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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ११ ]

व्याख्या—‘विश्वरूप’, ‘विश्वेश्वर’— इन सम्बोधनोंका तात्पर्य है कि मेरेको जो कुछ भी दीख रहा है, वह सब आप ही हैं और इस विश्वके मालिक भी आप ही हैं। सांसारिक मनुष्योंके शरीर तो जड़ होते हैं और उनमें शरीरी चेतन होता है; परन्तु आपके विराटरूपमें शरीर और शरीरी—ये दो विभाग नहीं हैं। विराटरूपमें शरीर और शरीररूपसे एक आप ही हैं। इसलिये विराटरूपमें सब कुछ चिन्मय-ही-चिन्मय है। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुन ‘विश्वरूप’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीर हैं और ‘विश्वेश्वर’ सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीरी (शरीरके मालिक) हैं।

‘अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्’— मैं आपके हाथोंकी तरफ देखता हूँ तो आपके हाथ भी अनेक हैं; आपके पेटकी तरफ देखता हूँ तो पेट भी अनेक हैं; आपके मुखकी तरफ देखता हूँ तो मुख भी अनेक हैं; और आपके नेत्रोंकी तरफ देखता हूँ तो नेत्र भी अनेक हैं। तात्पर्य है कि आपके हाथों, पेटों, मुखों और नेत्रोंका कोई अन्त नहीं है, सब-के-सब अनन्त हैं।

‘पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्’— आप देश, काल, परिशिष्ट भाव—यहाँ भगवान्के विराटरूपकी अनन्तताका वर्णन हुआ है। भगवान्के एक अंशमें भी अनन्तता है। जैसे स्याहीमें किस जगह कौन-सी लिपि नहीं है? सोनेमें किस जगह कौन-सा गहना नहीं है? ऐसे ही भगवान्में क्या नहीं है? अर्थात् भगवान्में स्वाभाविक ही सब कुछ है।

वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिके रूपमें चारों तरफ अनन्त-ही-अनन्त दिखायी दे रहे हैं।

‘नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्’— आपका कहाँ अन्त है, इसका भी पता नहीं; आपका कहाँ मध्य है, इसका भी पता नहीं और आपका कहाँ आदि है, इसका भी पता नहीं।

सबसे पहले ‘नान्तम्’ कहनेका तात्पर्य यह मालूम देता है कि जब कोई किसीको देखता है, तब सबसे पहले उसकी दृष्टि उस वस्तुकी सीमापर जाती है कि यह कहाँतक है। जैसे, किसी पुस्तकको देखनेपर सबसे पहले उसकी सीमापर दृष्टि जाती है कि पुस्तककी लम्बाई-चौड़ाई कितनी है। ऐसे ही भगवान्के विराटरूपको देखनेपर अर्जुनकी दृष्टि सबसे पहले उसकी सीमा- (अन्त-) की ओर गयी। जब अर्जुनको उसका अन्त नहीं दीखा, तब उनकी दृष्टि मध्यभागपर गयी; फिर आदि- (आरम्भ-) की तरफ दृष्टि गयी, पर कहीं भी विराटरूपका अन्त, मध्य और आदिका पता नहीं लगा। इसलिये इस श्लोकमें ‘नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम्’—यह क्रम रखा गया है।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥

त्वाम्= (मैं) आपको(आपको)दुर्निरीक्ष्यम्= नेत्रोंके द्वारा
किरीटिनम्= किरीट (मुकुट),तेजोराशिम्= तेजकी राशि,कठिनतासे देखे
गदिनम्= गदा,सर्वतः= सब ओरजानेयोग्य
चक्रिणम्= चक्र (तथा शंख और पद्म) धारणदीप्तिमन्तम्= प्रकाशवाले,
किये हुएदीप्तानार्कद्युतिम्= देदीप्यमानसमन्तात्
पश्यामि= देख रहा हूँ।अग्नि तथा सूर्यके समान कान्तिवाले,अप्रमेयम्
(देख रहा हूँ)।

व्याख्या—‘किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च’— आपको मैं किरीट, गदा और चक्र धारण किये हुए देख रहा हूँ। यहाँ ‘च’ पदसे शंख और पद्मको भी ले लेना चाहिये। इसका तात्पर्य ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनको विश्वरूपमें भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप भी दीख रहा है।

‘तेजोराशिम्’— आप तेजकी राशि हैं, मानो तेजका समूह-का-समूह (अनन्त तेज) इकट्ठा हो गया हो। इसका

पहले संजयने वर्णन किया है कि आकाशमें हजारों सूर्य एक साथ उदित होनेपर भी भगवान्के तेजकी बराबरी नहीं कर सकते (ग्यारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)। ऐसे आप प्रकाशस्वरूप हैं।

‘सर्वतो दीप्तिमन्तम्’— स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेसे आप चारों तरफ प्रकाश कर रहे हैं।

‘पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानार्क-