ]
- साधक-संजीवनी *
७४९
परमात्मा सम्पूर्ण शक्तियों, कलाओं, विद्याओं आदिके विलक्षण भण्डार हैं। शक्तियाँ जड़ प्रकृतिमें नहीं रह सकती, प्रत्युत चिन्मय परमात्मत्त्वमें ही रह सकती हैं। जिस ज्ञानसे क्रिया हो रही है, वह ज्ञान जड़में कैसे रह सकता है? अगर ऐसा मानें कि सब शक्तियाँ प्रकृतिमें ही हैं, तो भी यह मानना पड़ेगा कि उन शक्तियोंका प्राकट्य और उपयोग (सृष्टि-रचना आदि) करनेकी योग्यता प्रकृतिमें नहीं है। जैसे, कम्प्यूटर जड़ होते हुए भी अनेक चमत्कारिक कार्य करता है, पर उसका निर्माण और संचालन करनेवाला चेतन (मनुष्य) है। मनुष्यके द्वारा निर्मित, शिक्षित तथा संचालित हुए बिना वह कार्य नहीं कर सकता। कम्प्यूटर स्वतःसिद्ध नहीं है, प्रत्युत कृत्रिम (बनाया हुआ) है, जबकि परमात्मा स्वतःसिद्ध है।
अगर परमात्मामें विशेषता न होती तो वह संसारमें कैसे आती? जो विशेषता बीजमें होती है, वही वृक्षमें भी आती है। जो विशेषता बीजमें नहीं है, वह वृक्षमें कैसे आयेगी? उसी परमात्माकी कवित्व-शक्ति कविमें आती है, उसीकी वक्तुत्व-शक्ति वक्तामें आती है, उसीकी लेखन-शक्ति लेखकमें आती है, उसीकी दातुत्व-शक्ति दातामें आती है। मुक्ति, ज्ञान, प्रेम आदि सब उस परमात्माका ही दिया हुआ है। यह प्रकृतिका कार्य नहीं है। अगर 'मैं मुक्तस्वरूप हूँ'—यह बात सच्ची है तो फिर बन्धन कहाँसे आया, कैसे आया, कब आया और क्यों आया? अगर 'मैं ज्ञानस्वरूप हूँ'—यह बात सच्ची है तो फिर अज्ञान कहाँसे आया, कैसे आया, कब आया और क्यों आया? सूर्यमें अमावसकी रात कैसे आ सकती है? वास्तवमें ज्ञान है तो परमात्माका, पर मान लिया अपना, तभी अज्ञान आया है। मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञान मेरा है—यह 'मैं' और 'मेरा' (अहंता-ममता) ही अज्ञान हैं जिससे मुक्ति, ज्ञान, प्रेम आदि मिले हैं, उसकी तरफ दृष्टि न रहनेसे ही ऐसा दीखता है कि मुक्ति मेरी है, ज्ञान मेरा है, प्रेम मेरा है। यह तो देनेवाले-(परमात्मा-) की विलक्षणता है कि लेनेवालेको वह चीज अपनी ही मालूम देती है! परमात्माकी यह विलक्षणता महान् आदर्श है, जिसका साधकोंको आदर करना चाहिये। मनुष्यसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह मिली हुई वस्तुको तो अपनी मान लेता है, पर जहाँसे वह मिली है, उस देनेवालेकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं! वह मिली हुई वस्तुको तो देखता है, पर देनेवालेको देखता ही नहीं! कार्यको तो देखता है, पर जिसकी शक्तिसे कार्य हुआ, उस कारणको देखता ही नहीं! वास्तवमें वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत देनेवाला अपना है।
भगवान्की दी हुई सामर्थ्यसे ही मनुष्य कर्मयोगी होता है, उनके दिये हुए ज्ञानसे ही मनुष्य ज्ञानयोगी होता है और उनके दिये हुए प्रेमसे ही मनुष्य भक्तियोगी होता है। मनुष्यमें जो भी विलक्षणता, विशेषता देखनेमें आती है, वह सब-की-सब उन्हींकी दी हुई है। सब कुछ देकर भी वे अपनेको प्रकट नहीं करते—यह उनका स्वभाव है।
सम्बन्ध—यहाँतक अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर देकर अब भगवान् अपनी तरफसे खास बात बताते हैं।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
| अथवा | = अथवा | किम् | = क्या आवश्यकता है, | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन | = हे अर्जुन! | (जबकि) | जगत् | = जगत्को | |
| तव | = तुम्हें | अहम् | = मैं | विष्टभ्य | = व्याप्त करके |
| एतेन | = इस प्रकार | एकांशेन | = (अपने किसी) एक | स्थितः | = स्थित हूँ अर्थात् |
| बहुना | = बहुत-सी बातें | अंशसे | अनन्त ब्रह्माण्ड में | ||
| ज्ञातेन | = जाननेकी | इदम् | = इस | किसी एक अंशमें है। |
१-ज्ञान अथवा जाननेकी शक्ति प्रकृतिमें नहीं है। प्रकृति एकरस रहनेवाली नहीं है, प्रत्युत प्रतिक्षण बदलनेवाली है। अगर प्रकृतिमें ज्ञान होगा तो वह ज्ञान भी एकरस न रहकर बदलनेवाला हो जायगा। जो ज्ञान पैदा होगा, वह सदाके लिये नहीं होगा, प्रत्युत अनित्य होगा। अगर कोई माने कि ज्ञान प्रकृतिमें ही है तो उसी प्रकृतिको हम परमात्मा कहते हैं, केवल शब्दोंमें फर्क है! तात्पर्य यह हुआ कि ज्ञान प्रकृतिमें नहीं है, अगर है तो वही परमात्मा है।
२-मैं अरु मीर तोर तैं माया। जेहि बस कीन्हें जीव निकाया ॥ (मानस, अरण्य० १५।१)
७४२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
