श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १० ]
विभूतियाँ अव्यय (अविनाशी) हैं।
यहाँ शंका होती है कि जब सम्पूर्ण संसार ही भगवत्स्वरूप है, तो फिर विभूति-वर्णनका तात्पर्य क्या है? इसका समाधान है कि अर्जुनका प्रश्न ही यही था कि मैं कहाँ-कहाँ आपका चिन्तन करूँ (इसी अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)? वास्तवमें सब कुछ भगवान्का समग्ररूप ही है, पर मनुष्यको जिस वस्तुमें विशेषता दीखती है, उस वस्तुमें भगवान्को देखना, उनका चिन्तन करना सुगम पड़ता है; क्योंकि मनमें उसकी विशेषता अंकित रहनेसे मन स्वतः उसमें जाता है। इसीलिये भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। मुख्य-मुख्य विभूतियोंका वर्णन करते हुए भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण प्राणियोंका एवं सृष्टिमात्रका आदि, मध्य तथा अन्त मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ और बत्तीसवाँ श्लोक), सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज मैं ही हूँ, मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है (इसी अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक), और सम्पूर्ण जगत् मेरे एक अंशमें स्थित है (इसी अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक), फिर भगवान्के सिवाय बाकी क्या रहा? कुछ भी बाकी नहीं रहा! सब कुछ भगवान् ही हुए—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)।
गीतामें विभूति-वर्णन गौण नहीं है, प्रत्युत यह भगवत्प्राप्तिका मुख्य साधन है, जिसकी सिद्धि ‘वासुदेवः सर्वम्’ में होती है। कारण कि संसारमें हमें जहाँ भी कोई विशेषता दिखायी दे, उसको भगवान्की ही विशेषता माननेसे हमारा आकर्षण उस वस्तु, व्यक्ति आदिमें न होकर भगवान्में ही होगा। जड़ताका आकर्षण, प्रियता ही मनुष्यको बाँधनेवाली है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिन्यम्सु’ (गीता १३।२१)। अतः विभूति-वर्णनका तात्पर्य संसारकी सत्ता, महत्ता और प्रियताको हटाकर मनुष्यको ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव कराना है, जो कि गीताका खास ध्येय है।
संसारकी सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध ही मनुष्यको बाँधनेवाला है। इसलिये संसारमें जहाँ मनुष्यका ज्यादा आकर्षण होता है, वहाँ उसकी भोगबुद्धि न होकर भगवदबुद्धि हो जायगी तो उसके अन्तःकरणमें संसारकी सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध न होकर भगवान्की सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध हो जायगा*।
सम्बन्ध—अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से विभूति और योग बतानेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान्ने पहले अपनी विभूतियोंको बताया और अब आगेके श्लोकमें योग बताते हैं।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्भूजितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
| यत्, यत् | = जो-जो | सत्त्वम् | = प्राणी तथा पदार्थ है, | तेजः | = तेज-(योग अर्थात् सामर्थ्य- )के |
|---|---|---|---|---|---|
| विभूतिमत् | = ऐश्वर्ययुक्त, | तत्, तत् | = उस-उसको | अंशसम्भवम् | = अंशसे |
| श्रीमत् | = शोभायुक्त | त्वम् | = तुम | उत्पन्न हुई | |
| वा | = और | मम | = मेरे | अवगच्छ | = समझो। |
| ऊर्जितम् | = बलयुक्त | एव | = ही |
व्याख्या—‘यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्भूजितमेव वा’—संसारमात्रमें जिस-किसी सजीव-निजीव वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, गुण, भाव, क्रिया आदिमें जो कुछ ऐश्वर्य दीखे, शोभा या सौन्दर्य दीखे, बलवत्ता दीखे तथा
जो कुछ भी विशेषता, विलक्षणता, योग्यता दीखे, उन सबको मेरे तेजके किसी एक अंशसे उत्पन्न हुई जानो। तात्पर्य है कि उनमें वह विलक्षणता मेरे योगसे, सामर्थ्यसे, प्रभावसे ही आयी है—ऐसा तुम समझो—‘तत्तदेवावगच्छ
‘समस्त देवता, मनु, सप्तर्षि तथा मनुपुत्र और देवताओंके अधिपति इन्द्र तथा इनके सिवाय जो कुछ है—ये सब-की-सब भगवान् विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं।’
- ‘नेरुषभीक्षणं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्। स्पर्धासूयातिरस्काराः साहंकारा विद्यन्ति हि ॥
(श्रीमद्भा० ११।२९।१५)
‘जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है अर्थात् उनमें मुझे ही देखता है, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषद्वेष, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित सर्वथा दूर हो जाते हैं।