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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

७३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

विभूतियाँ अव्यय (अविनाशी) हैं।

यहाँ शंका होती है कि जब सम्पूर्ण संसार ही भगवत्स्वरूप है, तो फिर विभूति-वर्णनका तात्पर्य क्या है? इसका समाधान है कि अर्जुनका प्रश्न ही यही था कि मैं कहाँ-कहाँ आपका चिन्तन करूँ (इसी अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)? वास्तवमें सब कुछ भगवान्का समग्ररूप ही है, पर मनुष्यको जिस वस्तुमें विशेषता दीखती है, उस वस्तुमें भगवान्को देखना, उनका चिन्तन करना सुगम पड़ता है; क्योंकि मनमें उसकी विशेषता अंकित रहनेसे मन स्वतः उसमें जाता है। इसीलिये भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। मुख्य-मुख्य विभूतियोंका वर्णन करते हुए भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण प्राणियोंका एवं सृष्टिमात्रका आदि, मध्य तथा अन्त मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ और बत्तीसवाँ श्लोक), सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज मैं ही हूँ, मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है (इसी अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक), और सम्पूर्ण जगत् मेरे एक अंशमें स्थित है (इसी अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक), फिर भगवान्के सिवाय बाकी क्या रहा? कुछ भी बाकी नहीं रहा! सब कुछ भगवान् ही हुए—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९)।

गीतामें विभूति-वर्णन गौण नहीं है, प्रत्युत यह भगवत्प्राप्तिका मुख्य साधन है, जिसकी सिद्धि ‘वासुदेवः सर्वम्’ में होती है। कारण कि संसारमें हमें जहाँ भी कोई विशेषता दिखायी दे, उसको भगवान्की ही विशेषता माननेसे हमारा आकर्षण उस वस्तु, व्यक्ति आदिमें न होकर भगवान्में ही होगा। जड़ताका आकर्षण, प्रियता ही मनुष्यको बाँधनेवाली है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिन्यम्सु’ (गीता १३।२१)। अतः विभूति-वर्णनका तात्पर्य संसारकी सत्ता, महत्ता और प्रियताको हटाकर मनुष्यको ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव कराना है, जो कि गीताका खास ध्येय है।

संसारकी सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध ही मनुष्यको बाँधनेवाला है। इसलिये संसारमें जहाँ मनुष्यका ज्यादा आकर्षण होता है, वहाँ उसकी भोगबुद्धि न होकर भगवदबुद्धि हो जायगी तो उसके अन्तःकरणमें संसारकी सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध न होकर भगवान्की सत्ता, महत्ता और सम्बन्ध हो जायगा*।

सम्बन्ध—अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से विभूति और योग बतानेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान्ने पहले अपनी विभूतियोंको बताया और अब आगेके श्लोकमें योग बताते हैं।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्भूजितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥

यत्, यत्= जो-जोसत्त्वम्= प्राणी तथा पदार्थ है,तेजः= तेज-(योग अर्थात् सामर्थ्य- )के
विभूतिमत्= ऐश्वर्ययुक्त,तत्, तत्= उस-उसकोअंशसम्भवम्= अंशसे
श्रीमत्= शोभायुक्तत्वम्= तुमउत्पन्न हुई
वा= औरमम= मेरेअवगच्छ= समझो।
ऊर्जितम्= बलयुक्तएव= ही

व्याख्या—‘यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्भूजितमेव वा’—संसारमात्रमें जिस-किसी सजीव-निजीव वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, गुण, भाव, क्रिया आदिमें जो कुछ ऐश्वर्य दीखे, शोभा या सौन्दर्य दीखे, बलवत्ता दीखे तथा

जो कुछ भी विशेषता, विलक्षणता, योग्यता दीखे, उन सबको मेरे तेजके किसी एक अंशसे उत्पन्न हुई जानो। तात्पर्य है कि उनमें वह विलक्षणता मेरे योगसे, सामर्थ्यसे, प्रभावसे ही आयी है—ऐसा तुम समझो—‘तत्तदेवावगच्छ

‘समस्त देवता, मनु, सप्तर्षि तथा मनुपुत्र और देवताओंके अधिपति इन्द्र तथा इनके सिवाय जो कुछ है—ये सब-की-सब भगवान् विष्णुकी ही विभूतियाँ हैं।’

  • ‘नेरुषभीक्षणं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्। स्पर्धासूयातिरस्काराः साहंकारा विद्यन्ति हि ॥

(श्रीमद्भा० ११।२९।१५)

‘जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है अर्थात् उनमें मुझे ही देखता है, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषद्वेष, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित सर्वथा दूर हो जाते हैं।

श्लोक ४९ ]

  • साधक-संजीवनी *

७३९

त्वं मम तेजोऽशसम्भवम्। मेरे बिना कहीं भी और कुछ भी विलक्षणता नहीं है।

मनुष्यको जिस-जिसमें विशेषता मालूम दे, उस-उसमें भगवान्की ही विशेषता मानते हुए भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। अगर भगवान्को छोड़कर दूसरे वस्तु, व्यक्ति आदिकी विशेषता दीखती है, तो यह पतनका कारण है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने मनमें यदि पतिके सिवाय दूसरे किसी पुरुषकी विशेषता रखती है, तो उसका पातिव्रत्य भंग हो जाता है, ऐसे ही भगवान्के सिवाय दूसरी किसी वस्तुकी विशेषताको लेकर मन खिंचता है, तो व्यभिचार-दोष आ जाता है अर्थात् भगवान्के अनन्यभावका व्रत भंग हो जाता है।

संसारमें छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी वस्तु, व्यक्ति, क्रिया आदिमें जो भी महत्ता, सुन्दरता, सुखरूपता दीखती है और जो कुछ लाभरूप, हितरूप दीखता है, वह वास्तवमें सांसारिक वस्तुका है ही नहीं। अगर उस वस्तुका होता तो वह सब समय रहता और सबको दीखता, पर वह न तो सब समय रहता है और न सबको दीखता है। इससे सिद्ध होता है कि वह उस वस्तुका नहीं है। तो फिर किसका है? उस वस्तुका जो आधार है, उस परमात्माका है। उस परमात्माकी झलक ही उस वस्तुमें सुन्दरता, सुखरूपता आदि रूपोंसे दीखती है। परन्तु जब मनुष्यकी वृत्ति परमात्माकी महिमाकी तरफ न जाकर उस वस्तुकी तरफ ही जाती है, तब वह संसारमें फँस जाता है। संसारमें फँसनेपर उसको न तो कुछ मिलता है और न उसकी तृप्ति ही होती है। इसमें सुख नहीं है, इससे तृप्ति नहीं होती—इतना अनुभव होनेपर भी मनुष्यका वस्तु आदिमें सुखरूपताका वहम मिटता नहीं। मनुष्यको सावधानीके साथ विचारपूर्वक देखना चाहिये कि प्रतिक्षण मिटनेवाली वस्तुमें जो सुख दीखता है, वह उसका कैसे हो सकता है! वह वस्तु प्रतिक्षण नष्ट हो रही है तो उसमें दीखनेवाली महत्ता, सुन्दरता उस वस्तुकी कैसे हो सकती है!

जैसे बिजलीके सम्बन्धसे रेडियो बोलता है तो मनुष्य राजी होता है कि देखो, इस यन्त्रसे कैसी आवाज आ रही है! पर वास्तवमें उस रेडियोमें जो कुछ शक्ति है, वह सब बिजलीकी ही है। बिजलीसे सम्बन्ध न होनेपर केवल यन्त्रसे आवाज नहीं निकाली जा सकती। अनजान व्यक्ति तो उस शक्तिको यन्त्रकी ही मान लेता है, पर जानकार

व्यक्ति उस शक्तिको बिजलीकी ही मानता है। ऐसे ही किसी वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया आदिमें जो कुछ विशेषता दीखती है, उसको अनजान मनुष्य तो उस वस्तु, व्यक्ति आदिकी ही मान लेता है, पर जानकार मनुष्य उस विशेषताको भगवान्की ही मानता है।

इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि सब मेरेसे ही पैदा होते हैं और सबमें मेरी ही शक्ति है। इसमें भगवान्का तात्पर्य यही है कि तुम्हें जहाँ-कहीं और जिस-किसीमें विशेषता, महत्ता, सुन्दरता, बलवत्ता आदि दीखे, वह सब मेरी ही है, उनकी नहीं। एक वेश्या बड़े सुन्दर स्वरोंमें गाना गा रही थी, तो उसको सुनकर एक सन्त मस्त हो गये कि देखो! ठाकुरजीने कैसा कण्ठ दिया है! कितनी सुन्दर आवाज दी है! तो सन्तकी दृष्टि वेश्यापर नहीं गयी, प्रत्युत भगवान्पर गयी कि इसके कण्ठमें जो आकर्षण है, मिठास है, वह भगवान्की है। ऐसे ही कोई फूल दीखे तो राजी हो जाय कि वाह-वाह, भगवान्ने इसमें कैसी सुन्दरता भरी है! कोई किसीको बढिया पढ़ा रहा है तो बढिया पढ़ानेकी शक्ति भगवान्की है, पढ़ानेवालेकी नहीं। देवताओंको बृहस्पति प्रिय लगते हैं, रघुवंशियोंको वसिष्ठजी प्रिय लगते हैं, किसीको सिंहमें विशेषता दीखती है, किसीको रूपये बहुत प्यारे लगते हैं, तो उनमें जिस शक्ति, महत्ता, विशेषता आदिको लेकर आकर्षण, प्रियता, खिंचाव हो रहा है, वह शक्ति, महत्ता आदि भगवान्की ही है, उनकी अपनी नहीं। इस तरह जिस-किसीमें जहाँ-कहीं विशेषता दीखे, वह भगवान्की ही दीखनी चाहिये। इसलिये भगवान्ने अनेक तरहकी विभूतियाँ बतायी हैं। इसका तात्पर्य है कि उन विभूतियोंमें श्रद्धा, रुचिके भेदसे आकर्षण हरेकका अलग-अलग होगा, एक समान सबको विभूतियाँ अच्छी नहीं लगेंगी, पर उन सबमें शक्ति भगवान्की है।

यद्यपि जिस-किसीमें जो भी विशेषता है, वह परमात्माकी है, तथापि जिनसे हमें लाभ हुआ है अथवा हो रहा है, उनके हम जरूर कृतज्ञ बनें, उनकी सेवा करें। परन्तु उनकी व्यक्तिगत विशेषता मानकर वहाँ फँस न जायें—यह सावधानी रखें।

विशेष बात

भगवान्ने बीसवें श्लोकसे लेकर उन्नालीसवें श्लोकतक जितनी विभूतियाँ कही हैं, उनमें प्रायः 'अस्मि' (मैं हूँ) पदका प्रयोग किया है। केवल तीन

७४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

जगह—चौबीसवें और सताईसवें श्लोकमें ‘विद्धि’ तथा यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें ‘अवगच्छ’ पदका प्रयोग करके ‘जानने’ की बात कही है।

‘अस्मि’ (मैं हूँ) पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य विभूतियोंके मूल तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है कि इन सब विभूतियोंके मूलमें मैं ही हूँ। कारण कि सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मैं आपको कैसे जानूँ, तो भगवान्ने ‘अस्मि’ का प्रयोग करके सब विभूतियोंमें अपनेको जाननेकी बात कही।