व्याख्या—‘अथवा’ —यह अव्यय-पद देकर भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि तुमने जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने उत्तर दिया ही है; अब मैं अपनी तरफसे तेरे लिये एक विशेष महत्वकी सार बात बताता हूँ।
‘बहुनेतैन किं ज्ञातेन तवार्जुन’ —भैया अर्जुन! तुम्हें इस प्रकार बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं घोड़ोंकी लगाम और चाबुक पकड़ते तेरे सामने बैठा हूँ। दीखनेमें तो मैं छोटा-सा दीखता हूँ, पर मेरे इस शरीरके किसी एक अंशमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड महासर्ग और महाप्रलय—दोनों अवस्थाओंमें मेरेमें स्थित हैं। उन सबको लेकर मैं तेरे सामने बैठा हूँ और तेरी आज्ञाका पालन करता हूँ! इसलिये जब मैं स्वयं तेरे सामने हूँ, तब तेरे लिये बहुत-सी बातें जाननेकी क्या जरूरत है?
‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ —मैं इस सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ—यह कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्के किसी भी अंशमें
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकका तात्पर्य है कि भगवान् ही जगत्-रूपसे स्थित हैं; क्योंकि व्याप्य और व्यापक, सूक्ष्म और महान्, सत् और असत्—दोनों भगवान् ही हैं। भगवान् अनन्त हैं, इसीलिये अनन्त ब्रह्माण्ड उनके किसी एक अंशमें स्थित हैं—‘एकांशेन स्थितो जगत्’।
भगवान्के कथनका तात्पर्य अपनी तरफ दृष्टि करानेमें है कि सब कुछ मैं ही तो हूँ! मेरी तरफ देखनेसे फिर कोई भी विभूति बाकी नहीं रहेगी। जब सम्पूर्ण विभूतियोंका आधार, आश्रय, प्रकाशक, बीज (मूल कारण) मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तो फिर विभूतियोंका चिन्तन करनेकी क्या जरूरत?
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार ‘ॐ, तत्, सत्’—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘विभूतियोग’ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १० ॥
जहाँ-कहीं जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह सब भगवान्की ही विभूति हैं—ऐसा माननेसे भगवान्के साथ योग-(सम्बन्ध-) का अनुभव हो जाता है। इसलिये दसवें अध्यायका नाम ‘विभूतियोग’ है।
दसवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ दशमोऽध्यायः’ के तीन, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके छः, श्लोकोंके पाँच सौ छप्पन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ अठहत्तर है।
(२) ‘अथ दशमोऽध्यायः’ के सात, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके बीस, श्लोकोंके एक हजार तीन सौ चौवालीस और पुष्पिकाके छियालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार चार सौ सत्रह है। इस
अनन्त सृष्टियों विद्यमान हैं—‘रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड’ (मानस १।२०१)। परन्तु उन सृष्टियोंसे भगवान्का कोई अंश, भाग रुका नहीं है अर्थात् भगवान्के किसी अंशमें उन सब सृष्टियोंके रहनेपर भी वहाँ खाली जगह पड़ी है। जैसे, प्रकृतिका बहुत शुद्ध अंश हमारी बुद्धि है। बुद्धिमें कई भाषाओंका, कई लिपियोंका, कई कलाओंका ज्ञान होनेपर भी हम ऐसा नहीं कह सकते कि हमारी बुद्धि अनेक भाषाओं आदिके ज्ञानसे भर गयी है; अतः अब दूसरी भाषा, लिपि आदि जाननेके लिये जगह नहीं रही। तात्पर्य है कि बुद्धिमें अनेक भाषाओं आदिका ज्ञान होनेपर भी बुद्धिमें जगह खाली ही रहती है और कितनी ही भाषाएँ आदि सीखनेपर भी बुद्धि भर नहीं सकती। इस प्रकार जब प्रकृतिका छोटा अंश बुद्धि भी अनेक भाषाओं आदिके ज्ञानसे नहीं भरती, तो फिर प्रकृतिसे अतीत, अनन्त, असीम और अगाध भगवान्का कोई अंश अनन्त सृष्टियोंसे कैसे भर सकता है? वह तो बुद्धिकी अपेक्षा भी विशेषरूपसे खाली रहता है।
अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें तीन उवाच हैं—दो ‘श्रीभगवानुवाच’ और एक ‘अर्जुन उवाच’।
दसवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके बयालीस श्लोकोंमेंसे—दूसरे और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न विपुला’; सातवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा पाँचवें और बत्तीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; आठवें श्लोकके प्रथम चरणमें और छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’ और छठे श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष छत्तीस श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ एकादशोऽध्यायः
अवतरणिका—
दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनपर विशेष कृपा करके कहा कि सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अनन्त सृष्टियों मेरे किसी एक अंशमें हैं और वह मैं तेरा सारथि बना हुआ तेरे घोड़ोंकी लगाम और चानुक लेकर बैठा हूँ तथा तेरी आज्ञाका पालन कर रहा हूँ! जब सब विभूतियों और योग-(प्रभाव-) का महान् आधार मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तब तुझे अलग-अलग विभूतियोंको जाननेकी क्या आवश्यकता है? इस बातको सुनकर जब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की महती कृपापर गयी, तब वे बड़े आश्चर्यमें डूब जाते हैं और बोल उठते हैं—
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गृह्यमध्यात्मसञ्जितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥
अर्जुन बोले—
| मदनुग्रहाय | = केवल मुझपर कृपा | गृह्यम् | = गोपनीय | तेन | = उससे |
|---|---|---|---|---|---|
| करनेके लिये | अध्यात्म- | मम | = मेरा | ||
| त्वया | = आपने | सञ्जितम् | = अध्यात्म-विषयक | अयम् | = यह |
| यत् | = जो | वचः | = वचन | मोहः | = मोह |
| परमम् | = परम | उक्तम् | = कहे, | विगतः | = नष्ट हो गया है। |
व्याख्या —[भगवान्की कृपाका अनुभव करके अर्जुन भावविभोर हो उठे और कृपाका रहस्य प्रकट करनेके लिये जब अत्यधिक प्रसन्नतासे बोले, तब नियमका खयाल न रहनेसे यह श्लोक तैंतीस अक्षरोंका आया है, जब कि गीताभरमें अनुष्टुप् छन्दवाले श्लोक बत्तीस अक्षरोंके ही आये हैं। तात्पर्य है कि अत्यधिक प्रसन्नता होनेपर नियमका ध्यान नहीं रहता।]
'मदनुग्रहाय' —मेरा भजन करनेवालोंपर कृपा करके मैं स्वयं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारका नाश कर देता हूँ (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)—यह बात भगवान्ने केवल कृपा-परवश होकर कही। इस बातका अर्जुनपर बड़ा प्रभाव पड़ा, जिससे अर्जुन भगवान्की स्तुति
करने लगे (दसवें अध्यायके बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक)। ऐसी स्तुति उन्होंने पहले गीतामें कहीं नहीं की। उसीका लक्ष्य करके अर्जुन यहाँ कहते हैं कि केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने ऐसी बात कही है*।
'परमं गृह्यम्' —अपनी प्रधान-प्रधान विभूतियोंको कहनेके बाद भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें अपनी ओरसे कहा कि मैं अपने किसी अंशमें सम्पूर्ण जगत्को, अनन्त-कोटि ब्रह्माण्डोंको व्याप्त करके स्थित हूँ (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक) अर्थात् भगवान्ने खुद अपना परिचय दिया कि मैं कैसा हूँ। इसी बातको अर्जुन परम गोपनीय मानते हैं।
'अध्यात्मसञ्जितम्' —दसवें अध्यायके सातवें
- ऐसे तो पहले अध्यायसे लेकर यहाँतक भगवान्ने जो कुछ कहा है वह सब कृपा-परवश होकर ही कहा है। वास्तवमें भगवान्की सम्पूर्ण क्रियाओंमें कृपा भरी रहती है, पर मनुष्य उसे पहचानता नहीं। भगवान्की कृपाको पहचाननेपर भगवत्तत्त्वका अनुभव बहुत सुगमतासे और शीघ्रतासे हो जाता है। अर्जुनका लक्ष्य भी जब भगवत्कृपाकी ओर जाता है, तब वे विभोर होकर कह उठते हैं कि आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया।
७४४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् सम्पूर्ण विभूतियोंके मूलमें भगवान् ही हैं और सम्पूर्ण विभूतियाँ भगवान्की सामर्थ्यसे ही प्रकट होती हैं तथा अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाती हैं—ऐसा तत्त्वसे जानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसी बातको अर्जुन अध्यात्मसंज्ञित मान रहे हैं।
‘यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम’— सम्पूर्ण जगत् भगवान्ने किसी एक अंशमें है—इस बातपर पहले अर्जुनकी दृष्टि नहीं थी और वे स्वयं इस बातको जानते भी नहीं थे, यही उनका मोह था। परन्तु जब भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें व्याप्त करके मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तब अर्जुनकी इस तरफ
दृष्टि गयी कि भगवान् कितने विलक्षण हैं! उनके किसी एक अंशमें अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं और वे वैसे-के-वैसे रहते हैं! इस मोहके नष्ट होते ही अर्जुनको यह खयाल आया कि पहले जो मैं इस बातको नहीं जानता था, वह मेरा मोह ही था। इसलिये अर्जुन यहाँ अपनी दृष्टिसे कहते हैं कि भगवान्! मेरा यह मोह सर्वथा चला गया है। परन्तु ऐसा कहनेपर भी भगवान्ने इसको (अर्जुनके मोहनाशको) स्वीकार नहीं किया; क्योंकि आगे उनचासवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि तेरेको व्यथा और मूढ़भाव (मोह) नहीं होना चाहिये—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावः।’
