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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

व्याख्या—‘पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽश सहस्रशः’— अर्जुनकी संकोचपूर्वक प्रार्थनाको सुनकर भगवान् अत्यधिक प्रसन्न हुए; अतः अर्जुनके लिये ‘पार्थ’ सम्बोधनका प्रयोग करते हुए कहते हैं कि तू मेरे रूपोंको देख। रूपोंमें भी तीन-चार नहीं, प्रत्युत सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख अर्थात् अनगिनत रूपोंको देख। भगवान्ने जैसे विभूतियोंके विषय कहा है कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं आ सकता, ऐसे ही यहाँ भगवान्ने अपने रूपोंकी अनन्तता बतायी है।

‘नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च’— अब भगवान् उन रूपोंकी विशेषताओंका वर्णन करते हैं कि उनकी तरह-तरहकी बनावट है। उनके रंग भी तरह-तरहके हैं अर्थात् कोई किसी रंगका तो कोई किसी रंगका, कोई पीला तो कोई लाल आदि-आदि। उनमें भी एक-एक रूपमें कई तरहके रंग हैं। उन रूपोंकी आकृतियाँ भी तरह-तरहकी हैं अर्थात् कोई छोटा तो कोई मोटा, कोई

परिशिष्ट भाव— अर्जुनने तो अपनेको असमर्थ मानकर भगवान्से अपना एक ऐश्वररूप दिखानेकी प्रार्थना की थी और उसको भगवान्की इच्छापर छोड़ दिया था, पर भगवान् उनको सैकड़ों-हजारों रूपोंको देखनेकी बात कहते हैं। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्की इच्छापर छोड़नेसे साधकको जो लाभ होता है, वह अपनी इच्छासे, अपनी बुद्धिसे नहीं होता। कारण कि मनुष्य कितनी ही विद्याएँ, कला-कौशल आदि सीख ले, कितने ही शास्त्र पढ़ ले तो भी उसकी बुद्धि तुच्छ, सीमित ही रहती है। साधकमें जितनी सरलता, निर्बलता, निरभिमानताका भाव होगा, उतना ही वह भगवान्को जानेगा। अपना अभिमान करके साधक भगवान्को जाननेमें आड़ ही लगाता है। वह जितना समझदार बनता है, उतना ही बेसमझ रहता है। अपनेको समझदार माननेसे वह समझदारीका गुलाम हो जाता है। वह जितना निरभिमान होता है, समझदारीका अभिमान नहीं करता, उतना ही वह समझदार होता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने विश्वरूपमें तरह-तरहके वर्णों और आकृतियोंको देखनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें देवताओंको देखनेकी बात कहते हैं।

पश्य्यादित्यान्वसूरुद्रानशिवनौ मरुतस्तथा ।

बहून्वटृष्टपूर्वाणि पश्य्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥

भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | अश्विनौ | = दो अश्विनी- कुमारोंको | अटृष्टपूर्वाणि | = जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं, ---|---|---|---|---|--- आदित्यान् | = बारह आदित्योंको, | तथा | = तथा | बहूनि | = (ऐसे) बहुत-से वसुन् | = आठ वसुओंको, | मरुतः | = उन्चास | आश्चर्याणि | = आश्चर्यजनक रुद्रान् | = ग्यारह रुद्रोंको (और) | पश्य | = देख। | रूपोंको (भी) | | | | | पश्य | = (तू) देख।

व्याख्या—पश्य्यादित्यान्वसूरुद्रानशिवनौ मरुतस्तथा’— अदितिके पुत्र धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु—ये बारह ‘आदित्य’ हैं (महा०, आदि० पैंसठवाँ अध्याय,

लम्बा तो कोई चौड़ा आदि-आदि।

जैसे पृथ्वीका एक छोटा-सा कण भी पृथ्वी ही है, ऐसे ही भगवान्के अनन्त, अपार विश्वरूपका एक छोटा-सा अंश होनेके कारण यह संसार भी विश्वरूप ही है। परन्तु यह हरेकके सामने दिव्य विश्वरूपसे प्रकट नहीं है, प्रत्युत संसाररूपसे ही प्रकट है। कारण कि मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ न होकर नाशवान् संसारकी तरफ ही रहती है। जैसे अवतार लेनेपर भगवान् सबके सामने भगवद्रूपसे प्रकट नहीं रहते (गीता—सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक), प्रत्युत मनुष्यरूपसे ही प्रकट रहते हैं, ऐसे ही विश्वरूपभगवान् सबके सामने संसाररूपसे ही प्रकट रहते हैं अर्थात् हरेकको यह विश्वरूप संसाररूपसे ही दीखता है। परन्तु यहाँ भगवान् अपने दिव्य अविनाशी विश्वरूपसे साक्षात् प्रकट होकर अर्जुनको कह रहे हैं कि तू मेरे दिव्य रूपोंको देख।

पन्द्रहवाँ-सोलहवाँ श्लोक।

धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ ‘वसु’ हैं (महा०, आदि० छाछठवाँ अध्याय, अठारहवाँ श्लोक)।