दो जगह ‘विद्धि’ पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य मनुष्यको सावधान, सावचेत करानेमें है। मनुष्य दोके द्वारा सावचेत होता है—जानके द्वारा और शासनके द्वारा। ज्ञान गुरुके द्वारा प्राप्त होता है और शासन स्वयं राजा करता है। अतः चौबीसवें श्लोकमें जहाँ गुरु बृहस्पतिका वर्णन आया है, वहाँ ‘विद्धि’ कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग गुरुके द्वारा मेरी विभूतियोंके तत्त्वको ठीक तरहसे समझो। विभूतियोंके तत्त्वको समझनेका फल है—मेरेमें दृढ़ भक्ति होना (गीता—इसी अध्यायका सातवाँ श्लोक)। सताईसवें श्लोकमें जहाँ राजाका वर्णन आया है, वहाँ ‘विद्धि’ कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग राजाके शासनद्वारा उन्मागसे बचकर सम्मार्गमें लगना अर्थात् अपना जीवन शुद्ध बनाना

परिशिष्ट भाव —पहले कही गयी विभूतियोंके सिवाय भी साधकको स्वतः जिस-जिसमें व्यक्तिगत आकर्षण दीखता है, वहाँ-वहाँ भगवान्को ही देखना चाहिये अर्थात् वह विशेषता भगवान्की ही है—ऐसा दृढ़तासे धारण कर लेना चाहिये। भगवद्वुद्धि की दृढ़ता होनेसे संसार लुप्त हो जायगा; जैसे—सोनेके गहनोंमें सोनाबुद्धि होनेसे गहने लुप्त हो जाते हैं, खाँड़के खिलीनोंमें खाँड़बुद्धि होनेसे खिलीने लुप्त हो जाते हैं। कारण कि वास्तवमें संसार है नहीं। केवल जीवने ही अपने राग-द्वेषसे संसारको धारण कर रखा है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७।५)। सार बात यह है कि किसी भी तरह साधकको अन्तमें ‘वासुदेवः सर्वम्’ (सब कुछ भगवान् ही हैं) में ही पहुँचना है। इसीलिये भगवान्ने अरुन्धतीन्यायसे ‘वासुदेवः सर्वम्’ का अनुभव करानेके लिये ही विभूतियोंका वर्णन किया है; क्योंकि विभूतियोंमें भगवान्को देखनेसे फिर सब जगह भगवान् दीखने लग जायेंगे अर्थात् वस्तुरूपसे आकर्षण न रहकर भगवद्रूपसे आकर्षण हो जायगा।

मनुष्यमें जो भी विशेषता, विलक्षणता आती है, वह सब वास्तवमें भगवान्से ही आती है। अगर भगवान्में विशेषता, विलक्षणता न होती तो वह मनुष्यमें कैसे आती? जो चीज अंशोंमें नहीं है, वह अंशमें कैसे आ सकती है? मनुष्यसे यही भूल होती है कि वह उस विशेषताको अपनी विशेषता मानकर अभिमान कर लेता है और जहाँसे वह विशेषता आयी है, उस तरफ खयाल करता ही नहीं।

सृष्टिकी प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति आदि प्रतिक्षण नाशकी ओर जा रहे हैं। हम जिस वस्तु, व्यक्ति आदिमें सुन्दरता, बलवत्ता आदि विशेषता देखते हैं, वे एक दिन नष्ट हो जाते हैं। अतः सृष्टिकी प्रत्येक वस्तु मानो यह क्रियात्मक उपदेश दे रही है कि मेरी तरफ मत देखो, मैं तो रहूँगी नहीं, मेरेको बनानेवाले और बननेवालेकी तरफ देखो। मेरेमें जो सुन्दरता, सामर्थ्य, विलक्षणता आदि दीख रही है, यह मेरी नहीं है, प्रत्युत उसकी है! ऐसा जान लेनेपर फिर वस्तु, व्यक्ति आदिमें हमारा आकर्षण नहीं रहेगा और प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति आदिमें भगवान्के ही दर्शन होंगे। ऐसा होनेपर फिर भोग नहीं होगा, प्रत्युत स्वतः योग (भगवान्के साथ नित्य-सम्बन्ध) हो जायगा।

समझो। गुरु प्रेमसे समझाता है और राजा बलसे, भयसे समझाता है। गुरुके समझानेमें उद्धारकी बात मुख्य रहती है और राजाके समझानेमें लौकिक मर्यादाका पालन करनेकी बात मुख्य रहती है।

सताईसवें श्लोकमें जो ‘उच्चैःश्रवा’ और ‘ऐरावत’ का वर्णन आया है, वे दोनों राजाके वैभवके उपलक्षण हैं। कारण कि घोड़े, हाथी आदि राजाके ऐश्वर्य हैं और ऐश्वर्यवान् राजा ही शासन करता है। इसलिये उस श्लोकमें ‘विद्धि’ पदका प्रयोग खास करके राजाके लिये ही किया हुआ मालूम देता है।

यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें जो ‘अवगच्छ’ पद आया है, उसका अर्थ है—वास्तविकतासे समझना कि जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह वस्तुतः भगवान्की ही है।

इस प्रकार दो बार ‘विद्धि’ और एक बार ‘अवगच्छ’ पद देनेका तात्पर्य यह है कि गुरु और राजाके द्वारा समझानेपर भी जबतक मनुष्य स्वयं उनकी बातको वास्तविकतासे नहीं समझेगा, उनकी बातको नहीं मानेगा, तबतक गुरुका ज्ञान और राजाका शासन उसके काम नहीं आयेगा। अन्तमें तो स्वयंको ही मानना पड़ेगा और वही उसके काम आयेगा।

श्लोक ४२ ]

  • साधक-संजीवनी *

७४९

परमात्मा सम्पूर्ण शक्तियों, कलाओं, विद्याओं आदिके विलक्षण भण्डार हैं। शक्तियाँ जड़ प्रकृतिमें नहीं रह सकती, प्रत्युत चिन्मय परमात्मत्त्वमें ही रह सकती हैं। जिस ज्ञानसे क्रिया हो रही है, वह ज्ञान जड़में कैसे रह सकता है? अगर ऐसा मानें कि सब शक्तियाँ प्रकृतिमें ही हैं, तो भी यह मानना पड़ेगा कि उन शक्तियोंका प्राकट्य और उपयोग (सृष्टि-रचना आदि) करनेकी योग्यता प्रकृतिमें नहीं है। जैसे, कम्प्यूटर जड़ होते हुए भी अनेक चमत्कारिक कार्य करता है, पर उसका निर्माण और संचालन करनेवाला चेतन (मनुष्य) है। मनुष्यके द्वारा निर्मित, शिक्षित तथा संचालित हुए बिना वह कार्य नहीं कर सकता। कम्प्यूटर स्वतःसिद्ध नहीं है, प्रत्युत कृत्रिम (बनाया हुआ) है, जबकि परमात्मा स्वतःसिद्ध है।

अगर परमात्मामें विशेषता न होती तो वह संसारमें कैसे आती? जो विशेषता बीजमें होती है, वही वृक्षमें भी आती है। जो विशेषता बीजमें नहीं है, वह वृक्षमें कैसे आयेगी? उसी परमात्माकी कवित्व-शक्ति कविमें आती है, उसीकी वक्तुत्व-शक्ति वक्तामें आती है, उसीकी लेखन-शक्ति लेखकमें आती है, उसीकी दातुत्व-शक्ति दातामें आती है। मुक्ति, ज्ञान, प्रेम आदि सब उस परमात्माका ही दिया हुआ है। यह प्रकृतिका कार्य नहीं है। अगर 'मैं मुक्तस्वरूप हूँ'—यह बात सच्ची है तो फिर बन्धन कहाँसे आया, कैसे आया, कब आया और क्यों आया? अगर 'मैं ज्ञानस्वरूप हूँ'—यह बात सच्ची है तो फिर अज्ञान कहाँसे आया, कैसे आया, कब आया और क्यों आया? सूर्यमें अमावसकी रात कैसे आ सकती है? वास्तवमें ज्ञान है तो परमात्माका, पर मान लिया अपना, तभी अज्ञान आया है। मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, ज्ञान मेरा है—यह 'मैं' और 'मेरा' (अहंता-ममता) ही अज्ञान हैं जिससे मुक्ति, ज्ञान, प्रेम आदि मिले हैं, उसकी तरफ दृष्टि न रहनेसे ही ऐसा दीखता है कि मुक्ति मेरी है, ज्ञान मेरा है, प्रेम मेरा है। यह तो देनेवाले-(परमात्मा-) की विलक्षणता है कि लेनेवालेको वह चीज अपनी ही मालूम देती है! परमात्माकी यह विलक्षणता महान् आदर्श है, जिसका साधकोंको आदर करना चाहिये। मनुष्यसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह मिली हुई वस्तुको तो अपनी मान लेता है, पर जहाँसे वह मिली है, उस देनेवालेकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं! वह मिली हुई वस्तुको तो देखता है, पर देनेवालेको देखता ही नहीं! कार्यको तो देखता है, पर जिसकी शक्तिसे कार्य हुआ, उस कारणको देखता ही नहीं! वास्तवमें वस्तु अपनी नहीं है, प्रत्युत देनेवाला अपना है।

भगवान्की दी हुई सामर्थ्यसे ही मनुष्य कर्मयोगी होता है, उनके दिये हुए ज्ञानसे ही मनुष्य ज्ञानयोगी होता है और उनके दिये हुए प्रेमसे ही मनुष्य भक्तियोगी होता है। मनुष्यमें जो भी विलक्षणता, विशेषता देखनेमें आती है, वह सब-की-सब उन्हींकी दी हुई है। सब कुछ देकर भी वे अपनेको प्रकट नहीं करते—यह उनका स्वभाव है।

सम्बन्ध—यहाँतक अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर देकर अब भगवान् अपनी तरफसे खास बात बताते हैं।

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥

अथवा= अथवाकिम्= क्या आवश्यकता है,कृत्स्नम्= सम्पूर्ण
अर्जुन= हे अर्जुन!(जबकि)जगत्= जगत्को
तव= तुम्हेंअहम्= मैंविष्टभ्य= व्याप्त करके
एतेन= इस प्रकारएकांशेन= (अपने किसी) एकस्थितः= स्थित हूँ अर्थात्
बहुना= बहुत-सी बातेंअंशसेअनन्त ब्रह्माण्ड में
ज्ञातेन= जाननेकीइदम्= इसकिसी एक अंशमें है।

१-ज्ञान अथवा जाननेकी शक्ति प्रकृतिमें नहीं है। प्रकृति एकरस रहनेवाली नहीं है, प्रत्युत प्रतिक्षण बदलनेवाली है। अगर प्रकृतिमें ज्ञान होगा तो वह ज्ञान भी एकरस न रहकर बदलनेवाला हो जायगा। जो ज्ञान पैदा होगा, वह सदाके लिये नहीं होगा, प्रत्युत अनित्य होगा। अगर कोई माने कि ज्ञान प्रकृतिमें ही है तो उसी प्रकृतिको हम परमात्मा कहते हैं, केवल शब्दोंमें फर्क है! तात्पर्य यह हुआ कि ज्ञान प्रकृतिमें नहीं है, अगर है तो वही परमात्मा है।

२-मैं अरु मीर तोर तैं माया। जेहि बस कीन्हें जीव निकाया ॥ (मानस, अरण्य० १५।१)

७४२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १० ]

व्याख्या—‘अथवा’ —यह अव्यय-पद देकर भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि तुमने जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने उत्तर दिया ही है; अब मैं अपनी तरफसे तेरे लिये एक विशेष महत्वकी सार बात बताता हूँ।

‘बहुनेतैन किं ज्ञातेन तवार्जुन’ —भैया अर्जुन! तुम्हें इस प्रकार बहुत जाननेकी क्या जरूरत है? मैं घोड़ोंकी लगाम और चाबुक पकड़ते तेरे सामने बैठा हूँ। दीखनेमें तो मैं छोटा-सा दीखता हूँ, पर मेरे इस शरीरके किसी एक अंशमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड महासर्ग और महाप्रलय—दोनों अवस्थाओंमें मेरेमें स्थित हैं। उन सबको लेकर मैं तेरे सामने बैठा हूँ और तेरी आज्ञाका पालन करता हूँ! इसलिये जब मैं स्वयं तेरे सामने हूँ, तब तेरे लिये बहुत-सी बातें जाननेकी क्या जरूरत है?

‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ —मैं इस सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ—यह कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्के किसी भी अंशमें

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकका तात्पर्य है कि भगवान् ही जगत्-रूपसे स्थित हैं; क्योंकि व्याप्य और व्यापक, सूक्ष्म और महान्, सत् और असत्—दोनों भगवान् ही हैं। भगवान् अनन्त हैं, इसीलिये अनन्त ब्रह्माण्ड उनके किसी एक अंशमें स्थित हैं—‘एकांशेन स्थितो जगत्’।

भगवान्के कथनका तात्पर्य अपनी तरफ दृष्टि करानेमें है कि सब कुछ मैं ही तो हूँ! मेरी तरफ देखनेसे फिर कोई भी विभूति बाकी नहीं रहेगी। जब सम्पूर्ण विभूतियोंका आधार, आश्रय, प्रकाशक, बीज (मूल कारण) मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तो फिर विभूतियोंका चिन्तन करनेकी क्या जरूरत?

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इस प्रकार ‘ॐ, तत्, सत्’—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘विभूतियोग’ नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १० ॥

जहाँ-कहीं जो कुछ भी विशेषता दीखती है, वह सब भगवान्की ही विभूति हैं—ऐसा माननेसे भगवान्के साथ योग-(सम्बन्ध-) का अनुभव हो जाता है। इसलिये दसवें अध्यायका नाम ‘विभूतियोग’ है।

दसवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें ‘अथ दशमोऽध्यायः’ के तीन, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके छः, श्लोकोंके पाँच सौ छप्पन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ अठहत्तर है।

(२) ‘अथ दशमोऽध्यायः’ के सात, ‘अर्जुन उवाच’ आदि पदोंके बीस, श्लोकोंके एक हजार तीन सौ चौवालीस और पुष्पिकाके छियालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार चार सौ सत्रह है। इस

अनन्त सृष्टियों विद्यमान हैं—‘रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड’ (मानस १।२०१)। परन्तु उन सृष्टियोंसे भगवान्का कोई अंश, भाग रुका नहीं है अर्थात् भगवान्के किसी अंशमें उन सब सृष्टियोंके रहनेपर भी वहाँ खाली जगह पड़ी है। जैसे, प्रकृतिका बहुत शुद्ध अंश हमारी बुद्धि है। बुद्धिमें कई भाषाओंका, कई लिपियोंका, कई कलाओंका ज्ञान होनेपर भी हम ऐसा नहीं कह सकते कि हमारी बुद्धि अनेक भाषाओं आदिके ज्ञानसे भर गयी है; अतः अब दूसरी भाषा, लिपि आदि जाननेके लिये जगह नहीं रही। तात्पर्य है कि बुद्धिमें अनेक भाषाओं आदिका ज्ञान होनेपर भी बुद्धिमें जगह खाली ही रहती है और कितनी ही भाषाएँ आदि सीखनेपर भी बुद्धि भर नहीं सकती। इस प्रकार जब प्रकृतिका छोटा अंश बुद्धि भी अनेक भाषाओं आदिके ज्ञानसे नहीं भरती, तो फिर प्रकृतिसे अतीत, अनन्त, असीम और अगाध भगवान्का कोई अंश अनन्त सृष्टियोंसे कैसे भर सकता है? वह तो बुद्धिकी अपेक्षा भी विशेषरूपसे खाली रहता है।

अध्यायके सभी श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें तीन उवाच हैं—दो ‘श्रीभगवानुवाच’ और एक ‘अर्जुन उवाच’।

दसवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके बयालीस श्लोकोंमेंसे—दूसरे और पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न विपुला’; सातवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा पाँचवें और बत्तीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; आठवें श्लोकके प्रथम चरणमें और छब्बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘भगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘भ-विपुला’ और छठे श्लोकके प्रथम चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष छत्तीस श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ एकादशोऽध्यायः

अवतरणिका—

दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने अर्जुनपर विशेष कृपा करके कहा कि सम्पूर्ण जगत् अर्थात् अनन्त सृष्टियों मेरे किसी एक अंशमें हैं और वह मैं तेरा सारथि बना हुआ तेरे घोड़ोंकी लगाम और चानुक लेकर बैठा हूँ तथा तेरी आज्ञाका पालन कर रहा हूँ! जब सब विभूतियों और योग-(प्रभाव-) का महान् आधार मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तब तुझे अलग-अलग विभूतियोंको जाननेकी क्या आवश्यकता है? इस बातको सुनकर जब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की महती कृपापर गयी, तब वे बड़े आश्चर्यमें डूब जाते हैं और बोल उठते हैं—

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गृह्यमध्यात्मसञ्जितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥

अर्जुन बोले—

मदनुग्रहाय= केवल मुझपर कृपागृह्यम्= गोपनीयतेन= उससे
करनेके लियेअध्यात्म-मम= मेरा
त्वया= आपनेसञ्जितम्= अध्यात्म-विषयकअयम्= यह
यत्= जोवचः= वचनमोहः= मोह
परमम्= परमउक्तम्= कहे,विगतः= नष्ट हो गया है।

व्याख्या —[भगवान्की कृपाका अनुभव करके अर्जुन भावविभोर हो उठे और कृपाका रहस्य प्रकट करनेके लिये जब अत्यधिक प्रसन्नतासे बोले, तब नियमका खयाल न रहनेसे यह श्लोक तैंतीस अक्षरोंका आया है, जब कि गीताभरमें अनुष्टुप् छन्दवाले श्लोक बत्तीस अक्षरोंके ही आये हैं। तात्पर्य है कि अत्यधिक प्रसन्नता होनेपर नियमका ध्यान नहीं रहता।]

'मदनुग्रहाय' —मेरा भजन करनेवालोंपर कृपा करके मैं स्वयं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारका नाश कर देता हूँ (गीता—दसवें अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक)—यह बात भगवान्ने केवल कृपा-परवश होकर कही। इस बातका अर्जुनपर बड़ा प्रभाव पड़ा, जिससे अर्जुन भगवान्की स्तुति

करने लगे (दसवें अध्यायके बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक)। ऐसी स्तुति उन्होंने पहले गीतामें कहीं नहीं की। उसीका लक्ष्य करके अर्जुन यहाँ कहते हैं कि केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने ऐसी बात कही है*।

'परमं गृह्यम्' —अपनी प्रधान-प्रधान विभूतियोंको कहनेके बाद भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें अपनी ओरसे कहा कि मैं अपने किसी अंशमें सम्पूर्ण जगत्को, अनन्त-कोटि ब्रह्माण्डोंको व्याप्त करके स्थित हूँ (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक) अर्थात् भगवान्ने खुद अपना परिचय दिया कि मैं कैसा हूँ। इसी बातको अर्जुन परम गोपनीय मानते हैं।

'अध्यात्मसञ्जितम्' —दसवें अध्यायके सातवें

  • ऐसे तो पहले अध्यायसे लेकर यहाँतक भगवान्ने जो कुछ कहा है वह सब कृपा-परवश होकर ही कहा है। वास्तवमें भगवान्की सम्पूर्ण क्रियाओंमें कृपा भरी रहती है, पर मनुष्य उसे पहचानता नहीं। भगवान्की कृपाको पहचाननेपर भगवत्तत्त्वका अनुभव बहुत सुगमतासे और शीघ्रतासे हो जाता है। अर्जुनका लक्ष्य भी जब भगवत्कृपाकी ओर जाता है, तब वे विभोर होकर कह उठते हैं कि आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् सम्पूर्ण विभूतियोंके मूलमें भगवान् ही हैं और सम्पूर्ण विभूतियाँ भगवान्की सामर्थ्यसे ही प्रकट होती हैं तथा अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाती हैं—ऐसा तत्त्वसे जानता है, वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसी बातको अर्जुन अध्यात्मसंज्ञित मान रहे हैं।

‘यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम’— सम्पूर्ण जगत् भगवान्ने किसी एक अंशमें है—इस बातपर पहले अर्जुनकी दृष्टि नहीं थी और वे स्वयं इस बातको जानते भी नहीं थे, यही उनका मोह था। परन्तु जब भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें व्याप्त करके मैं तेरे सामने बैठा हूँ, तब अर्जुनकी इस तरफ

दृष्टि गयी कि भगवान् कितने विलक्षण हैं! उनके किसी एक अंशमें अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं और वे वैसे-के-वैसे रहते हैं! इस मोहके नष्ट होते ही अर्जुनको यह खयाल आया कि पहले जो मैं इस बातको नहीं जानता था, वह मेरा मोह ही था। इसलिये अर्जुन यहाँ अपनी दृष्टिसे कहते हैं कि भगवान्! मेरा यह मोह सर्वथा चला गया है। परन्तु ऐसा कहनेपर भी भगवान्ने इसको (अर्जुनके मोहनाशको) स्वीकार नहीं किया; क्योंकि आगे उनचासवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि तेरेको व्यथा और मूढ़भाव (मोह) नहीं होना चाहिये—‘मा ते व्यथा मा च विमूढभावः।’

परिशिष्ट भाव— अर्जुन कहते हैं कि आपने जो वचन कहे हैं, वे केवल मेरेपर कृपा करके ही कहे हैं, अपनी विद्वत्ता बतानेके लिये नहीं। इसमें केवल कृपाके अलावा और कोई हेतु नहीं है।

सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक), मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका बीज हूँ, (दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ श्लोक), ऐश्वर्य, शोभा और बलसे युक्त प्रत्येक वस्तुको मेरे ही योगके अंशसे उत्पन्न हुई समझो (दसवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), मैं अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हूँ, (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)—इन वचनोंको सुननेसे अर्जुनको ऐसा लगा कि मेरा मोह नष्ट हो गया। परन्तु वास्तवमें उनका आंशिक मोह नष्ट हुआ है, पूरा नहीं।

सम्बन्ध—मोह कैसे नष्ट हो गया—इसीको आगेके श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।

त्वतः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥

हि= क्योंकिविनाश= और (आपका)
कमलपत्राक्ष= हे कमलनयन !मया= मैंनेअव्ययम्
भूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकेविस्तरशः= विस्तारपूर्वकमाहात्म्यम्
भवाप्ययौ= उत्पत्ति तथात्वतः= आपसे हीअपि
श्रुतौ= सुने हैं(सुना है)।

व्याख्या— भवाप्ययौ हि भूतानां त्वतः श्रुतौ विस्तरशो मया’—भगवान्ने पहले कहा था—मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ, मेरे सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है (सातवें अध्यायका छठा-सातवाँ श्लोक); सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं (सातवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक); प्राणियोंके अलग-अलग अनेक तरहके

भाव मेरेसे ही होते हैं (दसवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक); सम्पूर्ण प्राणी मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सब चेष्टा करते हैं (दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक); प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक) और सम्पूर्ण सृष्टियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (दसवें अध्यायका

१-भगवान्ने अभीतक भक्तिकी जितनी बातें कही हैं, वे सब-की-सब परम गोपनीय अध्यात्म उपदेश हैं।