परिशिष्ट भाव— अर्जुन कहते हैं कि आपने जो वचन कहे हैं, वे केवल मेरेपर कृपा करके ही कहे हैं, अपनी विद्वत्ता बतानेके लिये नहीं। इसमें केवल कृपाके अलावा और कोई हेतु नहीं है।
सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज हूँ, (दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक), ऐश्वर्य, शोभा और बलसे युक्त प्रत्येक वस्तुको मेरे ही योगके अंशसे उत्पन्न हुई समझो (दसवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), मैं अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हूँ, (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)—इन वचनोंको सुननेसे अर्जुनको ऐसा लगा कि मेरा मोह नष्ट हो गया। परन्तु वास्तवमें उनका आंशिक मोह नष्ट हुआ है, पूरा नहीं।
सम्बन्ध—मोह कैसे नष्ट हो गया—इसीको आगेके श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥
| हि | = क्योंकि | विनाश | च | = और (आपका) |
|---|---|---|---|---|
| कमलपत्राक्ष | = हे कमलनयन ! | मया | = मैंने | अव्ययम् |
| भूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंके | विस्तरशः | = विस्तारपूर्वक | माहात्म्यम् |
| भवाप्ययौ | = उत्पत्ति तथा | त्वतः | = आपसे ही | अपि |
| श्रुतौ | = सुने हैं | (सुना है)। |
व्याख्या— भवाप्ययौ हि भूतानां त्वतः श्रुतौ विस्तरशो मया’—भगवान्ने पहले कहा था—मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ, मेरे सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है (सातवें अध्यायका छठा-सातवाँ श्लोक); सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं (सातवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक); प्राणियोंके अलग-अलग अनेक तरहके
भाव मेरेसे ही होते हैं (दसवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक); सम्पूर्ण प्राणी मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सब चेष्टा करते हैं (दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक); प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक) और सम्पूर्ण सृष्टियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका
१-भगवान्ने अभीतक भक्तिकी जितनी बातें कही हैं, वे सब-की-सब परम गोपनीय अध्यात्म उपदेश हैं।
२-मोहके रहते हुए मोहका ज्ञान नहीं होता, प्रत्युत मोहके चले जानेपर ही मोहका ज्ञान होता है और ज्ञान होनेपर मोह रहता ही नहीं।
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
७४५
बत्तीसाँ श्लोक)। इसीको लेकर अर्जुन यहाँ कहते हैं कि मैंने आपसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका वर्णन विस्तारसे सुना है। इसका तात्पर्य प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाश सुननेसे नहीं है, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह सुननेसे है कि सभी प्राणी आपसे ही उत्पन्न होते हैं, आपमें ही रहते हैं और आपमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् सब कुछ आप ही हैं। 'माहात्म्यमपि चाव्ययम्'—आपने दसवें अध्यायके सातवें श्लोकमें बताया कि मेरी विभूति और योगको
तत्वसे जानता है, वह अविकम्प भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इस प्रकार आपकी विभूति और योगको तत्वसे जाननेका माहात्म्य भी मैंने सुना है। माहात्म्यको 'अव्यय' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्की विभूति और योगको तत्वसे जाननेपर भगवान्में जो भक्ति होती है, प्रेम होता है, भगवान्से अभिन्नता होती है, वह सब अव्यय है। कारण कि भगवान् अव्यय, नित्य हैं तो उनकी भक्ति, प्रेम भी अव्यय ही होगा।
परिशिष्ट भाव—इस श्लोकमें अर्जुन अपनी दृष्टिसे मोह नष्ट होनेका कारण बताते हैं। 'माहात्म्यमपि चाव्ययम्'—यहाँ 'अपि' पदसे ऐसा अर्थ निकलता है कि अर्जुनने भगवान्का विनाशी माहात्म्य भी सुना है और अविनाशी माहात्म्य भी सुना है। 'भवाप्ययौ हि भूतानाम्'—यह भगवान्का विनाशी अर्थात् परिवर्तनशील माहात्म्य है। मनुष्य भगवान्के साथ किसी भी प्रकारसे सम्बन्ध जोड़ ले तो वह कल्याण ही करेगा—यह भगवान्का अविनाशी अर्थात् अपरिवर्तनशील माहात्म्य है। तात्पर्य है कि सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—'सदसच्चाहम्' (गीता ९।१९)।
सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन विराटरूपके दर्शनके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥
पुरुषोत्तम = हे पुरुषोत्तम! त्वम् = आप आत्मानम् = अपने-आपको यथा = जैसा आत्थ = कहते हैं, एतत् = यह (वास्तवमें) एवम् = ऐसा ही है। परमेश्वर = हे परमेश्वर! ते = आपके ऐश्वरम् = ईश्वर-सम्बन्धी रूपम् = रूपको (मैं) द्रष्टुम् = देखना इच्छामि = चाहता हूँ।
व्याख्या—पुरुषोत्तम'—यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि हे भगवन्! मेरी दृष्टिमें इस संसारमें आपके समान कोई उत्तम, श्रेष्ठ नहीं है अर्थात् आप ही सबसे उत्तम, श्रेष्ठ हैं। इस बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने भी कहा है कि मैं क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हूँ; अतः मैं शास्त्र और वेदमं पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। 'एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानम्'—हे पुरुषोत्तम! आपने (सातवें अध्यायसे दसवें अध्यायतक) मेरे प्रति अपने अलौकिक प्रभावका, सामर्थ्यका जो कुछ वर्णन किया, वह वास्तवमें ऐसा ही है। यह संसार मेरेसे ही उत्पन्न होता है और मेरेमें ही लीन हो जाता है (सातवें अध्यायका छठा श्लोक), मेरे सिवाय
इसका और कोई कारण नहीं है (सातवें अध्यायका सातवाँ श्लोक), सब कुछ वासुदेव ही है (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधिज्ञरूपमें मैं ही हूँ (सातवें अध्यायका उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक), अनन्य भक्तिसे प्रापणीय परम तत्त्व मैं ही हूँ (आठवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), मेरेसे ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, पर मैं संसारमें और संसार मेरेमें नहीं है (नवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक), सत् और असत्-रूपसे सब कुछ मैं ही हूँ (नवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), मैं ही संसारका मूल कारण हूँ और मेरेसे ही सारा संसार सत्ता-स्फूर्ति पाता है (दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक), यह सारा संसार मेरे ही किसी एक अंशमें स्थित है (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)
७४६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
आदि-आदि। अपने-आपको आपने जो कुछ कहा है, वह सब-का-सब यथार्थ ही है।
‘परमेश्वर’—भगवान्के मुखसे अर्जुनने पहले सुना है कि ‘मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ—‘भूतानामिश्वरोऽपि’ (४।६); ‘सर्वलोक-महेश्वरम्’ (५।२९)। इसलिये अर्जुन यहाँ भगवान्के विलक्षण प्रभावसे प्रभावित होकर उनके लिये ‘परमेश्वर’ सम्बोधन देते हैं, जिसका तात्पर्य है कि हे भगवन्! वास्तवमें आप ही परम ईश्वर हैं, आप ही सम्पूर्ण ऐश्वर्यके मालिक हैं।
‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरम्’—अर्जुन कहते हैं कि मैंने आपसे आपका माहात्म्यसहित प्रभाव सुन लिया है और इस विषयमें मेरे हृदयमें दृढ़ विश्वास भी हो गया है। ‘सम्पूर्ण संसार मेरे शरीरके एक अंशमें है’—इसे सुनकर मेरे मनमें आपके उस रूपको देखनेकी उत्कट लालसा हो रही है।
दूसरा भाव यह है कि आप इतने विलक्षण और महान् होते हुए भी मेरे साथ कितना स्नेह रखते हैं, कितनी आत्मीयता रखते हैं कि मैं जैसा कहता हूँ, वैसा ही आप करते हैं और जो कुछ पूछता हूँ, उसका आप उत्तर देते हैं। इस कारण आपसे कहनेका, पूछनेका किंचिन्मात्र भी संकोच न होनेसे मेरे मनमें आपका वह रूप देखनेकी बहुत इच्छा हो रही है, जिसके एक अंशमें सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि आप अपनी पूरी-की-पूरी विभूतियाँ कह दीजिये, बाकी मत रखिये—‘वक्तुमहैत्यशेषेण’, तो भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन करते हुए उपक्रममें और उपसंहारमें
परिशिष्ट भाव —अर्जुनके कथनका तात्पर्य है कि अब उसमें कोई सन्देह नहीं रहा है। सब कुछ आप ही हैं—यह ठीक ऐसा ही है। अब केवल आपका ईश्वर-सम्बन्धी रूप देखना बाकी रह गया है।
उपदेश दो तरहसे होता है—कहना और करके दिखाना। पहले दसवें अध्यायमें भगवान्ने अपने समग्ररूपका वर्णन किया कि मैं अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हूँ। अब इस अध्यायमें अर्जुन उसी रूपको प्रत्यक्ष दिखानेकी प्रार्थना करते हैं।
