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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक १६ ]

  • साधक-संजीवनी *

७५७

यह है कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान् के शरीरमें जिस-किसी एक स्थानपर गयी, वहीं उनको भगवान् का विश्वरूप दिखायी देने लग गया। उस समय अर्जुनकी दृष्टि सारथिरूप भगवान् के शरीरकी तरफ गयी ही नहीं। अर्जुनकी दृष्टि जहाँ गयी, वहीं अनन्त सृष्टियाँ दीखने लग गयीं; अतः अर्जुनकी दृष्टि उधर ही बह गयी। इसलिये अर्जुन ‘एकस्थम्’ नहीं कह सके। वे ‘एकस्थम्’ तो तभी कह सकते हैं, जब विश्वरूप दीखनेके साथ-साथ सारथिरूपसे भगवान् का शरीर भी दीखे। अर्जुनको केवल विश्वरूप ही दीख रहा है, इसलिये वे विश्वरूपका ही वर्णन कर रहे हैं। उनको विश्वरूप इतना अपार दीख रहा है, जिसकी देश या कालसे कोई सीमा नहीं दीखती। तात्पर्य यह हुआ कि जब अर्जुनकी दृष्टिमें विश्वरूपका ही अन्त नहीं आ रहा है, तब उनकी दृष्टि सारथिरूपसे बैठे भगवान् की तरफ जाय ही कैसे?

परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान् के विराट् रूपमें देवता, प्राणी, ब्रह्माजी, विष्णु, शंकरजी, ऋषि, नाग—इन सबका समूह देखते हैं। तात्पर्य है कि अर्जुन मृत्युलोकमें बैठे हुए ही देवलोक, ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, कैलास, नागलोक आदि लोक देख रहे हैं। अतः जो कुछ भी कहने-सुननेमें आता है, वह सब-का-सब भगवान् के एक अंशमें स्थित है। भगवान् साकार हों या निराकार हों, बड़े-से-बड़े हों या छोटे-से-छोटे हों, उनका अनन्तपना नहीं मिटता। सम्पूर्ण सृष्टि उनसे ही उत्पन्न होती है, उनमें ही रहती है और उनमें ही लीन हो जाती है, पर वे वैसे-के-वैसे ही रहते हैं!

— — — — —

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥

विश्वरूप= हे विश्वरूप!(तथा)आदिम्= आदिको,
विश्वेश्वर= हे विश्वेश्वर!सर्वतः= सब ओरसे
त्वाम्= आपको (मैं)अनन्तरूपम्= अनन्त रूपोंवालामध्यम्
अनेकबाहूदर-पुनः
वक्त्रनेत्रम्= अनेक हाथों,पश्यामि= देख रहा हूँ।
पेटों, मुखोंतव= (मैं) आपकेअन्तम्= अन्तको ही
और नेत्रोंवाला= नपश्यामि= देख रहा हूँ।

१-भगवान् और संजयके वचनोंमें ‘एकस्थम्’ पद आनेसे यह मान लेना चाहिये कि अर्जुनने भी भगवान् के शरीरमें एक जगह ही सम्पूर्ण विश्वरूपको देखा।

२-(१) ‘रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड’ (मानस १।२०१)।

(२) कवेदुविधाविगणिताण्डपराणुचर्यावाताध्वरोमविवरस्य च ते महिल्वम् ॥ (श्रीमद्भागवत १०।१४।११)

‘आपके एक-एक रोमछिद्रमें ऐसे अगणित ब्रह्माण्ड उसी प्रकार उड़ते-पड़ते रहते हैं, जिस प्रकार झरोखेकी जालीमेंसे आनेवाली सूर्यको किरणोंमें रजके छोटे-छोटे परमाणु उड़ते हुए दिखायी देते हैं।’

७५८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

व्याख्या—‘विश्वरूप’, ‘विश्वेश्वर’— इन सम्बोधनोंका तात्पर्य है कि मेरेको जो कुछ भी दीख रहा है, वह सब आप ही हैं और इस विश्वके मालिक भी आप ही हैं। सांसारिक मनुष्योंके शरीर तो जड़ होते हैं और उनमें शरीरी चेतन होता है; परन्तु आपके विराटरूपमें शरीर और शरीरी—ये दो विभाग नहीं हैं। विराटरूपमें शरीर और शरीररूपसे एक आप ही हैं। इसलिये विराटरूपमें सब कुछ चिन्मय-ही-चिन्मय है। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुन ‘विश्वरूप’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीर हैं और ‘विश्वेश्वर’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीरी (शरीरके मालिक) हैं।

‘अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्’— मैं आपके हाथोंकी तरफ देखता हूँ तो आपके हाथ भी अनेक हैं; आपके पेटकी तरफ देखता हूँ तो पेट भी अनेक हैं; आपके मुखकी तरफ देखता हूँ तो मुख भी अनेक हैं; और आपके नेत्रोंकी तरफ देखता हूँ तो नेत्र भी अनेक हैं। तात्पर्य है कि आपके हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंका कोई अन्त नहीं है, सब-के-सब अनन्त हैं।

‘पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्’— आप देश, काल, परिशिष्ट भाव—यहाँ भगवान्के विराटरूपकी अनन्तताका वर्णन हुआ है। भगवान्के एक अंशमें भी अनन्तता है। जैसे स्याहीमें किस जगह कौन-सी लिपि नहीं है? सोनेमें किस जगह कौन-सा गहना नहीं है? ऐसे ही भगवान्में क्या नहीं है? अर्थात् भगवान्में स्वाभाविक ही सब कुछ है।

वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिके रूपमें चारों तरफ अनन्त-ही-अनन्त दिखायी दे रहे हैं।

‘नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्’— आपका कहाँ अन्त है, इसका भी पता नहीं; आपका कहाँ मध्य है, इसका भी पता नहीं और आपका कहाँ आदि है, इसका भी पता नहीं।

सबसे पहले ‘नान्तम्’ कहनेका तात्पर्य यह मालूम देता है कि जब कोई किसीको देखता है, तब सबसे पहले उसकी दृष्टि उस वस्तुकी सीमापर जाती है कि यह कहाँतक है। जैसे, किसी पुस्तकको देखनेपर सबसे पहले उसकी सीमापर दृष्टि जाती है कि पुस्तककी लम्बाई-चौड़ाई कितनी है। ऐसे ही भगवान्के विराटरूपको देखनेपर अर्जुनकी दृष्टि सबसे पहले उसकी सीमा- (अन्त-) की ओर गयी। जब अर्जुनको उसका अन्त नहीं दीखा, तब उनकी दृष्टि मध्यभागपर गयी; फिर आदि- (आरम्भ-) की तरफ दृष्टि गयी, पर कहीं भी विराटरूपका अन्त, मध्य और आदिका पता नहीं लगा। इसलिये इस श्लोकमें ‘नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्’—यह क्रम रखा गया है।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥

त्वाम्= (मैं) आपको(आपको)दुर्निरीक्ष्यम्= नेत्रोंके द्वारा
किरीटिनम्= किरीट (मुकुट),तेजोराशिम्= तेजकी राशि,कठिनतासे देखे
गदिनम्= गदा,सर्वतः= सब ओरजानेयोग्य
चक्रिणम्= चक्र (तथा शंख और पद्म) धारणदीप्तिमन्तम्= प्रकाशवाले,
किये हुएदीप्तानार्कद्युतिम्= देदीप्यमानसमन्तात्
पश्यामि= देख रहा हूँ।अग्नि तथा सूर्यके समान कान्तिवाले,अप्रमेयम्
(देख रहा हूँ)।

व्याख्या—‘किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च’— आपको मैं किरीट, गदा और चक्र धारण किये हुए देख रहा हूँ। यहाँ ‘च’ पदसे शंख और पद्मको भी ले लेना चाहिये। इसका तात्पर्य ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनको विश्वरूपमें भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप भी दीख रहा है।

‘तेजोराशिम्’— आप तेजकी राशि हैं, मानो तेजका समूह-का-समूह (अनन्त तेज) इकट्ठा हो गया हो। इसका

पहले संजयने वर्णन किया है कि आकाशमें हजारों सूर्य एक साथ उदित होनेपर भी भगवान्के तेजकी बराबरी नहीं कर सकते (ग्यारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। ऐसे आप प्रकाशस्वरूप हैं।

‘सर्वतो दीप्तिमन्तम्’— स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेसे आप चारों तरफ प्रकाश कर रहे हैं।

‘पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानार्क-

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७५९

वृतिमप्रमेयम् —खूब देदीप्यमान अग्नि और सूर्यके समान आपकी कान्ति है। जैसे सूर्यके तेज प्रकाशके सामने आँखें चौंघ जाती हैं, ऐसे ही आपको देखकर आँखें चौंघ जाती हैं। अतः आप कठिनातासे देखे जानेयोग्य हैं। आपको ठीक तरहसे देख नहीं सकते।

[यहाँ एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी थी, पर वे दिव्यदृष्टिवाले अर्जुन

परिशिष्ट भाव—‘अप्रमेयम्’ —परमात्माके सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सभी रूप अप्रमेय (अपरिमित) हैं और उनका अंश जीवात्मा भी अप्रमेय है—‘अनाशिनाऽप्रमेयस्य’ (गीता २।१८)। वे परमात्मा ज्ञानका विषय नहीं हैं; क्योंकि वे ज्ञानके भी ज्ञाता हैं—‘वेदान्तकृद्देविवेद चाहम्’ (गीता १५।१५)।

‘वृत्तिरीक्ष्यम्’ —भगवान्के द्वारा प्रदत्त दिव्यदृष्टिसे भी अर्जुन भगवान्के विराट्रूपको देखनेमें पूरे समर्थ नहीं हो रहे हैं! इससे सिद्ध होता है कि भगवान्की ही हुई शक्तिसे भी भगवान्को पूरा नहीं जान सकते। भगवान् भी अपनेको पूरा नहीं जानते, यदि जान जायँ तो वे अनन्त कैसे रहेंगे ?

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें अर्जुन भगवान्को निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकाररूपमें देखते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥

त्वम्= आप (ही)विश्वस्य= सम्पूर्ण विश्वकेत्वम्= (और) आप (ही)
वेदितव्यम्= जाननेयोग्यपरम्= परमअव्ययः= अविनाशी
परमम्= परमनिधानम्= आश्रय हैं,सनातनः= सनातन
अक्षरम्= अक्षर(अक्षर-
ब्रह्म) हैं,त्वम्= आप (ही)पुरुषः= पुरुष हैं
(—ऐसा)
त्वम्= आप (ही)शाश्वतधर्म-मे= मैं
अस्य= इसगोप्ता= सनातनधर्मके
रक्षक हैंमतः= मानता हूँ।

व्याख्या—‘त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्’ —वेदों, शास्त्रों, पुराणों, स्मृतियों, सन्तोंकी वाणियों और तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंद्वारा जाननेयोग्य जो परमानन्दस्वरूप अक्षरब्रह्म है, जिसको निर्गुण-निराकार कहते हैं, वे आप ही हैं।

‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’ —देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है, उस संसारके परम आश्रय, आधार आप ही हैं। जब महाप्रलय होता है, तब सम्पूर्ण संसार कारणसहित आपमें ही लीन होता है और फिर महासर्गके आदिमें आपसे ही प्रकट होता है। इस तरह

भी विश्वरूपको देखनेमें पूरे समर्थ नहीं हो रहे हैं! ऐसा देदीप्यमान भगवान्का स्वरूप है!]