२-मोहके रहते हुए मोहका ज्ञान नहीं होता, प्रत्युत मोहके चले जानेपर ही मोहका ज्ञान होता है और ज्ञान होनेपर मोह रहता ही नहीं।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

७४५

बत्तीसाँ श्लोक)। इसीको लेकर अर्जुन यहाँ कहते हैं कि मैंने आपसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका वर्णन विस्तारसे सुना है। इसका तात्पर्य प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाश सुननेसे नहीं है, प्रत्युत इसका तात्पर्य यह सुननेसे है कि सभी प्राणी आपसे ही उत्पन्न होते हैं, आपमें ही रहते हैं और आपमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् सब कुछ आप ही हैं। 'माहात्म्यमपि चाव्ययम्'—आपने दसवें अध्यायके सातवें श्लोकमें बताया कि मेरी विभूति और योगको

तत्वसे जानता है, वह अविकम्प भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इस प्रकार आपकी विभूति और योगको तत्वसे जाननेका माहात्म्य भी मैंने सुना है। माहात्म्यको 'अव्यय' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्की विभूति और योगको तत्वसे जाननेपर भगवान्में जो भक्ति होती है, प्रेम होता है, भगवान्से अभिन्नता होती है, वह सब अव्यय है। कारण कि भगवान् अव्यय, नित्य हैं तो उनकी भक्ति, प्रेम भी अव्यय ही होगा।

परिशिष्ट भाव—इस श्लोकमें अर्जुन अपनी दृष्टिसे मोह नष्ट होनेका कारण बताते हैं। 'माहात्म्यमपि चाव्ययम्'—यहाँ 'अपि' पदसे ऐसा अर्थ निकलता है कि अर्जुनने भगवान्का विनाशी माहात्म्य भी सुना है और अविनाशी माहात्म्य भी सुना है। 'भवाप्ययौ हि भूतानाम्'—यह भगवान्का विनाशी अर्थात् परिवर्तनशील माहात्म्य है। मनुष्य भगवान्के साथ किसी भी प्रकारसे सम्बन्ध जोड़ ले तो वह कल्याण ही करेगा—यह भगवान्का अविनाशी अर्थात् अपरिवर्तनशील माहात्म्य है। तात्पर्य है कि सत्-असत् सब कुछ भगवान् ही हैं—'सदसच्चाहम्' (गीता ९।१९)।

सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन विराटरूपके दर्शनके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं।

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥

पुरुषोत्तम = हे पुरुषोत्तम! त्वम् = आप आत्मानम् = अपने-आपको यथा = जैसा आत्थ = कहते हैं, एतत् = यह (वास्तवमें) एवम् = ऐसा ही है। परमेश्वर = हे परमेश्वर! ते = आपके ऐश्वरम् = ईश्वर-सम्बन्धी रूपम् = रूपको (मैं) द्रष्टुम् = देखना इच्छामि = चाहता हूँ।

व्याख्या—पुरुषोत्तम'—यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि हे भगवन्! मेरी दृष्टिमें इस संसारमें आपके समान कोई उत्तम, श्रेष्ठ नहीं है अर्थात् आप ही सबसे उत्तम, श्रेष्ठ हैं। इस बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने भी कहा है कि मैं क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हूँ; अतः मैं शास्त्र और वेदमं पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ। 'एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानम्'—हे पुरुषोत्तम! आपने (सातवें अध्यायसे दसवें अध्यायतक) मेरे प्रति अपने अलौकिक प्रभावका, सामर्थ्यका जो कुछ वर्णन किया, वह वास्तवमें ऐसा ही है। यह संसार मेरेसे ही उत्पन्न होता है और मेरेमें ही लीन हो जाता है (सातवें अध्यायका छठा श्लोक), मेरे सिवाय

इसका और कोई कारण नहीं है (सातवें अध्यायका सातवाँ श्लोक), सब कुछ वासुदेव ही है (सातवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधिज्ञरूपमें मैं ही हूँ (सातवें अध्यायका उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक), अनन्य भक्तिसे प्रापणीय परम तत्त्व मैं ही हूँ (आठवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक), मेरेसे ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, पर मैं संसारमें और संसार मेरेमें नहीं है (नवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक), सत् और असत्-रूपसे सब कुछ मैं ही हूँ (नवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक), मैं ही संसारका मूल कारण हूँ और मेरेसे ही सारा संसार सत्ता-स्फूर्ति पाता है (दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक), यह सारा संसार मेरे ही किसी एक अंशमें स्थित है (दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

आदि-आदि। अपने-आपको आपने जो कुछ कहा है, वह सब-का-सब यथार्थ ही है।

‘परमेश्वर’—भगवान्के मुखसे अर्जुनने पहले सुना है कि ‘मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ—‘भूतानामिश्वरोऽपि’ (४।६); ‘सर्वलोक-महेश्वरम्’ (५।२९)। इसलिये अर्जुन यहाँ भगवान्के विलक्षण प्रभावसे प्रभावित होकर उनके लिये ‘परमेश्वर’ सम्बोधन देते हैं, जिसका तात्पर्य है कि हे भगवन्! वास्तवमें आप ही परम ईश्वर हैं, आप ही सम्पूर्ण ऐश्वर्यके मालिक हैं।

‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरम्’—अर्जुन कहते हैं कि मैंने आपसे आपका माहात्म्यसहित प्रभाव सुन लिया है और इस विषयमें मेरे हृदयमें दृढ़ विश्वास भी हो गया है। ‘सम्पूर्ण संसार मेरे शरीरके एक अंशमें है’—इसे सुनकर मेरे मनमें आपके उस रूपको देखनेकी उत्कट लालसा हो रही है।

दूसरा भाव यह है कि आप इतने विलक्षण और महान् होते हुए भी मेरे साथ कितना स्नेह रखते हैं, कितनी आत्मीयता रखते हैं कि मैं जैसा कहता हूँ, वैसा ही आप करते हैं और जो कुछ पूछता हूँ, उसका आप उत्तर देते हैं। इस कारण आपसे कहनेका, पूछनेका किंचिन्मात्र भी संकोच न होनेसे मेरे मनमें आपका वह रूप देखनेकी बहुत इच्छा हो रही है, जिसके एक अंशमें सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।

दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि आप अपनी पूरी-की-पूरी विभूतियाँ कह दीजिये, बाकी मत रखिये—‘वक्तुमहैत्यशेषेण’, तो भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन करते हुए उपक्रममें और उपसंहारमें

परिशिष्ट भाव —अर्जुनके कथनका तात्पर्य है कि अब उसमें कोई सन्देह नहीं रहा है। सब कुछ आप ही हैं—यह ठीक ऐसा ही है। अब केवल आपका ईश्वर-सम्बन्धी रूप देखना बाकी रह गया है।

उपदेश दो तरहसे होता है—कहना और करके दिखाना। पहले दसवें अध्यायमें भगवान्ने अपने समग्ररूपका वर्णन किया कि मैं अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हूँ। अब इस अध्यायमें अर्जुन उसी रूपको प्रत्यक्ष दिखानेकी प्रार्थना करते हैं।

कहा कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है (दसवें अध्यायका उन्नीसवाँ और चालीसवाँ श्लोक)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन संक्षेपसे ही किया। परन्तु यहाँ जब अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके एक रूपको देखना चाहता हूँ—‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्’, तब भगवान् आगे (पाँचवें श्लोकमें) कहेंगे कि तू मेरे सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख। जैसे संसारमें कोई किसीसे लालचपूर्वक अधिक माँगता है, तो देनेवालेमें देनेका भाव कम हो जाता है और वह कम देता है। इसके विपरीत यदि कोई संकोचपूर्वक कम माँगता है, तो देनेवाला उदारतापूर्वक अधिक देता है। ऐसे ही वहाँ अर्जुनने स्पष्टरूपसे कह दिया कि आप सब-की-सब विभूतियाँ कह दीजिये तो भगवान्ने कहा कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा। इस बातको लेकर अर्जुन सावधान हो जाते हैं कि अब मेरे कहनेमें ऐसी कोई अनुचित बात न आ जाय। इसलिये अर्जुन यहाँ संकोचपूर्वक कहते हैं कि अगर मेरे द्वारा आपका विराट्रूप देखा जा सकता है तो दिखा दीजिये। अर्जुनके इस संकोचको देखकर भगवान् बड़ी उदारतापूर्वक कहते हैं कि तू मेरे सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख ले।

दूसरा भाव यह है कि अर्जुनके रथमें एक जगह बैठे हुए भगवान्ने यह कहा कि ‘तू जो मेरे इस शरीरको देख रहा है, इसके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् (जिसके अन्तर्गत अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं) व्याप्त है।’ तात्पर्य है कि भगवान्का छोटा-सा शरीर है और उस छोटे-से शरीरके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् है। अतः उस एक अंशमें स्थित रूपको मैं देखना चाहता हूँ—यही अर्जुनके ‘रूपम्’ (एक रूप) कहनेका आशय मालूम देता है।

मैंने आपकी बातोंको सुनकर ठीक समझ लिया है और यह ठीक ऐसा ही है। अब केवल आपका ईश्वर-सम्बन्धी

—◆—

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥

श्लोक ५

  • साधक-संजीवनी *

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प्रभो = हे प्रभो! मया = मेरे द्वारा तत् = (आपका) वह ऐश्वर-रूप द्रष्टुम् = देखा शक्यम् = जा सकता है इति = —ऐसा यदि = अगर मन्यसे = (आप) मानते हैं, ततः = तो योगेश्वर = हे योगेश्वर! त्वम् = आप आत्मानम् = अपने (उस) अव्ययम् = अविनाशी स्वरूपको मे = मुझे दर्शय = दिखा दीजिये।

व्याख्या—'प्रभो'—'प्रभु' नाम सर्वसमर्थका है, इसलिये इस सम्बोधनका भाव यह मालूम देता है कि यदि आप मेरेमें विराट्‌रूप देखनेकी सामर्थ्य मानते हैं, तब तो ठीक है; नहीं तो आप मेरेको ऐसी सामर्थ्य दीजिये, जिससे मैं आपका वह ऐश्वर (ईश्वर-सम्बन्धी) रूप देख सकूँ।

हठयोग, राजयोग, लययोग, मन्त्रयोग आदि जितने भी योग हो सकते हैं, उन सबके आप मालिक हैं, इसलिये आप अपनी अलौकिक योगशक्तिसे वह विराट्‌रूप भी दिखा दीजिये।

'मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति'—इसका तात्पर्य है कि अगर आप अपना वह रूप नहीं दिखायेंगे, तो भी मैं यही मानूँगा कि आपका रूप तो वैसा ही है, जैसा आप कहते हैं, पर मैं उसको देखनेका अधिकारी नहीं हूँ, योग्य नहीं हूँ, पात्र नहीं हूँ। इस प्रकार अर्जुनको भगवान्‌के वचनोंमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है, प्रत्युत दृढ़ विश्वास है। इसीलिये तो वे कहते हैं कि आप मेरेको अपना विराट्‌रूप दिखाइये।

अर्जुनने दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें भगवान्‌के लिये 'योगिन्' सम्बोधन दिया था अर्थात् भगवान्‌को योगी बताया था; परन्तु अब अर्जुनने भगवान्‌के लिये 'योगेश्वर' सम्बोधन दिया है अर्थात् भगवान्‌को सम्पूर्ण योगोंका मालिक बताया है। कारण यह है कि दसवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनकी भगवान्‌के प्रति जो धारणा थी, उस धारणामें अब बहुत परिवर्तन हुआ है।

