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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 748

श्लोक ५

  • साधक-संजीवनी *

७४७

प्रभो = हे प्रभो! मया = मेरे द्वारा तत् = (आपका) वह ऐश्वर-रूप द्रष्टुम् = देखा शक्यम् = जा सकता है इति = —ऐसा यदि = अगर मन्यसे = (आप) मानते हैं, ततः = तो योगेश्वर = हे योगेश्वर! त्वम् = आप आत्मानम् = अपने (उस) अव्ययम् = अविनाशी स्वरूपको मे = मुझे दर्शय = दिखा दीजिये।

व्याख्या—'प्रभो'—'प्रभु' नाम सर्वसमर्थका है, इसलिये इस सम्बोधनका भाव यह मालूम देता है कि यदि आप मेरेमें विराट्‌रूप देखनेकी सामर्थ्य मानते हैं, तब तो ठीक है; नहीं तो आप मेरेको ऐसी सामर्थ्य दीजिये, जिससे मैं आपका वह ऐश्वर (ईश्वर-सम्बन्धी) रूप देख सकूँ।

हठयोग, राजयोग, लययोग, मन्त्रयोग आदि जितने भी योग हो सकते हैं, उन सबके आप मालिक हैं, इसलिये आप अपनी अलौकिक योगशक्तिसे वह विराट्‌रूप भी दिखा दीजिये।

'मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति'—इसका तात्पर्य है कि अगर आप अपना वह रूप नहीं दिखायेंगे, तो भी मैं यही मानूँगा कि आपका रूप तो वैसा ही है, जैसा आप कहते हैं, पर मैं उसको देखनेका अधिकारी नहीं हूँ, योग्य नहीं हूँ, पात्र नहीं हूँ। इस प्रकार अर्जुनको भगवान्‌के वचनोंमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है, प्रत्युत दृढ़ विश्वास है। इसीलिये तो वे कहते हैं कि आप मेरेको अपना विराट्‌रूप दिखाइये।

अर्जुनने दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें भगवान्‌के लिये 'योगिन्' सम्बोधन दिया था अर्थात् भगवान्‌को योगी बताया था; परन्तु अब अर्जुनने भगवान्‌के लिये 'योगेश्वर' सम्बोधन दिया है अर्थात् भगवान्‌को सम्पूर्ण योगोंका मालिक बताया है। कारण यह है कि दसवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनकी भगवान्‌के प्रति जो धारणा थी, उस धारणामें अब बहुत परिवर्तन हुआ है।

'योगेश्वर'—'योगेश्वर' सम्बोधन देनेका यह भाव मालूम देता है कि भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, 'ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्'—आपका वह स्वरूप तो अविनाशी ही है, जिससे अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं। आप अपने ऐसे अविनाशी स्वरूपके दर्शन कराये।

परिशिष्ट भाव—भगवान्‌के विश्वरूपको 'अव्यय' (अविनाशी) कहनेसे यह सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण संसार भगवान्‌का ही स्वरूप है। अव्यय होनेसे इसका अत्यन्त अभाव नहीं होता (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका पहला श्लोक)। वास्तवमें परिवर्तनशील (असत्) और अपरिवर्तनशील (सत्)—दोनों ही मिलकर भगवान्‌का समग्ररूप है—'सदसच्चाहमर्जुन'। जड़ता केवल अपनी आसक्ति और अज्ञानके कारण ही प्रतीत होती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनकी नम्रतापूर्वक की हुई प्रार्थनाको सुनकर अब भगवान् अर्जुनको विश्वरूप देखनेके लिये आज्ञा देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥५॥

श्रीभगवान् बोले—

पार्थ = हे पृथानन्दन! अथ = अब मे = मेरे नानाविधानि = अनेक तरहके च = और नाना-वर्णाकृतीनि = अनेक वर्णों (रंगों) तथा आकृतियोंवाले शतशः = सैकड़ों- सहस्रशः = हजारों दिव्यानि = अलौकिक रूपाणि = रूपोंको पश्य = (तू) देख।