आप सब तरफसे अप्रमेय (अपरिमित) हैं अर्थात् आप प्रमा-(माप-) के विषय नहीं हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि आदि कोई भी प्रमाण आपको बतानेमें काम नहीं करता; क्योंकि प्रमाणोंमें शक्ति आपकी ही है।

‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ —जब धर्मकी हानि और

अधर्मकी वृद्धि होती है, तब आप ही अवतार लेकर अधर्मका नाश करके सनातनधर्मकी रक्षा करते हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुण-साकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]

‘अव्ययः सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे’ —अव्यय

अर्थात् अविनाशी, सनातन, आदिरहित, सदा रहनेवाले

उत्तम पुरुष आप ही हैं, ऐसा मैं मानता हूँ।

आप इस संसारके परम निधान हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुण-निराकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]

‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ —जब धर्मकी हानि और

अधर्मकी वृद्धि होती है, तब आप ही अवतार लेकर अधर्मका नाश करके सनातनधर्मकी रक्षा करते हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुण-साकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]

‘अव्ययः सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे’ —अव्यय

अर्थात् अविनाशी, सनातन, आदिरहित, सदा रहनेवाले

उत्तम पुरुष आप ही हैं, ऐसा मैं मानता हूँ।

परिशिष्ट भाव— यहाँ ‘त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्’ पदोंसे निर्गुण-निराकारकी बात आयी है, ‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’ पदोंसे सगुण-निराकारकी बात आयी है और ‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ पदोंसे सगुण-साकारकी बात आयी है। तात्पर्य है कि निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकार—ये सब मिलकर भगवान्का समग्ररूप है, जिसको

७६०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

जाननेपर फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता (गीता—सातवें अध्यायका दूसरा श्लोक); क्योंकि उसके सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं।

सम्बन्ध—पंद्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक आश्चर्यचकित करनेवाले देवरूपका वर्णन करके अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन उस विश्वरूपकी उग्राता, प्रभाव, सामर्थ्यका वर्णन करते हैं।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥

त्वाम् = आपको (मैं)अनन्तबाहुम् = अनन्तवाले (और)
अनादिमध्यान्तम्=आदि, मध्यभुजाओंवाले,स्वतेजसा = अपने तेजसे
और अन्तसेशशिसूर्यनेत्रम् = चन्द्र और सूर्य-इदम् = इस
रहित,रूप नेत्रोंवाले,विश्वम् = संसारको
अनन्तवीर्यम् = अनन्त प्रभाव-दीप्तहुताशवक्त्रम्=प्रज्वलिततपन्तम् = तपाते हुए
शाली,अग्निरूप मुखों-पश्यामि = देख रहा हूँ।

व्याख्या—‘अनादिमध्यान्तम्’—आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं अर्थात् आपको कोई सीमा नहीं है।

सोलहवें श्लोकमें भी अर्जुनने कहा है कि मैं आपके आदि, मध्य और अन्तको नहीं देखता हूँ। वहाँ तो ‘देशकृत’ अनन्ताका वर्णन हुआ है और यहाँ ‘कालकृत’ अनन्ताका वर्णन हुआ है। तात्पर्य है कि देशकृत, कालकृत, वस्तुकृत आदि किसी तरहसे भी आपकी सीमा नहीं है। सम्पूर्ण देश, काल आदि आपके अन्तर्गत हैं, फिर आप देश, काल आदिके अन्तर्गत कैसे आ सकते हैं? अर्थात् देश, काल आदि किसीके भी आधारपर आपको मापा नहीं जा सकता।

‘अनन्तवीर्यम्’—आपमें अपार पराक्रम, सामर्थ्य, बल और तेज है। आप अनन्त, असीम, शक्तिशाली हैं।

‘अनन्तबाहुम्’—* आपकी कितनी भुजाएँ हैं, इसकी

परिशिष्ट भाव—इस श्लोकका तात्पर्य है कि भगवान् सब तरहसे अनन्त हैं। उनके तेजसे तपनेवाला विश्व भगवान्से अलग नहीं है। अतः तपानेवाला और तपनेवाला—दोनों ही भगवान्के स्वरूप हैं।

कोई गिनती नहीं हो सकती। आप अनन्त भुजाओं-वाले हैं।

‘शशिसूर्यनेत्रम्’—संसारमात्रको प्रकाशित करनेवाले जो चन्द्र और सूर्य हैं, वे आपके नेत्र हैं। इसलिये संसार-मात्रको आपसे ही प्रकाश मिलता है।

‘दीप्तहुताशवक्त्रम्’—यज्ञ, होम आदिमें जो कुछ अग्निमें हवन किया जाता है, उन सबको ग्रहण करनेवाले देदीप्यमान अग्निरूप मुखवाले आप ही हैं।

‘स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्’—अपने तेजसे सम्पूर्ण विश्वको तपानेवाले आप ही हैं। तात्पर्य यह है कि जिन-जिन व्यक्तियों, वस्तुओं, परिस्थितियों आदिसे प्रतिकूलता मिल रही है, उन-उनसे ही सम्पूर्ण प्राणी संतप्त हो रहे हैं। संतप्त करनेवाले और संतप्त होनेवाले—दोनों एक ही विराट्रूपके अंग हैं।

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥

  • सोलहवें श्लोकमें अर्जुनने ‘अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्’ कहा और यहाँ भी ‘अनन्तबाहुम्’ कहते हैं, तो इसमें पुनरुक्ति-सी दीखती है। परन्तु वास्तवमें यह पुनरुक्ति नहीं है; क्योंकि वहाँ विराट्रूप भगवान्के देवरूपका वर्णन है और यहाँ उग्ररूपका वर्णन है। उग्ररूपका वर्णन होनेसे ही यहाँ ‘विश्वमिदं तपन्तम्’ और आगेके (बीसवें) श्लोकमें ‘दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम्’ पद आये हैं।

श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

७६९

महात्मन्= हे महात्मन् !दिशः= दिशाएँअद्भुतम्= अद्भुत (और)
इदम्= यहएकेन= एकउग्रम्= उग्र
द्यावापृथिव्योः= स्वर्ग और पृथ्वीकेत्वया= आपसेरूपम्= रूपको
अन्तरम्= बीचका अन्तरालहि= हीदृष्ट्वा= देखकर
= औरव्याप्तम्= परिपूर्ण हैं ।लोकत्रयम्= तीनों लोक
सर्वाः= सम्पूर्णतव= आपकेप्रव्यथितम्= व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं ।
इदम्= इस

व्याख्या—‘महात्मन्’ —इस सम्बोधनका तात्पर्य है कि आपके स्वरूपके समान किसीका स्वरूप हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। इसलिये आप ‘महात्मा’ अर्थात् महान् स्वरूपवाले हैं।

‘द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशाश्च सर्वाः’ —स्वर्ग और पृथ्वीके बीचमें जितना अवकाश है, पोलाहट है, वह सब पोलाहट आपसे परिपूर्ण हो रही है। पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण; पूर्व—उत्तरके बीचमें ‘ईशान’, उत्तर—पश्चिमके बीचमें ‘वायव्य’, पश्चिम—दक्षिणके बीचमें ‘नैऋत्य’ और दक्षिण—पूर्वके बीचमें ‘आग्नेय’ तथा ऊपर और नीचे—ये दसों दिशाएँ आपसे व्याप्त हैं अर्थात् इन सबमें आप-ही-आप विराजमान हैं।

‘दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुगं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम्’ —[उनीसवें श्लोकमें तथा बीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें उग्ररूपका वर्णन करके अब बीसवें श्लोकके उत्तरार्धसे बाईसवें श्लोकतक अर्जुन उग्ररूपके परिणामका वर्णन करते हैं—] आपके इस अद्भुत, विलक्षण, अलौकिक, आश्चर्यजनक, महान् देदीप्यमान और भयंकर उग्ररूपको देखकर स्वर्ग, मृत्यु और पाताललोकमें रहनेवाले सभी प्राणी व्यथित हो रहे हैं, भयभीत हो रहे हैं।

यद्यपि इस श्लोकमें स्वर्ग और पृथ्वीकी ही बात आयी है (द्यावापृथिव्योः), तथापि अर्जुनद्वारा ‘लोकत्रयम्’ कहनेके अनुसार यहाँ पाताल भी ले सकते हैं। कारण कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के शरीरके किसी एक देशमें जा रही है और वहाँ अर्जुनको जो दीख रहा है, वह दृश्य कभी पातालका है, कभी मृत्युलोकका है और कभी स्वर्गका है।

  • अर्जुनने स्वर्गसे पातालतक तथा पातालसे स्वर्गतक भगवान्की दी हुई दिव्यदृष्टिसे स्वर्ग, भूमण्डल, पाताल आदि सबको एक साथ देख रहे हैं; और जैसे देख रहे हैं वैसे ही बोल रहे हैं—‘हे देव! मैं आपकी देहमें देवताओंको देख रहा हूँ। प्राणियोंके अलग-अलग समुदायोंको देख रहा हूँ, कमलपर विराजमान ब्रह्माजीको देख रहा हूँ, कैलासपर विराजमान शंकरको देख रहा हूँ, सम्पूर्ण ऋषियोंको देख रहा हूँ, दिव्य सर्पाको देख रहा हूँ, (११।१५) आदि-आदि। अर्जुनको ऐसा कहनेमें तो देरी लगी है, पर ऐसा (सबको एक साथ) देखनेमें देरी नहीं लगी। इसलिये अर्जुनके वचनोंमें स्वर्ग, मृत्यु, पाताल आदि लोकोंका कोई क्रम नहीं है।

इस तरह अर्जुनकी दृष्टिके सामने सब दृश्य बिना क्रमके आ रहे हैं*।

यहाँपर एक शंका होती है कि अगर विराट्रूपको देखकर त्रिलोकी व्यथित हो रही है, तो दिव्यदृष्टिके बिना त्रिलोकीने विराट्रूपको कैसे देखा? भगवान्ने तो केवल अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी थी। त्रिलोकीको विराट्रूप देखनेके लिये दिव्यदृष्टि किसने दी? कारण कि प्राकृत चर्मचक्षुओंसे यह विराट्रूप नहीं देखा जा सकता, जबकि ‘विश्वमिदं तप्तम्’ (११।१९) और ‘लोकत्रयं प्रव्यथितम्’ पदोंसे विराट्रूपको देखकर त्रिलोकीके संतप्त और व्यथित होनेकी बात अर्जुनने कही है।

इसका समाधान यह है कि संतप्त और व्यथित होनेवाली त्रिलोकी भी उस विराट्रूपके अन्तर्गत ही है अर्थात् विराट्रूपका ही अंग है। संजयने और भगवान्ने विराट्रूपको एक देशमें देखनेकी बात (एकस्थाम्) कही, पर अर्जुनने एक देशमें देखनेकी बात नहीं कही। कारण कि विराट्रूप देखते हुए भगवान्के शरीरकी तरफ अर्जुनका खयाल ही नहीं गया। उनकी दृष्टि केवल विराट्रूपकी तरफ ही बह गयी। जब सारथिरूप भगवान्के शरीरकी तरफ भी अर्जुनकी दृष्टि नहीं गयी, तब संतप्त और व्यथित होनेवाले इस लौकिक संसारकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि कैसे जा सकती है? इससे सिद्ध होता है कि संतप्त होनेवाला और संतप्त करनेवाला तथा व्यथित होनेवाला और व्यथित करनेवाला—ये चारों उस विराट्रूपके ही अंग हैं। अर्जुनको ऐसा दीख रहा है कि त्रिलोकी विराट्रूपको देखकर व्यथित, भयभीत हो रही है, पर वास्तवमें (विराट्रूपके अन्तर्गत)

क्रमपूर्वक विश्वरूपको देखा हो, ऐसी बात नहीं है। अर्जुन भगवान्की दी हुई दिव्यदृष्टिसे स्वर्ग, भूमण्डल, पाताल आदि सबको एक साथ देख रहे हैं; और जैसे देख रहे हैं वैसे ही बोल रहे हैं—‘हे देव! मैं आपकी देहमें देवताओंको देख रहा हूँ। प्राणियोंके अलग-अलग समुदायोंको देख रहा हूँ, कमलपर विराजमान ब्रह्माजीको देख रहा हूँ, कैलासपर विराजमान शंकरको देख रहा हूँ, सम्पूर्ण ऋषियोंको देख रहा हूँ, दिव्य सर्पाको देख रहा हूँ, (११।१५) आदि-आदि। अर्जुनको ऐसा कहनेमें तो देरी लगी है, पर ऐसा (सबको एक साथ) देखनेमें देरी नहीं लगी। इसलिये अर्जुनके वचनोंमें स्वर्ग, मृत्यु, पाताल आदि लोकोंका कोई क्रम नहीं है।