'योगेश्वर'—'योगेश्वर' सम्बोधन देनेका यह भाव मालूम देता है कि भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, 'ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्'—आपका वह स्वरूप तो अविनाशी ही है, जिससे अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं, उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं। आप अपने ऐसे अविनाशी स्वरूपके दर्शन कराये।

परिशिष्ट भाव—भगवान्‌के विश्वरूपको 'अव्यय' (अविनाशी) कहनेसे यह सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण संसार भगवान्‌का ही स्वरूप है। अव्यय होनेसे इसका अत्यन्त अभाव नहीं होता (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका पहला श्लोक)। वास्तवमें परिवर्तनशील (असत्) और अपरिवर्तनशील (सत्)—दोनों ही मिलकर भगवान्‌का समग्ररूप है—'सदसच्चाहमर्जुन'। जड़ता केवल अपनी आसक्ति और अज्ञानके कारण ही प्रतीत होती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनकी नम्रतापूर्वक की हुई प्रार्थनाको सुनकर अब भगवान् अर्जुनको विश्वरूप देखनेके लिये आज्ञा देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥५॥

श्रीभगवान् बोले—

पार्थ = हे पृथानन्दन! अथ = अब मे = मेरे नानाविधानि = अनेक तरहके च = और नाना-वर्णाकृतीनि = अनेक वर्णों (रंगों) तथा आकृतियोंवाले शतशः = सैकड़ों- सहस्रशः = हजारों दिव्यानि = अलौकिक रूपाणि = रूपोंको पश्य = (तू) देख।

७४८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

व्याख्या—‘पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽश सहस्रशः’— अर्जुनकी संकोचपूर्वक प्रार्थनाको सुनकर भगवान् अत्यधिक प्रसन्न हुए; अतः अर्जुनके लिये ‘पार्थ’ सम्बोधनका प्रयोग करते हुए कहते हैं कि तू मेरे रूपोंको देख। रूपोंमें भी तीन-चार नहीं, प्रत्युत सैकड़ों-हजारों रूपोंको देख अर्थात् अनगिनत रूपोंको देख। भगवान्ने जैसे विभूतियोंके विषय कहा है कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं आ सकता, ऐसे ही यहाँ भगवान्ने अपने रूपोंकी अनन्तता बतायी है।

‘नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च’— अब भगवान् उन रूपोंकी विशेषताओंका वर्णन करते हैं कि उनकी तरह-तरहकी बनावट है। उनके रंग भी तरह-तरहके हैं अर्थात् कोई किसी रंगका तो कोई किसी रंगका, कोई पीला तो कोई लाल आदि-आदि। उनमें भी एक-एक रूपमें कई तरहके रंग हैं। उन रूपोंकी आकृतियाँ भी तरह-तरहकी हैं अर्थात् कोई छोटा तो कोई मोटा, कोई

परिशिष्ट भाव— अर्जुनने तो अपनेको असमर्थ मानकर भगवान्से अपना एक ऐश्वररूप दिखानेकी प्रार्थना की थी और उसको भगवान्की इच्छापर छोड़ दिया था, पर भगवान् उनको सैकड़ों-हजारों रूपोंको देखनेकी बात कहते हैं। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्की इच्छापर छोड़नेसे साधकको जो लाभ होता है, वह अपनी इच्छासे, अपनी बुद्धिसे नहीं होता। कारण कि मनुष्य कितनी ही विद्याएँ, कला-कौशल आदि सीख ले, कितने ही शास्त्र पढ़ ले तो भी उसकी बुद्धि तुच्छ, सीमित ही रहती है। साधकमें जितनी सरलता, निर्बलता, निरभिमानताका भाव होगा, उतना ही वह भगवान्को जानेगा। अपना अभिमान करके साधक भगवान्को जाननेमें आड़ ही लगाता है। वह जितना समझदार बनता है, उतना ही बेसमझ रहता है। अपनेको समझदार माननेसे वह समझदारीका गुलाम हो जाता है। वह जितना निरभिमान होता है, समझदारीका अभिमान नहीं करता, उतना ही वह समझदार होता है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने विश्वरूपमें तरह-तरहके वर्णों और आकृतियोंको देखनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें देवताओंको देखनेकी बात कहते हैं।

पश्य्यादित्यान्वसूरुद्रानशिवनौ मरुतस्तथा ।

बहून्वटृष्टपूर्वाणि पश्य्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥

भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! | अश्विनौ | = दो अश्विनी- कुमारोंको | अटृष्टपूर्वाणि | = जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं, ---|---|---|---|---|--- आदित्यान् | = बारह आदित्योंको, | तथा | = तथा | बहूनि | = (ऐसे) बहुत-से वसुन् | = आठ वसुओंको, | मरुतः | = उन्चास | आश्चर्याणि | = आश्चर्यजनक रुद्रान् | = ग्यारह रुद्रोंको (और) | पश्य | = देख। | रूपोंको (भी) | | | | | पश्य | = (तू) देख।

व्याख्या—पश्य्यादित्यान्वसूरुद्रानशिवनौ मरुतस्तथा’— अदितिके पुत्र धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु—ये बारह ‘आदित्य’ हैं (महा०, आदि० पैंसठवाँ अध्याय,

लम्बा तो कोई चौड़ा आदि-आदि।

जैसे पृथ्वीका एक छोटा-सा कण भी पृथ्वी ही है, ऐसे ही भगवान्के अनन्त, अपार विश्वरूपका एक छोटा-सा अंश होनेके कारण यह संसार भी विश्वरूप ही है। परन्तु यह हरेकके सामने दिव्य विश्वरूपसे प्रकट नहीं है, प्रत्युत संसाररूपसे ही प्रकट है। कारण कि मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ न होकर नाशवान् संसारकी तरफ ही रहती है। जैसे अवतार लेनेपर भगवान् सबके सामने भगवद्रूपसे प्रकट नहीं रहते (गीता—सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक), प्रत्युत मनुष्यरूपसे ही प्रकट रहते हैं, ऐसे ही विश्वरूपभगवान् सबके सामने संसाररूपसे ही प्रकट रहते हैं अर्थात् हरेकको यह विश्वरूप संसाररूपसे ही दीखता है। परन्तु यहाँ भगवान् अपने दिव्य अविनाशी विश्वरूपसे साक्षात् प्रकट होकर अर्जुनको कह रहे हैं कि तू मेरे दिव्य रूपोंको देख।

पन्द्रहवाँ-सोलहवाँ श्लोक।

धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ ‘वसु’ हैं (महा०, आदि० छाछठवाँ अध्याय, अठारहवाँ श्लोक)।

श्लोक [ ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

७४९

हर, बहरूप, ज्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपदी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह ‘रुद्र’ हैं (हरिवंश० पहला पर्व, तीसरा अध्याय, इक्यावनवाँ-बावनवाँ श्लोक)।

‘अश्विनीकुमार’ दो हैं। ये दोनों भाई देवताओंके वैद्य हैं।

सत्त्वज्योति, आदित्य, सत्यज्योति, तिर्यज्योति, सज्योति, ज्योतिष्मान्, हरित, ऋतजित्, सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, सत्यमित्र, अभिमित्र, हरिमित्र, कृत, सत्य, ध्रुव, धर्ता, विधर्ता, विधारय, ध्वान्त, धुनि, उग्र, भीम, अभियु, साक्षिप, ईदृक्, अन्यादृक्, यादृक्, प्रतिकृत, ऋक्, समिति, संरम्भ, ईदृश, पुरुष, अन्यादृश, चेतस, समिता, समिदृश, प्रतिदृश, मरुति, सरत, देव, दिश, यजूः, अनुदृक्, साम, मानुष और विश्व—ये उनचास ‘मरुत’ हैं (वायुपुराण, सङ्गठवाँ अध्याय, एक सौ तेईसवेंसे एक सौ तीसवें

परिशिष्ट भाव —पिछले श्लोकमें भगवान्ने विराट् रूपमें अनेक तरहके और अनेक रंगों तथा आकृतियोंवाले रूपोंको देखनेकी बात कही थी, अब उसी बातको इस श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।

भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि सभी देवता मेरे स्वरूप हैं अर्थात् उन देवताओंके रूपमें मैं ही हूँ (गीता—नवें अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध —भगवान्द्वारा विश्वरूप देखनेकी आज्ञा देनेपर अर्जुनकी यह जिज्ञासा हो सकती है कि मैं इस रूपको कहाँ देखूँ? अतः भगवान् कहते हैं—

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्वद्वष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥

गुडाकेश | = हे नींदको जीतने- वाले अर्जुन! | सचराचरम् | = चराचरसहित | और ---|---|---|---|--- मम | = मेरे | कृत्स्नम् | = सम्पूर्ण | च | = भी इह | = इस | जगत् | = जगत्को | यत् | = जो कुछ देहे | = शरीरके | अद्य | = अभी | द्वष्टुम् | = देखना एकस्थम् | = एक देशमें | पश्य | = देख ले। | इच्छसि | = चाहता है, (वह भी देख ले) | | अन्यत् | = इसके सिवाय (तू) | |

व्याख्या—‘गुडाकेश’ —निद्रापर अधिकार प्राप्त करनेसे अर्जुनको ‘गुडाकेश’ कहते हैं। यहाँ यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तू निरालस्य होकर सावधानीसे मेरे विश्वरूपको देख।

‘इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्, मम देहे’ —दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने कहा था कि मैं सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ। इसीपर

श्लोकतक) —इन सबको तू मेरे विराट् रूपमें देख।

बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस कोटि (तैंतीस प्रकारके) देवता सम्पूर्ण देवताओंमें मुख्य हैं। देवताओंमें मरुदृगणोंका नाम भी आता है, पर वे उनचास मरुदृगण इन तैंतीस प्रकारके देवताओंसे अलग माने जाते हैं; क्योंकि वे सभी दैत्योंसे देवता बने हैं। इसलिये भगवान्ने भी ‘तथा’ पद देकर मरुदृगणोंको अलग बताया है।

‘बहुन्यद्वष्टुपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत’ —तुमने इन रूपोंको पहले कभी आँखोंसे नहीं देखा है, कानोंसे नहीं सुना है, मनसे चिन्तन नहीं किया है, बुद्धिसे कल्पना नहीं की है। इन रूपोंकी तरफ तुम्हारी कभी वृत्ति ही नहीं गयी है। ऐसे बहुत—से अद्वष्टुपूर्व रूपोंको तू अब प्रत्यक्ष देख ले।

इन रूपोंके देखते ही आश्चर्य होता है कि अहो! ऐसे भी भगवान्के रूप हैं! ऐसे अद्भुत रूपोंको तू देख।

अर्जुनके मनमें विश्वरूप देखनेकी इच्छा हुई। अतः भगवान् कहते हैं कि हाथमें घोड़ोंकी लगाम और चाबुक लेकर तेरे सामने बैठे हुए मेरे इस शरीरके एक देश—(अंश—) में चर—अचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख। एक देशमें देखनेका अर्थ है कि तू जहाँ दृष्टि डालेगा, वहाँ तेरेको अनन्त ब्रह्माण्ड दीखेंगे। तू मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस, भूत, पशु, पक्षी आदि चलने—फिरनेवाले जंगम और वृक्ष, लता, घास, पौधा

७५०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

आदि स्थावर तथा पृथ्वी, पहाड़, रेत आदि जडसहित सम्पूर्ण जगत्को 'अद्य'—अभी, इसी क्षण देख ले, इसमें देरीका काम नहीं है।

