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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 760

श्लोक १८ ]

  • साधक-संजीवनी *

७५९

वृतिमप्रमेयम् —खूब देदीप्यमान अग्नि और सूर्यके समान आपकी कान्ति है। जैसे सूर्यके तेज प्रकाशके सामने आँखें चौंघ जाती हैं, ऐसे ही आपको देखकर आँखें चौंघ जाती हैं। अतः आप कठिनातासे देखे जानेयोग्य हैं। आपको ठीक तरहसे देख नहीं सकते।

[यहाँ एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी थी, पर वे दिव्यदृष्टिवाले अर्जुन

परिशिष्ट भाव—‘अप्रमेयम्’ —परमात्माके सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार सभी रूप अप्रमेय (अपरिमित) हैं और उनका अंश जीवात्मा भी अप्रमेय है—‘अनाशिनाऽप्रमेयस्य’ (गीता २।१८)। वे परमात्मा ज्ञानका विषय नहीं हैं; क्योंकि वे ज्ञानके भी ज्ञाता हैं—‘वेदान्तकृद्देविवेद चाहम्’ (गीता १५।१५)।

‘वृत्तिरीक्ष्यम्’ —भगवान्के द्वारा प्रदत्त दिव्यदृष्टिसे भी अर्जुन भगवान्के विराट्रूपको देखनेमें पूरे समर्थ नहीं हो रहे हैं! इससे सिद्ध होता है कि भगवान्की ही हुई शक्तिसे भी भगवान्को पूरा नहीं जान सकते। भगवान् भी अपनेको पूरा नहीं जानते, यदि जान जायँ तो वे अनन्त कैसे रहेंगे ?

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें अर्जुन भगवान्को निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकाररूपमें देखते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।

त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥

त्वम्= आप (ही)विश्वस्य= सम्पूर्ण विश्वकेत्वम्= (और) आप (ही)
वेदितव्यम्= जाननेयोग्यपरम्= परमअव्ययः= अविनाशी
परमम्= परमनिधानम्= आश्रय हैं,सनातनः= सनातन
अक्षरम्= अक्षर(अक्षर-
ब्रह्म) हैं,त्वम्= आप (ही)पुरुषः= पुरुष हैं
(—ऐसा)
त्वम्= आप (ही)शाश्वतधर्म-मे= मैं
अस्य= इसगोप्ता= सनातनधर्मके
रक्षक हैंमतः= मानता हूँ।

व्याख्या—‘त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्’ —वेदों, शास्त्रों, पुराणों, स्मृतियों, सन्तोंकी वाणियों और तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंद्वारा जाननेयोग्य जो परमानन्दस्वरूप अक्षरब्रह्म है, जिसको निर्गुण-निराकार कहते हैं, वे आप ही हैं।

‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’ —देखने, सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है, उस संसारके परम आश्रय, आधार आप ही हैं। जब महाप्रलय होता है, तब सम्पूर्ण संसार कारणसहित आपमें ही लीन होता है और फिर महासर्गके आदिमें आपसे ही प्रकट होता है। इस तरह

भी विश्वरूपको देखनेमें पूरे समर्थ नहीं हो रहे हैं! ऐसा देदीप्यमान भगवान्का स्वरूप है!]

आप सब तरफसे अप्रमेय (अपरिमित) हैं अर्थात् आप प्रमा-(माप-) के विषय नहीं हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि आदि कोई भी प्रमाण आपको बतानेमें काम नहीं करता; क्योंकि प्रमाणोंमें शक्ति आपकी ही है।

‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ —जब धर्मकी हानि और

अधर्मकी वृद्धि होती है, तब आप ही अवतार लेकर अधर्मका नाश करके सनातनधर्मकी रक्षा करते हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुण-साकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]

‘अव्ययः सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे’ —अव्यय

अर्थात् अविनाशी, सनातन, आदिरहित, सदा रहनेवाले

उत्तम पुरुष आप ही हैं, ऐसा मैं मानता हूँ।

आप इस संसारके परम निधान हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुण-निराकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]

‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ —जब धर्मकी हानि और

अधर्मकी वृद्धि होती है, तब आप ही अवतार लेकर अधर्मका नाश करके सनातनधर्मकी रक्षा करते हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुण-साकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]

‘अव्ययः सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे’ —अव्यय

अर्थात् अविनाशी, सनातन, आदिरहित, सदा रहनेवाले

उत्तम पुरुष आप ही हैं, ऐसा मैं मानता हूँ।

परिशिष्ट भाव— यहाँ ‘त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम्’ पदोंसे निर्गुण-निराकारकी बात आयी है, ‘त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्’ पदोंसे सगुण-निराकारकी बात आयी है और ‘त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता’ पदोंसे सगुण-साकारकी बात आयी है। तात्पर्य है कि निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकार—ये सब मिलकर भगवान्का समग्ररूप है, जिसको