७६२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

भयानक सिंह, व्याघ्र, साँप आदि जन्तुओंको और मृत्युको देखकर त्रिलोकी भयभीत हो रही है।

मार्मिक बात

देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाला सम्पूर्ण संसार भगवान्के दिव्य विराटरूपका ही एक छोटा-सा अंग है। संसारमें जो जडता, परिवर्तनशीलता, अदिव्यता दीखती है, वह वस्तुतः दिव्य विराटरूपकी ही एक झलक है, एक लीला है। विराटरूपकी जो दिव्यता है, उसकी तो स्वतन्त्र सत्ता है, पर संसारकी जो अदिव्यता है, उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। अर्जुनको तो दिव्यदृष्टिसे भगवान्का विराटरूप दीखा, पर भक्तोंको भावदृष्टिसे यह संसार भगवत्स्वरूप दीखता है—‘वासुदेवः सर्वम्।’ तात्पर्य है कि जैसे बचपनमें बालकका कंकड़-पत्थरोंमें जो भाव

रहता है, वैसा भाव बड़े होनेपर नहीं रहता; बड़े होनेपर कंकड़-पत्थर उसे आकृष्ट नहीं करते, ऐसे ही भोगदृष्टि रहनेपर संसारमें जो भाव रहता है, वह भाव भोगदृष्टिके मिटनेपर नहीं रहता।

जिनकी भोगदृष्टि होती है, उनको तो संसार सत्य दीखता है, पर जिनकी भोगदृष्टि नहीं है, ऐसे महापुरुषोंको संसार भगवत्स्वरूप ही दीखता है। जैसे एक ही स्त्री बालकको माँके रूपमें, पिताको पुत्रीके रूपमें, पतिको पत्नीके रूपमें और सिंहको भोजनके रूपमें दीखती है, ऐसे ही यह संसार ‘चर्मदृष्टि’से सच्चा, ‘विवेकदृष्टि’से परिवर्तनशील, ‘भावदृष्टि’से भगवत्स्वरूप और ‘दिव्यदृष्टि’से विराटरूपका ही एक छोटा-सा अंग दीखता है।

परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें आये ‘त्वयैकेन’ पदका तात्पर्य है कि असंख्य रूपोंमें एक आप ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’। आपके अनेक रूपोंकी कोई गणना नहीं कर सकता, पर उनमें हैं आप एक ही।

भगवान्में अनेक तरहकी अद्भुतता है। वे देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, रूप, ज्ञान, योग आदि सब दृष्टियोंसे अनन्त हैं। जिसको हमने देखा नहीं, सुना नहीं, जाना नहीं, समझा नहीं और जो हमारी कल्पनामें आया ही नहीं, वह सब विराटरूपके अन्तर्गत है।

सम्बन्ध—अब अर्जुनकी दृष्टिके सामने (विराटरूपमें) स्वर्गादि लोकोंका दृश्य आता है और वे उसका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्द्वीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥

अमी= वेप्राञ्जलयः= हाथ जोड़े हुएस्वस्ति= ‘कल्याण हो! मंगल हो!’
हि= ही(आपके नामों औरइति= ऐसा
सुरसङ्घाः= देवताओंके समुदायगुणोंका)उक्त्वा= कहकर
त्वाम्= आपमेंगृणन्ति= कीर्तन कर रहे हैं।पुष्कलाभिः= उत्तम-उत्तम
विशन्ति= प्रविष्ट हो रहे हैं।महर्षि-स्तुतिभिः= स्तोत्रोंके द्वारा
केचित्= (उनमेंसे) कई तोसिद्धसङ्घाः= महर्षियों औरत्वाम्= आपकी
भीताः= भयभीत होकरसिद्धोंके समुदायस्तुवन्ति= स्तुति कर रहे हैं।

व्याख्या —‘अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति’—जब अर्जुन स्वर्गमें गये थे, उस समय उनका जिन देवताओंसे परिचय हुआ था, उन्हीं देवताओंके लिये यहाँ अर्जुन कह रहे हैं कि वे ही देवतालोग आपके स्वरूपमें प्रविष्ट होते हुए दीख रहे हैं। ये सभी देवता आपसे ही उत्पन्न होते हैं, आपमें ही स्थित रहते हैं और आपमें ही प्रविष्ट होते हैं।

‘केचिद्द्वीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति’ —परन्तु उन

देवताओंमेंसे जिनकी आयु अभी ज्यादा शेष है, ऐसे आज़ान देवता (विराटरूपके अन्तर्गत) नृसिंह आदि भयानक रूपोंको देखकर भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम, रूप, लीला, गुण आदिका गान कर रहे हैं।

यद्यपि देवतालोग नृसिंह आदि अवतारोंको देखकर और कालरूप मृत्युसे भयभीत होकर ही भगवान्का गुणगान कर

श्लोक २२ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६३

रहे हैं (जो सभी विराटरूपके ही अंग हैं); परन्तु अर्जुनको ऐसा लग रहा है कि वे विराटरूप भगवान्को देखकर ही भयभीत होकर स्तुति कर रहे हैं। 'स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि:

पुष्कलाभि: '—सप्तर्षियों, देवर्षियों, महर्षियों, सनकादिकों और देवताओंके द्वारा स्वस्तिवाचन (कल्याण हो! मंगल हो!) हो रहा है और बड़े उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुतियाँ हो रही हैं।

परिशिष्ट भाव—देवता, महर्षि, सिद्ध आदि सब भगवान्के ही विराटरूपके अंग हैं। अतः प्रविष्ट होनेवाले, भयभीत होनेवाले, भगवान्के नामों और गुणोंका कीर्तन करनेवाले तथा स्तुति करनेवाले भी भगवान् हैं और जिनमें प्रविष्ट हो रहे हैं, जिनसे भयभीत हो रहे हैं, जिनके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं और जिनकी स्तुति कर रहे हैं, वे भी भगवान् हैं। यह भगवान्के सगुण रूपकी विलक्षणता है!

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥

ये =जो रुद्रादित्या: =ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, वसव: =आठ वसु, साध्या: =बारह साध्यगण, विश्वे =दस विश्वेदेव च =और अश्विनौ =दो अश्विनीकुमार,

च =तथा मरुत: =उनचास मरुद्गण च =और ऊष्मपा: =गरम-गरम भोजन करनेवाले (सात पितृगण) च =तथा

गन्धर्वयक्षासुर- सिद्धसङ्घा: =गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं, सर्वे, एव =(वे) सभी विस्मिता: =चकित होकर त्वाम् =आपको वीक्षन्ते =देख रहे हैं।

व्याख्या—'रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च'—ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, दो अश्विनीकुमार और उनचास मरुद्गण—इन सबके नाम इसी अध्यायके छठे श्लोककी व्याख्यामें दिये गये हैं, इसलिये वहाँ देख लेना चाहिये। मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु—ये बारह 'साध्य' हैं (वायुपुराण, छाछठवाँ अध्याय, पन्द्रहवाँ-सोलहवाँ श्लोक)। क्रतु, दक्ष, श्रव, सत्य, काल, काम, धुनि, कुरुवान्, प्रभवन् और रोचमान—ये दस 'विश्वेदेव' हैं (वायुपुराण, छाछठवाँ अध्याय, इकतीसवाँ-बत्तीसवाँ श्लोक)। कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात और बर्हिषत्—ये सात 'पितर' हैं (शिवपुराण, धर्म० तिरसठवाँ अध्याय, दूसरा श्लोक)। ऊष्म अर्थात् गरम अन्न खानेके कारण पितरोंका नाम 'ऊष्मपा' है। 'गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा: '—कश्यपजीकी पत्नी मुनि और प्राधासे तथा अरिष्टासे गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई है। गन्धर्वलोग राग-रागिनियोंकी विद्यामें बड़े चतुर हैं। ये स्वर्गलोकके गायक हैं। कश्यपजीकी पत्नी खसासे यक्षोंकी उत्पत्ति हुई है। देवताओंके विरोधी* दैत्यों, दानवों और राक्षसोंको असुर कहते हैं। कपिल आदिको सिद्ध कहते हैं। 'वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे'—उपर्युक्त सभी देवता, पितर, गन्धर्व, यक्ष आदि चकित होकर आपको देख रहे हैं। ये सभी देवता आदि विराटरूपके ही अंग हैं।

परिशिष्ट भाव—रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव आदि सब-के-सब एक भगवान्के समग्ररूपके ही अंग हैं। अतः देखनेवाले और दीखनेवाले सभी एक परमात्मा ही हैं।

सम्बन्ध—अब अर्जुन आगेके तीन श्लोकोंमें विश्वरूपके महान् विकराल रूपका वर्णन करके उसका परिणाम बताते हैं।

  • यहाँ आये 'असुर' शब्दमें 'नञ्' समास है—'न सुरा असुरा:'। अतः यहाँ 'असुर' शब्द देवताओंके विरोधीका वाचक है।

७६४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरूपादम्।

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥ २३॥

महाबाहो = हे महाबाहो! ते = आपके बहुवक्त्र- नेत्रम् = बहुत मुखों और नेत्रोंवाले, बहुबाहूरूपादम् = बहुत भुजाओं, जंघाओं और चरणोंवाले, बहूदरम् = बहुत उदरोंवाले (और) बहुदंष्ट्रा- करालम् = बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महत् = महान् रूपम् = रूपको दृष्ट्वा = देखकर लोकाः = सब प्राणी प्रव्यथिताः = व्यथित हो रहे हैं तथा = तथा अहम् = मैं भी (व्यथित हो रहा हूँ)।

व्याख्या—[पन्द्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक विश्वरूपमें 'देव'-रूपका, उन्नीसवेंसे बाईसवें श्लोकतक 'उग्र'-रूपका और तेईसवेंसे तीसवें श्लोकतक 'अत्यन्त उग्र'-रूपका वर्णन हुआ है।] 'बहुवक्त्रनेत्रम्'—आपके मुख एक-दूसरेसे नहीं मिलते। कई मुख सौम्य हैं और कई विकराल हैं। कई मुख छोटे हैं और कई बड़े हैं। ऐसे ही आपके जो नेत्र हैं, वे भी सभी एक समान नहीं दीख रहे हैं। कई नेत्र सौम्य हैं और कई विकराल हैं। कई नेत्र छोटे हैं, कई बड़े हैं, कई लम्बे हैं, कई चौड़े हैं, कई गोल हैं, कई टेढ़े हैं, आदि-आदि। 'बहुबाहूरूपादम्'—हाथोंकी बनावट, वर्ण, आकृति और उनके कार्य विलक्षण-विलक्षण हैं। जंघाएँ विचित्र-विचित्र हैं और चरण भी तरह-तरहके हैं। 'बहूदरम्'—पेट भी एक समान नहीं हैं। कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई भयंकर आदि कई तरहके पेट हैं। 'बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्'—मुखोंमें बहुत प्रकारकी विकराल दाढ़ें हैं। ऐसे महान् भयंकर, विकराल रूपको देखकर सब प्राणी व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। इस श्लोकसे पहले कहे हुए श्लोकोंमें भी अनेक मुखों, नेत्रों आदिकी और सब लोगोंके भयभीत होनेकी बात आयी है। अतः अर्जुन एक ही बात बार-बार क्यों कह रहे हैं? इसका कारण है कि—(१) विराट् रूपमें अर्जुनकी दृष्टिके सामने जो-जो रूप आता है, उस-उसमें उनको नयी-नयी विलक्षणता और दिव्यता दीख रही है।