'यच्चान्यद्रष्टुमिच्छसि'—भगवान्के शरीरमें सब बातें वर्तमान थीं अर्थात् जो बातें भूतकालमें बीत गयी हैं और जो भविष्यमें बीतनेवाली हैं, वे सब बातें भगवान्के शरीरमें वर्तमान थीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि तू और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह भी देख ले। अर्जुन और क्या देखना चाहते थे? अर्जुनके मनमें सन्देह था कि युद्धमें जीत हमारी होगी या कौरवोंको? (गीता—दूसरे अध्यायका छठा श्लोक) इसलिये भगवान् कहते हैं कि वह भी तू मेरे इस शरीरके एक अंशमें देख ले।

विशेष बात

जैसे दसवें अध्यायमें भगवान्ने 'जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है, उसका मेरेमें दृढ़ भक्तियोग हो जाता है' इस बातको सुनकर ही अर्जुनने भगवान्की स्तुति-प्रार्थना करके विभूतियाँ पूछी थीं, ऐसे ही भगवान्ने 'मेरे एक अंशमें सारा संसार स्थित है' इस बातको सुनकर अर्जुनने विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की है। अगर

परिशिष्ट भाव —भगवान् अपने शरीरके एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् देखनेकी आज्ञा देते हैं। इससे सिद्ध होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण समग्र हैं और उनके एक अंशमें सम्पूर्ण संसार है। 'रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड' (मानस, बाल० २०१)—यह भगवान् प्रत्यक्ष दिखा रहे हैं! जब सम्पूर्ण संसार भगवान्के किसी एक अंशमें है, तो फिर भगवान्के सिवाय क्या बाकी रहा? सब कुछ भगवान् ही हुए! इसलिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू जो कुछ भी देखना चाहता है, वह सब तू मेरे विराटरूपमें देख सकता है। अर्जुन युद्धका परिणाम देखना चाहते थे, जिसको उन्होंने विराटरूपमें ही देख लिया (गीता—इसी अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—भगवान्ने तीन श्लोकोंमें चार बार 'पश्य' पदसे अपना रूप देखनेके लिये आज्ञा दी। इसके अनुसार ही अर्जुन आँखें फाड़-फाड़कर देखते हैं और देखना चाहते भी हैं; परन्तु अर्जुनको कुछ भी नहीं दीखता। इसलिये अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको न दीखनेका कारण बताते हुए उनको दिव्यचक्षु देकर विश्वरूप देखनेकी आज्ञा देते हैं।

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥

तु= परन्तुएव= हीददामि= देता हूँ,
अनेन= (तू) इस= नहीं(जिससे
स्वचक्षुषा= अपनीशक्यसे= सकता,तू)
आँख-ते= (इसलिये मैं)मे= मेरी
(चर्मचक्षु-)सेतुझेऐश्वरम्= ईश्वरीय
माम्= मुझेदिव्यम्= दिव्ययोगम्= सामर्थ्यको
द्रष्टुम्= देखचक्षुः= चक्षुपश्य= देख।

श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७५९

व्याख्या—‘न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा’— तुम्हारे जो चर्मचक्षु हैं, इनकी शक्ति बहुत अल्प और सीमित है। प्राकृत होनेके कारण ये चर्मचक्षु केवल प्रकृतिके तुच्छ कार्यको ही देख सकते हैं अर्थात् प्राकृत मनुष्य, पशु, पक्षी आदिके रूपोंको, उनके भेदोंको तथा धूप-छाया आदिके रूपोंको ही देख सकते हैं। परन्तु वे मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसे अतीत मेरे रूपको नहीं देख सकते।

‘दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्’— मैं तुझे अतीन्द्रिय, अलौकिक रूपको देखनेकी सामर्थ्यवाले दिव्यचक्षु देता हूँ अर्थात् तेरे इन चर्मचक्षुओंमें ही दिव्य शक्ति प्रदान करता हूँ, जिससे तू अतीन्द्रिय, अलौकिक पदार्थ भी देख सके और साथ-साथ उनकी दिव्यताको भी देख सके।

यद्यपि दिव्यता देखना नेत्रका विषय नहीं है, प्रत्युत बुद्धिका विषय है, तथापि भगवान् कहते हैं मेरे दिये हुए दिव्यचक्षुओंसे तू दिव्यताको अर्थात् मेरे ईश्वर-सम्बन्धी अलौकिक प्रभावको भी देख सकेगा। तात्पर्य है कि मेरा विराटरूप देखनेके लिये दिव्यचक्षुओंकी आवश्यकता है।

‘पश्य’ क्रियाके दो अर्थ होते हैं—बुद्धि-(विवेक-) से देखना और नेत्रोंसे देखना। नवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ कहकर बुद्धिके द्वारा देखने-(जानने-)की बात कही थी। अब यहाँ ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ कहकर नेत्रोंके द्वारा देखनेकी बात कहते हैं।

विशेष बात

जैसे किसी जगह ‘श्रीमद्भगवद्गीता’—ऐसा लिखा हुआ है। जिनको वर्णमालाका बिलकुल ज्ञान नहीं है, उनको तो इसमें केवल काली-काली लकीरें दीखती हैं और जिनको वर्णमालाका ज्ञान है, उनको इसमें अक्षर दीखते हैं। परन्तु जो पढ़ा-लिखा है और जिसको गीताका गहरा मनन है, उसको ‘श्रीमद्भगवद्गीता’—ऐसा लिखा हुआ दीखते ही गीताके अध्यायोंकी, श्लोकोंकी, भावोंकी सब बातें दीखने लग जाती हैं। ऐसे ही अर्जुनको जब भगवान्ने दिव्यचक्षु दिये, तब उनको अलौकिक विश्वरूप तथा उसकी दिव्यता भी दीखने लगी, जो कि साधारण बुद्धिका विषय नहीं है। यह सब सामर्थ्य भगवत्प्रदत्त दिव्यचक्षुकी ही थी।

परिशिष्ट भाव—‘पश्य’ क्रियाके दो अर्थ होते हैं—‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ पदोंसे भगवान्को जाननेकी बात आयी है और यहाँ ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ पदोंसे भगवान्के विराटरूपको

अब यहाँ एक शंका होती है कि जब अर्जुनने चौथे श्लोकमें कहा कि अगर मैं आपके विश्वरूपको देख सकता हूँ तो आप अपने विश्वरूपको दिखा दीजिये, तब उसके उत्तरमें भगवान्को यह आठवाँ श्लोक कहना चाहिये था कि तू अपने इन चर्मचक्षुओंसे मेरे विश्वरूपको नहीं देख सकता, इसलिये मैं तेरेको दिव्यचक्षु देता हूँ। परन्तु भगवान्ने वहाँ ऐसा नहीं कहा, प्रत्युत दिव्यचक्षु देनेसे पहले ही ‘पश्य-पश्य’ कहकर बार-बार देखनेकी आज्ञा दी। जब अर्जुनको दीखा नहीं, तब उनको न दीखनेका कारण बताया और फिर दिव्यचक्षु देकर उसका निराकरण किया। अतः इतनी झंझट भगवान्ने की ही क्यों ?

साधकपर भगवान्की कृपाका क्रमशः कैसे विस्तार होता है, यह बतानेके लिये ही भगवान्ने ऐसा किया है; क्योंकि भगवान्का ऐसा ही स्वभाव है। भगवान् अत्यधिक कृपालु हैं। उन कृपासागरकी कृपाका कभी अन्त नहीं आता। भक्तोंपर कृपा करनेके उनके विचित्र-विचित्र ढंग हैं। जैसे, पहले तो भगवान्ने अर्जुनको उपदेश दिया। उपदेशके द्वारा अर्जुनके भीतरके भावोंका परिवर्तन कराकर उनको अपनी विभूतियोंका ज्ञान कराया। उन विभूतियोंको जाननेसे अर्जुनमें एक विलक्षणता आ गयी, जिससे उन्होंने भगवान्से कहा कि आपके अमृतमय वचन सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। विभूतियोंका वर्णन करके अन्तमें भगवान्ने कहा कि ऐसे (तरह-तरहकी विभूतियोंवाले) अनन्त ब्रह्माण्ड मेरे एक अंशमें पड़े हुए हैं। जिसके एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उस विराटरूपको देखनेके लिये अर्जुनकी इच्छा हुई और इसके लिये उन्होंने प्रार्थना की। इसपर भगवान्ने अपना विराटरूप दिखाया और उसको देखनेके लिये बार-बार आज्ञा दी। परन्तु अर्जुनको विराटरूप दीखा नहीं। तब उनको भगवान्ने दिव्यचक्षु प्रदान किये। सारांश यह हुआ कि भगवान्ने ही विराटरूप देखनेकी जिज्ञासा प्रकट की। जिज्ञासा प्रकट करके विराटरूप दिखानेकी इच्छा प्रकट की। इच्छा प्रकट करनेपर विराटरूप दिखाया। अर्जुनको नहीं दीखा तो दिव्यचक्षु देकर इसकी पूर्ति की। तात्पर्य यह निकला कि भगवान्के शरण होनेपर शरणागतका सब काम करनेकी जिम्मेवारी भगवान् अपने ऊपर ले लेते हैं।

जानना और देखना। नवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘पश्य मे योगमैश्वरम्’ पदोंसे भगवान्के विराटरूपको

७५२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

देखनेकी बात आयी है। तात्पर्य है कि जो जाननेमें आता है, वह भी भगवान् है और जो देखनेमें आता है, वह भी भगवान् है। भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है। इस ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्के अलौकिक रूपको देखनेकी विलक्षणता है, विवेचनकी विलक्षणता नहीं है। इसलिये गीताके अन्तमें भी संजयने एक तो 'संवाद' की विलक्षणता कही है और एक 'रूप' की विलक्षणता कही है (अठारहवें अध्यायका छिहत्तरवाँ-सतहत्तरवाँ श्लोक)।

भगवान्का विराट्रूप अलौकिक था, इसलिये उसको देखनेके लिये भगवान्ने अर्जुनको अलौकिक चक्षु दिये।

सम्बन्ध—दिव्यचक्षु प्राप्त करके अर्जुने भगवान्का कैसा रूप देखा, यह बात संजय धृतराष्ट्रसे आगेके श्लोकमें कहते हैं।

सज्ज्य उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ १ ॥

संजय बोले—

राजन्= हे राजन् !महायोगेश्वरः= महायोगेश्वरपरमम्= परम
एवम्= ऐसाहरिः= भगवान्ऐश्वरम्= ऐश्वर
उक्त्वा= कहकरश्रीकृष्णेरूपम्= विराट्रूप
ततः= फिरपार्थाय= अर्जुनकोदर्शयामास= दिखाया।*

व्याख्या—एवमुक्त्वा ततो ……… परमं रूपमैश्वरम्—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो यह कहा था कि 'तू अपने चर्मचक्षुओंसे मुझे नहीं देख सकता, इसलिये मैं तेरेको दिव्यचक्षु देता हूँ, जिससे तू मेरे ईश्वर-सम्बन्धी योगको देख', उसीका संकेत यहाँ संजयने 'एवमुक्त्वा' पदसे किया है।

चौथे श्लोकमें अर्जुने भगवान्को 'योगेश्वर' कहा और यहाँ संजय भगवान्को 'महायोगेश्वर' कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने अर्जुनकी प्रार्थनासे बहुत अधिक अपना विश्वरूप दिखाया। भक्तकी थोड़ी-सी भी वास्तविक रुचि भगवान्की तरफ होनेपर भगवान् अपनी

परिशिष्ट भाव—भगवान्को 'महायोगेश्वर' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् सम्पूर्ण योगोंके ईश्वर हैं। ऐसा कोई भी योग नहीं है, जिसके ईश्वर (मालिक) भगवान् न हों अर्थात् सब योग भगवान्के ही अन्तर्गत हैं।