कहा कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है (दसवें अध्यायका उन्नीसवाँ और चालीसवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन संक्षेपसे ही किया। परन्तु यहाँ जब अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके एक रूपको देखना चाहता हूँ—‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्’, तब भगवान् आगे (पाँचवें श्लोकमें) कहेंगे कि तू मेरे सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख। जैसे संसारमें कोई किसीसे लालचपूर्वक अधिक माँगता है, तो देनेवालेमें देनेका भाव कम हो जाता है और वह कम देता है। इसके विपरीत यदि कोई संकोचपूर्वक कम माँगता है, तो देनेवाला उदारतापूर्वक अधिक देता है। ऐसे ही वहाँ अर्जुनने स्पष्टरूपसे कह दिया कि आप सब-की-सब विभूतियाँ कह दीजिये तो भगवान्ने कहा कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा। इस बातको लेकर अर्जुन सावधान हो जाते हैं कि अब मेरे कहनेमें ऐसी कोई अनुचित बात न आ जाय। इसलिये अर्जुन यहाँ संकोचपूर्वक कहते हैं कि अगर मेरे द्वारा आपका विराट्रूप देखा जा सकता है तो दिखा दीजिये। अर्जुनके इस संकोचको देखकर भगवान् बड़ी उदारतापूर्वक कहते हैं कि तू मेरे सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख ले।
दूसरा भाव यह है कि अर्जुनके रथमें एक जगह बैठे हुए भगवान्ने यह कहा कि ‘तू जो मेरे इस शरीरको देख रहा है, इसके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् (जिसके अन्तर्गत अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं) व्याप्त है।’ तात्पर्य है कि भगवान्का छोटा-सा शरीर है और उस छोटे-से शरीरके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् है। अतः उस एक अंशमें स्थित रूपको मैं देखना चाहता हूँ—यही अर्जुनके ‘रूपम्’ (एक रूप) कहनेका आशय मालूम देता है।
मैंने आपकी बातोंको सुनकर ठीक समझ लिया है और यह ठीक ऐसा ही है। अब केवल आपका ईश्वर-सम्बन्धी
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मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥
श्लोक ५
- साधक-संजीवनी *
७४७
प्रभो = हे प्रभो! मया = मेरे द्वारा तत् = (आपका) वह ऐश्वर-रूप द्रष्टुम् = देखा शक्यम् = जा सकता है इति = —ऐसा यदि = अगर मन्यसे = (आप) मानते हैं, ततः = तो योगेश्वर = हे योगेश्वर! त्वम् = आप आत्मानम् = अपने (उस) अव्ययम् = अविनाशी स्वरूपको मे = मुझे दर्शय = दिखा दीजिये।
व्याख्या—'प्रभो'—'प्रभु' नाम सर्वसमर्थका है, इसलिये इस सम्बोधनका भाव यह मालूम देता है कि यदि आप मेरेमें विराट्रूप देखनेकी सामर्थ्य मानते हैं, तब तो ठीक है; नहीं तो आप मेरेको ऐसी सामर्थ्य दीजिये, जिससे मैं आपका वह ऐश्वर (ईश्वर-सम्बन्धी) रूप देख सकूँ।
हठयोग, राजयोग, लययोग, मन्त्रयोग आदि जितने भी योग हो सकते हैं, उन सबके आप मालिक हैं, इसलिये आप अपनी अलौकिक योगशक्तिसे वह विराट्रूप भी दिखा दीजिये।
'मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति'—इसका तात्पर्य है कि अगर आप अपना वह रूप नहीं दिखायेंगे, तो भी मैं यही मानूँगा कि आपका रूप तो वैसा ही है, जैसा आप कहते हैं, पर मैं उसको देखनेका अधिकारी नहीं हूँ, योग्य नहीं हूँ, पात्र नहीं हूँ। इस प्रकार अर्जुनको भगवान्के वचनोंमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है, प्रत्युत दृढ़ विश्वास है। इसीलिये तो वे कहते हैं कि आप मेरेको अपना विराट्रूप दिखाइये।
अर्जुनने दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें भगवान्के लिये 'योगिन्' सम्बोधन दिया था अर्थात् भगवान्को योगी बताया था; परन्तु अब अर्जुनने भगवान्के लिये 'योगेश्वर' सम्बोधन दिया है अर्थात् भगवान्को सम्पूर्ण योगोंका मालिक बताया है। कारण यह है कि दसवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनकी भगवान्के प्रति जो धारणा थी, उस धारणामें अब बहुत परिवर्तन हुआ है।
'योगेश्वर'—'योगेश्वर' सम्बोधन देनेका यह भाव मालूम देता है कि भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, 'ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्'—आपका वह स्वरूप तो अविनाशी ही है, जिससे अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं। आप अपने ऐसे अविनाशी स्वरूपके दर्शन कराये।