(२) विराट् रूपको देखकर अर्जुन इतने घबरा गये, चकित हो गये, चक्रा गये, व्यथित हो गये कि उनको यह ख्याल ही नहीं रहा कि मैंने क्या कहा और मैं क्या कह रहा हूँ। (३) पहले तो अर्जुनने तीनों लोकोंके व्यथित होनेकी बात कही थी, पर यहाँ सब प्राणियोंके साथ-साथ स्वयंके भी व्यथित होनेकी बात कहते हैं। (४) एक बातको बार-बार कहना अर्जुनके भयभीत और आश्चर्यचकित होनेका चिह्न है। संसारमें देखा भी जाता है कि जिसको भय, हर्ष, शोक, आश्चर्य आदि होते हैं, उसके मुखसे स्वाभाविक ही किसी शब्द या वाक्यका बार-बार उच्चारण हो जाता है; जैसे—कोई साँपको देखकर भयभीत होता है तो वह बार-बार 'साँप! साँप! साँप!' ऐसा कहता है। कोई सज्जन पुरुष आता है तो हर्षमें भरकर कहते हैं—'आइये! आइये! आइये!' कोई प्रिय व्यक्ति मर जाता है तो शोकाकुल होकर कहते हैं—'मैं मारा गया! मारा गया! घरमें अँधेरा हो गया, अँधेरा हो गया!' अचानक कोई आफत आ जाती है तो मुखसे निकलता है—'मैं मरा! मरा! मरा!' ऐसे ही यहाँ विश्वरूप-दर्शनमें अर्जुनके द्वारा भय और हर्षके कारण कुछ शब्दों और वाक्योंका बार-बार उच्चारण हुआ है। अर्जुनने भय और हर्षको स्वीकार भी किया है—'अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे' (११।४५)। तात्पर्य यह कि भय, हर्ष, शोक आदिमें एक बातको बार-बार कहना पुनरुक्ति-दोष नहीं माना जाता।

परिशिष्ट भाव—दीखनेवाले और देखनेवाले, व्यथित करनेवाले और व्यथित होनेवाले सब प्राणी और स्वयं अर्जुन भी भगवान्के विराट् रूपके अन्तर्गत ही हैं।

श्लोक २४ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६५

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥

हि= क्योंकिव्यात्ताननम्= आपका मुख फैला हुआ है,प्रव्यथितान्तरात्मा= भयभीत
विष्णो= हे विष्णो ! (आपके)दीप्तविशाल-अन्तःकरणवाला
दीप्तम्= देदीप्यमाननेत्रम्= आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं ।(में)
अनेकवर्णम्= अनेक वर्ण हैं,त्वाम्= (ऐसे) आपकोधृतिम्= धैर्य
नभःस्पृशम्= आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैंदृष्ट्वा= देखकर= और
अर्थात् सब तरफसे बहुत बड़े हैं,शमम्= शान्तिको
न, विन्दामि= प्राप्त नहीं हो रहा हूँ ।

व्याख्या—[बीसवें श्लोकमें तो अर्जुने विराट् रूपकी लम्बाई-चौड़ाईका वर्णन किया, अब यहाँ केवल लम्बाईका वर्णन करते हैं ।]

‘विष्णो’—आप साक्षात् सर्वव्यापक विष्णु हैं, जिन्होंने पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये कृष्णरूपसे अवतार लिया है।

‘दीप्तमनेकवर्णम्’—आपके काले, पीले, श्याम, गौर आदि अनेक वर्ण हैं, जो बड़े ही देदीप्यमान हैं।

‘नभःस्पृशम्’—आपका स्वरूप इतना लम्बा है कि वह आकाशको स्पर्श कर रहा है।

वायुका गुण होनेसे स्पर्श वायुका ही होता है, आकाशका नहीं। फिर यहाँ आकाशको स्पर्श करनेका तात्पर्य क्या है? मनुष्यकी दृष्टि जहाँतक जाती है, वहाँतक तो उसको आकाश दीखता है, पर उसके आगे कालापन दिखायी देता है। कारण कि जब दृष्टि आगे नहीं जाती, थक जाती है, तब वह वहाँसे लौटती है, जिससे आगे कालापन दीखता है। यही दृष्टिका आकाशको स्पर्श करना है। ऐसे ही अर्जुनकी दृष्टि जहाँतक जाती है, वहाँतक उनको भगवान्का विराट् रूप दिखायी देता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का विराट् रूप असीम है, जिसके सामने दिव्यदृष्टि भी सीमित ही है।

‘व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्’—जैसे कोई भयानक जन्तु किसी जन्तुको खानेके लिये अपना मुख फैलाता है, ऐसे ही मात्र विश्वको चट करनेके लिये आपका मुख फैला हुआ दीख रहा है।

आपके नेत्र बड़े ही देदीप्यमान और विशाल दीख रहे हैं।

‘दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि

शमं च विष्णो’—इस तरह आपको देखकर मैं भीतरसे बहुत व्यथित हो रहा हूँ। मेरेको कहींसे भी धैर्य नहीं मिल रहा है और शान्ति भी नहीं मिल रही है।

यहाँ एक शंका होती है कि अर्जुनमें एक तो खुदकी सामर्थ्य है और दूसरी, भगवत्प्रदत्त सामर्थ्य (दिव्यदृष्टि) है। फिर भी अर्जुन तो विश्वरूपको देखकर डर गये, पर संजय नहीं डरे। इसमें क्या कारण है? सन्तोसे ऐसा सुना है कि भीष्म, विदुर, संजय और कुन्ती—ये चारों भगवान् श्रीकृष्णके तत्त्वको विशेषतासे जाननेवाले थे। इसलिये संजय पहलेसे ही भगवान्के तत्त्वको, उनके प्रभावको जानते थे, जब कि अर्जुन भगवान्के तत्त्वको उतना नहीं जानते थे। अर्जुनका विमूढ़भाव (मोह) अभी सर्वथा दूर नहीं हुआ था (गीता—ग्यारहवें अध्यायका उन्चासवाँ श्लोक)। इस विमूढ़भावके कारण अर्जुन भयभीत हुए। परन्तु संजय भगवान्के तत्त्वको जानते थे अर्थात् उनमें विमूढ़भाव नहीं था; अतः वे भयभीत नहीं हुए।

उपर्युक्त विवेचनसे एक बात सिद्ध होती है कि भगवान् और महापुरुषोंकी कृपा विशेषरूपसे अयोग्य मनुष्योंपर होती है, पर उस कृपाको विशेषरूपसे योग्य मनुष्य ही जानते हैं। जैसे, छोटे बच्चेपर माँका अधिक स्नेह होता है, पर बड़ा लड़का माँको जितना जानता है, उतना छोटा बच्चा नहीं जानता। ऐसे ही भोले-भाले, सीधे-सादे ब्रजवासी, ग्वालबाल, गोप-गोपी और गाय—इनपर भगवान् जितना अधिक स्नेह करते हैं, उतना स्नेह जीवन्मुक्त महापुरुषोंपर नहीं करते। परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुष ग्वालबाल आदिकी अपेक्षा भगवान्को विशेषरूपसे जानते हैं। संजयने विश्वरूपके लिये प्रार्थना भी नहीं की और विश्वरूपको देख लिया। परन्तु विश्वरूप देखनेके लिये अर्जुनको स्वयं

७६६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ११

भगवान्ने ही उत्कण्ठित किया और अपना विश्वरूप भी दिखाया; क्योंकि संजयकी अपेक्षा भगवान्के तत्त्वको जाननेमें अर्जुन छोटे थे और भगवान्के साथ सखाभाव रखते थे। इसलिये अर्जुनपर भगवान्की कृपा अधिक थी। इस कृपाके कारण अन्तमें अर्जुनका मोह नष्ट हो गया—'नष्टो मोहः ....... त्वत्प्रसादात्' (गीता १८।७३)। इससे सिद्ध होता है कि कृपापात्रका मोह अन्तमें नष्ट हो ही जाता है।

परिशिष्ट भाव—यहाँ आया 'नभःस्पृशम्' पद विराटरूपकी अनन्तताका द्योतक है। अर्जुनकी दृष्टि जहाँतक जाती है, वहाँतक उनको विराटरूप ही दीखता है—'सा काष्ठा सा परा गतिः' (कठ० १।३।११) अर्थात् वह परमात्मा सबकी परम अवधि और परम गति है।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥

ते = आपके, कालानल-सन्निभानि = प्रलयकालकी अग्निके समान, प्रज्वलित = और, दंष्ट्राकरालानि = दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक), मुखानि = मुखोंको, दृष्ट्वा = देखकर, (मुझे), न = न तो, दिशः = दिशाओंका, जाने = ज्ञान हो रहा है, च = और, न = न, शर्म = शान्ति, एव = ही, लभे = मिल रही है। (इसलिये), देवेश = हे देवेश!, जगन्निवास = हे जगन्निवास!, प्रसीद = (आप) प्रसन्न होइये।

व्याख्या—'दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि'—महाप्रलयके समय सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म करनेवाली जो अग्नि प्रकट होती है, उसे संवर्तक अथवा कालाग्नि कहते हैं। उस कालाग्निके समान आपके मुख हैं, जो भयंकर-भयंकर दाढ़ोंके कारण बहुत विकराल हो रहे हैं। उनको देखनेमात्रसे ही बड़ा भय लग रहा है। अगर उनका कार्य देखा जाय तो उसके सामने किसीका टिकना ही मुश्किल है।

'दिशो न जाने न लभे च शर्म'—ऐसे विकराल मुखोंको देखकर मुझे दिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो रहा है। इसका तात्पर्य है कि दिशाओंका ज्ञान होता है सूर्यके उदय और अस्त होनेसे। पर वह सूर्य तो आपके नेत्रोंकी जगह है अर्थात् वह तो आपके विराटरूपके अन्तर्गत आ गया है। इसके सिवाय आपके चारों ओर महान् प्रज्वलित प्रकाश-ही-प्रकाश दीख रहा है (ग्यारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक), जिसका न उदय और न अस्त हो रहा है। इसलिये मेरेको दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहा है और विकराल मुखोंको देखकर भयके कारण मैं किसी तरहका सुख और शान्ति भी प्राप्त नहीं कर रहा हूँ।

'प्रसीद देवेश जगन्निवास'—आप सब देवताओंके मालिक हैं और सम्पूर्ण संसार आपमें ही निवास कर रहा है। अतः कोई भी देवता, मनुष्य भयभीत होनेपर आपको ही पुकारेगा! आपके सिवाय और किसको पुकारेगा? तथा और कौन सुनेगा? इसलिये मैं भी आपको पुकारकर कह रहा हूँ कि हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइये।

भगवान्के विकराल रूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् मानो बड़े क्रोधमें आये हुए हैं। इस भावनाको लेकर ही भयभीत अर्जुन भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं।

परिशिष्ट भाव—भगवान् तो प्रसन्न होकर ही अर्जुनको अपना विराटरूप दिखा रहे हैं (गीता—इसी अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक), पर उनके रूपकी उग्रताको देखकर अर्जुनको यह वहम हो रहा है कि भगवान् अप्रसन्न हैं। इसलिये वे भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करते हैं।

सम्बन्ध—अब अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें मुख्य-मुख्य योद्धाओंका विराटरूपमें प्रवेश होनेका वर्णन करते हैं।

श्लोक २६-२७ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६७

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहेवावनपालसङ्घैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशानान्तेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥

अस्मदीयैः= हमारे पक्षकेअवनपाल-भयानकानि= भयंकर
योधमुख्यैः= मुख्य-मुख्य
योद्धाओंकेसङ्घैः= राजाओंके
समुदायोंकेवक्त्राणि= मुखोंमें
सह= सहितसह= सहितत्वरमाणाः= बड़ी तेजीसे
भीष्मः= भीष्म,धृतराष्ट्रस्य= धृतराष्ट्रकेविशन्ति= प्रविष्ट हो रहे हैं।
द्रोणः= द्रोणअमी= वेकेचित्= (उनमेंसे) कई-
तथा= औरएव= हीएक तो
असौ= वहसर्वे= सब-के-सबचूर्णितैः= चूर्ण हुए
सूतपुत्रः= कर्णपुत्राः= पुत्रउत्तमाङ्गैः= सिरोंसहित
अपि= भीते= आपकेदशानान्तेषु= (आपके) दांतोंके
त्वाम्= आपमेंदंष्ट्राकरालानि= विकराल दाढ़ोंकेविलग्नाः= बीचमें
(प्रविष्ट हो रहे हैं)कारणसन्दृश्यन्ते= फँसे हुए
= दीख रहे हैं।

