श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 761, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
जाननेपर फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता (गीता—सातवें अध्यायका दूसरा श्लोक); क्योंकि उसके सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं।
सम्बन्ध—पंद्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक आश्चर्यचकित करनेवाले देवरूपका वर्णन करके अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन उस विश्वरूपकी उग्राता, प्रभाव, सामर्थ्यका वर्णन करते हैं।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥
| त्वाम् = आपको (मैं) | अनन्तबाहुम् = अनन्त | वाले (और) |
|---|---|---|
| अनादिमध्यान्तम्=आदि, मध्य | भुजाओंवाले, | स्वतेजसा = अपने तेजसे |
| और अन्तसे | शशिसूर्यनेत्रम् = चन्द्र और सूर्य- | इदम् = इस |
| रहित, | रूप नेत्रोंवाले, | विश्वम् = संसारको |
| अनन्तवीर्यम् = अनन्त प्रभाव- | दीप्तहुताशवक्त्रम्=प्रज्वलित | तपन्तम् = तपाते हुए |
| शाली, | अग्निरूप मुखों- | पश्यामि = देख रहा हूँ। |
व्याख्या—‘अनादिमध्यान्तम्’—आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं अर्थात् आपको कोई सीमा नहीं है।
सोलहवें श्लोकमें भी अर्जुनने कहा है कि मैं आपके आदि, मध्य और अन्तको नहीं देखता हूँ। वहाँ तो ‘देशकृत’ अनन्ताका वर्णन हुआ है और यहाँ ‘कालकृत’ अनन्ताका वर्णन हुआ है। तात्पर्य है कि देशकृत, कालकृत, वस्तुकृत आदि किसी तरहसे भी आपकी सीमा नहीं है। सम्पूर्ण देश, काल आदि आपके अन्तर्गत हैं, फिर आप देश, काल आदिके अन्तर्गत कैसे आ सकते हैं? अर्थात् देश, काल आदि किसीके भी आधारपर आपको मापा नहीं जा सकता।
‘अनन्तवीर्यम्’—आपमें अपार पराक्रम, सामर्थ्य, बल और तेज है। आप अनन्त, असीम, शक्तिशाली हैं।
‘अनन्तबाहुम्’—* आपकी कितनी भुजाएँ हैं, इसकी
परिशिष्ट भाव—इस श्लोकका तात्पर्य है कि भगवान् सब तरहसे अनन्त हैं। उनके तेजसे तपनेवाला विश्व भगवान्से अलग नहीं है। अतः तपानेवाला और तपनेवाला—दोनों ही भगवान्के स्वरूप हैं।
कोई गिनती नहीं हो सकती। आप अनन्त भुजाओं-वाले हैं।
‘शशिसूर्यनेत्रम्’—संसारमात्रको प्रकाशित करनेवाले जो चन्द्र और सूर्य हैं, वे आपके नेत्र हैं। इसलिये संसार-मात्रको आपसे ही प्रकाश मिलता है।
‘दीप्तहुताशवक्त्रम्’—यज्ञ, होम आदिमें जो कुछ अग्निमें हवन किया जाता है, उन सबको ग्रहण करनेवाले देदीप्यमान अग्निरूप मुखवाले आप ही हैं।
‘स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्’—अपने तेजसे सम्पूर्ण विश्वको तपानेवाले आप ही हैं। तात्पर्य यह है कि जिन-जिन व्यक्तियों, वस्तुओं, परिस्थितियों आदिसे प्रतिकूलता मिल रही है, उन-उनसे ही सम्पूर्ण प्राणी संतप्त हो रहे हैं। संतप्त करनेवाले और संतप्त होनेवाले—दोनों एक ही विराट्रूपके अंग हैं।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
- सोलहवें श्लोकमें अर्जुनने ‘अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्’ कहा और यहाँ भी ‘अनन्तबाहुम्’ कहते हैं, तो इसमें पुनरुक्ति-सी दीखती है। परन्तु वास्तवमें यह पुनरुक्ति नहीं है; क्योंकि वहाँ विराट्रूप भगवान्के देवरूपका वर्णन है और यहाँ उग्ररूपका वर्णन है। उग्ररूपका वर्णन होनेसे ही यहाँ ‘विश्वमिदं तपन्तम्’ और आगेके (बीसवें) श्लोकमें ‘दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम्’ पद आये हैं।