परिशिष्ट भाव—भगवान्के विश्वरूपको 'अव्यय' (अविनाशी) कहनेसे यह सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण संसार भगवान्का ही स्वरूप है। अव्यय होनेसे इसका अत्यन्त अभाव नहीं होता (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका पहला श्लोक)। वास्तवमें परिवर्तनशील (असत्) और अपरिवर्तनशील (सत्)—दोनों ही मिलकर भगवान्का समग्ररूप है—'सदसच्चाहमर्जुन'। जड़ता केवल अपनी आसक्ति और अज्ञानके कारण ही प्रतीत होती है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनकी नम्रतापूर्वक की हुई प्रार्थनाको सुनकर अब भगवान् अर्जुनको विश्वरूप देखनेके लिये आज्ञा देते हैं।
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥५॥
श्रीभगवान् बोले—
पार्थ = हे पृथानन्दन! अथ = अब मे = मेरे नानाविधानि = अनेक तरहके च = और नाना-वर्णाकृतीनि = अनेक वर्णों (रंगों) तथा आकृतियोंवाले शतशः = सैकड़ों- सहस्रशः = हजारों दिव्यानि = अलौकिक रूपाणि = रूपोंको पश्य = (तू) देख।
७४८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
व्याख्या—‘पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽश सहस्रशः’— अर्जुनकी संकोचपूर्वक प्रार्थनाको सुनकर भगवान् अत्यधिक प्रसन्न हुए; अतः अर्जुनके लिये ‘पार्थ’ सम्बोधनका प्रयोग करते हुए कहते हैं कि तू मेरे रूपोंको देख। रूपोंमें भी तीन-चार नहीं, प्रत्युत सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख अर्थात् अनगिनत रूपोंको देख। भगवान्ने जैसे विभूतियोंके विषय कहा है कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं आ सकता, ऐसे ही यहाँ भगवान्ने अपने रूपोंकी अनन्तता बतायी है।
‘नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च’— अब भगवान् उन रूपोंकी विशेषताओंका वर्णन करते हैं कि उनकी तरह-तरहकी बनावट है। उनके रंग भी तरह-तरहके हैं अर्थात् कोई किसी रंगका तो कोई किसी रंगका, कोई पीला तो कोई लाल आदि-आदि। उनमें भी एक-एक रूपमें कई तरहके रंग हैं। उन रूपोंकी आकृतियाँ भी तरह-तरहकी हैं अर्थात् कोई छोटा तो कोई मोटा, कोई
परिशिष्ट भाव— अर्जुनने तो अपनेको असमर्थ मानकर भगवान्से अपना एक ऐश्वररूप दिखानेकी प्रार्थना की थी और उसको भगवान्की इच्छापर छोड़ दिया था, पर भगवान् उनको सैकड़ों-हजारों रूपोंको देखनेकी बात कहते हैं। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्की इच्छापर छोड़नेसे साधकको जो लाभ होता है, वह अपनी इच्छासे, अपनी बुद्धिसे नहीं होता। कारण कि मनुष्य कितनी ही विद्याएँ, कला-कौशल आदि सीख ले, कितने ही शास्त्र पढ़ ले तो भी उसकी बुद्धि तुच्छ, सीमित ही रहती है। साधकमें जितनी सरलता, निर्बलता, निरभिमानताका भाव होगा, उतना ही वह भगवान्को जानेगा। अपना अभिमान करके साधक भगवान्को जाननेमें आड़ ही लगाता है। वह जितना समझदार बनता है, उतना ही बेसमझ रहता है। अपनेको समझदार माननेसे वह समझदारीका गुलाम हो जाता है। वह जितना निरभिमान होता है, समझदारीका अभिमान नहीं करता, उतना ही वह समझदार होता है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने विश्वरूपमें तरह-तरहके वर्णों और आकृतियोंको देखनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें देवताओंको देखनेकी बात कहते हैं।
पश्य्यादित्यान्वसूरुद्रानशिवनौ मरुतस्तथा ।
बहून्वटृष्टपूर्वाणि पश्य्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥
भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | अश्विनौ | = दो अश्विनी- कुमारोंको | अटृष्टपूर्वाणि | = जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं, ---|---|---|---|---|--- आदित्यान् | = बारह आदित्योंको, | तथा | = तथा | बहूनि | = (ऐसे) बहुत-से वसुन् | = आठ वसुओंको, | मरुतः | = उन्चास | आश्चर्याणि | = आश्चर्यजनक रुद्रान् | = ग्यारह रुद्रोंको (और) | पश्य | = देख। | रूपोंको (भी) | | | | | पश्य | = (तू) देख।
व्याख्या—पश्य्यादित्यान्वसूरुद्रानशिवनौ मरुतस्तथा’— अदितिके पुत्र धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु—ये बारह ‘आदित्य’ हैं (महा०, आदि० पैंसठवाँ अध्याय,
लम्बा तो कोई चौड़ा आदि-आदि।