व्याख्या —‘भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः’—हमारे पक्षके धृष्टद्युम्न, विराट, हुपद आदि जो मुख्य-मुख्य योद्धालोग हैं, वे सब-के-सब धर्मके पक्षमें हैं और केवल अपना कर्तव्य समझकर युद्ध करनेके लिये आये हैं। हमारे इन सेनापतियोंके साथ पितामह भीष्म,

आचार्य द्रोण और वह प्रसिद्ध सूतपुत्र कर्ण आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं।

यहाँ भीष्म, द्रोण और कर्णका नाम लेनेका तात्पर्य है कि ये तीनों ही अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये युद्धमें आये थे*।

  • भीष्म—भीष्मजीकी प्रतिज्ञा दुनियामें प्रसिद्ध है कि उन्होंने पिताजीकी प्रसन्नताके लिये विवाह न करनेकी प्रतिज्ञा की और आबाल ब्रह्मचारी रहे। इस प्रतिज्ञापर वे इतने डटे रहे कि उन्होंने गुरु परशुरामजीके साथ युद्ध किया, पर अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। भगवान्ने पहले हाथमें शस्त्र ग्रहण न करनेकी प्रतिज्ञा की थी। परन्तु जब भीष्मजीने (भगवान्की प्रतिज्ञाके विरुद्ध) यह प्रतिज्ञा कर ली कि ‘आजु जो हरिहि न शस्त्र गृह्णाऊँ। तौ लाजौ गंगा जननीको शान्तनु-सुत न कहहाऊँ॥’ तो भगवान्को भी अपनी प्रतिज्ञा छोड़कर एक बार चाबुक और दूसरी बार चक्र लेकर भीष्मजीकी तरफ दौड़ना पड़ा। इस तरह भीष्मकी प्रतिज्ञा बनी रही और भगवान्की प्रतिज्ञा टूट गयी!

द्रोण—द्रोणाचार्य दुर्वाधनका अन्न खाकर उसके वृत्तिभोगी रहे हैं। इसलिये वे युद्धको अपना कर्तव्य समझकर युद्धमें लग जाते हैं और अन्तमें देवताओंकी बातें सुनकर और युद्धमें अपने ब्राह्मणोचित धर्मको समझकर युद्धसे उपरत हो जाते हैं।

द्रोणाचार्यमें इतनी निष्पक्षता थी कि गुरुभक्त और विद्यामें तत्पर अर्जुनको ब्रह्मास्त्र छोड़ना और उसका उपसंहार करना (वापस लेना)—ये दो विद्याएँ सिखा दीं; परन्तु अपने पुत्र अश्वत्थामाको केवल ब्रह्मास्त्र छोड़ना ही सिखाया, उपसंहार करना सिखाया ही नहीं।

कर्ण—कर्णकी दुर्वाधनके साथ मित्रता थी, उस मित्रतारूप कर्तव्यको निभानेके लिये वे युद्धमें आते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा ‘कर्ण! तू कुत्तीका बेटा है,’ ऐसा कहनेपर भी वे दुर्वाधनके पक्षमें ही रहे और उन्होंने भगवान्से कहा कि ‘यह बात आप धर्मराज युधिष्ठिरसे मत कहना; क्योंकि अगर उनको पता लग जायगा तो मुझे बड़ा समझकर वे राज्य मुझे दे देंगे और मैं राज्य दुर्वाधनको दे दूँगा। इससे पाण्डव सदाके लिये दुःखी रहेंगे।’

कर्ण बड़े दृढ़प्रतिज्ञ थे। वे विचित्र ही दानवीर थे। इन्द्रके माँगनेपर उन्होंने अपने नैसर्गिक (जन्मजात) कुण्डल और कवच उतारकर दे दिये थे। माता कुत्तीके द्वारा माँगनेपर उन्होंने उनको पाँच पुत्रोंके बने रहनेका वचन दिया, जिसमें उन्होंने कहा ‘माँ! मैं युधिष्ठिर, भीष्म, नकुल और सहदेवको तो मारूँगा नहीं, पर अर्जुनके साथ मेरा युद्ध होगा। युद्धमें अगर अर्जुन मेरेको मार देगा, तो तेरे पाँच पुत्र रहेंगे ही और अगर मैं अर्जुनको मार दूँगा, तो भी मेरेसहित तेरे पाँच पुत्र रहेंगे!’

७६८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

'अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहीवावनिपालसङ्घैः' —दुर्योधनके पक्षमें जितने राजालोग हैं, जो युद्धमें दुर्योधनका प्रिय करना चाहते हैं (गीता—पहले अध्यायका तेईसवाँ श्लोक) अर्थात् दुर्योधनको हितकी सलाह नहीं दे रहे हैं, उन सभी राजाओंके समूहोंके साथ धृतराष्ट्रके दुर्योधन, दुःशासन आदि सौ पुत्र विकराल दाढ़ोंके कारण अत्यन्त भयानक आपके मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रवेश कर रहे हैं—'वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दृष्ट्वाकरालानि भयानकानि ।'

विराट्रूपमें वे चाहे भगवान्में प्रवेश करें, चाहे भगवान्के मुखोंमें जायँ, वह एक ही लीला है। परन्तु भावोंके अनुसार उनकी गतियाँ अलग-अलग प्रतीत हो रही हैं। इसलिये भगवान्में जायँ अथवा मुखोंमें जायँ, वे हैं तो विराट्रूपमें ही।

'केचिद्विलग्ना दशानान्तेषु संधूश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्घ्रैः' —जैसे खाद्य पदार्थोंमें कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं, जो चबाते समय सीधे पेटमें चले जाते हैं, पर कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं, जो चबाते समय दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें

फँस जाते हैं। ऐसे ही आपके मुखोंमें प्रविष्ट होनेवालोंमेंसे कई-एक तो सीधे भीतर (पेटमें) चले जा रहे हैं, पर कई-एक चूर्ण हुए मस्तकोंसहित आपके दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।

यहाँ एक शंका होती है कि योद्धालोग तो अभी सामने युद्धक्षेत्रमें खड़े हुए हैं, फिर वे अर्जुनको विराट्रूपके मुखोंमें जाते हुए कैसे दिखायी दिये? इसका समाधान यह है कि भगवान् विराट्रूपमें अर्जुनको आसन्न भविष्यकी बात दिखा रहे हैं। भगवान्ने विराट्रूप दिखाते समय अर्जुनसे कहा था कि तू और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह भी मेरे इस विराट्रूपमें देख ले (सातवाँ श्लोक)। अर्जुनके मनमें सन्देह था कि युद्धमें हमारी जीत होगी या कौरवोंकी? (दूसरे अध्यायका छठा श्लोक) इसलिये उस सन्देहको दूर करनेके लिये भगवान् अर्जुनको आसन्न भविष्यका दृश्य दिखाकर मानो यह बताते हैं कि युद्धमें तुम्हारी ही जीत होगी। आगे अर्जुनके द्वारा प्रश्न करनेपर भी भगवान्ने यही बात कही है (बत्तीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक)।

परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान्के विराट्रूपमें आसन्न भविष्यको देख रहे हैं। कालातीत होनेसे भगवान्में भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों काल वर्तमान ही हैं (गीता—सातवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध —जो अपना कर्तव्य समझकर धर्मकी दृष्टिसे युद्धमें आये हैं और जो परमात्माकी प्राप्ति चाहनेवाले हैं—ऐसे पुरुषोंका विराट्रूपमें नदियोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥

यथा= जैसेअभिमुखाः= सम्मुखतव= आपके
नदीनाम्= नदियोंकेद्रवन्ति= दौड़ते हैं,अभिविज्वलन्ति= सब तरफसे
बहवः= बहुत-सेतथा= ऐसे हीदेदीप्यमान
अम्बुवेगाः= जलके प्रवाहअमी= वेवक्त्राणि= मुखोंमें
एव= (स्वाभाविक) हीनरलोकवीराः= संसारके महान्विशन्ति= प्रवेश
समुद्रम्= समुद्रकेशूरवीरकर रहे हैं।

व्याख्या'यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति' —मूलमें जलमात्र समुद्रका है। वही जल बादलोंके द्वारा वर्षारूपमें पृथ्वीपर बरसकर झरने, नाले आदिको लेकर नदियोंका रूप धारण करता है। उन नदियोंके जितने वेग हैं, प्रवाह हैं, वे सभी स्वाभाविक ही समुद्रकी तरफ दौड़ते हैं। कारण कि जलका उद्गम स्थान समुद्र ही है। वे सभी जल-प्रवाह समुद्रमें जाकर अपने नाम

और रूपको छोड़कर अर्थात् गंगा, यमुना, सरस्वती आदि नामोंको और प्रवाहके रूपको छोड़कर समुद्ररूप ही हो जाते हैं। फिर वे जल-प्रवाह समुद्रके सिवाय अपना कोई अलग, स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखते। वास्तवमें तो उनका स्वतन्त्र अस्तित्व पहले भी नहीं था, केवल नदियोंके प्रवाहरूपमें होनेके कारण वे अलग दीखते थे।

'तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभि-

श्लोक २९ ]

  • साधक-संजीवनी *

७६९

विज्वलन्ति —नदियोंकी तरह मात्र जीव नित्य सुखकी अभिलाषाको लेकर परमात्माके सम्मुख ही दौड़ते हैं। परन्तु भूलसे असत्, नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे वे सांसारिक संग्रह और संयोगजन्य सुखमें लग जाते हैं तथा अपना अलग अस्तित्व मानने लगते हैं। उन जीवोंमें वे ही वास्तविक शूरवीर हैं, जो सांसारिक संग्रह और सुखभोगोंमें न लगकर, जिसके लिये शरीर

मिला है, उस परमात्मप्राप्तिके मार्गमें ही तत्परतासे लगे हुए हैं। ऐसे युद्धमें आये हुए भीष्म, द्रोण आदि नरलोकवीर आपके प्रकाशमय (ज्ञानस्वरूप) मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।

सामने दीखनेवाले लोगोंमें परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले लोग विलक्षण हैं और बहुत थोड़े हैं। अतः उनके लिये परोक्षवाचक ‘अमी’ (वे) पद दिया गया है।

सम्बन्ध —जो राज्य और प्रशांसाके लोभसे युद्धमें आये हैं और जो सांसारिक संग्रह और भोगोंकी प्राप्तिमें लगे हुए हैं—ऐसे पुरुषोंका विराद्वरूपमें पतंगोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।

तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥

यथा = जैसे पतङ्गाः = पतंगे (मोहवश) नाशाय = (अपना) नाश करनेके लिये समृद्धवेगाः = बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रदीप्तम् = प्रज्वलित

ज्वलनम् = अग्नियें विशन्ति = प्रविष्ट होते हैं, तथा = ऐसे एव = ही लोकाः = ये सब लोग अपि = भी (मोहवश) नाशाय = (अपना) नाश

करनेके लिये समृद्धवेगाः = बड़े वेगसे दौड़ते हुए तव = आपके वक्त्राणि = मुखोंमें विशन्ति = प्रविष्ट हो रहे हैं।

व्याख्या —‘यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः’—‘जैसे हरी-हरी घासमें रहनेवाले पतंगे चातुर्मासकी अँधेरी रात्रियें कहींपर प्रज्वलित अग्नि देखते हैं, तो उसपर मुग्ध होकर (कि बहुत सुन्दर प्रकाश मिल गया, हम इससे लाभ ले लेंगे, हमारा अँधेरा मिट जायगा) उसकी तरफ बड़ी तेजीसे दौड़ते हैं। उनमेंसे कुछ तो प्रज्वलित अग्नियें स्वाहा हो जाते हैं; कुछको अग्निकी थोड़ी-सी लपट लग जाती है तो उनका उड़ना बंद हो जाता है और वे तड़पते रहते हैं। फिर भी उनकी लालसा उस अग्निकी तरफ ही रहती है! यदि कोई पुरुष दया करके उस अग्निको बुझा देता है तो वे पतंगे बड़े दुःखी हो जाते हैं कि उसने हमारेको बड़े लाभसे वंचित कर दिया!

