श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक २२ ]
- साधक-संजीवनी *
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रहे हैं (जो सभी विराटरूपके ही अंग हैं); परन्तु अर्जुनको ऐसा लग रहा है कि वे विराटरूप भगवान्को देखकर ही भयभीत होकर स्तुति कर रहे हैं। 'स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि:
पुष्कलाभि: '—सप्तर्षियों, देवर्षियों, महर्षियों, सनकादिकों और देवताओंके द्वारा स्वस्तिवाचन (कल्याण हो! मंगल हो!) हो रहा है और बड़े उत्तम-उत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुतियाँ हो रही हैं।
परिशिष्ट भाव—देवता, महर्षि, सिद्ध आदि सब भगवान्के ही विराटरूपके अंग हैं। अतः प्रविष्ट होनेवाले, भयभीत होनेवाले, भगवान्के नामों और गुणोंका कीर्तन करनेवाले तथा स्तुति करनेवाले भी भगवान् हैं और जिनमें प्रविष्ट हो रहे हैं, जिनसे भयभीत हो रहे हैं, जिनके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं और जिनकी स्तुति कर रहे हैं, वे भी भगवान् हैं। यह भगवान्के सगुण रूपकी विलक्षणता है!
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥
ये =जो रुद्रादित्या: =ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, वसव: =आठ वसु, साध्या: =बारह साध्यगण, विश्वे =दस विश्वेदेव च =और अश्विनौ =दो अश्विनीकुमार,
च =तथा मरुत: =उनचास मरुद्गण च =और ऊष्मपा: =गरम-गरम भोजन करनेवाले (सात पितृगण) च =तथा
गन्धर्वयक्षासुर- सिद्धसङ्घा: =गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं, सर्वे, एव =(वे) सभी विस्मिता: =चकित होकर त्वाम् =आपको वीक्षन्ते =देख रहे हैं।
व्याख्या—'रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च'—ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, आठ वसु, दो अश्विनीकुमार और उनचास मरुद्गण—इन सबके नाम इसी अध्यायके छठे श्लोककी व्याख्यामें दिये गये हैं, इसलिये वहाँ देख लेना चाहिये। मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु—ये बारह 'साध्य' हैं (वायुपुराण, छाछठवाँ अध्याय, पन्द्रहवाँ-सोलहवाँ श्लोक)। क्रतु, दक्ष, श्रव, सत्य, काल, काम, धुनि, कुरुवान्, प्रभवन् और रोचमान—ये दस 'विश्वेदेव' हैं (वायुपुराण, छाछठवाँ अध्याय, इकतीसवाँ-बत्तीसवाँ श्लोक)। कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात और बर्हिषत्—ये सात 'पितर' हैं (शिवपुराण, धर्म० तिरसठवाँ अध्याय, दूसरा श्लोक)। ऊष्म अर्थात् गरम अन्न खानेके कारण पितरोंका नाम 'ऊष्मपा' है। 'गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा: '—कश्यपजीकी पत्नी मुनि और प्राधासे तथा अरिष्टासे गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई है। गन्धर्वलोग राग-रागिनियोंकी विद्यामें बड़े चतुर हैं। ये स्वर्गलोकके गायक हैं। कश्यपजीकी पत्नी खसासे यक्षोंकी उत्पत्ति हुई है। देवताओंके विरोधी* दैत्यों, दानवों और राक्षसोंको असुर कहते हैं। कपिल आदिको सिद्ध कहते हैं। 'वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे'—उपर्युक्त सभी देवता, पितर, गन्धर्व, यक्ष आदि चकित होकर आपको देख रहे हैं। ये सभी देवता आदि विराटरूपके ही अंग हैं।
परिशिष्ट भाव—रुद्र, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव आदि सब-के-सब एक भगवान्के समग्ररूपके ही अंग हैं। अतः देखनेवाले और दीखनेवाले सभी एक परमात्मा ही हैं।
सम्बन्ध—अब अर्जुन आगेके तीन श्लोकोंमें विश्वरूपके महान् विकराल रूपका वर्णन करके उसका परिणाम बताते हैं।
- यहाँ आये 'असुर' शब्दमें 'नञ्' समास है—'न सुरा असुरा:'। अतः यहाँ 'असुर' शब्द देवताओंके विरोधीका वाचक है।