श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 750, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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हर, बहरूप, ज्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपदी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह ‘रुद्र’ हैं (हरिवंश० पहला पर्व, तीसरा अध्याय, इक्यावनवाँ-बावनवाँ श्लोक)।
‘अश्विनीकुमार’ दो हैं। ये दोनों भाई देवताओंके वैद्य हैं।
सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित्, सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्, अन्यादृक्, यादृक्, प्रतिकृत, ऋक्, समिति, संरम्भ, ईदृश, पुरुष, अन्यादृश, चेतस, समिता, समिदृश, प्रतिदृश, मरुति, सरत, देव, दिश, यजूः, अनुदृक्, साम, मानुष और विश्व—ये उनचास ‘मरुत’ हैं (वायुपुराण, सङ्गठवाँ अध्याय, एक सौ तेईसवेंसे एक सौ तीसवें
परिशिष्ट भाव —पिछले श्लोकमें भगवान्ने विराट् रूपमें अनेक तरहके और अनेक रंगों तथा आकृतियोंवाले रूपोंको देखनेकी बात कही थी, अब उसी बातको इस श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।
भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि सभी देवता मेरे स्वरूप हैं अर्थात् उन देवताओंके रूपमें मैं ही हूँ (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध —भगवान्द्वारा विश्वरूप देखनेकी आज्ञा देनेपर अर्जुनकी यह जिज्ञासा हो सकती है कि मैं इस रूपको कहाँ देखूँ? अतः भगवान् कहते हैं—
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्वद्वष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥
गुडाकेश | = हे नींदको जीतने- वाले अर्जुन! | सचराचरम् | = चराचरसहित | और ---|---|---|---|--- मम | = मेरे | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण | च | = भी इह | = इस | जगत् | = जगत्को | यत् | = जो कुछ देहे | = शरीरके | अद्य | = अभी | द्वष्टुम् | = देखना एकस्थम् | = एक देशमें | पश्य | = देख ले। | इच्छसि | = चाहता है, (वह भी देख ले) | | अन्यत् | = इसके सिवाय (तू) | |
व्याख्या—‘गुडाकेश’ —निद्रापर अधिकार प्राप्त करनेसे अर्जुनको ‘गुडाकेश’ कहते हैं। यहाँ यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तू निरालस्य होकर सावधानीसे मेरे विश्वरूपको देख।
‘इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्, मम देहे’ —दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने कहा था कि मैं सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ। इसीपर
श्लोकतक) —इन सबको तू मेरे विराट् रूपमें देख।
बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस कोटि (तैंतीस प्रकारके) देवता सम्पूर्ण देवताओंमें मुख्य हैं। देवताओंमें मरुदृगणोंका नाम भी आता है, पर वे उनचास मरुदृगण इन तैंतीस प्रकारके देवताओंसे अलग माने जाते हैं; क्योंकि वे सभी दैत्योंसे देवता बने हैं। इसलिये भगवान्ने भी ‘तथा’ पद देकर मरुदृगणोंको अलग बताया है।
‘बहुन्यद्वष्टुपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत’ —तुमने इन रूपोंको पहले कभी आँखोंसे नहीं देखा है, कानोंसे नहीं सुना है, मनसे चिन्तन नहीं किया है, बुद्धिसे कल्पना नहीं की है। इन रूपोंकी तरफ तुम्हारी कभी वृत्ति ही नहीं गयी है। ऐसे बहुत—से अद्वष्टुपूर्व रूपोंको तू अब प्रत्यक्ष देख ले।
इन रूपोंके देखते ही आश्चर्य होता है कि अहो! ऐसे भी भगवान्के रूप हैं! ऐसे अद्भुत रूपोंको तू देख।
अर्जुनके मनमें विश्वरूप देखनेकी इच्छा हुई। अतः भगवान् कहते हैं कि हाथमें घोड़ोंकी लगाम और चाबुक लेकर तेरे सामने बैठे हुए मेरे इस शरीरके एक देश—(अंश—) में चर—अचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख। एक देशमें देखनेका अर्थ है कि तू जहाँ दृष्टि डालेगा, वहाँ तेरेको अनन्त ब्रह्माण्ड दीखेंगे। तू मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस, भूत, पशु, पक्षी आदि चलने—फिरनेवाले जंगम और वृक्ष, लता, घास, पौधा