‘तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि

समृद्धवेगाः’ —‘भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही तत्परतापूर्वक लगे रहना और मनमें भोगों और संग्रहका ही चिन्तन होते रहना—यह बढ़ा हुआ सांसारिक वेग है। ऐसे वेगवाले दुर्बोधनादि राजालोग पतंगोंकी तरह बड़ी तेजीसे कालचक्ररूप आपके मुखोंमें जा रहे हैं अर्थात् पतनकी तरफ जा रहे हैं—चौरासी लाख योनियों और नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि प्रायः मनुष्य सांसारिक भोग, सुख, आराम, मान, आदर आदिको प्राप्त करनेके लिये रात-दिन दौड़ते हैं। उनको प्राप्त करनेमें उनका अपमान होता है, निन्दा होती है, घाटा लगता है, चिन्ता होती है, अन्तःकरणमें जलन होती है और जिस आयुके बलपर वे जी रहे हैं, वह आयु भी समाप्त होती जाती है, फिर भी वे नाशवान् भोग और संग्रहकी प्राप्तिके लिये भीतरसे लालायित रहते हैं*।

  • अजानन् दाहात्म्यं पतति शलभो दीपदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्विज्ञायुतमभ्यनाति पिशितम्।

विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्जालजटिलान् न मुंचामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥ ( भर्तृहरिवैराग्यशतक )

‘पतंग दीपकके दाहक स्वरूपको न जाननेके कारण ही उसपर गिरता है, मछली भी अज्ञानवश ही बंसीमें लगे हुए मांसके टुकड़ोंको निगलती है; परन्तु हमलोग जानते हुए भी विपत्तिके जटिल जालमें फँसानेवाली कामनाओंको नहीं छोड़ते; अहो! मोहको महिमा बड़ी गहन है।’

७७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

परिशिष्ट भाव —पिछले श्लोकमें नदियोंका और इस श्लोकमें पतंगोंका दृष्टान्त दिया गया है। पतंगे तो मोहवश लेनेकी इच्छासे खुद अग्नियमें जाते हैं, पर नदियाँ अपने-आपको देनेके लिये समुद्रमें जाती हैं। अतः जो मनुष्य, 'लेने' की इच्छा रखते हैं, वे पतंगोंके समान हैं और जो मनुष्य 'देने' की इच्छा रखते हैं, वे नदियोंके समान हैं, लेनेका भाव जड़ता है और देनेका भाव चेतनता है। लेनेकी भावनासे अशुभ कर्म और देनेकी भावनासे शुभ कर्म होते हैं। लेनेकी इच्छावालोंके लिये स्वर्ग हैं और देनेकी इच्छावालोंके लिये मोक्ष है। कारण कि लेनेका भाव बाँधनेवाला और देनेका भाव मुक्त करनेवाला होता है।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें दो दृष्टान्तोंसे दोनों समुदायोंका वर्णन करके अब सम्पूर्ण लोकोंका प्रसन्न करते हुए विश्वरूप भगवान्के भयानक रूपका वर्णन करते हैं।

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदैनैर्ज्वलद्भिः ।

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥

ज्वलद्भिः= (आप अपने)समन्तात्= सब ओरसेतेजोभिः= अपने तेजसे
प्रज्वलितलेलिह्यसे= बार-बार चाट रहे हैं;समग्रम्= सम्पूर्ण
वदैनः= मुखोंद्वाराजगत्= जगत्को
समग्रान्= सम्पूर्णविष्णो= (और) हे विष्णो !आपूर्य= परिपूर्ण
लोकान्= लोकोंकातव= आपकाकरके
ग्रसमानः= प्रसन्न करते हुएउग्राः= उग्रप्रतपन्ति= (सबको)
(उन्हें)भासः= प्रकाशतपा रहा है।

व्याख्या —'लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान् समग्रान्वदैनैर्ज्वलद्भिः'—आप सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार कर रहे हैं और कोई इधर-उधर न चला जाय, इसलिये बार-बार जीभके लपेटेसे अपने प्रज्वलित मुखोंमें लेते हुए उनका प्रसन्न कर रहे हैं। तात्पर्य है कि कालरूप भगवान्की

जीभके लपेटसे कोई भी प्राणी बच नहीं सकता।

'तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो'—विराटरूप भगवान्का तेज बड़ा उग्र है। वह उग्र तेज सम्पूर्ण जगत्में परिपूर्ण होकर सबको संतप्त कर रहा है, व्यथित कर रहा है।

परिशिष्ट भाव —यहाँ 'लोकान्समग्रान्' (लोकमात्र) तथा 'जगत्समग्रम्' (जड़-चेतन, स्थावर-जंगमरूप जगन्मात्र) कहनेका तात्पर्य है कि यह सब कुछ भगवान्के ही समग्ररूपके अन्तर्गत है।

गीतामें भगवान्को भी समग्र कहा है—'असंशयं समग्रं माम्' (७।१), कर्मोंको भी समग्र कहा है—'यज्ञायाचरतः कर्म समग्रम्' (४।२३) और प्रस्तुत श्लोकमें संसारको भी समग्र कहा है। इसका तात्पर्य है कि सब भगवान्के ही रूप हैं।

सम्बन्ध —विराटरूप भगवान् अपने विलक्षण-विलक्षण रूपोंका दर्शन कराते ही चले गये। उनके भयंकर और अत्यन्त उग्ररूपके मुखोंमें सम्पूर्ण प्राणी और दोनों पक्षोंके योद्धा जाते देखकर अर्जुन बहुत घबरा गये। अतः अत्यन्त उग्ररूपधारी भगवान्का वास्तविक परिचय जाननेके लिये अर्जुन प्रश्न करते हैं।

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥

मे= मुझे यहभवान्= आपते= आपको
आख्याहि= बताइये किकः= कौन हैं ?नमः= नमस्कार
उग्ररूपः= उग्र रूपवालेदेववर= हे देवताओंमें श्रेष्ठ !अस्तु= हो ।

श्लोक ३२ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७९

प्रसीद= (आप) प्रसन्न होइये।विज्ञातुम्= तत्त्वसे जाननातव= आपकी
आद्यम्= आदिरूपइच्छामि= चाहता हूँ;प्रवृत्तिम्= प्रवृत्तिको
भवन्तम्= आपको (मैं)हि= क्योंकि (मैं)न, प्रजानामि= भलीभाँति नहीं जानता।

व्याख्या— आख्याहि मे को भवानुग्रूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद—आप देवरूपसे भी दीख रहे हैं और उग्ररूपसे भी दीख रहे हैं; तो वास्तवमें ऐसे रूपोंको धारण करनेवाले आप कौन हैं?

अत्यन्त उग्र विराट् रूपको देखकर भयके कारण अर्जुन नमस्कारके सिवाय और करते भी क्या? जब अर्जुन भगवान् के ऐसे विराट् रूपको समझनेमें सर्वथा असमर्थ हो गये, तब अन्तमें कहते हैं कि हे देवताओंमें श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है।

भगवान् अपनी जीभसे सबको अपने मुखोंमें लेकर बार-बार चाट रहे हैं, ऐसे भयंकर बर्तावको देखकर अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि आप प्रसन्न हो जाइये।

‘विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्’— भगवान्का पहला अवतार विराट्-(संसार-) रूपमें ही हुआ था। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि आदिनारायण! आपको मैं स्पष्टरूपसे नहीं जानता हूँ। मैं आपकी इस प्रवृत्तिको भी नहीं जानता हूँ कि आप यहाँ क्यों प्रकट हुए हैं? और आपके मुखोंमें हमारे पक्षके तथा

विपक्षके बहुत-से योद्धा प्रविष्ट होते जा रहे हैं; अतः वास्तवमें आप क्या करना चाहते हैं? तात्पर्य यह हुआ कि आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं—इस बातको मैं जानना चाहता हूँ और इसको आप ही स्पष्टरूपसे बताइये।

एक प्रश्न होता है कि भगवान्का पहला अवतार विराट्-(संसारके) रूपमें हुआ और अभी अर्जुन भगवान्के किसी एक देशमें विराट् रूप देख रहे हैं—ये दोनों विराट् रूप एक ही हैं या अलग-अलग? इसका उत्तर यह है कि वास्तविक बात तो भगवान् ही जानें, पर विचार करनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुनने जो विराट् रूप देखा था, उसीके अन्तर्गत यह संसाररूपी विराट् रूप भी था। जैसे कहा जाता है कि भगवान् सर्वव्यापी हैं, तो इसका तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि भगवान् केवल सम्पूर्ण संसारमें ही व्याप्त हैं, प्रत्युत भगवान् संसारसे बाहर भी व्याप्त हैं। संसार तो भगवान् के किसी अंशमें है तथा ऐसी अनन्त सृष्टियाँ भगवान् के किसी अंशमें हैं। ऐसे ही अर्जुन जिस विराट्-रूपको देख रहे हैं, उसमें यह संसार भी है और इसके सिवाय और भी बहुत कुछ है।

परिशिष्ट भाव— भगवान् के ऐश्वर्ययुक्त उग्ररूपको श्रीकृष्णसे पूछ बैठते हैं कि आप कौन हैं!

देखकर अर्जुन इतने घबरा जाते हैं कि अपने ही सखा

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अर्जुनने प्रार्थनापूर्वक जो प्रश्न किया था, उसका यथार्थ उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

कालोऽस्मि लोकक्षयकृतप्रवृद्धो लोकात्ममाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥

श्रीभगवान् बोले—

लोकक्षयकृत्= (मैं) सम्पूर्ण लोकोंका नाश करनेवालासमाहर्तुम्= संहार करनेके लियेअवस्थिताः= खड़े हैं,
प्रवृद्धः= बढ़ा हुआप्रवृत्तः= (यहाँ) आया हूँ।सर्वे= (वे) सब
कालः= कालप्रत्यनीकेषु= (तुम्हारे) प्रतिपक्षमेंत्वाम्= तुम्हारे
अस्मि= हूँ (और)ये= जोऋते= (युद्ध किये) बिना
इह= इस समय (मैं)योधाः= योद्धालोगअपि= भी
लोकान्= (इन सब)= नहीं
भविष्यन्ति= रहेंगे।

७७२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

व्याख्या —[ भगवान्का विश्वरूप विचार करनेपर बहुत विलक्षण मालूम देता है; क्योंकि उसको देखनेमें अर्जुनकी दिव्यदृष्टि भी पूरी तरहसे काम नहीं कर रही है और वे विश्वरूपको कठिनतासे देखे जानेयोग्य बताते हैं—‘दुर्निरीक्ष्यं समन्तात्’ (११।१७)। यहाँ भी वे भगवान्से पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं? ऐसा मालूम देता है कि अगर अर्जुन भयभीत होकर ऐसा नहीं पूछते तो भगवान् और भी अधिक विलक्षणरूपसे प्रकट होते चले जाते। परन्तु अर्जुनके बीचमें ही पूछनेसे भगवान्ने और आगेका रूप दिखाना बन्द कर दिया और अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देने लगे।]

‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्स्वप्नद्वः’ —पूर्वश्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं—‘आख्याहि मे को भवानुग्ररूपः’ , उसके उत्तरमें विराट्रूप भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय (नाश) करनेवाला बड़े भयंकररूपसे बढ़ा हुआ अक्षय काल हूँ। ‘लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः’ —अर्जुनने पूछा था कि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जान रहा हूँ—‘न हि प्रजानामितव प्रवृत्तिम्’ अर्थात् आप यहाँ क्या करने आये हैं? उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मैं इस समय दोनों सेनाओंका संहार करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ।