जैसे पृथ्वीका एक छोटा-सा कण भी पृथ्वी ही है, ऐसे ही भगवान्के अनन्त, अपार विश्वरूपका एक छोटा-सा अंश होनेके कारण यह संसार भी विश्वरूप ही है। परन्तु यह हरेकके सामने दिव्य विश्वरूपसे प्रकट नहीं है, प्रत्युत संसाररूपसे ही प्रकट है। कारण कि मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ न होकर नाशवान् संसारकी तरफ ही रहती है। जैसे अवतार लेनेपर भगवान् सबके सामने भगवद्रूपसे प्रकट नहीं रहते (गीता—सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक), प्रत्युत मनुष्यरूपसे ही प्रकट रहते हैं, ऐसे ही विश्वरूपभगवान् सबके सामने संसाररूपसे ही प्रकट रहते हैं अर्थात् हरेकको यह विश्वरूप संसाररूपसे ही दीखता है। परन्तु यहाँ भगवान् अपने दिव्य अविनाशी विश्वरूपसे साक्षात् प्रकट होकर अर्जुनको कह रहे हैं कि तू मेरे दिव्य रूपोंको देख।
पन्द्रहवाँ-सोलहवाँ श्लोक।
धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ ‘वसु’ हैं (महा०, आदि० छाछठवाँ अध्याय, अठारहवाँ श्लोक)।
श्लोक [ ७ ]
- साधक-संजीवनी *
७४९
हर, बहरूप, ज्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपदी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह ‘रुद्र’ हैं (हरिवंश० पहला पर्व, तीसरा अध्याय, इक्यावनवाँ-बावनवाँ श्लोक)।
‘अश्विनीकुमार’ दो हैं। ये दोनों भाई देवताओंके वैद्य हैं।
सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित्, सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्, अन्यादृक्, यादृक्, प्रतिकृत, ऋक्, समिति, संरम्भ, ईदृश, पुरुष, अन्यादृश, चेतस, समिता, समिदृश, प्रतिदृश, मरुति, सरत, देव, दिश, यजूः, अनुदृक्, साम, मानुष और विश्व—ये उनचास ‘मरुत’ हैं (वायुपुराण, सङ्गठवाँ अध्याय, एक सौ तेईसवेंसे एक सौ तीसवें
परिशिष्ट भाव —पिछले श्लोकमें भगवान्ने विराट् रूपमें अनेक तरहके और अनेक रंगों तथा आकृतियोंवाले रूपोंको देखनेकी बात कही थी, अब उसी बातको इस श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।
भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि सभी देवता मेरे स्वरूप हैं अर्थात् उन देवताओंके रूपमें मैं ही हूँ (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध —भगवान्द्वारा विश्वरूप देखनेकी आज्ञा देनेपर अर्जुनकी यह जिज्ञासा हो सकती है कि मैं इस रूपको कहाँ देखूँ? अतः भगवान् कहते हैं—
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्वद्वष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
गुडाकेश | = हे नींदको जीतने- वाले अर्जुन! | सचराचरम् | = चराचरसहित | और ---|---|---|---|--- मम | = मेरे | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण | च | = भी इह | = इस | जगत् | = जगत्को | यत् | = जो कुछ देहे | = शरीरके | अद्य | = अभी | द्वष्टुम् | = देखना एकस्थम् | = एक देशमें | पश्य | = देख ले। | इच्छसि | = चाहता है, (वह भी देख ले) | | अन्यत् | = इसके सिवाय (तू) | |
व्याख्या—‘गुडाकेश’ —निद्रापर अधिकार प्राप्त करनेसे अर्जुनको ‘गुडाकेश’ कहते हैं। यहाँ यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तू निरालस्य होकर सावधानीसे मेरे विश्वरूपको देख।
‘इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्, मम देहे’ —दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने कहा था कि मैं सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ। इसीपर
श्लोकतक) —इन सबको तू मेरे विराट् रूपमें देख।
बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस कोटि (तैंतीस प्रकारके) देवता सम्पूर्ण देवताओंमें मुख्य हैं। देवताओंमें मरुदृगणोंका नाम भी आता है, पर वे उनचास मरुदृगण इन तैंतीस प्रकारके देवताओंसे अलग माने जाते हैं; क्योंकि वे सभी दैत्योंसे देवता बने हैं। इसलिये भगवान्ने भी ‘तथा’ पद देकर मरुदृगणोंको अलग बताया है।
‘बहुन्यद्वष्टुपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत’ —तुमने इन रूपोंको पहले कभी आँखोंसे नहीं देखा है, कानोंसे नहीं सुना है, मनसे चिन्तन नहीं किया है, बुद्धिसे कल्पना नहीं की है। इन रूपोंकी तरफ तुम्हारी कभी वृत्ति ही नहीं गयी है। ऐसे बहुत—से अद्वष्टुपूर्व रूपोंको तू अब प्रत्यक्ष देख ले।
इन रूपोंके देखते ही आश्चर्य होता है कि अहो! ऐसे भी भगवान्के रूप हैं! ऐसे अद्भुत रूपोंको तू देख।
अर्जुनके मनमें विश्वरूप देखनेकी इच्छा हुई। अतः भगवान् कहते हैं कि हाथमें घोड़ोंकी लगाम और चाबुक लेकर तेरे सामने बैठे हुए मेरे इस शरीरके एक देश—(अंश—) में चर—अचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख। एक देशमें देखनेका अर्थ है कि तू जहाँ दृष्टि डालेगा, वहाँ तेरेको अनन्त ब्रह्माण्ड दीखेंगे। तू मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस, भूत, पशु, पक्षी आदि चलने—फिरनेवाले जंगम और वृक्ष, लता, घास, पौधा