श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 763, कुल 1299 में से
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय ११ ]
भयानक सिंह, व्याघ्र, साँप आदि जन्तुओंको और मृत्युको देखकर त्रिलोकी भयभीत हो रही है।
मार्मिक बात
देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाला सम्पूर्ण संसार भगवान्के दिव्य विराटरूपका ही एक छोटा-सा अंग है। संसारमें जो जडता, परिवर्तनशीलता, अदिव्यता दीखती है, वह वस्तुतः दिव्य विराटरूपकी ही एक झलक है, एक लीला है। विराटरूपकी जो दिव्यता है, उसकी तो स्वतन्त्र सत्ता है, पर संसारकी जो अदिव्यता है, उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। अर्जुनको तो दिव्यदृष्टिसे भगवान्का विराटरूप दीखा, पर भक्तोंको भावदृष्टिसे यह संसार भगवत्स्वरूप दीखता है—‘वासुदेवः सर्वम्।’ तात्पर्य है कि जैसे बचपनमें बालकका कंकड़-पत्थरोंमें जो भाव
रहता है, वैसा भाव बड़े होनेपर नहीं रहता; बड़े होनेपर कंकड़-पत्थर उसे आकृष्ट नहीं करते, ऐसे ही भोगदृष्टि रहनेपर संसारमें जो भाव रहता है, वह भाव भोगदृष्टिके मिटनेपर नहीं रहता।
जिनकी भोगदृष्टि होती है, उनको तो संसार सत्य दीखता है, पर जिनकी भोगदृष्टि नहीं है, ऐसे महापुरुषोंको संसार भगवत्स्वरूप ही दीखता है। जैसे एक ही स्त्री बालकको माँके रूपमें, पिताको पुत्रीके रूपमें, पतिको पत्नीके रूपमें और सिंहको भोजनके रूपमें दीखती है, ऐसे ही यह संसार ‘चर्मदृष्टि’से सच्चा, ‘विवेकदृष्टि’से परिवर्तनशील, ‘भावदृष्टि’से भगवत्स्वरूप और ‘दिव्यदृष्टि’से विराटरूपका ही एक छोटा-सा अंग दीखता है।
परिशिष्ट भाव —इस श्लोकमें आये ‘त्वयैकेन’ पदका तात्पर्य है कि असंख्य रूपोंमें एक आप ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’। आपके अनेक रूपोंकी कोई गणना नहीं कर सकता, पर उनमें हैं आप एक ही।
भगवान्में अनेक तरहकी अद्भुतता है। वे देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, रूप, ज्ञान, योग आदि सब दृष्टियोंसे अनन्त हैं। जिसको हमने देखा नहीं, सुना नहीं, जाना नहीं, समझा नहीं और जो हमारी कल्पनामें आया ही नहीं, वह सब विराटरूपके अन्तर्गत है।
सम्बन्ध—अब अर्जुनकी दृष्टिके सामने (विराटरूपमें) स्वर्गादि लोकोंका दृश्य आता है और वे उसका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्द्वीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥
| अमी | = वे | प्राञ्जलयः | = हाथ जोड़े हुए | स्वस्ति | = ‘कल्याण हो! मंगल हो!’ |
|---|---|---|---|---|---|
| हि | = ही | (आपके नामों और | इति | = ऐसा | |
| सुरसङ्घाः | = देवताओंके समुदाय | गुणोंका) | उक्त्वा | = कहकर | |
| त्वाम् | = आपमें | गृणन्ति | = कीर्तन कर रहे हैं। | पुष्कलाभिः | = उत्तम-उत्तम |
| विशन्ति | = प्रविष्ट हो रहे हैं। | महर्षि- | स्तुतिभिः | = स्तोत्रोंके द्वारा | |
| केचित् | = (उनमेंसे) कई तो | सिद्धसङ्घाः | = महर्षियों और | त्वाम् | = आपकी |
| भीताः | = भयभीत होकर | सिद्धोंके समुदाय | स्तुवन्ति | = स्तुति कर रहे हैं। |
व्याख्या —‘अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति’—जब अर्जुन स्वर्गमें गये थे, उस समय उनका जिन देवताओंसे परिचय हुआ था, उन्हीं देवताओंके लिये यहाँ अर्जुन कह रहे हैं कि वे ही देवतालोग आपके स्वरूपमें प्रविष्ट होते हुए दीख रहे हैं। ये सभी देवता आपसे ही उत्पन्न होते हैं, आपमें ही स्थित रहते हैं और आपमें ही प्रविष्ट होते हैं।
‘केचिद्द्वीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति’ —परन्तु उन
देवताओंमेंसे जिनकी आयु अभी ज्यादा शेष है, ऐसे आज़ान देवता (विराटरूपके अन्तर्गत) नृसिंह आदि भयानक रूपोंको देखकर भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम, रूप, लीला, गुण आदिका गान कर रहे हैं।
यद्यपि देवतालोग नृसिंह आदि अवतारोंको देखकर और कालरूप मृत्युसे भयभीत होकर ही भगवान्का गुणगान कर