अर्जुनेने तो भगवान्को 'योगेश्वर' कहा था (इसी अध्यायका चौथा श्लोक), पर संजय भगवान्को 'महायोगेश्वर' कहते हैं। कारण कि संजय भगवान्को पहलेसे ही अर्जुनसे ज्यादा जानते थे। संजयसे भी ज्यादा वेदव्यासजी भगवान्को जानते थे। वेदव्यासजीकी कृपासे ही संजयने भगवान् और अर्जुनका संवाद सुना—'व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतदगृह्यमहं परम्' (गीता १८।७५)। वेदव्यासजीसे भी ज्यादा भगवान्को स्वयं भगवान् ही जानते हैं (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा और पन्द्रहवाँ श्लोक)।

अपार शक्तिसे उसकी पूर्ति कर देते हैं।

तीसरे श्लोकमें अर्जुनेने जिस रूपके लिये 'रूपमैश्वरम्' कहा, उसी रूपके लिये यहाँ संजय 'परमं रूपमैश्वरम्' कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान्का विश्वरूप बहुत ही विलक्षण है। सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर भगवान् श्रीकृष्णे ऐसा विलक्षण, अलौकिक, अदभुत विश्वरूप दिखाया, जिसको धैर्यशाली, जितेन्द्रिय, शूरवीर और भगवान्से प्राप्त दिव्यदृष्टिवाले अर्जुनको भी दुर्निरीक्ष्य कहना पड़ा (सत्रहवाँ श्लोक) और भयभीत होना पड़ा (पैंतालिसवाँ श्लोक), तथा भगवान्को भी 'व्यपेतभीः' कहकर अर्जुनको आश्वासन देना पड़ा (उनचासवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—अब संजय भगवान्के उस परम ऐश्वर-रूपका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

  • संजयको भी वेदव्यासजी महाराजसे दिव्यदृष्टि मिली हुई थी, इसलिये अर्जुनके साथ-ही-साथ उन्होंने भी भगवान्के विश्वरूपके दर्शन किये थे (गीता—अठारहवें अध्यायका सतहत्तरवाँ श्लोक)। अब संजय उसी विश्वरूपका धृतराष्ट्रसे वर्णन करते हैं।

श्लोक १०-११ ]

  • साधक-संजीवनी *

७५३

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥

अनेकवक्त्रनयनम् = जिनके अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेकाद्भुतदर्शनम् = अनेक तरहके अद्भुत दर्शन हैं, अनेकदिव्याभरणम् = अनेक अलौकिक आभूषण हैं, दिव्यानेकोद्यतायुधम् = हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं दिव्यमाल्याम्बरधरम् = (तथा) जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं, जो अलौकिक वस्त्र पहेने हुए हैं,

व्याख्या—‘अनेकवक्त्रनयनम्’—विराट् रूपसे प्रकट हुए भगवान् के जितने मुख और नेत्र दीख रहे हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं। विराट् रूपमें जितने प्राणी दीख रहे हैं, उनके मुख, नेत्र, हाथ, पैर आदि सब-के-सब अंग विराट् रूप भगवान् के हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही विराट् रूपसे प्रकट हुए हैं।

‘अनेकाद्भुतदर्शनम्’—भगवान् के विराट् रूपमें जितने रूप दीखते हैं, जितनी आकृतियाँ दीखती हैं, जितने रंग दीखते हैं, जितनी उनकी विचित्र रूपसे बनावट दीखती है, वह सब-की-सब अद्भुत दीख रही है।

‘अनेकदिव्याभरणम्’—विराट् रूपमें दीखनेवाले अनेक रूपोंके हाथोंमें, पैरोंमें, कानोंमें, नाकोंमें और गलोंमें जितने गहने हैं, आभूषण हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही गहनोंके रूपमें प्रकट हुए हैं।

‘दिव्यानेकोद्यतायुधम्’—विराट् रूप भगवान् ने अपने हाथोंमें चक्र, गदा, धनुष, बाण, परिघ आदि अनेक प्रकारके जो आयुध (अस्त्र-शस्त्र) उठा रखे हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं।

‘दिव्यमाल्याम्बरधरम्’—विराट् रूप भगवान् ने गलेमें फूलोंकी, सोनेकी, चाँदीकी, मोतियोंकी, रत्नोंकी, गुंजाओं आदिकी अनेक प्रकारकी मालाएँ धारण कर रखी हैं। वे सभी दिव्य हैं। उन्होंने अपने शरीरोंपर लाल, पीले, हरे, सफेद, कपिश आदि अनेक रंगोंके वस्त्र पहन रखे हैं, जो सभी दिव्य हैं।

‘दिव्यगन्धानुलेपनम्’—विराट् रूप भगवान् ने ललाटपर

दिव्यगन्धानुलेपनम् = जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन, कुंकुम आदि लगा हुआ है, सर्वाश्चर्यमयम् = ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय, अनन्तम् = अनन्त रूपोंवाले (तथा) विश्वतोमुखम् = सब तरफ मुखोंवाले देवम् = देव-(अपने दिव्य स्वरूप-) को (भगवान् ने दिखाया)।

कस्तूरी, चन्दन, कुंकुम आदि गन्धके जितने तिलक किये हैं तथा शरीरपर जितने लेप किये हैं, वे सब-के-सब दिव्य हैं।

‘सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्’—इस प्रकार देखते ही चकित कर देनेवाले, अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुख-ही-मुखवाले अपने परम ऐश्वर्यमय रूपको भगवान् ने अर्जुनको दिखाया।

जैसे, कोई व्यक्ति दूर बैठे ही अपने मनसे चिन्तन करता है कि मैं हरिद्वारमें हूँ तथा गंगाजीमें स्नान कर रहा हूँ, तो उस समय उसको गंगाजी, पुल, घाटपर खड़े स्त्री-पुरुष आदि दीखने लगते हैं तथा मैं गंगाजीमें स्नान कर रहा हूँ—ऐसा भी दीखने लगता है। वास्तवमें वहाँ न हरिद्वार है और न गंगाजी है; परन्तु उसका मन ही उन सब रूपोंमें बना हुआ उसको दीखता है। ऐसे ही एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें, उन रूपोंमें पहेने हुए गहनोंके रूपमें, अनेक प्रकारके आयुधोंके रूपमें, अनेक प्रकारकी मालाओंके रूपमें, अनेक प्रकारके वस्त्रोंके रूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये भगवान् के विराट् रूपमें सब कुछ दिव्य है।

श्रीमद्भागवतमें आता है कि जब ब्रह्माजी बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं, प्रत्युत उनके बेंत, सींग, बाँसुरी, वस्त्र, आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही बन गये (श्रीमद्भागवत, दसवाँ स्कन्ध, तेरहवाँ अध्याय, उन्नीसवाँ श्लोक)।

७५४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

परिशिष्ट भाव —दूसरे अध्यायमें तो भगवान्के अंश जीवका सब कुछ आश्चर्यमय बताया गया है (गीता—दूसरे अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक), यहाँ भगवान्का सब कुछ आश्चर्यमय बताते हैं। भगवान्को ज्यों देखें, त्यों—ही विलक्षणता दीखती चली जाती है। भगवान्की विलक्षणता अनन्त है।

सम्बन्ध—अब संजय विश्वरूपके प्रकाशका वर्णन करते हैं।

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्वासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥

दिवि= (अगर) आकाशमेंसा= उन सबकाभासः= प्रकाशके
युगपत्= एक साथभाः= प्रकाश (मिलकर)सदृशी= समान
सूर्यसहस्रस्य= हजारों सूर्योंकातस्य= उसयदि= शायद ही
उत्थिता= उदयमहात्मनः= महात्मा-(विराट्रूप परमात्मा-)स्यात्= हो अर्थात् नहीं
भवेत्= हो जाय, (तो भी)केहो सकता।

व्याख्या —‘दिवि सूर्यसहस्रस्य ..... तस्य महात्मनः’—जैसे आकाशमें हजारों तारे एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश एक चन्द्रमाके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता और हजारों चन्द्रमाओंका मिला हुआ प्रकाश एक सूर्यके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता, ऐसे ही आकाशमें हजारों सूर्य एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश विराट् भगवान्के प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता। तात्पर्य यह हुआ कि हजारों सूर्योंका प्रकाश भी विराट् भगवान्के प्रकाशका उपमेय नहीं हो सकता। इस प्रकार जब हजारों सूर्योंके प्रकाशको उपमेय बनानेमें भी दिव्यदृष्टिवाले संजयको

संकोच होता है, तब वह प्रकाश विराट्रूप भगवान्के प्रकाशका उपमान हो ही कैसे सकता है! कारण कि सूर्यका प्रकाश भौतिक है, जब कि विराट् भगवान्का प्रकाश दिव्य है। भौतिक प्रकाश कितना ही बड़ा क्यों न हो, दिव्य प्रकाशके सामने वह तुच्छ ही है। भौतिक प्रकाश और दिव्य प्रकाशकी जाति अलग-अलग होनेसे उनकी आपसमें तुलना नहीं की जा सकती। हाँ, अंगुलिनिर्देशकी तरह भौतिक प्रकाशसे दिव्य प्रकाशका संकेत किया जा सकता है। यहाँ संजय भी हजारों सूर्योंके भौतिक प्रकाशकी कल्पना करके विराट्रूप भगवान्के प्रकाश-(तेज-) का लक्ष्य कराते हैं।

परिशिष्ट भाव —हजारों सूर्योंका प्रकाश मिलकर भी भगवान्के प्रकाशकी बराबरी नहीं कर सकता; क्योंकि सूर्योंमें जो तेज है, वह भी भगवान्से ही आया है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। अगर हजारों सूर्योंका प्रकाश हो तो भी है तो भौतिक ही, जबकि भगवान्का प्रकाश भौतिक नहीं है, प्रत्युत दिव्य है।

सम्बन्ध—पीछेके श्लोकोंमें विश्वरूप भगवान्के दिव्यरूप, अवयव और तेजका वर्णन करके अब संजय अर्जुनद्वारा विश्वरूपका दर्शन करनेकी बात कहते हैं।

तत्रैकस्थं जगत्कृतस्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यददेवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥

तदा= उस समयतत्र= उसप्रविभक्तम्= विभागोंमें विभक्त
पाण्डवः= अर्जुनेशरीरे= शरीरमेंकृतस्नम्= सम्पूर्ण
देवदेवस्य= देवोंके देव भगवान्केएकस्थम्= एक जगह स्थितजगत्= जगत्को
अनेकधा= अनेक प्रकारकेअपश्यत्= देखा।

श्लोक १४]

  • साधक-संजीवनी *

७५५

व्याख्या—तत्रैकरथं जगत्कृतं प्रविभक्तमनेकधा’— अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त अर्थात् ये देवता हैं, ये मनुष्य हैं, ये पशु-पक्षी हैं, यह पृथ्वी है, ये समुद्र हैं, यह आकाश है, ये नक्षत्र हैं, आदि-आदि विभागोंके सहित (संकुचित नहीं, प्रत्युत विस्तारसहित) सम्पूर्ण चराचर जगत्को भगवान्के शरीरके भी एक देशमें अर्जुनने भगवान्के दिये हुए दिव्यचक्षुओंसे प्रत्यक्ष देखा। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् श्रीकृष्णके छोटे-से शरीरके भी एक अंशमें चर-अचर, स्थावर-जंगमसहित सम्पूर्ण संसार है। वह संसार भी अनेक ब्रह्माण्डोंके रूपमें, अनेक देवताओंके लोकोँके रूपमें, अनेक व्यक्तियों और पदार्थोंके रूपमें विभक्त और विस्तृत है—इस प्रकार अर्जुनने

परिशिष्ट भाव— अर्जुनने भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज; स्थावर-जंगम; नभचर-जलचर-थलचर; चौरासी लाख योनियाँ; चौदह भुवन आदि अनेक विभागोंमें विभक्त जगत्को देखा। जगत् भले ही अनन्त हो, पर है वह भगवान्के एक अंशमें ही (गीता—दसवें अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक) ! अर्जुन भगवान्के शरीरमें जहाँ भी दृष्टि डालते हैं, वहाँ उनको अनन्त जगत् दीखता है!