‘ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः’ —तुमने पहले यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा—‘न योत्स्ये’ (२।९), तो क्या तुम्हारे युद्ध किये बिना ये प्रतिपक्षी नहीं मरेंगे? अर्थात् तुम्हारे युद्ध

करने और न करनेसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कारण कि मैं सबका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। यह बात तुमने विराट्रूपमें भी देख ली है कि तुम्हारे पक्षकी और विपक्षकी दोनों सेनाएँ मेरे भयंकर मुखोंमें प्रविष्ट हो रही हैं।

यहाँ एक शंका होती है कि अर्जुनने अपनी और कौरवपक्षकी सेनाके सभी लोगोंको भगवान्के मुखोंमें जाकर नष्ट होते हुए देखा था, तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल प्रतिपक्षकी ही बात क्यों कही कि तुम्हारे युद्ध किये बिना भी ये प्रतिपक्षी नहीं रहेंगे? इसका समाधान है कि अगर अर्जुन युद्ध करते तो केवल प्रतिपक्षियोंको ही मारते और युद्ध नहीं करते तो प्रतिपक्षियोंको नहीं मारते। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी नहीं बचेंगे; क्योंकि मैं कालरूपसे सबको खा जाऊँगा। तात्पर्य यह है कि इन सबका संहार तो होनेवाला ही है, तुम केवल अपने युद्धरूप कर्तव्यका पालन करो।

एक शंका यह भी होती है कि यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि प्रतिपक्षके योद्धालोग तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे, फिर इस युद्धमें प्रतिपक्षके अश्वत्थामा आदि योद्धा कैसे बच गये? इसका समाधान है कि यहाँ भगवान्ने उन्हीं योद्धाओंके मरनेकी बात कही है, जिनको अर्जुन मार सकते हैं और जिनको अर्जुन आगे मारेंगे। अतः भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि जिन योद्धाओंको तुम मार सकते हो, वे सभी तुम्हारे मारे बिना ही मर जायेंगे। जिनको तुम आगे मारोगे, वे मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं—‘मयैवैते निहताः पूर्वमेव’ (११।३३)।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा था कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी योद्धा नहीं रहेंगे। ऐसी स्थितिमें अर्जुनको क्या करना चाहिये—इसका उत्तर भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥

तस्मात्= इसलियेसमृद्धम्= धन-धान्यसेनिहताः= मारे हुए हैं।
त्वम्= तुम (युद्धके लिये)सम्पन्नसव्यसाचिन्= हे सव्यसाचिन् अर्थात् दोनों हाथोंसे बाण चलानेवाले अर्जुन! (तुम इनको मारनेमें)
उत्तिष्ठ= खड़े हो जाओ (और)राज्यम्= राज्यको
यशः= यशकोभुङ्क्ष्व= भोगो।
लभस्व= प्राप्त करो (तथा)एते, एव= ये सभी
शत्रून्= शत्रुओंकोमया= मेरे द्वारानिमित्तमात्रम्= निमित्तमात्र
जित्वा= जीतकरपूर्वम्= पहलेसेभव= बन जाओ।
एव= ही

श्लोक ३३ ]

  • साधक-संजीवनी *

७७३

व्याख्या —‘तस्मान्तमुत्तिष्ठ यशो लभस्व’—हे अर्जुन! जब तुमने यह देख ही लिया कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी बचेंगे नहीं, तो तुम कमर कसकर युद्धके लिये खड़े हो जाओ और मुफ्तमें ही यशको प्राप्त कर लो। इसका तात्पर्य है कि यह सब होनहार है, जो होकर ही रहेगी और इसको मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष दिखा भी दिया है। अतः तुम युद्ध करोगे तो तुम्हें मुफ्तमें ही यश मिलेगा और लोग भी कहेंगे कि अर्जुनने विजय कर ली?

‘यशो लभस्व’ कहनेका यह अर्थ नहीं है कि यशकी प्राप्ति होनेपर तुम फूल जाओ कि ‘वाह’! मैंने विजय प्राप्त कर ली’, प्रत्युत तुम ऐसा समझो कि जैसे ये प्रतिपक्षी मेरे द्वारा मारे हुए ही मरेंगे, ऐसे ही यश भी जो होनेवाला है, वही होगा। अगर तुम यशको अपने पुरुषार्थसे प्राप्त मानकर राजी होओगे, तो तुम फलमें बँध जाओगे—‘फले सक्तो निबध्यते ’ (गीता ५।१२)। तात्पर्य यह हुआ कि लाभ-हानि, यश-अपयश सब प्रभुके हाथमें है। अतः मनुष्य इनके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े; क्योंकि ये तो होनहार हैं।

‘जित्वा शत्रून् भुङ्क्व राज्यं समृद्धम्’ —समृद्ध राज्यमें दो बातें होती हैं—(१) राज्य निष्कण्टक हो अर्थात् उसमें बाधा देनेवाला कोई भी शत्रु या प्रतिपक्षी न रहे और (२) राज्य धन-धान्यसे सम्पन्न हो अर्थात् प्रजाके पास खूब धन-सम्पत्ति हो; हाथी, घोड़े, गाय, जमीन, मकान, जलाशय आदि आवश्यक वस्तुएँ भरपूर हों; प्रजाके खानेके लिये भरपूर अन्न हो। इन दोनों बातोंसे ही राज्यकी समृद्धता, पूर्णता होती है। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शत्रुओंको जीतकर तुम ऐसे निष्कण्टक और धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो।

यहाँ राज्यको भोगनेका अर्थ अनुकूलताका सुख भोगनेमें नहीं है, प्रत्युत यह अर्थ है कि साधारण लोग जिसे भोग मानते हैं, उस राज्यको भी तुम अनायास प्राप्त कर लो।

‘मयैवैते निहताः पूर्वमेव’ —तुम मुफ्तमें यश और राज्यको कैसे प्राप्त कर लोगे, इसका हेतु बताते हैं कि यहाँ जितने भी आये हुए हैं, उन सबकी आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् कालरूप मेरे द्वारा ये पहलेसे ही मारे जा चुके हैं।

‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ —बायें हाथसे बाण चलानेके कारण अर्थात् दायें और बायें—दोनों हाथोंसे बाण चलानेके कारण अर्जुनका नाम ‘सव्यसाची’ था*। इस नामसे सम्बोधित करके भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं

कि तुम दोनों हाथोंसे बाण चलाओ अर्थात् युद्धमें अपनी पूरी शक्ति लगाओ, पर बनना है निमित्तमात्र। निमित्तमात्र बननेका तात्पर्य अपने बल, बुद्धि, पराक्रम आदिको कम लगाना नहीं है, प्रत्युत इनको सावधानीपूर्वक पूरा-का-पूरा लगाना है। परन्तु मैंने मार दिया, मैंने विजय प्राप्त कर ली—यह अभिमान नहीं करना है; क्योंकि ये सब मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। इसलिये तुम्हें केवल निमित्तमात्र बनना है, कोई नया काम नहीं करना है।

निमित्तमात्र बनकर कार्य करनेमें अपनी ओरसे किसी भी अंशमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिये, प्रत्युत पूरी-की-पूरी शक्ति लगाकर सावधानीपूर्वक कार्य करना चाहिये। कार्यकी सिद्धिमें अपने अभिमानका किंचित्मात्र भी अंश नहीं रखना चाहिये। जैसे, भगवान् श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वत उठाया तो उन्होंने ग्वालबालोंसे कहा कि तुमलोग भी पर्वतके नीचे अपनी-अपनी लाटियाँ लगाओ। सभी ग्वालबालोंने अपनी-अपनी लाटियाँ लगायीं और वे ऐसा समझने लगे कि हम सबकी लाटियाँ लगनेसे ही पर्वत ऊपर ठहरा हुआ है। वास्तवमें पर्वत ठहरा हुआ था भगवान्के बायें हाथकी छोटी अंगुलीके नखपर! ग्वालबालोंमें जब इस तरहका अभिमान हुआ, तब भगवान्ने अपनी अंगुली थोड़ी-सी नीचे कर ली। अंगुली नीचे करते ही पर्वत नीचे आने लगा तो ग्वालबालोंने पुकारकर भगवान्से कहा—‘अरे दादा! मेरे! मेरे!! मेरे!!!’ भगवान्ने कहा कि जोरसे शक्ति लगाओ। पर वे सब-के-सब एक साथ अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी पर्वतको ऊँचा नहीं कर सके। तब भगवान्ने पुनः अपनी अंगुलीसे पर्वतको ऊँचा कर दिया।

ऐसे ही साधकको परमात्मप्राप्तिके लिये अपने बल, बुद्धि, योग्यता आदिको तो पूरा-का-पूरा लगाना चाहिये, उसमें कभी किंचित्मात्र भी कमी नहीं रखनी चाहिये, पर परमात्माका अनुभव होनेमें बल, उद्योग, योग्यता, तत्परता, जितेन्द्रियता, परिश्रम आदिको कारण मानकर अभिमान नहीं करना चाहिये। उसमें तो केवल भगवान्की कृपाको ही कारण मानना चाहिये। भगवान्ने भी गीतामें कहा है कि शाश्वत अविनाशी पदकी प्राप्ति मेरी कृपासे होगी—‘मत्प्रसादा-दवाजोति शाश्वतं पदमव्ययम् ’ (१८।५६), और सम्पूर्ण विघ्नोंको मेरी कृपासे तर जायगा—‘मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादातरिष्यसि ’ (१८।५८)। इससे यह सिद्ध हुआ कि केवल निमित्तमात्र बननेसे साधकको परमात्माकी प्राप्ति

  • उभौ मे दक्षिणौ पाणौ गाण्डीवस्य विकर्षणे। तेन देवमनुष्येषु सव्यसाचीति मां विदुः॥ (महा० विराट० ४४।१९)

७७४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

हो जाती है।

जब साधक अपना बल मानते हुए साधन करता है, तब अपना बल माननेके कारण उसको बार-बार विफलताका अनुभव होता रहता है और तत्त्वकी प्राप्तिमें देरी लगती है। अगर साधक अपने बलका किंचिन्मात्र भी अभिमान न करे तो सिद्धि तत्काल हो जाती है। कारण कि परमात्मा तो नित्यप्राप्त है ही, केवल अपने पुरुषार्थके अभिमानके कारण ही उनका अनुभव नहीं हो रहा था। इस पुरुषार्थके अभिमानको दूर करनेमें ही 'निमित्तमात्रं भव' पदोंका तात्पर्य है।

कर्मोंमें जो अपने करनेका अभिमान है कि 'मैं करता हूँ तो होता है, अगर मैं नहीं करूँ तो नहीं होगा', यह

केवल अज्ञताके कारण ही अपनेमें आरोपित कर रखा है। अगर मनुष्य अभिमान और फलेच्छाका त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाय, तो उसका उद्धार स्वतःसिद्ध है। कारण कि जो होनेवाला है, वह तो होगा ही, उसको कोई अपनी शक्तिसे रोक नहीं सकता; और जो नहीं होनेवाला है, वह नहीं होगा, उसको कोई अपने बल-बुद्धिसे कर नहीं सकता। अतः सिद्धि-असिद्धिमें सम रहते हुए कर्तव्य-कर्मोंका पालन किया जाय तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है। बन्धन, नरकोंकी प्राप्ति, चौरासी लाख योनियोंकी प्राप्ति—ये सभी कृतिसाध्य हैं और मुक्ति, कल्याण, भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम आदि सभी स्वतःसिद्ध हैं।

परिशिष्ट भाव—'निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्' —निमित्तमात्र बननेका तात्पर्य यह नहीं है कि नाममात्रके लिये कर्म करो, प्रत्युत इसका तात्पर्य है कि अपनी पूरी-की-पूरी शक्ति लगाओ, पर अपनेको कारण मत मानो अर्थात् अपने उद्योगमें कमी भी मत रखो और अपनेमें अभिमान भी मत करो। भगवान्ने जो कुछ बल, विद्या, योग्यता आदि दी है, वह सब लगानेके लिये दी है; परन्तु अपना पूरा बल आदि लगाकर हम उसको प्राप्त नहीं कर सकते। प्राप्ति तो उनकी कृपासे ही होगी।

