सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 757, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 757

७५६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

सिरसे प्रणाम ही कर सकता हूँ अर्थात् अपने-आपको अपित ही कर सकता हूँ। अतः अर्जुन हाथ

जोड़कर और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए विश्वरूप भगवान्की स्तुति करने लगे।

सम्बन्ध—अर्जुन विराट्रूप भगवान्की जिस विलक्षणताको देखकर चकित हुए, उसका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वास्तथा भूतविशेषसङ्गान् ।

ब्रह्माण्मीशं कमलासनस्थमूर्षीश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥

अर्जुन बोले—

देव | = हे देव ! (मैं) | भूतविशेष- | | ईशम् | = शंकारजीको, ---|---|---|---|---|--- तव | = आपके | सङ्गान् | = प्राणियोंके विशेष- | सर्वान् | = सम्पूर्ण देहे | = शरीरमें | | विशेष समुदायोंको | ऋषीन् | = ऋषियोंको सर्वान् | = सम्पूर्ण | च | = और | च | = और देवान् | = देवताओंको | कमलासनस्थम् | = कमलासन- | दिव्यान् | = दिव्य तथा | = तथा | | पर बैठे हुए | उरगान् | = सर्पोंको | | ब्रह्माणम् | = ब्रह्माजीको, | पश्यामि | = देख रहा हूँ।

व्याख्या—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वास्तथा भूतविशेषसङ्गान्’—अर्जुनकी भगवत्प्रदत्त दिव्य दृष्टि इतनी विलक्षण है कि उनको देवलोक भी अपने सामने दीख रहे हैं। इतना ही नहीं, उनको सब-की-सब त्रिलोकी दिख रही है। केवल त्रिलोकी ही नहीं, प्रत्युत त्रिलोकीके उत्पादक (ब्रह्मा), पालक (विष्णु) और संहारक (महेश) भी प्रत्यक्ष दीख रहे हैं। अतः अर्जुन वर्णन करते हैं कि मैं सम्पूर्ण देवोंको, प्राणियोंके समुदायोंको और ब्रह्मा तथा शंकरको देख रहा हूँ।

‘ब्रह्माण्मीशं कमलासनस्थम्’—अर्जुन कहते हैं कि मैं कमलके ऊपर स्थित ब्रह्माजीको देखता हूँ—इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन कमलके नालको और नालके उद्गम-स्थान अर्थात् मूल आधार भगवान् विष्णुको (जो कि शेषशय्यापर सोये हुए हैं) भी देख रहे हैं। इसके सिवाय भगवान् शंकरको, उनके कैलास पर्वतको और कैलास पर्वतपर स्थित उनके निवासस्थान वटवृक्षको भी अर्जुन देख रहे हैं।

‘ऋषीश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्’—पृथ्वीपर रहनेवाले जितने भी ऋषि हैं, उनको तथा पाताललोकमें रहनेवाले दिव्य सर्पोंको भी अर्जुन देख रहे हैं।

इस श्लोकमें अर्जुनके कथनसे यह सिद्ध होता है कि

उन्हें स्वर्ग, मृत्यु और पाताल—यह त्रिलोकी अलग-अलग नहीं दीख रही है; किन्तु विभागसहित एक साथ एक जगह ही दीख रही है—‘प्रविभक्तमनेकथा’ (गीता ११।१३)। उस त्रिलोकीसे जब अर्जुनकी दृष्टि हटती है, तब जिनको ब्रह्मलोक, कैलास और वैकुण्ठलोक कहते हैं वे अधिकारियोंके अभीष्ट लोक तथा उनके मालिक (ब्रह्मा, शंकर और विष्णु) भी अर्जुनको दीखते हैं। यह सब भगवत्प्रदत्त दिव्यदृष्टिका ही प्रभाव है।

विशेष बात

जब भगवान्ने कहा कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरे किसी एक अंशमें है, तब अर्जुन उसे दिखानेकी प्रार्थना करते हैं। अर्जुनकी प्रार्थनापर भगवान् कहते हैं कि तू मेरे शरीरमें एक जगह स्थित चराचर जगत्को देख—‘इह एकस्थं’ ““मम देहे” (११।७)। वेदव्यासजीद्वारा प्राप्त दिव्यदृष्टिवाले संजय भी यही बात कहते हैं कि अर्जुनने भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित सम्पूर्ण जगत्को देखा—‘तत्र एकस्थं’ ““देवदेवस्य शरीरे” (११।१३)। यहाँ अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण भूतसमुदाय आदिको देखता हूँ—‘तव देव देहे’। इस प्रकार भगवान् और संजयके वचनोंमें तो ‘एकस्थम्’ (एक जगह स्थित) पद आया है, पर अर्जुनके वचनोंमें यह पद नहीं आया है। इसका कारण