सम्बन्ध— भगवान्के अलौकिक विराट्रूपको देखनेके बाद अर्जुनकी क्या दशा हुई—इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकमें करते हैं।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४ ॥

ततः= भगवान्के विश्व-रूपको देखकरविस्मयाविष्टः= बहुत चकित हुए (और)कृताञ्जलिः= (वे) हाथ जोड़कर
सः= वेहृष्टरोमाः= आश्चर्यके कारण उनका शरीरदेवम्= विश्वरूप देवको
धनञ्जयः= अर्जुनरोमांचित हो गया।शिरसा= मस्तकसे
प्रणम्य= प्रणाम करके
अभाषत= बोले।

व्याख्या—‘ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः’— अर्जुनने भगवान्के रूपके विषयमें जैसी कल्पना भी नहीं की थी, वैसा रूप देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। भगवान्ने मेरेपर कृपा करके विलक्षण आध्यात्मिक बातें अपनी ओरसे बतायीं और अब कृपा करके मेरेको अपना विलक्षण रूप दिखा रहे हैं—इस

बातको लेकर अर्जुन प्रसन्नताके कारण रोमांचित हो उठे।

‘प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत’— भगवान्की विलक्षण कृपाको देखकर अर्जुनका ऐसा भाव उमड़ा कि मैं इसके बदलेमें क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ? मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो मैं इनके अर्पण करूँ। मैं तो केवल

  • श्रीमद्भागवतमें आया है कि एक बार यशोदाजीने कह्नैयाके छोटे-से मुखमें विश्वरूप देखा। इसपर विचार किया जाय तो अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंमेंसे एक ब्रह्माण्डमें एक भूमण्डल है। इस भूमण्डलमें भारतवर्ष, भारतवर्षमें एक माथुरमण्डल, माथुरमण्डलमें एक व्रजमण्डल, व्रजमण्डलमें एक नन्दगौव, नन्दगौवमें एक नन्दभवन और नन्दभवनमें एक जगह छोटा-सा कह्नैया खड़ा है। उस कह्नैयाको यशोदा मैया छड़ी लेकर धमकाती हैं कि ‘तूने माटी क्यों खायी? दिखा अपना मुख!’ कह्नैयाने अपना मुख खोलकर दिखाया तो उस छोटे-से मुखमें यशोदा मैयाने सम्पूर्ण जगत्को—नन्दगौवको और नन्दभवनमें अपने-आपको भी देखा—‘सहात्मानम्’ (श्रीमद्भागवत दसवाँ स्कन्ध, आठवाँ अध्याय, उन्तालीसवाँ श्लोक)। इसी तरह अर्जुनने भी भगवान्के शरीरके किसी अंशमें सम्पूर्ण जगत्को देखा।

७५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

सिरसे प्रणाम ही कर सकता हूँ अर्थात् अपने-आपको अपित ही कर सकता हूँ। अतः अर्जुन हाथ

जोड़कर और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए विश्वरूप भगवान्की स्तुति करने लगे।

सम्बन्ध—अर्जुन विराट्रूप भगवान्की जिस विलक्षणताको देखकर चकित हुए, उसका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वास्तथा भूतविशेषसङ्गान् ।

ब्रह्माण्मीशं कमलासनस्थमूर्षीश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥

अर्जुन बोले—

देव | = हे देव ! (मैं) | भूतविशेष- | | ईशम् | = शंकारजीको, ---|---|---|---|---|--- तव | = आपके | सङ्गान् | = प्राणियोंके विशेष- | सर्वान् | = सम्पूर्ण देहे | = शरीरमें | | विशेष समुदायोंको | ऋषीन् | = ऋषियोंको सर्वान् | = सम्पूर्ण | च | = और | च | = और देवान् | = देवताओंको | कमलासनस्थम् | = कमलासन- | दिव्यान् | = दिव्य तथा | = तथा | | पर बैठे हुए | उरगान् | = सर्पोंको | | ब्रह्माणम् | = ब्रह्माजीको, | पश्यामि | = देख रहा हूँ।

व्याख्या—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वास्तथा भूतविशेषसङ्गान्’—अर्जुनकी भगवत्प्रदत्त दिव्य दृष्टि इतनी विलक्षण है कि उनको देवलोक भी अपने सामने दीख रहे हैं। इतना ही नहीं, उनको सब-की-सब त्रिलोकी दिख रही है। केवल त्रिलोकी ही नहीं, प्रत्युत त्रिलोकीके उत्पादक (ब्रह्मा), पालक (विष्णु) और संहारक (महेश) भी प्रत्यक्ष दीख रहे हैं। अतः अर्जुन वर्णन करते हैं कि मैं सम्पूर्ण देवोंको, प्राणियोंके समुदायोंको और ब्रह्मा तथा शंकरको देख रहा हूँ।

‘ब्रह्माण्मीशं कमलासनस्थम्’—अर्जुन कहते हैं कि मैं कमलके ऊपर स्थित ब्रह्माजीको देखता हूँ—इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन कमलके नालको और नालके उद्गम-स्थान अर्थात् मूल आधार भगवान् विष्णुको (जो कि शेषशय्यापर सोये हुए हैं) भी देख रहे हैं। इसके सिवाय भगवान् शंकरको, उनके कैलास पर्वतको और कैलास पर्वतपर स्थित उनके निवासस्थान वटवृक्षको भी अर्जुन देख रहे हैं।

‘ऋषीश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्’—पृथ्वीपर रहनेवाले जितने भी ऋषि हैं, उनको तथा पाताललोकमें रहनेवाले दिव्य सर्पोंको भी अर्जुन देख रहे हैं।

इस श्लोकमें अर्जुनके कथनसे यह सिद्ध होता है कि

उन्हें स्वर्ग, मृत्यु और पाताल—यह त्रिलोकी अलग-अलग नहीं दीख रही है; किन्तु विभागसहित एक साथ एक जगह ही दीख रही है—‘प्रविभक्तमनेकथा’ (गीता ११।१३)। उस त्रिलोकीसे जब अर्जुनकी दृष्टि हटती है, तब जिनको ब्रह्मलोक, कैलास और वैकुण्ठलोक कहते हैं वे अधिकारियोंके अभीष्ट लोक तथा उनके मालिक (ब्रह्मा, शंकर और विष्णु) भी अर्जुनको दीखते हैं। यह सब भगवत्प्रदत्त दिव्यदृष्टिका ही प्रभाव है।

विशेष बात

जब भगवान्ने कहा कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरे किसी एक अंशमें है, तब अर्जुन उसे दिखानेकी प्रार्थना करते हैं। अर्जुनकी प्रार्थनापर भगवान् कहते हैं कि तू मेरे शरीरमें एक जगह स्थित चराचर जगत्को देख—‘इह एकस्थं’ ““मम देहे” (११।७)। वेदव्यासजीद्वारा प्राप्त दिव्यदृष्टिवाले संजय भी यही बात कहते हैं कि अर्जुनने भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित सम्पूर्ण जगत्को देखा—‘तत्र एकस्थं’ ““देवदेवस्य शरीरे” (११।१३)। यहाँ अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण भूतसमुदाय आदिको देखता हूँ—‘तव देव देहे’। इस प्रकार भगवान् और संजयके वचनोंमें तो ‘एकस्थम्’ (एक जगह स्थित) पद आया है, पर अर्जुनके वचनोंमें यह पद नहीं आया है। इसका कारण

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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यह है कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान् के शरीरमें जिस-किसी एक स्थानपर गयी, वहीं उनको भगवान् का विश्वरूप दिखायी देने लग गया। उस समय अर्जुनकी दृष्टि सारथिरूप भगवान् के शरीरकी तरफ गयी ही नहीं। अर्जुनकी दृष्टि जहाँ गयी, वहीं अनन्त सृष्टियाँ दीखने लग गयीं; अतः अर्जुनकी दृष्टि उधर ही बह गयी। इसलिये अर्जुन ‘एकस्थम्’ नहीं कह सके। वे ‘एकस्थम्’ तो तभी कह सकते हैं, जब विश्वरूप दीखनेके साथ-साथ सारथिरूपसे भगवान् का शरीर भी दीखे। अर्जुनको केवल विश्वरूप ही दीख रहा है, इसलिये वे विश्वरूपका ही वर्णन कर रहे हैं। उनको विश्वरूप इतना अपार दीख रहा है, जिसकी देश या कालसे कोई सीमा नहीं दीखती। तात्पर्य यह हुआ कि जब अर्जुनकी दृष्टिमें विश्वरूपका ही अन्त नहीं आ रहा है, तब उनकी दृष्टि सारथिरूपसे बैठे भगवान् की तरफ जाय ही कैसे?

परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान् के विराट् रूपमें देवता, प्राणी, ब्रह्माजी, विष्णु, शंकरजी, ऋषि, नाग—इन सबका समूह देखते हैं। तात्पर्य है कि अर्जुन मृत्युलोकमें बैठे हुए ही देवलोक, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास, नागलोक आदि लोक देख रहे हैं। अतः जो कुछ भी कहने-सुननेमें आता है, वह सब-का-सब भगवान् के एक अंशमें स्थित है। भगवान् साकार हों या निराकार हों, बड़े-से-बड़े हों या छोटे-से-छोटे हों, उनका अनन्तपना नहीं मिटता। सम्पूर्ण सृष्टि उनसे ही उत्पन्न होती है, उनमें ही रहती है और उनमें ही लीन हो जाती है, पर वे वैसे-के-वैसे ही रहते हैं!

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अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

विश्वरूप= हे विश्वरूप!(तथा)आदिम्= आदिको,
विश्वेश्वर= हे विश्वेश्वर!सर्वतः= सब ओरसे
त्वाम्= आपको (मैं)अनन्तरूपम्= अनन्त रूपोंवालामध्यम्
अनेकबाहूदर-पुनः
वक्त्रनेत्रम्= अनेक हाथों,पश्यामि= देख रहा हूँ।
पेटों, मुखोंतव= (मैं) आपकेअन्तम्= अन्तको ही
और नेत्रोंवाला= नपश्यामि= देख रहा हूँ।

१-भगवान् और संजयके वचनोंमें ‘एकस्थम्’ पद आनेसे यह मान लेना चाहिये कि अर्जुनने भी भगवान् के शरीरमें एक जगह ही सम्पूर्ण विश्वरूपको देखा।

२-(१) ‘रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड’ (मानस १।२०१)।

(२) कवेदुविधाविगणिताण्डपराणुचर्यावाताध्वरोमविवरस्य च ते महिल्वम् ॥ (श्रीमद्भागवत १०।१४।११)

‘आपके एक-एक रोमछिद्रमें ऐसे अगणित ब्रह्माण्ड उसी प्रकार उड़ते-पड़ते रहते हैं, जिस प्रकार झरोखेकी जालीमेंसे आनेवाली सूर्यको किरणोंमें रजके छोटे-छोटे परमाणु उड़ते हुए दिखायी देते हैं।’