भगवान्ने अपनी ओरसे हमारेपर कृपा करनेमें कोई कमी नहीं रखी है। जैसे बछड़ा एक थनसे ही दूध पीता है, पर भगवान्ने गायको चार थन दिये हैं! ऐसे ही भगवान् चारों तरफसे हमारेपर कृपा कर रहे हैं! हमें तो निमित्तमात्र बनना है। अर्जुनके सामने तो युद्ध था, इसलिये भगवान् उनसे कहते हैं कि तुम निमित्तमात्र बनकर युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी। इसी तरह हमारे सामने संसार है; अतः हम भी निमित्तमात्र बनकर साधन करें तो संसारपर हमारी विजय हो जायगी।

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।

मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्तान् ॥ ३४ ॥

द्रोणम्= द्रोणतथा= तथाजहि= मारो।
= औरअन्यान्मा, व्यथिष्ठाः= तुम व्यथा मत करो।
भीष्मम्= भीष्मअपि= अन्य सभीयुध्यस्व= (और) युद्ध करो।
= तथामया= मेरे द्वारारणे= युद्धमें (तुम निःसन्देह)
जयद्रथम्= जयद्रथहतान्= मारे हुएसपत्तान्= वैरियोंको
= औरयोधवीरान्= शूरवीरोंकोजेतासि= जीतोगे।
कर्णम्= कर्णत्वम्= तुम

व्याख्या—'द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् मया हतांस्त्वं जहि' —तुम्हारी दृष्टिमें गुरु द्रोणाचार्य, पितामह भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य जितने प्रतिपक्षके नामी शूरवीर हैं, जिनपर विजय करना बड़ा

कठिन काम है*, उन सबकी आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् वे सब कालरूप मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। इसलिये हे अर्जुन! मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मार दो।

भगवान्के द्वारा पूर्वश्लोकमें 'मयैवैते निहताः पूर्वमेव'

  • भीष्म, द्रोण और कर्ण अपनी शूरवीरताके कारण संसारमें प्रसिद्ध थे; अतः इनको जीतनेमें कठिनता थी। जयद्रथ तो ऐसा कोई नामी शूरवीर था नहीं, पर उसको एक वरदान था कि 'तुम्हारा सिर कोई पृथ्वीपर गिरा देगा तो उस (सिर गिरानेवाले-) के सिरके सौ टुकड़े हो जायेंगे। इस वरदानके कारण जयद्रथको मारनेमें कठिनता थी।

श्लोक ३४ ]

  • साधक-संजीवनी *

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और यहाँ 'मया हतांस्तं जहि' कहनेका तात्पर्य यह है कि तुम इनपर विजय करो, पर विजयका अभिमान मत करो; क्योंकि ये सब-के-सब मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं।

'मा व्यथिष्ठा युध्यस्व'—अर्जुन पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्यको मारनेमें पाप समझते थे, यही अर्जुनके मनमें व्यथा थी। अतः भगवान् कह रहे हैं कि वह व्यथा भी तुम मत करो अर्थात् भीष्म और द्रोण आदिको मारनेसे हिंसा आदि दोषोंका विचार करनेकी तुम्हें किंचिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। तुम अपने क्षात्रधर्मका अनुष्ठान करो अर्थात् युद्ध करो। इसका त्याग मत करो।

'जेतासि रणे सप्लान्'—इस युद्धमें तुम वैरियोंको जीतोगे। ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि पहले (गीता—दूसरे अध्यायके छठे श्लोकमें) अर्जुनके कहा था कि हम उनको जीतेंगे या वे हमें जीतेंगे—इसका हमें पता नहीं। इस प्रकार अर्जुनके मनमें सन्देह था। यहाँ ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको विश्वरूप देखनेकी आज्ञा दी, तो उसमें भगवान्ने कहा कि तुम और भी जो कुछ देखना चाहो, वह देख लो (सातवाँ श्लोक) अर्थात् किसकी जय होगी और किसकी पराजय होगी—यह भी तुम देख लो। फिर भगवान्ने विराट्रूपके अन्तर्गत भीष्म, द्रोण और कर्णके नाशकी बात दिखा दी और इस श्लोकमें वह बात स्पष्टरूपसे कह दी कि युद्धमें निःसन्देह तुम्हारी विजय होगी।

विशेष बात

साधकको अपने साधनमें बाधकरूपसे नाशवान् पदार्थोंका, व्यक्तियोंका जो आकर्षण दीखता है, उससे वह घबरा जाता है कि मेरा उद्योग कुछ भी काम नहीं कर रहा है; अतः यह आकर्षण कैसे मिटे! भगवान् 'मयैवेते निहताः पूर्वमेव' और 'मया हतांस्तं जहि' पदोंसे ढाढ़स बँधाते हुए मानो

परिशिष्ट भाव —भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि ये सभी शूरवीर मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। इससे यह समझना चाहिये कि साधकके राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि भी पहलेसे ही मारे हुए हैं अर्थात् सत्तारहित हैं। इनको हमने ही सत्ता और महत्ता देकर अपनेमें स्वीकार किया है। वास्तवमें इनकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं—'नासतो विद्यते भावः' (गीता २।१६)।

सम्बन्ध—विराट्रूप भगवान्के अत्यन्त उग्ररूपको देखकर अर्जुनने इकतीसवें श्लोकमें पूछा कि आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आये हैं? बत्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने उसका उत्तर दिया कि मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। फिर तैंतीसवें-चौतीसवें श्लोकोंमें भगवान्ने अर्जुनको आश्वासन दिया कि मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे, तेरी जीत होगी। इसके बाद अर्जुनने क्या किया—इसको संजय आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यह आश्वासन देते हैं कि तुम्हारेको अपने साधनमें जो वस्तुओं आदिका आकर्षण दिखायी देता है और वृत्तियाँ खराब होती हुई दीखती हैं, ये सब-के-सब विघ्न नाशवान् हैं और मेरे द्वारा नष्ट किये हुए हैं। इसलिये साधक इनको महत्त्व न दे।

'दुर्गुण-दुराचार दूर नहीं हो रहे हैं, क्या करूँ!—ऐसी चिन्ता होनेमें तो साधकका अभिमान ही कारण है और 'ये दूर होने चाहिये और जल्दी होने चाहिये'—इसमें भगवान्के विश्वासकी, भरोसेकी, आश्रयकी कमी है। दुर्गुण-दुराचार अच्छे नहीं लगते, सुहाते नहीं, इसमें दोष नहीं है। दोष है चिन्ता करनेमें। इसलिये साधकको कभी चिन्ता नहीं करनी चाहिये।

'मेरे द्वारा मारे हुएको तू मार'—इस कथनसे यह शंका होती है कि कालरूप भगवान्के द्वारा सब-के-सब मारे हुए हैं तो संसारमें कोई किसीको मारता है तो वह भगवान्के द्वारा मारे हुएको ही मारता है। अतः मारनेवालेको पाप नहीं लगना चाहिये। इसका समाधान यह है कि किसीको मारनेका या दुःख देनेका अधिकार मनुष्यको नहीं है। उसका तो सबकी सेवा करनेका, सबको सुख पहुँचानेका ही अधिकार है। अगर मारनेका अधिकार मनुष्यको होता तो विधि-निषेध अर्थात् शुभ-कर्म करो, अशुभ-कर्म मत करो—ऐसा शास्त्रोंका, गुरुजनों और सन्तोंका कहना ही व्यर्थ हो जायगा। वह विधि-निषेध किसपर लागू होगा? अतः मनुष्य किसीको मारता है या दुःख देता है तो उसको पाप लगेगा ही; क्योंकि यह उसकी राग-द्वेषपूर्वक अनधिकार चेष्टा है। परन्तु क्षत्रियके लिये शास्त्रविहित युद्ध प्राप्त हो जाय, तो स्वार्थ और अहंकारका त्याग करके कर्तव्य-पालन करनेसे पाप नहीं लगता, क्योंकि यह क्षत्रियका स्वधर्म है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

संजय उवाच

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताज्जलिवैपमानः किरिटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदगदं भीतभीतः प्रणाम्य ॥ ३५ ॥

संजय बोले—

केशवस्य= भगवान् केशवकाकृताज्जलिः= हाथ जोड़करप्रणाम्य= प्रणाम
एतत्= यहनमस्कृत्वा= नमस्कार करकेकरके
वचनम्= वचन(और)सगदगदम्= गदगद वाणीसे
श्रुत्वा= सुनकरभीतभीतः= भयभीत होते हुएकृष्णम्= भगवान्
वेषमानः= (भयसे) काँपते हुएएव= भीकृष्णसे
किरीटी= किरिटीधारी अर्जुनभूयः= फिरआह= बोले।

व्याख्या—‘एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताज्जलिवैपमानः किरिटी’—अर्जुन तो पहलेसे भयभीत थे ही, फिर भगवान्ने ‘मैं काल हूँ, सबको खा जाऊँगा’—ऐसा कहकर मानो डरे हुएको और डरा दिया। तात्पर्य है कि ‘कालोऽस्मि’—यहाँसे लेकर ‘मया हतास्त्वं जहि’—यहाँतक भगवान्ने नाश-ही-नाशकी बात बतायी। इसे सुनकर अर्जुन डरके मारे काँपने लगे और हाथ जोड़कर बार-बार नमस्कार करने लगे।

अर्जुनने इन्द्रकी सहायताके लिये जब काल, खंज आदि राक्षसोंको मारा था, तब इन्द्रने प्रसन्न होकर अर्जुनको सूर्यके समान प्रकाशवाला एक दिव्य ‘किरीट’ (मुकुट) दिया था। इसीसे अर्जुनका नाम ‘किरीटी’ पड़ गया*। यहाँ ‘किरीटी’ कहनेका तात्पर्य है कि जिन्होंने बड़े-बड़े राक्षसोंको मारकर इन्द्रकी सहायता की थी, वे अर्जुन भी भगवान्के विराटरूपको देखकर कम्पित हो रहे हैं।

‘नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगदगदं भीतभीतः प्रणाम्य’—काल सबका भक्षण करता है; किसीको भी छोड़ता नहीं। कारण कि यह भगवान्की संहारशक्ति है, जो हरदम संहार करती ही रहती है। इधर अर्जुनने जब भगवान्के अत्युग्र विराटरूपको देखा तो उनको लगा कि भगवान् कालके भी काल—महाकाल हैं। उनके सिवाय दूसरा कोई भी कालसे बचानेवाला नहीं है। इसलिये अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बार-बार प्रणाम करते हैं।

‘भूयः’ कहनेका तात्पर्य है कि पहले पंद्रहवेंसे इकतीसवें श्लोकतक अर्जुनने भगवान्की स्तुति और नमस्कार किया, अब फिर भगवान्की स्तुति और नमस्कार करते हैं।

हर्षसे भी वाणी गदगद होती है और भयसे भी। यहाँ भयका विषय है। अगर अर्जुन बहुत ज्यादा भयभीत होते तो वे बोल ही न सकते। परन्तु अर्जुन गदगद वाणीसे बोलते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वे इतने भयभीत नहीं हैं।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकसे अर्जुन भगवान्की स्तुति करना आरम्भ करते हैं।

अर्जुन उवाच

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ३६ ॥

अर्जुन बोले—

हृषीकेश= हे अन्तर्यामीलीलाका) कीर्तन= और
भगवन्!करनेसेअनुरज्यते= अनुराग-(प्रेम)
तव= आपकेजगत्= यह सम्पूर्ण जगत्को प्राप्त हो
प्रकीर्त्या= (नाम, गुण,प्रहृष्यति= हर्षित हो रहा हैरहा है।
  • पुरा शक्रेण मे दत्तं युध्यतो दानवर्षभैः। किरिटं मूर्ध्नि सूर्याभं तेनाहर्मा किरिटिनम् ॥ (महा० विराट० ४४।१७)