श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 758, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १६ ]
- साधक-संजीवनी *
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यह है कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान् के शरीरमें जिस-किसी एक स्थानपर गयी, वहीं उनको भगवान् का विश्वरूप दिखायी देने लग गया। उस समय अर्जुनकी दृष्टि सारथिरूप भगवान् के शरीरकी तरफ गयी ही नहीं। अर्जुनकी दृष्टि जहाँ गयी, वहीं अनन्त सृष्टियाँ दीखने लग गयीं; अतः अर्जुनकी दृष्टि उधर ही बह गयी। इसलिये अर्जुन ‘एकस्थम्’ नहीं कह सके। वे ‘एकस्थम्’ तो तभी कह सकते हैं, जब विश्वरूप दीखनेके साथ-साथ सारथिरूपसे भगवान् का शरीर भी दीखे। अर्जुनको केवल विश्वरूप ही दीख रहा है, इसलिये वे विश्वरूपका ही वर्णन कर रहे हैं। उनको विश्वरूप इतना अपार दीख रहा है, जिसकी देश या कालसे कोई सीमा नहीं दीखती। तात्पर्य यह हुआ कि जब अर्जुनकी दृष्टिमें विश्वरूपका ही अन्त नहीं आ रहा है, तब उनकी दृष्टि सारथिरूपसे बैठे भगवान् की तरफ जाय ही कैसे?
परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान् के विराट् रूपमें देवता, प्राणी, ब्रह्माजी, विष्णु, शंकरजी, ऋषि, नाग—इन सबका समूह देखते हैं। तात्पर्य है कि अर्जुन मृत्युलोकमें बैठे हुए ही देवलोक, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास, नागलोक आदि लोक देख रहे हैं। अतः जो कुछ भी कहने-सुननेमें आता है, वह सब-का-सब भगवान् के एक अंशमें स्थित है। भगवान् साकार हों या निराकार हों, बड़े-से-बड़े हों या छोटे-से-छोटे हों, उनका अनन्तपना नहीं मिटता। सम्पूर्ण सृष्टि उनसे ही उत्पन्न होती है, उनमें ही रहती है और उनमें ही लीन हो जाती है, पर वे वैसे-के-वैसे ही रहते हैं!
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अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥
| विश्वरूप | = हे विश्वरूप! | (तथा) | आदिम् | = आदिको, |
|---|---|---|---|---|
| विश्वेश्वर | = हे विश्वेश्वर! | सर्वतः | = सब ओरसे | न |
| त्वाम् | = आपको (मैं) | अनन्तरूपम् | = अनन्त रूपोंवाला | मध्यम् |
| अनेकबाहूदर- | पुनः | |||
| वक्त्रनेत्रम् | = अनेक हाथों, | पश्यामि | = देख रहा हूँ। | न |
| पेटों, मुखों | तव | = (मैं) आपके | अन्तम् | = अन्तको ही |
| और नेत्रोंवाला | न | = न | पश्यामि | = देख रहा हूँ। |
१-भगवान् और संजयके वचनोंमें ‘एकस्थम्’ पद आनेसे यह मान लेना चाहिये कि अर्जुनने भी भगवान् के शरीरमें एक जगह ही सम्पूर्ण विश्वरूपको देखा।
२-(१) ‘रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड’ (मानस १।२०१)।
(२) कवेदुविधाविगणिताण्डपराणुचर्यावाताध्वरोमविवरस्य च ते महिल्वम् ॥ (श्रीमद्भागवत १०।१४।११)
‘आपके एक-एक रोमछिद्रमें ऐसे अगणित ब्रह्माण्ड उसी प्रकार उड़ते-पड़ते रहते हैं, जिस प्रकार झरोखेकी जालीमेंसे आनेवाली सूर्यको किरणोंमें रजके छोटे-छोटे परमाणु उड़ते हुए दिखायी देते हैं।’